नर्मदा बचाओ आंदोलन का प्रमुख कारण

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नर्मदा बचाओ आंदोलन का प्रमुख कारण 

नर्मदा नदी परियोजना, भारत के चार प्रमुख राज्यों से होकर गुजरती है। भारत में पर्यावरण को क्षति पहुँचाने वाली परियोजनाओं में यह सबसे बड़ी परियोजना है। इससे भारत के समक्ष सर्वाधिक गम्भीर पर्यावरणीय समस्या को उत्पन्न किया है। सरदार सरोवर परियोजना अन्तर्राज्यीय बहुउद्देश्यीय परियोजना है जो कि नर्मदा नदी पर बनायी जा रही है। 

नर्मदा 1312 किमी. लम्बी नदी है जो कि उत्तर भारत को दक्षिण भारत से जोड़ती है। यह नदी मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में अमरकंटक नामक पठार से निकलती है। नर्मदा नदी के तट पर भारत के सर्वाधिक मंदिर बसे हैं। बहुत सारे हिन्दू सम्पूर्ण जीवन में नर्मदा नदी एक बार परिक्रमा अवश्य करते हैं। इस प्रकार यदि नर्मदा नदी पर बाँध बनाया जाता है। तो इससे न सिर्फ गम्भीर प्रकार की पर्यावरण की क्षति होगी अपितु हिन्दू सभ्यता व संस्कृति जो हजारों वर्षों से चली आ रही है, उसे भी आघात पहुँचेगा। परिणामस्वरूप नर्मदा नदी परियोजना आम जनता, विद्वत जनों, पर्यावरणविदों व वैज्ञानिकों के मध्य सर्वाधिक विवादास्पद मुद्दा है, जिसे भारत सरकार विकास के नाम पर चला रही है।

नर्मदा नदी घाटी परियोजना भारत की सर्वाधिक महत्वाकांक्षी परियोजना है। नर्मदा भारत की सबसे तेज बहने वाली नदी है। यह उत्तर के विंध्य श्रेणी तथा दखिण के सतपुड़ा श्रेणी के मध्य अविरल रूप से बहती है। इस नदी करीब-करीब बेसाल्ट की चट्टान, महत्वपूर्ण जंगली इलाकों, उपजाऊ कृशि भूमि एवं तमाम प्रकार के गार्जों से होते हुए आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के लगभग 1312 किलोमीटर की परिधि बनाते हुए खम्भात की खाड़ी में गिरती है। 

नर्मदा नदी पर दो बड़े बाँध नर्मदा सागर एवं सरदार सरोवर परियोजना निर्माणधीन है। इसके अतिरिक्त अन्य बाँधों में विक्षिपा बाँध, वरनर बाँध, रोसरा बाँध, हालोन बाँध, अटारिया बाँध, बसनिया बाँध, सीतारेवा बाँध, बरमा बाँध, लटिया बाँध, तवा बाँध, होषंगाबाद बाँध, सोलर बाँध इत्यादि हैं। प्रस्तावित परियोजना से 12 से 15 लाख लोगों के प्रभावित होने की संभावना है। परियोजना द्वारा नर्मदा घाटी की पारिस्थितिकीय व सामाजिक तथा सांस्कृतिक स्थिति पर विचारणीय प्रभाव पड़ेगा।

नर्मदा घाटी परियोजना पर आधारित दूसरी बड़ी परियोजना सरदार सरोवर परियोजना है। यह गुजरात के बड़गाम जिले में स्थित है। इस सागर परियोजना की कुल सिंचाई क्षमता 18.7 लाख हेक्टेयर उपजाऊ भूमि है। सरदार सरोवर परियोजना से जुड़े बाँध की कुल जल-विद्युत उत्पादन क्षमता 1500 मेगावाट है। इस परियोजना के अन्य लाभदायक कार्यों में बाढ़ नियंत्रण, मत्स्य उत्पादन, औद्योगीकरण, पर्यटन का विकास और पीने योग्य साफ पानी की आपूर्ति है। इस परियोजना के कारण 39,134 हेक्टेयर भूमि जिसमें 13,744 हेक्टेयर जंगल व 11,313 हेक्टेयर कृशि भूमि है, के जलमग्न होने की संभावना है। 

