पुस्तक समीक्षा की विशेषताएं और महत्व

pustak samiksha kya hai पुस्तक समीक्षा में किसी पुस्तक का सम्यक् विश्लेषण किया जाता है। इस विश्लेषण से पाठक को पुस्तक विशेष के विभिन्न पहलुओं की जानकारी मिलती है। पुस्तक समीक्षा में एक पुस्तक की पूरी छानबीन की जाती है। समीक्षक पाठक को पुस्तक से परिचित कराता है। इस क्रम में वह पुस्तक के लेखक, विषय वस्तु, शिल्प, प्रकाशन स्तर आदि पर प्रकाश डालता जाता है। इसके साथ ही वह समग्र रूप में पुस्तक का आलोचनात्मक मूल्यांकन भी करता है। 

इस प्रकार पुस्तक विशेष के संबंध में समीक्षक अपनी राय भी व्यक्त करता है।

पुस्तक समीक्षा का पहला और प्राथमिक दायित्व पाठकों को पुस्तक से परिचित कराना है। लेकिन परिचय का अर्थ पुस्तक की विषयवस्तु का सारांश भर देना नहीं है निश्चय ही पुस्तक की विषयवस्तु के बारे में जानने की उत्सुकता ही पाठक को पुस्तक समीक्षा पढ़ने के लिए प्रेरित करती है परंतु यह भी सही है कि वह समीक्षा के द्वारा पुस्तक की विषयवस्तु, संरचना और भाविक सर्जनात्मकता के संबंध में समीक्षक की विशेषज्ञतापूर्ण राय जानना चाहता है। 

वह समीक्षक से विश्लेषण और आलोचनात्मक विवेचन की भी अपेक्षा करता है। इसलिए समीक्षा लिखते समय समीक्षक को सतर्क रहना चाहिए कि उसकी समीक्षा पुस्तक का सारांश मात्र बनकर न रह जाए।

पुस्तक समीक्षा और आलोचना में अंतर

समीक्षा और आलोचना को आम तौर पर एक समझ लिया जाता है। लेकिन यहाँ हम इन्हें दो भिन्न अर्थों में प्रयुक्त कर रहे हैं। समीक्षा, जिसे अंग्रेजी में रिव्यू (Review) कहा जाता है, का प्रयोग पुस्तक समीक्षा (Book review) के अर्थ में किया गया है जबकि आलोचना (criticism) अधिक व्यापक अर्थ वाला शब्द है।

वस्तुत: समीक्षा आलोचना  विधा की एक शाखा या उपशाखा है। समीक्षा का तात्पर्य पुस्तक समीक्षा से है। निश्चित रूप से वह आलोचना  के दायरे में आती है पर आलोचना के दायरे में और भी बहुत कुछ आता है, जैसे किसी विधा, लेखक, प्रवृत्ति आदि का मूल्यांकन। पुस्तक समीक्षा में पुस्तक केन्द्र में होती है और आलोचना में विधा, लेखक और प्रवृत्ति भी केन्द्र में  हो सकती हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि पुस्तक समीक्षा में विधा, लेखक और प्रवृत्ति की चर्चा नहीं होती या आलोचना  में किसी पुस्तक की चर्चा नहीं होती, होती है पर संदर्भ के रूप में किसी पुस्तक पर समीक्षा लिखते समय समीक्षक उस धारा या प्रवृत्ति और उस क्षेत्र के समकालीन लखेकीय रूझान की चर्चा करता है या कर सकता है, पर चर्चा के केन्द्र में वह पुस्तक ही रहेगी। इसी प्रकार किसी विषय विशेष पर विचार करते समय 

