भारत की परमाणु नीति (दक्षिण एशिया में परमाणविक शक्ति संतुलन के विशेष सन्दर्भ में)

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परमाणु हथियारों के विकास ने राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में चिन्तन को नई दिशा प्रदान की है। प्रत्येक राष्ट्र चाहे वह कितना भी महान हो, बिना परमाणु हथियारों के शक्तिशाली नहीं बन सकता है। इसी सोच ने राष्ट्रों को ‘शान्ति की दौड़’ के बजाय ‘हथियारों की होड़’ में लगा दिया। अपनी सुरक्षा चिन्ताओं के कारण भारत भी परमाणु सम्पन्न देश बना। लेकिन भारतीय परमाणु नीति न तो आक्रामक है और न ही किसी पड़ोसी देश के लिए खतरा। 

भारतीय परमाणु नीति केवल भारतीय सुरक्षा चिन्ताओं का समाधान करती है। यह समाधान दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय परमाणु सन्तुलन स्थापित करता है। एक तरफ यह पाकिस्तान व चीन को संतुलित करता है तो दूसरे तरफ अमेरिका जैसे देश को भी इस क्षेत्र से दूर रखने का प्रयास करता है। इस प्रकार भारतीय परमाणु नीति ने केवल क्षेत्रीय स्तर पर बल्कि वैश्विक स्तर पर भी परमाणु सन्तुलन (Deterence) स्थापित किया है।

सुरक्षा किसी भी राष्ट्र की अनिवार्यता है। राष्ट्रीय सुरक्षा प्रारम्भ से ही एक विकट समस्या रही है हालांकि परमाणु हथियारों के आविष्कार ने इसे और भी जटिल बना दिया है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका द्वारा हिरोशिमा व नागासाकी पर गिराये गये दो परमाणु बमों ने राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में चिंतन को नई दिशा दी। प्रत्येक राष्ट्र यह विचार करने के लिए मजबूर हुआ कि क्या वे परम्परागत हथियारों से अपनी राष्ट्रीय अस्मिता, एकता, अखण्डता एवं अस्तित्व को बनाये रख सकते हैं? इसी आशंका ने पूरे विश्व में परमाणु शस्त्रों की होड़ शुरू कर दी। आज घोषित व अघोषित रूप में कम से कम 15-20 राष्ट्रों के पास परमाणु हथियार हैं।

परमाणु हथियारों के प्रति राष्ट्रों की ललक का कारण राष्ट्रीय सुरक्षा की सुनिश्चितता रही है। अब यह ललक अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है। इसलिए नि:शस्त्रीकरण और शस्त्र नियन्त्रण की बात की जाने लगी। इस बात की आवश्यकता महसूस की जाने लगी कि सभी परमाणु संपन्न राष्ट्रों को अन्तर्राष्ट्रीय नैतिकता के दायरे में लाया जाय। उनसे अपेक्षा की गई कि वे अपनी परमाणु नीति घोषित करें और यह सुनिश्चित करे कि इसका दुरूपयोग नहीं होगा। 

इसी सन्दर्भ में यहॉ भारतीय परमाणु नीति की चर्चा किया जा सकता है। स्वतन्त्रता के समय से ही भारत ‘पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण’ एवं ‘परमाणु ऊर्जा के शान्तिपूर्ण उपयोग’ में विश्वास करता है। इसके लिए भारत ने यू0एन0 महासभा में वर्ष 1961, 1978, 1988 में प्रस्ताव भी प्रस्तुत किये। साथ ही वह आंशिक परमाणु परीक्षण सन्धि (च्ज्ठज्) पर हस्ताक्षर करने वाला अग्रणी देश भी है। आन्तरिक एवं वाह्य सुरक्षा के दबावों के कारणों से भारत को 1974 एवं 1998 में परमाणु परीक्षण करना पड़ा। भारत अब भी अर्थात ‘नई परमाणु नीति’ में भी इन सिद्धान्तों में विश्वास करता है। 

