चैत्य किसे कहते हैं ?

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भिक्षुओं के रहने का स्थान निश्चित हो जाने पर पूजा निमित्त स्थान की आवश्यकता का अनुभव किया अतएव पर्वतों को काटकर निवास-स्थान के साथ ही पूजा-प्रकार की व्यवस्था की गई। तत्पश्चात यह कार्य उत्तरोत्तर बढ़ता गया और शुंगकाल आते-आते अनगिनत गुफाएं खोदी गयी।

बौद्ध धर्म में स्तूप भगवान बुद्ध के प्रतीक के रूप में पूज्यनीय हैं तथा बाद में इन्हीं स्तूपों को ही चैत्य नाम से भी सम्बोधित किया गया। चैत्य पूजा के निमित्त जिन गुफाओं का निमार्ण् किया गया उन्हें ही चैत्यगृह कहा गया। चैत्य शब्द (चित्य+अण) अर्थात् पूजास्थान का बोधक है। चैत्य का बौद्धकला से बहुत गहरा सम्बन्ध रहा है परन्तु वैदिक साहित्य तथा संस्कतृ ग्रंथो में भी चैत्य शब्द प्राय: देवायतन के साथ प्रयुक्त हुआ है। 

चैत्य शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में किया गया है जैसे देवतास्थान, देवमन्दिर या बौद्ध यतनानि। अमरकोश में भी चैत्य के रूप में प्रस्तर तथा ईट द्वारा निर्मित भवन का उल्लेख मिलता है।

चीयते पाषाणादिना इति चैत्यम्। अभिलेखों में इसे चैत्य-गृह तथा साहित्य में चैत्य-प्रसाद भी कहा गया है। वस्तुत: यह एक प्रार्थना भवन है जहाँ भीतर एक स्तूप या चैत्य बनाया जाता था। इसी कारण इसे यह नाम दिया गया।

बौद्ध धमर् में भिक्षु समहू तथा उनके सामूहिक प्रार्थना को ध्यान में रखकर गुहा-निर्माण किया जाता था। इन्हीं कारणों से गुहा के मलू भावना में धार्मिक भावना निहित थी। उन दिनों  गुफाओं  का दान एक धामिर्क कृत्य माना जाता था। भिक्षु कलाकार विहार के समीप चैत्य तैयार करने लगे जिससे एक ही सीमा में निवास और पूजा कार्य सम्पन्न हो सके।

वास्तु की रूपरेखा की दृष्टि से चैत्य-प्रसाद सामान्यत: घोड़नाल के आकार का अर्द्धगोलाकार आकार के पर्वतों को काटकर तैयार किया जाता था। इसमें सामान्यत: एक बड़ा वर्तुलाकार छतवाला वृत्तायत मण्डप, होता है। इसे दो स्तम्भ श्रेणियाँ नाभि या बीच का भाग तथा पाश्र्ववीथिका में बांटती हैं, जो गोलाई लिए भाग की ओर एक स्तूप को घेरती हुई मिल जाती है। मौर्यकालीन सुदामा और लोमस-ऋषि नामक गुफाओं में इसका प्रमाण देखने को मिलता है।

भारत के प्रमुख चैत्य

वेडसा :

वेडसा कार्ले से 10 मील दूर दक्षिण में स्थित हैं। बेडसा के चैत्यगृह के द्वार-भाग के अलंकरण में काष्ठ-शिल्प से प्रस्तर-शिल्प की ओर प्रगति दृष्टिगोचर होती है। चैत्यशालाआं े का सर्वलक्षण सम्पन्न रूप देखने को मिलता है। गुहाआं े के मुखमण्डप में सामने के भाग में दो स्तम्भ है, जो अठपहल ू हैं। स्तम्भ की मध्य यष्टि तथा पशु शीर्षक के ऊपर अशोक कालीन स्तम्भो ं का स्पष्ट प्रभाव परलक्षित होता है जो काष्ठशिल्प के अनुकरण पर निर्मित हुए हैं। स्तम्भ का निचला भाग पूर्ण कुम्भ के मुख में निक्रिष्ठ है, जिनके सिरे पर नीच े की ओर लहराती हुई कमल की पंखुि ड़याँ हैं। स्तम्भो के शीर्ष चौकी पर युगल आरोही सहित एक ओर अश्वसंघाट तथा दूसरी ओर गजसंघाट की मूि र्तयो ं का प्रदर्शन वास्तु एवं शिल्प कला का सुन्दर समन्वय को दर्शाता है।

गुहा के मुख्य द्वार का पूरा भाग वेदिका से अलंकृत है। इस चैत्य-गृह का समस्त मुखपट यथार्थ स्वरूप में वास्तु एवं शिल्पकला का सर्वोत्तम उदाहरण है। इसके सौन्दर्य की तुलना केवल कार्ले के चैत्यगृह के मुखपट से की जा सकती है।