आलाचेक विभिन्न पुस्तकों का संदर्भ के तौर पर उल्लेख कर सकता है, उन पर अपनी राय व्यक्त कर सकता है, पर केन्द्र में वह विषय विशेष ही रहेगा न कि काइेर् पुस्तक। मसलन, अगर काइेर् लेखक भीश  साहनी के उपन्यास ‘मय्यादास की माड़ी’ का विश्लेशण करता है, तो यह पुस्तक समीक्षा का उदाहरण होगा, और कोई  साहित्यकार भीष्म साहनी के उपन्यास शिल्प का विश्लेषण करता हे और इसके लिए वह संदर्भ के तौर पर ‘तमस’ और ‘मय्यादास की माड़ी’ का उपयोग करता है तो वह आलोचना का उदाहरण होगा। कभी-कभी पुस्तक समीक्षा आलोचना के दायरे में प्रवेश कर जाती है। जब पुस्तक समीक्षक पुस्तक के बहाने उस लेखक के संपूर्ण लेखन या पुस्तक के विषय को आधार बनाकर एक स्वतंत्र लेख लिख दे। उदाहरण के लिए जवाहर लाल नेहरू की पुस्तक ‘भारत की खोज’ के प्रसिद्ध इतिहासविद् दामोदर धर्मानंद कोसंबी द्वारा लिखित समीक्षा को सिर्फ पुस्तक समीक्षा नहीं कहा जा सकता। वह एक स्वतंत्र लेख की तरह महत्वपूर्ण  है। 

इस प्रकार के आलोचनात्मक मूल्यांकन के माध्यम से लेखक पुस्तक समीक्षा करते हुए कुछ ऐसी महत्वपूर्ण स्थापनाएँ कर जाता है जो पुस्तक से अलग भी अपना महत्व रखती हैं। साहित्यिक विषयों पर लिखी गयी समीक्षाओं में भी इसकी संभावना रहती है कि समीक्षक पुस्तक के बहाने रचनाकार के संपूर्ण लेखन या किसी खास प्रवृत्ति या उसकी भाविक और शैलीगत विशेषताओं का ऐसा मूल्यांकन प्रस्तुत करें जो उस ‘समीक्षा’ को आलोचना  के दायरे में पहुँचा दे।

अब तक आप एक बात समझ गये होगें कि आलोचना  का क्षेत्र समीक्षा से व्यापक होता है। यहाँ व्यापकता का अर्थ क्षेत्र विस्तार से नहीं, बल्कि विश्लेषण की व्यापकता से है। समीक्षा का दायरा छोटा होता हैं, उसमें विश्लेषण किसी पुस्तक तक सीमित रहता है। यह विश्लेषण ही समीक्षा और आलोचना  को एक दूसरे से जोड़ता है। दोनों में शोध-प्रवृत्ति भी होती है। किसी पुस्तक की समीक्षा करते समय समीक्षक तथ्यों की गहरी छानबीन करता है। आलोचना  में खाजे बीन का यह दायरा और भी बड़ा और मूल्य-आधारित हो जाता है।

वस्तुत: समीक्षा और आलोचना  एक दूसरे से जुड़े अवश्य हैं पर एक नहीं है। समीक्षा आलोचना का एक अंग है पर उसका अपना अस्तित्व है, एक अलग पहचान है। इसलिए आलोचना  और समीक्षा को एक दूसरे का पर्याय नहीं समझना चाहिए।

पुस्तक समीक्षा का महत्व

अब सवाल यह उठता है कि पुस्तक समीक्षा क्यों? इसका उद्देश्य क्या है? ऐसे कुछ सवाल आपके दिमाग में पनप रहे होंगे। आइए, इन सवालों का हल ढूँढ़ा जाए। दरअसल, साहित्य में पुस्तक समीक्षा की अहम भूमिका है। समीक्षा पाठक और पुस्तक को एक दूसरे से जोड़ती है। पाठक के सामने बराबर यह समस्या रहती है कि वह कौन सी किताब पढ़े। उसके इस सवाल का समाधान पुस्तक समीक्षा कर देती है। 

