ऋग्वेद का क्रम और रचना काल

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संहिताओं में ऋग्वेद संहिता को सबसे प्राचीन माना गया है यज्ञ का जो कर्म सामवेद या यजुर्वेद द्वारा जो प्रतिपादित किया जाता है। वह पूर्णतया पुष्ट नहीं माना जाता, किन्तु यज्ञ के विषय में ऋग्वेद का जो प्रतिपादन है, वह दृढ़ या अकाट्य समझा जा सकता है।

संहिता शब्द संकलन या संग्रह का बोधक है, ऋचाओं का संग्रह होने के कारण ही इसे ऋग्वेद संहिता कहा गया है। ऋक् का अर्थ है स्तुति परक मन्त्र। सायण के अनुसार जिस ऋचा के द्वारा किसी देवता की या किसी क्रिया के साधन भूत करण की प्रशंसा की जाती है उसे ऋक् कहते है। ऋक् की आध्यात्मिक एवं दार्शनिक व्याख्या भी ब्राह्मण ग्रन्थों से प्राप्त होती है। ब्रह्म को ही ऋक् कहा गया है। जैमिनी उपनिशद् में वाणी को ही ऋक् कहा गया है। प्राण अमृत एवं भूलोक को भी ऋक् कहा गया है। 

यजुर्वेद के अनुसार वाक् तत्त्व को ही ऋक् कहा जाता है। प्राचीन काल में लेखन कला का विकास न होने के कारण वेदों को कण्ठस्थ रखना पड़ता था। विभिन्न कुलों द्वारा भिन्न-भिन्न रूप से पाठ होने के कारण इनकी अनेक शाखायें हो गयीं फिर भी प्रत्येक शाखा के अपने-अपने ब्राह्मण निश्चित थे। 

कालान्तर में बहुत सी शाखायें लुप्त हो गयी। पतंजलि ने ऋग्वेद की शाखाओं का उल्लेख किया है। ऋग्वेद समस्त वैदिक साहित्य में सबसे वृह्द है। यजुर्वेद, सामवेद एवं अर्थर्ववेद तीनों ही मिलकर इससे न्यून हैं। 

वर्तमान में केवल पाँच शाखाओं का ही नाम प्राप्त होता है। ये निम्नलिखित हैं - 
  1. षाकल
  2. वाश्कल
  3. आष्वलायन
  4. षांखायन और 
  5. माण्डूकायन। 

ऋग्वेद का क्रम

ऋग्वेद का संगठन दो प्रकार के क्रमों से किया गया है -

1-अश्टक क्रम

इस क्रम के अनुसार ऋग्वेद को आठ अश्टकों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक अश्टक आठ अध्यायों के होते हैं। इस प्रकार चौसठ अध्यायों में ऋग्वेद को विभाजित किया गया है। प्रत्येक अध्याय वर्गो में विभक्त है। प्रत्येक अध्याय में वर्गो की संख्या भिन्न है। यह संख्या 25 से लेकर 49 तक है प्रत्येक वर्ग में मन्त्रों की संख्या प्राय: 5 है। 

इस प्रकार ऋग्वेद में 8 अश्टक, 64 अध्याय, 2024 वर्ग तथा 10552 मन्त्र हैं।

2-मण्डल क्रम

ऋग्वेद का यह क्रम अधिक महत्त्वपूर्ण, ऐतिहासिक एवं वैज्ञानिक है। इस क्रम के अनुसार ऋग्वेद 10 मण्डलों में विभक्त है इसमें 85 अनुवपक् तथा 1028 सूक्त है। इसमें 11 बालखिल्यसूक्त भी शामिल है। इस विभाजन में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखा गया है -

ऋशि परिवारों से सम्बद्ध मन्त्रों को क्रम से रखने का प्रयास किया गया है। जहाँ पर यह सम्भव नहीं होती वहाँ विषय की एकता का ध्यान रखा गया है। एक ऋषि द्वारा दृष्ट मन्त्रों को एक स्थान पर रखा गया है। सोम सम्बन्धी मन्त्रों की संख्या अधिक है। अत: उन्हें अलग-अलग स्थान दिया गया है। जो विषय अथवा ऋषि-क्रम से सम्ब़द्ध न हो सके तो उन्हें पृथक व अन्त में स्थान दिया गया है।

ऋग्वेद में मण्डल, सूक्त तथा सम्बद्ध ऋशियों का विवरण निम्नवत् है - मण्डल सूक्तों की संख्या ऋषि प्रथम 191 मधुच्छन्दा, मेधातिथि, दीर्घतमा, अगस्त्य इत्यादि। द्वितीय 43 गृहत्समद एवं वंषज। तृतीय 62 विश्वामित्र। चतुर्थ 58 वामदेव, वंशज। पंचम् 87 अत्रि या वंशज। शश्ठम् 75 भारद्वाज या वंषज। सप्तम् 104 वशिष्ठ या वंषज। अश्टम् 103 कण्व, भृगु, अंगिरा आदि । नवम् 114 सोमपवमान। दषम् 191 त्रित, विभद्, इन्द्र, श्रद्धा, कामायनी इत्यादि। 

