ब्रजभाषा का नामकरण और उपबोलियां

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ब्रजभाषा का नामकरण

ब्रजभाषा ब्रज क्षेत्र के आधार पर दिया गया नाम है। आजकल ब्रज शब्द से साधारणतया मथुरा या उसके आस-पास के भू-भाग को समझा जाता है। ब्रजभाषा के अन्य नाम अन्तर्वेदी और ग्वालियरी भी है। किन्तु ये दोनों नाम क्षेत्र की दृष्टि से संकुचित होने के कारण ज्यादा चलन में नहीं हैं। ब्रजभाषा के प्राचीन नाम मध्यदेशी तथा पिंगली भी मिलते हैं। ‘‘‘ब्रज’ शब्द का अर्थ होता है- गोष्ठ या गोस्थली जहाँ पर गो समूह रहता है।’’ 

वैदिक साहित्य में इसका प्रयोग पशुओं के समूह, उनके चरने के स्थान, गोचर भूमि और उनके बाड़े के रू प में मिलता है। पुराणों अथवा पुरावृत्तों में कहीं-कहीं स्थान के अर्थ में ब्रज शब्द का प्रयोग सम्भवत: गोकुल के लिये आया है। ब्रज का उल्लेख सर्वप्रथम ऋग्वेद संहिता में मिलता है हरिवंश पुराण, श्रीमद्भागवत, महापुराण, बाराह पुराण आदि में भी ब्रज शब्द मथुरा के निकटस्थ नन्द के ब्रज में प्रयुक्त हुआ है। 

प्राचीनकाल में ब्रज क्षेत्र के लोग गोचारण करते थे। गायों को चराने हेतु राजस्थान के घने जंगलों में यायावर वृत्थि को धारण करते थे इसी कारण इनकी संस्कृति ज्ञान प्रधान थी। इस प्रकार इस क्षेत्र की भाषा को ब्रजभाषा कहा जाता है। ब्रजभाषा मुख्यत: मथुरा, आगरा और अलीगढ़ की भाषा है। प्राचीनकाल में ही शूरसेन जनपद के नाम से प्रसिद्ध था जिसकी राजधारी मथुरा नगरी थी। लोकोक्तियों के आधार पर ब्रजभाषा को 84 कोस तक विस्तृत माना गया है और उसकी सीमाएँ निर्धारित की गयी हैं। ‘‘इत बरहद उत सोनहद। उत सूरसेन का गाँव।। ब्रज चौरासी कोस में। मथुरा मण्डल धाम।।’’

इस दोहे को आधार बनाकर एफ0एस0 ग्राउस ने ब्रजमण्डल की सीमा को स्पष्ट करते हुए कहा है- ‘‘ब्रजमण्डल के एक ओर की सीमा ‘वरस्थान’ है और दूसरी ओर सोन नदी और तीसरी ओर सूरसेन का गाँव है ‘वर’ अलीगढ़ जिले का वरहद स्थान है सोननदी की सीमा गुड़गाँव जिले तक जाती है। सूरसेन ग्राम यमुना तट पर बसा हुआ आगरा जनपद का बटेश्वर गाँव है।’’ सूरदास ने चौरासी कोस वाले ब्रज का उल्लेख किया है- 

‘‘चौरासी ब्रज कोस निरन्तर, खेलत है बलमोहन।
सामवेद रिगवेदयजुर में, कहे उच्चरित ब्रजमोहन।।’’

ब्रज और भाषा दोनों का ही विशेष महत्व प्राप्त है ब्रज जहाँ पूर्ण पुरुषोत्तम श्री कृष्ण चन्द्र की अवतार एवं लीला स्थली है वहीं ब्रजभाषा को बल्लभ सम्प्रदाय ने पुरुषोत्तम भाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया है। बल्लभाचार्य ने अष्टछाप के प्रथम चार कवियों को नियुक्त किया था और तभी से ब्रजभाषा काव्य सृजन की विविधवत प्रतिष्ठा हुई थी। भाषा की दृष्टि से सूर और परमानन्द से पहले ब्रजभाषा में रचना करने वाले किसी कवि का परिचय इतिहास नहीं देता। इस प्रकार अष्टछाप का प्रथम वर्ग ही ब्रजभाषा का आदि कवि वर्ग है और उससे भी अधिक श्रेय सूर को है। ब्रजभाषा के नाम के साथ जुड़ा हुआ ‘भाषा’ शब्द इसके अतीत के गौरव का परिचालक है। 