इसके अलावा पाठक वर्ग का एक हिस्सा ऐसा भी होता है जो पूरी किताब नहीं पढ़ना चाहता या उसके पास इतना समय नहीं है कि वह सभी पुस्तकों को पढ़े। यहाँ समीक्षा उसकी मदद करती है। इस प्रकार एक बार में पुस्तक को ढेर सारे पाठकों तक पहुंचा देती  है। इसके दो फायदे होते हैं। एक तो पाठक को प्रकाशित होने वाली पुस्तकों की जानकारी मिलती रहती है, दूसरे वह नये लेखकीय रुझानों  से भी परिचित होता चलता है। साहित्य, संस्कृति, विज्ञान, समाज विज्ञान, खेलकूद आदि क्षेत्रों से सम्बद्ध पुस्तकों की जानकारी समीक्षा के माध्यम से पाठकों तक पहुँचती है। पुस्तकों के इस व्यापक संसार में पाठक के लिए सही पुस्तक का चुनाव मुश्किल काम है। समीक्षा इस मुश्किल को कम करती है। 

इसके अतिरिक्त वह लेखक को पाठक से जोड़ने का सामाजिक दायित्व भी निभाती है। साथ ही इसकी मदद से पाठक किसी लेखक या कृति के बारे में अपनी समझ विकसित कर सकता है और अपनी राय बना सकता है।

पुस्तक समीक्षा की विशेषताएं

पुस्तक समीक्षा के विभिन्न पक्षों और एक अच्छे समीक्षक के गुणों की चर्चा पहले की जा चुकी है। पुस्तक समीक्षा की विशेषताएँ इन्हीं से जुड़ी हुई  हैं। पुस्तक समीक्षा के विभिन्न पक्षों पर विचार करने के क्रम में आपने अच्छी पुस्तक समीक्षा के उदाहरण भी देखे हैं। एक अच्छे समीक्षक के गुणों का प्रतिफलन अच्छी समीक्षा में होता  है। पुस्तक समीक्षा की विशेषताओं को विचार करते समय आप यह महसूस करेंगे कि यहाँ बहुत सी बातें दाहे राई  गई है मसलन वस्तुनिष्ठता और पूर्वग्रह मुक्तता जैसे गुणो की चर्चा एक अच्छे समीक्षक के गुण के अन्तर्गत भी हो चुकी है। 

इसका कारण यह है कि एक अच्छे समीक्षक के प्रयत्नों का परिणाम समीक्षा में झलकता है। इसी कारण इन दोनों गुणों का उल्लेख समीक्षा की विशेषताओं में भी किया गया है।

वस्तुनिष्ठता

एक अच्छी समीक्षा की पहली शर्त है-वस्तुनिष्ठता। पुस्तक समीक्षा पढ़कर पाठक को यह महसूस होना चाहिए कि इसमें  पुस्तक के साथ न्याय किया गया है और समीक्षक ने अनावश्यक रूप से भर्त्सना या स्तुति नहीं की है। समीक्षा करते हुए ध्यान रखना चाहिए कि आपकी समीक्षा कहीं पुस्तक का विज्ञापन तो नहीं बन रही है। केवल प्रशसं ात्मक, प्रचारात्मक और परिचायात्मक लेखन समीक्षा को विज्ञापन का रूप दे देता है। समीक्षा व्यक्तिगत राग-द्वेश से मुक्त होनी  चाहिए और उसमें निहित मूल्यांकन संतुलित होना चाहिए। 