नासिक 

गोदावरी तट पर स्थित नासिक का प्राचीन नाम ‘‘नासिक्या’’ था। प्राकृतिक स्थिति व मनोरम वातावरण के कारण तत्कालीन बौद्ध भिक्षुओं ने ध्यान आवास के लिए इसे उपयुक्त समझा। यह ई0पू0 दूसरी शती में बौद्ध धम्म के केन्द्र के रूप में स्थापित हुआ। नासिक में कुल 17 गुहाएँ स्थित हैं, जिनमें 16 विहार तथा 1 चैत्यगृह है। इस चैत्यगृह का निर्माण ई0पू0 प्रथम शताब्दी के मध्य माना जाता है। नासिक चैत्यगृह समान वृत्तायत रूपरेखा पर ही निर्मित है। चैत्य के मण्डप के स्तम्भ सीधे हैं तथा मुखमण्डप द्वितलीय एवं अलंकृत होने के साथ ही वास्तु विन्यास की श्रेष्ठता को भी प्रदर्शित करता है। 

इसके निचले तल में गोलम्बर सहित प्रवेश द्वार हैं तथा ऊपर महाकीर्तिमुख अथवा सूर्यद्वार है, जिसके पाश्र्व में एक महाकाय यक्षाकृत रक्षापुरुष अंकित है।

नासिक का यह चैत्यगृह पाण्डुलेण के नाम से भी प्रसिद्ध है जो सम्पूर्ण पहाड़ी में उत्कीर्ण है। इसमें कहीं भी ‘काष्ठ-कर्म’ का प्रयोग नहीं मिलता है। प्रवेश द्वार के स्तम्भ शीर्षकों पर पशुसंघात शोभायमान है तथा मण्डप के चौकोर स्तम्भों पर भव्य मूर्तियों का शिल्पाकंन है। प्रवेश द्वार की परिष्कृत कला के आधार पर यह कहा जा सकता है कि इस पाण्डुलेण का निर्माण कुशल शिल्पियो द्वारा सम्पन्न किया गया था।

जुन्नार 

पुणे से लगभग 48 मील उत्तर दिशा में जुन्नार स्थित है। इसके समीप लगभग 150 शैल गृह पाये गये हैं, जिनमें 10 चैत्य गृह तथा शेष विहार हैं जो अनेक समूह में हैं। इनमें गणेशलेण एवं तुलजालेण विशेष महत्वपूर्ण है। इनका निर्माण काल ई0पू0 द्वितीय शती से ईस्वी प्रथम शती तक माना गया है।

गणेशलेण में चार चैत्यगृह हैं, जिसमें एक में नहपान का अभिलेख अंकित है। जुन्नार की चैत्य शालाओं में से 6 आयताकार हैं जिनकी भीतरी छतें चिपटी हैं तथा मण्डप स्तम्भ विहिन है। ऐसी विशेषताएँ अन्यत्र कहीं नहीं देखने को मिलती है। गणेशलेण समूह में केवल पशुओं के समूह या संघाट ही बनाये गए हैं, जिनमें सिंह या शार्दुल, चीते और हाथी है।

इसी प्रकार तुलजा समूह की भी एक चैत्यशाला गोल है जो अपने समय का अद्भुत चैत्यगृह माना जाता है। इस गुहा के कीर्तिमुख का अलंकरण भी सुन्दर है। जुन्नार की अधिकतर गुहाओं का सादा रूप विशेष उल्लेखनीय है। इनके अतिरिक्त कछु गुहाओं में ही श्रीलक्ष्मी, कमल, गरुण, सर्प आदि का अलंकरण दिखाई देता है। ‘मानमोद’ की चैत्यशाला में उत्कीर्ण गज-लक्ष्मी की प्रतिमा अत्यन्त कलात्मक है।

कन्हेरी 

इसका प्राचीन नाम कृष्ण गिरि था। यह मुम्बई से 16 मील उत्तर बोरविली स्टेशन से 5 मील दूर स्थित है। इस पर्वत श्रृंखला में बौद्ध भिक्षुओं  के निवास के लिए लगभग 100 सौ गुहाएँ बनायी गयी थीं। हीनयान सम्प्रदाय के अन्तिम समय में कन्हेरी के विहारों का निर्माण प्रारम्भ हुआ। कन्हेरी की गुफाओं में सबसे विशिष्ट यहाँ का चैत्यगृह है जिसके गृहमुख के सामने एक प्रांगण है, जो अन्यत्र कहीं नहीं मिलता। इस प्रांगण के सिरे पर एक वेदिका है, जो विभिन्न प्रकार से अलंकृत है। वेदिका के नीच े की पट्टी में यक्षो  की स्थानक मूर्तियाँ हैं, जो हाथ ऊपर उठाएँ हैं। इनमें से कुछ चर्तुभुजी हैं परन्तु सभी प्रतिमाओं का एक हाथ ऊपर की ओर उठा है मानो वे किसी भार को रोक रही हों। 

डॉ0 अग्रवाल ने उन्हें ‘भारपुत्रक’ की संज्ञा देना उपयुक्त समझा। आँगन के दोनों छारे पर दो बड़ े स्तम्भ हैं, जो कार्ले के सदृश हैं। इन स्तम्भ शीषोर्ं पर यक्ष प्रतिमाओं के साथ चौकी पर सिंह प्रदर्शित है। सिंहों के मस्तक पर सम्भवत: धम्मचक्र बना था। सामने का बरामदा द्वितलीय है जिससे चैत्यगृह के मुखमण्डप की शोभा बढ़ गई है। मुख्य भाग पर दानकर्त्ताओ की विशाल मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं। 