परमाणु नि:शस्त्रीकरण के क्षेत्र में प्रथम बड़ा प्रयास 1963 में आंशिक परमाणु परीक्षण संधि के रूप में सामने आया। इसके प्रावधान निम्नलिखित हैं-
  1. कोई भी सदस्य राज्य वायुमण्डल, बाहरी अन्तरिक्ष तथा पानी के नीचे किसी भी तरह का कोई परमाणु परीक्षण नहीं करेगा।
  2. कोई भी सदस्य अपने भू-क्षेत्रीय समुद्र तथा खुले समुद्र में परमाणु परीक्षण नहीं करेगा।
  3. प्रत्येक सदस्य राष्ट्र, गैर-सदस्य राष्ट्रों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से परमाणु परीक्षण करने के लिए उत्साहित नहीं करेगा।
स्पष्ट है कि भारत ने PTBT पर हस्ताक्षर किया लेकिन चीन, फ्रांस जैसे देश इसमें शामिल नहीं रहे। जब इन देशों ने परमाणु क्षमता हासिल कर ली तब अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा छच्ज् (परमाणु अप्रसार संधि) प्रस्तावित किया गया जिसकी मुख्य धारायें निम्नलिखित है-
  1. परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र, परमाणु विहीन राष्ट्र को परमाणु बम बनाने के लिए तकनीक एवं सहायता नहीं देंगे। 
  2. परमाणु अस्त्र विहीन राष्ट्र परमाणु बम बनाने का अधिकार त्याग देंगे।
  3. वे राष्ट्र जिनमें परमाणु तकनीक की क्षमता है, वे उसका प्रयोग असैनिक कार्य के लिए करेंगे।
  4. असैनिक कार्य के लिए प्रयोग में लाये जा रहे परमाणु रिएक्टर अन्तर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA)  के निगरानी में रहेंगे। 
  5. जो राष्ट्र अपने परमाणु कार्यक्रमों को शान्तिपूर्ण कार्यों के रूप में प्रयोग करेंगे, उन्हें सभी तरह के ज्ञान व सामग्री दिया जायेगा। 
भारत ने NPT का विरोध करते हुए निम्न तर्क दिये-
  1. यह सन्धि भेदभावपूर्ण है। यह विश्व को दो भागों में विभाजित करती है- परमाणु सम्पन्न तथा परमाणु विहीन। 
  2. यह सन्धि इस विभेद को निरन्तर बनाये रखना चाहती है क्योंकि परमाणु सम्पन्न राष्ट्र परमाणु परीक्षण के लिए स्वतन्त्र हैं जबकि गैर परमाणु सम्पन्न राष्ट्र शान्तिपूर्ण कार्यों के लिए भी परीक्षण नहीं कर सकते हैं।
  3. यह सन्धि ‘पूर्ण परमाणु नि:शस्त्रीकरण’ के विरुद्ध हैं। वास्तव में यह नि:शस्त्रीकरण के लिए सन्धि नहीं है बल्कि इसका लक्ष्य अप्रसार है।
  4. यह सन्धि चीन जैसे परमाणु संम्पन्न राष्ट्र से भारत को सुरक्षा प्रदान नहीं करती।
  5. यह सन्धि शान्तिपूर्ण कार्यों के लिए भी परीक्षण करने के लिए भारत पर प्रतिबन्ध लगाती है।
इसी भेदभाव का विरोध करते हुए भारत ने 1974 में शान्तिपूर्ण परमाणु विस्फोट किया जो कि भारत के राष्ट्रीय हितों के अनुरूप है। दूसरी तरफ NPT 05.03.1970 को लागू हो गयी और भारत के विरोध के बावजूद 1995 में अनिश्चित काल के लिए लागू की गयी।