माधुर्य एवं समासोक्ति की दृष्टि से यह भाषा हिन्दी में सर्वोत्कृष्ट है तथा मध्य प्रदेश में विकसित होने के कारण इसमें संस्कृत एवं प्राकृत की श्रेष्ठ उपलब्धियाँ प्रकट हुयी हैं। वस्तुत: महान प्रभु बल्लभाचार्य तथा उनके पुत्र गोस्वामी बिट्ठल नाथ जी के द्वारा स्थापित अष्टछाप के आठ कवियों के द्वारा ही ब्रजभाषा कवियों के व्यवस्थित विवरणात्मक इतिहास का श्री गणेश हुआ था। 

अष्टछाप के कवियों की संगीतिक पद रचनाओं के अनुरूप ही इनके परवर्ती कवियों ने काव्य रचनाएं की जिनमें हित हरिवंश, मीराबाई, तुलसीदास, गदाधर भट्ट, श्री भट्ट, स्वामी हरिदास व्यास, रसखान, धु्रवदास, सूरदास, मदनमोहन, कबीरदास तथा निर्गुण धारा के अनेक संत कवियों ने इसी गेयपद शैली को अपनी रचना का माध्यम बनाया। 

इस काल में सगुण भक्ति धारा के कृष्णोपासक कवियों ने तो ब्रजभाषा का अवलम्बन ग्रहण ही किया था किन्तु रामोपासक कवियों ने भी ब्रजभाषा का सहारा लिया।

ब्रजभाषा की उपबोलियां

सामान्यत: बोली और भाषा का अर्थ एक ही होता है। ब्रजभाषा या ब्रजबोली, खड़ी बोली या भाषा कहने से कोई अन्तर नहीं आता है, क्योंकि एक भाषा की अनेक बोलियाँ हो सकती हैं। उसी प्रकार ब्रजभाषा की भी उपबोलियाँ हैं, क्योंकि सामान्यत: भाषा का परिवर्तन थोड़ी-थोड़ी दूर पर होता है। ‘‘कोस-कोस पर बदले पानी। दो कोस पर बानी।’’

कन्नौजी

गंगा किनारे स्थित फर्रुखाबाद जिले में कन्नौज नामक नगर वर्तमान है। ‘कन्नौज’ शब्द ‘कान्यकुब्ज’ का तद्भव है। इसका प्राचीन नाम पांचाल देश भी मिलता है। रामायण में भी इसका उल्लेख मिलता है। प्राचीन युग में कान्यकुब्ज प्रदेश की प्रतिष्ठा इतनी अधिक बढ़ी कि ब्राह्मणों के अतिरिक्त अन्य जातियों ने अपने नाम के साथ इसे लगाने में अपना गौरव माना। 

कन्नौजी का नामकरण इसी कन्नौज नगर के नाम के आधार पर हुआ। महाभारत काल में उत्तर पांचाल की राजधानी अहिच्छत्र और दक्षिण पांचाल की राजधानी का नाम काम्पिल था।

क्षेत्र- कन्नौजी बोली का क्षेत्र ब्रजभाषा तथा अवधी के बीच का है। फर्रुखाबाद कन्नौजी का केन्द्र है किन्तु उत्तर भारत में यह हरदोई, शाहजहाँपुर तथा पीलीभीत तक और दक्षिण में इटावा तथा कानपुर के पश्चिम भाग में बोली जाती है। कन्नौजी बोलने वालों की संख्या लगभग 45 लाख है। 