कन्हेरी की गुहा संख्या 90 की बाहरी दीवार पर भी भगवान बुद्ध की अनेक प्रतिमाएँ खोदी गई थीं।

कार्ले 

कार्ले का चैत्यगृह अपने वर्ग का नि:सन्देह सबसे बड़ा तथा सर्वाधिक सुरक्षित नमूना है। यह मुम्बई-पूना मार्ग पर मलावली स्टेशन से 3 मील दक्षिण में भोरघाटी की पहाड़ी में स्थित हैं। कार्ले में एक भव्य चैत्यशाला तथा तीन विहार हैं। यह चैत्यशाला पश्चिम भारत में शैल वास्तु का सर्वोत्तम उदाहरण है। जेम्स फगूर्स न के शब्दों में, ‘‘यह निश्चित ही भारत कीं सबसे बड़ी, साथ ही साथ सर्वाधिक महत्वपूर्ण चैत्यगुफा है जो उस समय खोदी गई थी जब शैली अपनी महत्तम उदात्तता में थी।’’ 

इसके मुखमण्डप में उत्कीर्ण एक लेख के अनुसार यह चैत्य तत्कालीन भारत का सर्वोत्तम शैलगृह समझा जाता था। जिसके अनुसार, ‘‘वैजयन्ती के सेठ भूतपाल ने इसे प्रतिष्ठापित कराया जो पूरे जम्बूद्वीप मं े सर्वश्रेष्ठ है।’’

कार्ले चैत्यगृह की माप 38.26 मी0 × 15.10 मी0 तथा ऊँचाई 14.50 मी0 है। इसका स्तम्भ 50 फुट ऊँचा तथा दण्ड 16 पहलू है। शीर्ष पर पद्मकोष अलंकरण है। उसके ऊपर चौकी पर चार महासिंह बैठें हुए दिखाये गये हैं। मण्डप के दो पाश्र्वों में दो महाकाय गजराज की मूर्तियाँ हैं जिसे चबूतरों पर खड़ा किया गया है। कार्ल े के स्तम्भों की खुदाई ऐसी विचित्र है कि शीर्ष भाग में मध्यवीथी की ओर दो हाथियों के आकार बने हैं, जिन पर दो दंपति बैठे हैं। उसी स्तम्भ पर पाश्र्ववीथी की ओर घोड़ों का आकार भी बना है।

मुखमण्डप के ऊपरी तल पर पीछे की ओर विशाल कीर्तिमुख है जो कला की दृष्टि से उत्कृष्ट है। 

अजन्ता

 बौद्ध धम्म के लिए प्रख्यात केन्द्र अजन्ता विहार वास्तु के इतिहास में दीर्घकालीन अध्याय का संवहन करता है। शिल्पकला तथा मूर्तियों  की दृष्टि से भारतीय शिल्प केन्द्रों में अजन्ता का स्थान बहुत ऊँचा है। यहाँ वास्तुकला का विकास ई0पू0 दूसरी शती से ईस्वी सातवीं शती तक निरन्तर मिलता है। प्रारम्भ से लेकर के दूसरी शती ई0 के अन्त तक अजन्ता हीनयान केन्द्र का मठ था। ईस्वी चौथी शती से सातवीं शती तक यहाँ महायान मठ का विकास हुआ। अजन्ता में कुल गुहाआं े की संख्या 29 है। उनमें से चार चैत्यगृह (गुहा सं0 1, 2, 9, 10) तथा शेष 25 विहार हैं।

गुहा संख्या 10 अजन्ता की सबसे पुरानी चैत्यशाला है। इसका विशाल आकार शिल्पियों के बढ़ते हुए उत्साह एवं आत्मविश्वास का द्याते क है। इसकी लम्बाई 97 फुट तथा चौड़ाई 41 फुट है जबकि ऊँचाई 33 फुट है।90 यहाँ की सबसे महत्त्वपूणर् बात इसके विभिन्न भागो के निर्माण में वास्तुपरक पर विशेष बल दिया जाना है। मण्डप तथा प्रदक्षिणापथ के बीच 59 स्तम्भों की पंक्ति है। गुहा संख्या 9 के मुखपट्ट के मध्य में प्रवेश-द्वार के अतिरिक्त दो पाश्र्व-गवाक्ष बने हैं। सामने वेदिका का अलंकरण पर्याप्त रोचक है। 

सम्भवत: शुंग काल में दोनों चैत्यशालाओं में अनेक सुन्दर चित्र बनाये गये थे। अजन्ता के चैत्यगृहो में न कवे ल काष्ठकला के प्रयेाग का बहिष्कार किया गया है वरन् उसके प्रभाव से भी वंचित रहने का प्रयास किया गया। अजन्ता के वास्तुकलांकार ने वास्तुकला में निश्चित रूपेण विकास मार्ग को प्रशस्त किया।91

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