ऋग्वेद का रचना काल

भारतीय परम्परा के अनुसार वेद अनादि है। भारतीय साहित्य के अनुसार सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर ने वेदों का ज्ञान अग्नि, वायु, सूर्य तथा अंगिरा को दिया। इस ईश्वरीय ज्ञान का ऋषियों ने साक्षात्कार किया। स्वामी दयानन्द के अनुसार वेद ‘अपौरुषेय’ है। जिसका ज्ञान सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर ने मनुष्यों के कल्याण के लिए ऋषियों के हृदय में प्रकाशित किया। अत: वेद सृष्टि के आरम्भ से ही विद्यमान हैं। परन्तु आधुनिक युग में ऐतिहासिक तथा विकासवादी विद्वान इस मत से सहमत नहीं हैं। 

वैदिक साहित्य का अध्ययन करने वाले अनेक विद्वानों ने ऋग्वेद को सबसे प्राचीन मानकर इसके समय-निर्धारण का प्रयास किया है। 

इन विद्वानों का मत है कि पुष्ट प्रमाणों के अभाव में ऋग्वेद की रचना कब हुई, ठीक-ठीक बताना असम्भव नहीं है। परन्तु अनुमान अवश्य लगाया जा सकता है। भारतीय विद्वानों ने भी ऋग्वेद का रचना-काल ज्ञात करने का प्रयास किया है। रचना-काल से सम्बन्धित विभिन्न विद्वानों का मत दिया जा रहा है।

मैक्समूलर का अनुमान है कि गौतम बुद्ध के समय तक वैदिक साहित्य की रचना पूरी हो चुकी थी। मैक्समूलर ने वैदिक साहित्य को छन्द, मन्त्र, ब्राह्मण एवं सूत्र चार भागों में विभाजित किया तथा प्रत्येक के लिए 200 वर्ष का समय निर्धारित किया।

गौतम बुद्ध का समय 500 ई0 पूर्व है अत: लगभग 600 ई0 पूर्व में ब्राह्मण साहित्य की रचना भी पूरी हो गयी होगी। ब्राह्मण ग्रन्थों से 200 वर्ष पहले अर्थात् 1000 ई0पू0 तक मन्त्रों की रचना के पूर्ण हो जाने का अनुमान लगाया। इस आधार पर मन्त्रों की रचना से 200 वर्ष पूर्व अर्थात् 1200 ई0पू0 में ऋग्वेद की रचना का अनुमान लगाया।

इस प्रकार की गणना से मैक्समूलर स्वयं भी सन्तुश्ट न थे। ऋग्वेद के रचना-काल के निर्धारण में अनेक विद्वानों ने मैक्समूलर की पद्धति को स्वीकार किया, किन्तु 200 वर्श के समय की पर्याप्त नहीं माना।

बालगंगाधर तिलक ने ऋग्वेद का समय निर्घारित करने में बहुत महत्वपूर्ण योगदान किया। इन्होंने ऋग्वेद का रचना काल 600 ई0पू0 से 4000 ई0पू0 माना। विभिन्न नक्षत्रों में इन्होंने वैदिक काल को चार भागों में विभक्त किया-
  1. अदिति - काल - 6000-4000 ई0पू0।
  2. मृगषिरा - काल - 4000-2500 ई0पू0।
  3. कृत्तिका - काल - 2500-1400 ई0पू0।
  4. अन्तिम - काल - 1400-500 ई0पू0।
सूत्रकाल - तिलक के अनुसार ब्राह्मण ग्रन्थों के समय नक्षत्रों की गणना कृत्तिका नक्षत्र से होती थी तथा कृत्तिका नक्षत्र के समय दिन-रात बराबर होते थे। वर्तमान समय में 21 मार्च तथा 23 सितम्बर को दिन-रात बराबर होते हैं और सूर्य उस समय अश्विन नक्षत्र में होता है। इतना परिवर्तन 4500 वर्षों में हो सकता है। अत: ब्राह्मण ग्रन्थों की रचना 2500 ई0पू0 में हुई होगी। संहिताओं के युग में दिन-रात बराबर होते थे। तब सूर्य मृगषिरा नक्षत्र में होता था। वह समय 6500 वर्ष पहले का होगा। अत: संहिताओं की रचना 4500 ई0पू0 में हो गयी होगी। 