साहित्य- हरदोई, कानपुर और कन्नौज (फर्रुखाबाद) साहित्य और संस्कृति के प्रमुख स्थल रहे हैं, परन्तु यहाँ के साहित्यकार भाषा का सामान्य और व्यापक रूप अपनाते रहे हैं। कन्नौजी का लोक साहित्य ही प्राप्त होता है।

व्याकरण- कन्नौजी में स्त्रीलिंग ब्रजभाषा की ही तरह बनते हैं। सहुआइन, पण्डिताइन, मेहरिया, बकरिया इत्यादि। कन्नौजी में ‘ण’ व्यंजना का प्रयोग नहीं होता है। ‘ड़’ और ‘ल’ की अपेक्षा दोनों व्यंजनों के स्थान पर ‘र’ का उच्चारण होता है- भीर (भीड़), उजारो (उजाला), कारो (काला) इत्यादि। व्यंजन संयोग की प्रवृत्ति अधिकता से मिलती है। उदाहरण- असाढ़ को महीना लगो। सब किसानन की खेत बउन की साइत लगी।

एक किसान की साइत नाहीं परी। उसकी महरुआ कहन लगी कि सब किसान ख् ोत जोतन बउन गए तुह हर कौ घरै में धरैहो।

(आसाढ़ मास लगा। सभी किसानों के खेत बोने का मुहूर्त (साइत) हो गयी। एक किसान का मुहूर्त नहीं बना। उसकी औरत कहने लगी कि सभी किसान खेत जोतने बोने गये और तुम्हारा हल घर पर ही रखा है।)

बुन्देलखण्डी

बुन्देल खण्ड भारत का वह भू-भाग है जिसे उत्तर से यमुना, दक्षिण से नर्मदा, पूर्व से तमसा तथा पश्चिम से चम्बल घेरे हुए है। बुन्देला राजपूतों का प्रदेश होने के कारण इस क्षेत्र को बुन्देलखण्ड और यहाँ की भाषा को बुन्देलखण्डी कहते हैं। 

क्षेत्र- 14 वीं शताब्दी के आरम्भ से यहाँ बुन्देला राजाओं का राज्य रहा है। यद्यपि इस क्षेत्र की सीमाएँ घटती बढ़ती रही हैं फिर भी यह उक्ति भी बुन्देल की सीमाओं को स्पष्ट करती हैं- ‘‘यमुना उत्तर और नर्मदा दक्षिण अंचल। पूर्व ओर है टौंस, पश्चिमांचल में चंबल।।’’ 

आगरा, मैनपुरी तथा इटावा के दक्षिण में भी इसका प्रयोग होता है। दक्षिण बुन्देलखण्ड की सीमा से बहुत आगे तक बुन्देली का प्रयोग होता है। पूर्व में हिन्दी की बघेली बोली, उत्तर पश्चिम की ओर ब्रजभाषा, दक्षिण की ओर मराठी भाषा तथा दक्षिण पश्चिम की ओर राजस्थानी की विभिन्न बोलियाँ, जिसमें मालवी मुख्य है।

साहित्य- ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से बुन्देलखण्ड का महत्वपूर्ण स्थान है। हिन्दी के महाकवि तुलसीदास केशवदास, बिहारी, मतिराम, पùाकर आदि की जन्मभूमि बुन्देलखण्ड ही है। तथाकथित ब्रजभाषा साहित्य वास्तव में बुन्देली का ही साहित्य है लोक साहित्य की दृष्टि से भी बुन्देली एक सम्पन्न भाषा है। व्याकरण- संज्ञा पुल्लिंग में या स्त्रीलिंग में इया प्रत्यय का प्रयोग होता है- बिटिया, बेटवा, मलिनिया, चकिया, बैलबा आदि। व्यंजनों में ‘ड़’ का उच्चारण ‘र’ में परिवर्तित हो जाता है घुड़वा (घुरवा)

उदाहरण- कछु दिना पैले की बात है, एक चलतौ-फिरतौ आदमी एक राजा के दरबार में पाचौ। मुजरा कर चाकरी के लाने विनती करी।