उदाहरण के तौर पर, आप इस इकाई में दी गयी समीक्षाओं को फिर से पढ सकते हैं।

पूर्वाग्रह से मुक्त

पुस्तक समीक्षा की इस विशेषता का उल्लेख एक अच्छे समीक्षक के गुण के अन्तर्गत भी किया जा चुका है। पहले उसका उल्लेख समीक्षक के संदर्भ में किया गया, अब समीक्षा के संदर्भ में किया जा रहा है, हालाँकि दोनों एक दूसरे से अभिन्न हैं। आप जानते हैं कि पुस्तक समीक्षा वस्तुनिष्ठ  होनी  चाहिए। यह वस्तुनिष्ठता तभी आ सकती है, जब समीक्षा पूर्वाग्रह से मुक्त हो। जैसे कि हम पहले चर्चा कर चुके हैं, पूर्वाग्रह समीक्षक के व्यक्तिगत और विषयगत दोनों ही दृष्टिकोण से प्रभावित हो सकता है। 

पाठक को यह नहीं महसूस होना  चाहिए कि समीक्षा समीक्षक के पूर्वाग्रहों से ग्रस्त है। समीक्षक को अपनी बात कहने का हक है, पर उसे ऐसा तर्क-संगत और वैज्ञानिक विवेचन के आधार पर करना चाहिए।

प्रासंगिकता

समीक्षा की जीवंतता के लिए उसका प्रासंगिक होना जरूरी है। एक सजग पाठक लगतार नयी पुस्तकों की जानकारी प्राप्त करते रहना चाहता है। अत: नयी पुस्तकों की समीक्षा यथाशीघ्र होनी चाहिए। समीक्षा में विलम्ब हानेे से उसके अप्रासंगिक हो जाने का खतरा रहता है। देर से प्रकाशित समीक्षाओं में पाठक की रूचि नहीं रह जाती है क्योंकि वह दूसरे स्रोतों से पुस्तक से परिचित हो जाता है। कभी-कभी कोई  पुस्तक भी किसी कालखडं में ही प्रासंगिक रहती है। आपातकाल समाप्त होते ही श्री शंकरदयाल सिंह ने ‘इमरजेंसी : क्या सच क्या झूठ’ नामक पुस्तक लिखी थी। उस समय वह पुस्तक प्रासंगिक थी, आज उसकी प्रासंगिकता शायद उतनी नहीं है। इस पुस्तक पर उस समय लिखी गयी समीक्षा भी प्रासंगिक थी और अब अगर उसी पुस्तक पर समीक्षा लिखी जाए तो वह उतनी महत्त्वपूर्ण नहीं होगी । 

कभी-कभी कोई  पुस्तक काफी दिनों बाद भी खबरों में आ जाती है। मसलन, पुस्तक विशेष पर कोई पुरस्कार प्राप्त हो या उस पर काइेर् विवाद उठ खड़ा हो, आदि। इस स्थिति में प्रकाशन के काफी बाद में की गई समीक्षा भी प्रासंगिक हो जाती है। वस्तुत: समीक्षा की प्रासंगिकता पुस्तक की प्रासंगिकता से जुड़ी हुई है।

केंद्रीय बिंदु की  पहचान

समीक्षा का मुख्य उद्देश्य पाठक को पुस्तक के मूल कथ्य से परिचित कराना होता है। इसे केंद्रीय विषय, केंद्रीय बिंदु, मुख्य विचार आदि भी कहते हैं। जैसा कि हम पहले भी कह चुके हैं कि पुस्तक का सिर्फ सारांश प्रस्तुत करना समीक्षा नहीं होता। उपन्यास, कहानी, कविता, नाटक में  वर्णित कथा को दुहराना भी समीक्षा नहीं है। अच्छी समीक्षा में पुस्तक के केंद्रीय विषय को सहज रूप में उजागर कर दिया जाता है। परिशिष्ट के पीछे उद्धृत समीक्षा पढ़ते हुए आपने महसूस किया होगा  कि समीक्षक ने उपन्यास में वर्णित समस्या की ओर पाठक का ध्यान आकृ"ट किया है। उसने उपन्यास की कथा उठाकर समीक्षा में नहीं रख दी है। यह बात पहले भी कही जा चुकी है कि कोई पाठक सिर्फ पुस्तक का सार जानने के लिए समीक्षा नहीं पढ़ता। 