अगर परियोजना के सम्पूर्ण विकास कार्यों की बात की जाए तो गुजरात के भरूच व बड़ोदरा के करीब 248 गाँवों में तथा महाराष्ट्र के घुले जिले में और मध्य प्रदेश के धार, झाबुआ तथा खरगाँव में कुल मिलाकर 10 लाख लोगों को विस्थापित होना है। इस परियोजना की कुल सकल लागत रू0 9000.00 करोड़ से भी अधिक है। सरदार सरोवर परियोजना प्राधिकरण का दावा है कि गुजरात के सौराष्ट्र व कच्छ के इलाकों को पीने के पानी की समस्या का स्थायी समाधान हो जाएगा। इसके साथ ही साथ इसके द्वारा रोजगार का भी सृजन हो सकेगा।

मेधा पाटेकर सरदार सरोवर परियोजना से प्रभावित गाँवों में पहली बार सन् 1985 में गई। उस समय उनकी उम्र 30 वर्ष थी तथा वे एक सामाजिक कार्यकर्ता तथा शोध छात्रा के रूप में नर्मदा घाटी में गई थी। मेधा पाटेकर ने तकरीबन 200 किलोमीटर की यात्रा बस, नावों तथा पैदल चलकर तय की। उन्होंने विस्थापित ग्रामीणों के साथ मिलकर उनके दु:ख दर्द को सुना और उन्हें प्रत्येक स्तर पर संगठित किया, जिससे कि वे सरकार के साने अपने अधिकारों की माँग कर सकें। मेधा पाटेकर का अधिकांश समय महाराष्ट्र के सतपुड़ा पहाड़ी के इलाकों में गुजरा। इनके संगठन में सामाजिक क्षेत्र के प्रत्येक स्तर के व्यक्ति, जिसमें प्रमुख लोग थे। इन लोगों ने 1986 के प्रारम्भ में महाराष्ट्र राज्य के गाँव के स्थानीय निवासियों के साथ मिलकर बाँध से प्रभावित लोगों की एक समिति का निर्माण किया जिसमें यह तय किया गया कि जब तक वहाँ के लोगों की क्षतिपूर्ति और पुनस्र्थापन की व्यवस्था नहीं होती, वे सरकारी अधिकारियों के साथ किसी प्रकार का सहयोग नहीं करेंगे।

इस समिति ने परियोजना के लाभों को लेकर सरकारी दावों की भी जाँच की तथा इन दावों के खोखलेपन को उजागर किया जिसमें विस्थापितों के लिए कोई स्थान नहीं था। नर्मदा बचाओं आंदोलन की मांग थी कि जब तक पूर्ण रूप से परियोजना से प्रभावित विस्थापितों का परीक्षण नहीं कर लिया जाता सरदार सरोवर परियोजना को रोक दिया जाए। इसके लिए नर्मदा बचाओं आंदोलन विभिन्न पर्यावरणीय मुद्दे एवं लागत लाभ के मुद्दे तथा विस्थापन से सम्बन्धित संवैधानिक मुद्दे को उठाता रहा है। इस आंदोलन का तर्क यह है कि क्या किसी समुदाय का सम्पूर्ण पुनस्र्थापन व पुनर्वास हो सकता है ?

सरदार सरोवर परियोजना का लाभ झूठे दावों पर आधारित है। इसमें राहत, पुनर्वास एवं पुनस्र्थापन की समुचित नीति को छोड़ दिया गया है। सरकारों ने पर्यावरणीय हितों का ध्यान दिए बिना इस योजनाओं पर जनता का बेशुमार धन खर्च किया है।

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