ऋग्वेद के एक मन्त्र के अनुसार मृगषिरा नक्षत्र में वसन्त-ऋतु होती थी और दिन-रात बराबर होते थे। यह समय वर्ष के और भी पूर्व का होगा। अत: उन्होंने ऋग्वेद के मन्त्रों की रचना 6500 ई0पू0 तक निर्धारित करने का प्रयास किया।

इन विवरणों से यह स्पष्ट है कि वैदिक मन्त्रों की रचना 6000 ई0पू0 में प्रारम्भ हो गयी और 2500-1400 ई0पू0 उनका परिवर्धन तथा परिष्कार हुआ होगा।25 बाल गंगाधर तिलक ने यह निष्कर्ष दिया कि वेदों का रचना-काल 4000 ई0पू0 भी मान लिया जाये, तो पाश्चात्य और भारतीय विद्वानों के परस्पर विरोधी मतों का सामंजस्य हो सकता है। इस प्रकार तिलक ने वेदों का रचना-काल 4000 ई0पू0 मानने पर बल दिया।

डॉ0 सम्पूर्णानन्द ने भूगर्भशास्त्र के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि आर्यो का आदिम निवास स्थान सप्त-सैन्धव प्रदेश था। उन दिनों का यह भूखण्ड जहाँ था, वहाँ वर्तमान समय में कष्मीर की उपत्यका, राजपुताना एवं उत्तर प्रदेश स्थित है। उन दिनों हिमालय समुद्र से ऊपर उठ रहा था। पृथ्वी में बराबर भूकम्प आते थे और पर्वत चंचल थे। यह स्थिति आर्यो ने स्वयं देखी थी। 

भूगर्भषास्त्रियों के अनुसार यह स्थिति 5000 ई0पू0 से 2500 ई0पू0 तक थी। अत: ऋग्वेद के कुछ मन्त्रों की रचना उस समय हुई होगी।

ऋग्वेद के एक मन्त्र में सप्त-सैन्धव के पूर्व व पश्चिम में दो समुद्रों का और एक अन्य मन्त्र32 में चार समुद्रों का उल्लेख प्राप्त होता है। ये चार समुद्र आर्यावर्त के चारों ओर विद्यमान थे ऋग्वेद के ही एक मन्त्र33 से ज्ञात होता है कि शतुद्री और सरस्वती नदियाँ समुद्र में गिरती थी। यहाँ दक्षिणी समुद्र था। ऋग्वेद के अनुशीलन से ज्ञात होता है कि जहाँ आजकल राजस्थान प्रदेश है, वहाँ प्राचीन काल में समुद्र लहरा रहा था। यह अरावली पर्वत के दक्षिण पूर्व तक फैला हुआ था। आज भी राजस्थान में खारे जल की झीलें तथा नमक की तहें यह सिद्ध करती हैं कि किसी समय राजस्थान समुद्र से आप्लावित था।

पश्चिमी समुद्र शायद अरब सागर था, जो आज भी विद्यमान है। पूर्वी समुद्र पंजाब से पूर्व समस्त गंगागेय प्रदेश को आप्लावित करके अवस्थित था। उत्तरी समुद्र एशिया के उत्तर में वालरस असोर पारस के उत्तरी भाग में स्थित एक विशाल समुद्र था, जिसे भूगर्भषास्त्री ‘एशियाई भूमध्य सागर’ कहते हैं। यह उत्तर में आर्कटिक महासागर से सम्बद्ध था। एषियाई समुद्र का तल ऊँचा तथा यूरोपीय समुद्र का तल नीचा था। प्राकृतिक परिवर्तनों के कारण एशियाई समुद्र का जल यूरोपीय समुद्र में चला गया और एशियाई समुद्र सूख गया।

इसी के अंष सूखकर काला सागर एवं केस्पियन सागर, अराल सागर के रूप में आज भी विद्यमान हैं। यही उत्तरी समुद्र था।

डॉ सम्पूर्णानन्द के अनुसार सभी समुद्र 25000 ई0पू0 से 75000 ई0पू0 के मध्य लुप्त, गुप्त एवं रूपान्तरित हुए हैं। अत: ऋग्वेद का रचना काल 75000 ई0पू0 माना जा सकता है।

भण्डारकर34 ने वेद को ‘असुर’ शब्द से ‘असीरियन’ शब्द का साम्य दिखाते हुए वैदिक ऋचाओं का निर्माण-काल 2500 ई0पू0 निर्धारित किया। इस मत को अधिक प्रतिष्ठा न प्राप्त हो सकी, क्योंकि कुछ कल्पित शब्दों के समय के आधार पर कोई मत स्थापित करना तर्कसंगत प्रतीत नहीं होगा।