पाठक समीक्षा के द्वारा पुस्तक की विषय वस्तु के संबंध में समीक्षक की विशेषज्ञतापूर्ण राय जानना चाहता है। इसलिए अच्छी समीक्षा केंद्रीय बिंदु या केंद्रीय कथ्य को उभारने का कार्य करती है।

सोद्देश्यता

पुस्तक समीक्षा पुस्तक और पाठक के बीच पुल का काम करती है। पुस्तक समीक्षा पाठक को पुस्तक से जोड़ती है। पुस्तक समीक्षा के माध्यम से वह पुस्तक से पहला परिचय प्राप्त करता है। वह उसकी विषय वस्तु से परिचित होता है, उसके महत्व और प्रासंगिकता को जानकर यह तय करता है कि उसे यह पुस्तक पढ़नी चाहिए या नहीं। इसलिए यह जरूरी है कि समीक्षा सोद्देश्यपूर्ण हो। समीक्षा लिखते हुए समीक्षक को ध्यान रखना चाहिए कि वह एक दायित्वपूर्ण कार्य कर रहा है। 

निजता

प्रत्येक समीक्षक का दृष्टिकोण और उसकी लेखन शैली अलग-अलग होती है। इसकी झलक भी समीक्षा में मिलती है। समीक्षक की विश्लेषण क्षमता के कारण भी समीक्षाओं का स्वरूप अलग-अलग हो जाता है। लेखन की यह निजता समीक्षा का खास गुण है। प्रत्येक नए समीक्षक को अपने में यह गुण विकसित करना चाहिए। लेकिन निजता के नाम पर दुरूहता, अत्यधिक विद्वता या गुरुडम पाठक पसंद नहीं करता। समीक्षा में स्पटता और सहजता पसंद की जाती है। पुस्तक समीक्षा आलोचना  का प्रथम चरण है। उसमें बहुत गम्भीर होने या अपने मत को बहुत दरढ़ता और विस्तार से प्रस्तुत करने की खास आवश्यकता के लिए आलोचना या निबंध में ज्यादा अवकाश रहता है।

भाषागत और शैलीगत विशेषताएं

समीक्षा की भाषा सहज, सरल और समूह में चलने लायक होनी चाहिए। समीक्षा का उद्देश्य होता है पाठकों को पुस्तक की जानकारी देना। इसलिए समीक्षा में भाषा का दुरूहपन ठीक नहीं है। कठिन और दुरूह भाषा में पाठक उलझकर रह जाता है और पुस्तक की सही जानकारी हासिल करने में उसे कठिनाई  महसूस होती है। समीक्षा की भाषा के साथ-साथ उसकी शैली भी सुपाठ्य और आकृष्ट करने वाली होनी चाहिए। समीक्षा का लेखन और विश्लेषण इस ढंग का होना चाहिए कि पाठक शुरू से लेकर अंत तक समीक्षा पढ़ने को बाध्य हो जाय और पूरी  तस्वीर उसके सामने स्पष्ट  हो जाए। 

लेखन शैली की यह परिपक्वता समीक्षक के विस्तृत ज्ञान और प्रस्तुति की कुशल क्षमता पर निर्भर होती है। समीक्षक तर्कसंगत ढंग से चरण-दर-चरण पुस्तक का विश्लेषण कर अपनी शैली को आर्कशक और सम्प्रेषय बना सकता है। समीक्षा जितनी अधिक सहज और सम्प्रेषय  होगी, उसकी महत्ता उतनी ज्यादा होगी। भाशा और शैली की दुरूहता में जकड़ी समीक्षा कभी भी श्रेष्ठ  समीक्षा नहीं हो सकती। 

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं। मैंने अपनी पुस्तकों के साथ बहुत समय बिताता हूँ। इससे https://www.scotbuzz.org और ब्लॉग की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

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