NPT के बाद CTBT (व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबन्ध सन्धि) अस्तित्व में आया। भारत 1993 में अमेरिका के साथ इस सन्धि का प्रस्तावक था लेकिन अमेरिका ने बाद में इसे बदलकर अपने हितों के अनुरूप ढाल लिया। इसके मुख्य प्रावधान इस प्रकार हैं-
  1. कोई भी राष्ट्र, आकाश, समुद्र या भूमिगत परमाणु परीक्षण नहीं करेंगे।
  2. इसमें ‘बल प्रयोग प्रवेश’ का प्रावधान है। अर्थात यह सन्धि तभी लागू होगी जब सभी परमाणु सम्पन्न एवं सम्भावित परमाणु सम्पन्न राष्ट्र इस पर हस्ताक्षर कर देंगे। 
  3. सन्धि के उल्लंघन की जॉच के लिए अन्तर्राष्ट्रीय निगरानी तन्त्र स्थापित किया जायेगा
  4. कोई भी राष्ट्र निरीक्षण का अनुरोध करने के लिए समर्थ होगा।
भारत CTBT का विरोध करता है जिसके निम्न कारण हैं-
  1. यह सन्धि भेदभाव पर आधारित है क्योंकि वह विश्व को दो भागों में बॉटती है- परमाणु सम्पन्न एवं परमाणु विहीन राष्ट्र।
  2. यह सन्धि परमाणु परीक्षण पर पूर्णत: रोक नहीं लगाती क्योंकि परमाणु सम्पन्न राष्ट्र इस समय कम्प्यूटर पर परीक्षण करने में समर्थ हैं।
  3. यह सन्धि यू0एन0ओ0 के लक्ष्य पूर्ण परमाणु नि:शस्त्रीकरण को पूरा नहीं करती।
  4. यह सन्धि भारतीय सुरक्षा चिन्ताओं का निवारण नहीं करती है।
  5. भारत को ‘बल द्वारा प्रवेश’ पर भी आपत्ति है।
  6. परमाणु शस्त्रधारी देश स्वयं परमाणु शस्त्रों की प्राप्ति व विकास करने के बाद ऐसी सन्धि अपना रहे थे। अब तक अमेरिका 1029, रूस 715, फ्रांस 191 तथा चीन 42 परमाणु परीक्षण कर चुके थे। एक अनुमान के अनुसार आज अमेरिका के पास 14500, रूस के पास 2900, फ्रांस के पास 512, ब्रिटेन 205 तथा चीन के पास 284 परमाणु बम है।
  7. कुछ देशों ने पहले NPT का उल्लंघन किया था, अब CTBT का भी उल्लंघन करेंगे।
  8. फ्रांस व चीन जो 1995 तक परमाणु परीक्षण कर रहे थे आज वे परमाणु परीक्षण निषेध की बात कर रहे हैं क्योंकि अब वे इतने आकड़े व ज्ञान इकट्ठा कर चुके थे जिसके आधार पर कम्प्यूटरों का प्रयोग कर अनुरूपण परीक्षण कर सकते हैं।
जब पड़ोसी राष्ट्र चीन द्वारा परमाणु कार्यक्रमों का विस्तार किया जा रहा था तथा पाकिस्तान ने भी चोरी छिपे परमाणु शस्त्र प्राप्त कर लिया तब भारत की सुरक्षा चिन्तायें बढ़ने लगी। दूसरी तरफ परमाणु सम्पन्न राष्ट्र पूर्ण निरस्त्रीकरण का संकेत नहीं दे रहे थे तो इसी कारण भारत को ‘शक्ति 98’ नाम पाँच परमाणु परीक्षण करने पड़े। साथ ही भारत ने कम्प्यूटर प्रणाली से भी परीक्षण करने की क्षमता हासिल कर ली।

परीक्षण के साथ ही भारत ने स्वयं को परमाणु शक्ति सम्पन्न देश घोषित किया लेकिन महाशक्तियों ने इसे मान्यता नहीं दिया। इस पर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी का कहना था कि जो हमारे पास है उसके लिए किसी के प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। इसका यह अर्थ नहीं है कि भारत अब पूर्ण परमाणु नि:शस्त्रीकरण में विश्वास नहीं करता। अब भी भारतीय परमाणु नीति नि:शस्त्रीकरण पर जोर देती है। 

अनेक असमंजस को दूर करने हेतु नई परमाणु नीति 1999 घोषित की गयी-
  1. भारत पहले परमाणु अस्त्रों का प्रयोग नहीं करेगा 
  2. परमाणु अस्त्र विहीन राष्ट्र पर परमाणु बम का प्रयोग नहीं करेगा।
  3. भारत न्यूनतम और विश्वसनीय परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को बनाये रखेगा।
  4. परमाणु अस्त्रों का प्रयोग राजनीतिक नेतृत्व द्वारा। 
  5. भारत अब और परीक्षण नहीं करेगा।
  6. भारत परमाणु शक्ति का प्रयोग आत्म रक्षा के लिए करेगा।
  7. परमाणु प्रौद्योगिकी के निर्यात पर कड़ा नियन्त्रण अर्थात भारत अपनी परमाणु प्रौद्योगिकी को हस्तान्तरण नहीं करेगा।
  8. परमाणु शक्ति सम्पन्नता हासिल करने के बाद भी भारत विश्व को परमाणु शक्ति विहीन बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।
  9. भारत का परमाणु हमला अपने लक्ष्य पर महाविनाश का दृश्य उपस्थित करेगा।
  10. जैविक एवं रासायनिक हथियारों के आक्रमण की स्थिति में परमाणु विकल्प खुला रहेगा।
सन् 2010 में परमाणु अस्त्र एवं तकनीक से सम्बन्धित दो महत्वपूर्ण सम्मेलन हुए प्रथम- वाशिंगटन तथा द्वितीय- तेहरान में। वाशिंगटन सम्मेलन मुख्यत: इस बात पर केन्द्रित था कि किस प्रकार परमाणु हथियार को आतंकवादियों के हाथों में जाने से रोका जाय। तेहरान सम्मेलन ने इस बात पर बल दिया कि शान्तिपूर्ण कार्यों के लिए परमाणु शक्ति के प्रयोग का अधिकार प्रत्येक राष्ट्र को है। भारतीय परमाणु नीति दोनों सम्मेलनों का समर्थन करती है। 