(कुछ दिनों पहले की बात है एक चालाक आदमी एक राजा के दरबार में पहुँचा। सलाम करके नौकरी के लिये उसने विनती की)

राजस्थानी

पंजाब के ठीक दक्षिण में राजस्थानी भाषा का क्षेत्र है। राजस्थानी भाषा का प्राचीन काल से ही मध्यदेश से अत्यन्त निकट का सम्बन्ध है। यही कारण है कि इस पर मध्यदेश की शौरसेनी का प्रभाव है। अपनी उपभाषाओं सहित राजस्थानी को बोलने वालों की संख्या लगभग 2 करोड़ है। इसकी उपबोलियों में पश्चिमी राजस्थानी है। इसे मारवाड़ी भी कहते हैं इसका क्षेत्र जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर और उदयपुर है। 

इसी के अन्तर्गत मेवाड़ी और शेखावटी भी है। इसको बोलने वाले लगभग 60 लाख हैं। पूर्वी मध्य राजस्थानी का क्षेत्र जयपुर कोटा और बूंदी है। इसके अन्तर्गत जयपुरी तथा उसकी विभिन्न शैलियाँ जैसे अजमेरी और हाड़ौटी है। इसके बोलने वाले 50 लाख के लगभग हैं, उत्तरी पूर्वी राजस्थानी के अन्तर्गत मेवाड़ी और अहीरवाटी बोलियाँ आती हैं। इसका प्रयोग करने वालों की संख्या लगभग 25 लाख हैं ‘‘इन उपभाषाओं के प्रयोग के क्षेत्र में हिन्दी भाषा ही साहित्यिक भाषा है। निज के व्यवहार में राजस्थानी उपभाषायें महाजनी लिपि में लिखी जाती हैं। 

छपाई में देवनागरी लिपि का व्यवहार होता है।’’

ब्रजभाषा की आधुनिक सीमा

ब्रजभाषा की प्राचीन सीमाएँ ब्रज और उसके आस-पास तक सीमित थी। कुछ कवियों ने रीतिकाल में ही इस सीमा का विस्तारण किया और भिखारीदास जैसे कवियों ने ब्रजभाषा में लिखा, जो मूलत: प्रतापगढ़ जिले के निवासी थे उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा- ‘‘ब्रजकाव्य हेतु ब्रजवास को न मानियो।’’

वास्तव में ब्रजभाषा सीमाओं को तोड़कर आगे बढ़ी और जहाँ-जहाँ हिन्दी में कृष्ण काव्य लिखा गया उसमें अवधी नगण्य हो गयी और ब्रजभाषा प्रमुखत: से स्थान पायी। इस तरह से कृष्ण काव्य के साथ-साथ ब्रजभाषा का प्रभाव चतुर्दिक फैला जहाँ तक ब्रजभाषा के आधुनिक सीमा की बात है, तो ब्रजभाषा का स्वरूप वैश्विक रूप से परिलक्षित होता है। विश्व में जहाँ-जहाँ भी ब्रज क्षेत्र के लोग गये वहाँ-वहाँ पर ब्रजभाषा अपनी संस्कृति के साथ में पहुँच गयी। 

यद्यपि अवधी और भोजपुरी के मुकाबले में इसका स्थान मजबूती के साथ नहीं बन पाया लेकिन विदेशों में रहने वाले ब्रजभाषा भाषी अपनी संस्कृति के साथ अपनी भाषा को जीवन्त करने में जुटे हैं यह प्रसन्नता का विषय है कि कृष्ण और राधा की महत्ता पूरे संसार में है। इसलिये ब्रजभाषा की व्यापकता भी पूरे संसार में मानी जानी चाहिये। 

खड़ी बोली के युग में भी ब्रजभाषा अपना अस्तित्व बनाये हुये है और आज भी भारत में सवैया और घनाक्षरी छन्दों की प्रिय भाषा है।

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