न्यूयार्क सम्मेलन में प्रधानमंत्री मनमोहन का सुझाव-अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में परमाणु सन्तुलन या आतंक सन्तुलन या डिटरेंस (Detarence) एक महत्वपूर्ण संकल्पना है। मूलत: यह एक सैन्य रणनीति है जिसके द्वारा राज्य के आक्रामक व्यवहार पर प्रतिबंध लगाया जाता है। इसमें संभावित आक्रामक राष्ट्र आक्रमण के संभावित नुकसान को देखते हुए आक्रमण नहीं करता है। अर्थात जब दो राष्ट्र परमाणु संपंन हो जाते हैं तो वे एक दूसरे पर आक्रमण नहीं करते। प्रत्येक राष्ट्र सम्भावित खतरे को देखते हुए अपने को आक्रमण से रोक लेता है। यही स्थित परमाणु सन्तुलन या डिटरेंस की है।

द्वितीय विश्वयुद्ध के अन्त तथा उसके बाद अमेरिका ने ये प्रदर्शित किया कि वह परमाणु हथियारों का प्रयोग कर सकता है। अमेरिका ने परमाणु हथियारों के विनाश का आतंक पैदा किया। अमेरिका राष्ट्रपति ने साम्यवाद व सोवियत संघ के विरुद्ध इसके प्रयोग की वकालत की।

1949 में सोवियत संघ ने भी परमाणु क्षमता हासिल कर ली। सोवियत संघ के राष्ट्रपति ख्रुश्चेव ने ‘शांतिपूर्ण सहअस्तित्व’ का नारा देते हुए कहते हैं कि परमाणु संपन्न राष्ट्र के मध्य युद्ध नहीं हो सकता है। फिर भी अमेरिका की क्षमता सोवियत संघ की अपेक्षा निर्णायक रूप से अधिक थी। सोवियत संघ ने संयुक्त राज्य अमेरिका की इस बढ़त को तब चुनौती दिया जब उसने 1957 में अन्तरिक्ष उपग्रह स्पुतनिक छोड़ा। इस घटना ने अमेरिका की सोच व नीति बदल दी। नई रणनीति के तहत अमेरिका ने घातक नरसंहारों के प्रयोग के बजाय राजनीति सौदेबाजी को प्राथमिकता दी।

अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में परमाणु संतुलन की नीति के प्रमुख उपाय इस प्रकार रहे हैं-
  1. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने पश्चिमी युरोप के राष्ट्रों के साथ मिलकर साम्यवादी प्रसार रोकने की नीति अपनायी। ऐसे में अमेरिका ने ‘निवारक स्टे्रेटजी’ का निर्माण किया। जिसका उद्देश्य था सोवियत संघ के विरुद्ध बगैर किसी प्रत्यक्ष उत्तेजना के आवश्यक होने पर परमाणु आक्रमण द्वारा शत्रु की सम्पूर्ण सैनिक शक्ति को नष्ट करना। 
  2. 1949 में रूस द्वारा अणुबम बना लेने के बाद अमेरिका ने ‘पूर्व प्रतिक्रियात्मक स्ट्रेटजी’ का सृजन किया। इसके अन्तर्गत शत्रु द्वारा स्ट्रेटजिक हवाई हमले की कार्यवाही प्रारम्भ करने के संकेत मिलते ही शत्रु पर परमाणु हमला कर देना शामिल था।
  3. सोवियत संघ की आक्रमकता को देखते हुए ‘जान फास्टर डलेस’ ने ‘सामूहिक प्रतिकार की स्टे्रटजी’ का प्रतिपादन किया। इसके अन्तर्गत ऐसी परमाणु शक्ति का विकास करना था जिसके द्वारा अपने चाहे हुए बिन्दुओं पर निश्चित समय पर आक्रमण कर शत्रु का विनाश किया जा सके।
  4. जब सोवियत संघ ने अन्तरमहाद्वीपीय प्रक्षेपास्त्रों का विकास कर लिया तब जान कैनेडी ने ‘क्रमिक प्रतिरोधकता की स्ट्रेटजी’ का प्रतिपादन किया। क्रमिक प्रतिरोधकता का उद्देश्य परमाणु व परम्परागत दोनों क्षेत्रों में संतुलन स्थापित करना था। 
अमेरिका व सोवियत संघ के बीच सन्तुलन स्थापित होने के बाद दो नवीन प्रकार की स्ट्रेटजी सामने आयी- 

क- प्रतिबल स्ट्रेटजी- इसका तात्पर्य ऐसी परमाणु क्षमता विकसित करना है, जिसके द्वारा शत्रु के अधिकांश सैनिक प्रतिष्ठानों व परमाणु हथियारों को प्रथम प्रहार द्वारा निश्चित रूप से नष्ट किया जा सके। दूसरी ओर शत्रु के जवाबी प्रहार से बचने के लिए द्वितीय प्रहारक क्षमता का होना अति आवश्यक है। 

ख- प्रतिनगर स्ट्रेटजी- सोवियत संघ का यह विश्वास था कि प्रतिकार की क्षमता को बेकार करने के लिए बड़े पैमाने पर प्रतिनगर स्ट्रेटजी का विकास करना आवश्यक है। इसके अन्तर्गत शत्रु के प्रमुख औद्योगिक नगरों व जनसंख्या वाले केन्द्रों को नष्ट करने हेतु परमाणु क्षमता प्राप्त करना है। रूस की दृष्टि में अमेरिका की जनता को इस नीति से बंधक बनाकर उसके द्वारा परमाणु हथियारों के प्रयोग पर रोक लगाने की यह उत्तम विधि है।

परमाणु डिटरेंस के परिणाम स्वरूप दो प्रवृत्तियॉं उभरती हैं- पहली प्रवृत्ति के अनुसार सोवियत संघ तथा अमेरिका ने अपने सहयोगी मित्रों को भी डिटरेंस उपलब्ध कराया, इसे ‘एटमी छाता’ भी कहा जाता है। अमेरिका का दायित्व अपने यूरोपीय मित्रों की रक्षा करना था तो सोवियत संघ ने पूर्वी यूरोपीय साम्यवादी देशों हेतु एटमी छाते का प्रयोग किया। दूसरी प्रवृत्ति- इन शक्तियों के द्वारा नि:शस्त्रीकरण पर जोर दिया गया।

प्रश्न उठता है कि भारतीय परमाणु नीति ने परमाणु डिटरेंस को किस तरह प्रभावित किया था या परमाणु डिटरेंस से भारतीय परमाणु नीति कैसे प्रभावित हुई ? पश्चिमी विचारकों के अनुसार भारत-पाक के मध्य डिटरेंस लागू होना सम्भव नहीं। जैसा कि विदित है, 1998 से भारत व पाक दोनों परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र है। पश्चिमी शक्तियों का मानना है कि यदि भारत परमाणु कार्यक्रमों का परित्याग करेगा तो पाकिस्तान स्वत: कर देगा। लेकिन भारत का मानना है कि भारतीय परमाणु कार्यक्रम किसी भी देश विशेष के प्रति नहीं बल्कि राष्ट्रीय रक्षा व प्रतिरक्षा के लिए है।

2009 में पहली बार पाक के तत्कालीन राष्ट्रपति श्री आसिफ अली जरदारी ने No first use की संकल्पना का समर्थन किया जबकि भारत द्वारा आरंभ से ही ये मान्यता स्वीकार की जाती रही है। 

अमेरिका सहित पश्चिमी देशों के अनुसार भारत एक उत्तरदायी राष्ट्र है जिसके पास उच्चतर रणनीति है जिसके निम्न कारण हैं- 
  1. भारत ने न्यूनतम परमाणु प्रतिरोध की क्षमता पर बल दिया और भारत हथियारों की दौड़ का समर्थक नहीं है।
  2. आज तक भारत का परमाणु हथियार या सामग्री के अवैध प्रसार का कोई प्रमाण नहीं है।
  3. भारत NPT तथा CTBT पर हस्ताक्षर न करने के बावजूद इनकी सभी मान्यताओं का पालन करता है।
  4. भारत में परमाणु हथियारों पर नियन्त्रण नागरिक सरकार का है, सैन्य प्रशासन या सरकार के पास नहीं है।
निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि दक्षिण एशिया में भी परमाणु संतुलन लागू है और इसकी सफलता बहुत कुछ पाकिस्तान के संयम व अनुशासन पर आधारित है। जुलाई 2013 में पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एन) पार्टी के श्री नवाज शरीफ ने प्रधानमंत्री की शपथ ली। आशा की जानी चाहिए कि यह सरकार आशातीत संयम व अनुशासन प्रदर्शित करेगी। अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में एक प्रमुख समस्या यह है कि परमाणु हथियारों को आतंकवादियों के हाथों में पहुँचने से कैसे रोका जाय। 

2010 में वाशिंगटन में आयोजित परमाणु सम्मेलन इसी पर केन्द्रित था। निश्चित रूप से जब तक बड़े राष्ट्रों तक परमाणु हथियार सीमित है, चिंता का विषय नहीं है लेकिन अब उत्तरी कोरिया, ईरान, पाकिस्तान, इण्डोनेशिया आदि देश भी परमाणु क्षमता का दावा करते हैं। इन देशों की शासन प्रणाली आतंकवादियों के दबाव को झेलने में सक्षम नहीं है। यहाँ से परमाणु रिसाव की सम्भावना बढ़ जाती है। यदि यह रिसाव ‘परमाणु हथियार व्यापार’ में बदल जाता है तो विश्व का विनाश निश्चित है, सम्पूर्ण मानवता का विनाश हो जायेगा। जय-पराजय का निर्णय करने वाला कोई नहीं बचेगा।

प्रश्न उठता है कि क्या भारतीय परमाणु नीति तर्क संगत है? बहुत से विद्वानों का मानना है कि अब भारत परमाणु तकनीक क्षमता हासिल कर लिया है अत: इसे NPT, CTBT  जैसे परमाणु सन्धियों पर हस्ताक्षर कर देने चाहिए। इससे भारत को न केवल सामरिक एवं आर्थिक लाभ होगा बल्कि पश्चिमी देशों से संबंध भी सुधरेंगे। सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का दावा भी मजबूत होगा।

मेरे विचार से विद्वानों का ये मत ठीक नहीं है। अमेरिका सहित अनेक देशों ने भारतीय परमाणु नीति को मान्यता देकर ही सिविल क्षेत्र में परमाणु सहयोग का समझौता किये हैं। इस कड़ी में फ्रांस, रूस, नामीविया, कजाकिस्तान, दक्षिण कोरिया, कनाडा, मंगोलिया जैसे अनेक राष्ट्र शामिल हैं। अनेक देश स्थायी सदस्यता का समर्थन भी करते हैं। भारत सम्पूर्ण प्रभुत्व संपंन एवं लोकतांत्रिक देश है। वह अवसरवादिता का खण्डन करता है। वह आज भी छच्ज् व ब्ज्ठज् के भेदभावपूर्ण प्रावधान का विरोध करता है। इस सन्धि में भारत एक ही शर्त पर हस्ताक्षर करेगा कि भारत भी अन्य पांच शक्तियों के साथ ही परमाणु शक्ति सम्पन्न देश घोषित हो।

सन्दर्भ -
  1. पंत, पुष्पेश एवं जैन श्रीपाल (2000), अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध, मीनाक्षी प्रकाशन, मेरठ।
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  6. पंत पुष्पेश, अन्तर्राष्ट्रीय संगठन, टाटा मैक्ग्राहिल पब्लिशिंग कम्पनी लिमिटेड, नई दिल्ली, 2008.
  7. पंत पुष्पेश, 21वीं शताब्दी में अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध, टाटा मैक्ग्राहिल, नई दिल्ली, 2008.
  8. सिंह डा0 रामकृष्ण, सिंह डा0 राकेश, सिंह डा0 रजवंत, ‘विश्व के प्रमुख स्टे्रटजिक चिंतक’, शारदा पुस्तक भवन, इलाहाबाद, 2011, पेज 181-193।

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