डॉ0 अविनाषचन्द्र दास ने डॉ0 सम्पूर्णानन्द के मत से सहमति प्रकट करते हुए ऋग्वेद में भूगर्भ सम्बन्धी घटनाओं के आधार पर ऋग्वेद का काल-निर्धारित करने का प्रयास किया। ऋग्वेद में वर्णित समुद्र तथा चतु: समुद्र के आधार पर उन्होंने उस भौगोलिक दषा को 25000 ई0पू0 स्वीकार किया है।35 डॉ0 दास के अनुसार ऋग्वेद उस समय बना जब राजपूताना एवं संयुक्त प्रान्त में समुद्र लहरा रहा था।

बूलर का कहना है कि आर्यो ने 700 ई0पू0 से 600 ई0पू0 में दक्षिण भारत पर विजय प्राप्त कर लिया था। इस आधार पर यह कल्पना निराधार प्रतीत होती है कि भारतीय आर्य 1200 ई0पू0 या 1500 ई0पू0 के मध्य आकर भारत में बस गये थे। वैदिक साहित्य के प्रारम्भिक काल में ये सिन्धु नदी से गंगा तट की ओर बढ़ चुके थे। इन्हें दक्षिण विजय करने में कई शताब्दियाँ लगी होगी, क्योंकि आर्यों में परस्पर संघर्ष होते रहते थे। अत: विजय का कार्य अत्यन्त मन्द गति से ही हुआ होगा।

वैदिक वाड़्मय के सन्दर्भ में कहा जाता है कि पहले यह मौखिक परम्परा से चला आ रहा था उसे संहिता के रूप में संकलित करने में कई शताब्दियाँं लगी होगी। इसी प्रकार ब्राह्मण एवं उपनिषद काल तक इस विशाल वाड़्मय के विकास के लिए कई शताब्दियों का समय अपेक्षित है।

इस काल तक आर्य गांगेय प्रदेश तक ही पहुँच सके तो दक्षिण प्रदेश पर विजय प्राप्त करने में कितना समय लगा होगा।39 अत: उन्होंने ऋग्वैदिक काल को पीछे तक ले जाने का प्रयास किया।

याकोबी ने ऋग्वेद का रचना-काल 4500 ई0पू0 निर्धारित करने का प्रयास किया है। उन्होंने कल्प सूत्रों में वर्णित विवाह प्रकरण में ‘ध्रुव इद स्थिरा भव’’ वाक्य के आधार पर यह अनुमान व्यक्त किया है कि कल्प सूत्रों के काल में विवाह के अवसर पर वर-वधू को ध्रुव तारा दिखाने की प्रथा थी। उस समय ध्रुव तारा अधिक चमकीला तथा स्थिर था। यह स्थिति लगभग 2700 ई0पू0 में रही होगी। उसी समय सूत्र ग्रन्थों की रचना हुई होगी तथा की रचना 4500 ई0पू0 में हुई होगी। 

कालान्तर में याकोबी के इस मत का पाश्चात्य विद्वानों द्वारा विरोध भी हुआ।

विण्टरनित्ज के अनुसार मैक्समूलर द्वारा निर्धारित वैदिक साहित्य के प्रत्येक भाग के लिए 200 वशोर्ं का समय किसी प्रमाण पर आधारित नहीं है। यह शुद्ध रूप से काल्पनिक है।

उन्होंने खेद प्रकट करते हुए कहा कि विज्ञान के क्षेत्र में भी किसी बात को कहते रहने का इतना प्रभाव होता है कि जैसे-जैसे समय बीतता गया लोगों ने मैक्समूलर द्वारा निर्धारित कल्पित तिथि को भी वैज्ञानिक आधार पर स्थापित मान लिया, न तो लोगों ने कोई नयी युक्तियाँ दी और न ही प्रमाण उपस्थित किये। लोगों की आदत सी हो गयी है कि बिना सोचे विचारे कह दें कि मैक्समूलर ने सिद्ध कर दिया है कि ऋग्वेद का काल 1200 ई0पू0-1000 ई0पू0 है। 

विण्टरनित्ज के अनुसार वैदिक साहित्य का निर्माण से 500 ई0पू0 के मध्य हुआ। अत: ऋग्वेद का काल 2500 ई0पू0 है। ह्विटने - ह्विटने महोदय ने मैक्समूलर के मत की आलोचना करते हुए उनके द्वारा किये गये वैदिक साहित्य के चार भागों में विभाजित करके स्वीकार तो किया, किन्तु छन्द काल को इन्होंने 2000 ई0पू0-1500 ई0पू0 के मध्य स्वीकार किया। 

वैदिक काल-निर्धारण के सन्दर्भ में ह्विटने का कथन है कि भारतीय वैदिक साहित्य का क्रमिक अध्ययन न होने से निश्कर्शत: कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। 

जर्मन विद्वान बेवर के अनुसार वेदों का समय निश्चित नहीं किया जा सकता, क्योंकि ये उस समय के रचित हैं, जहॉँ पहुँचने के लिए हमारे पास उपयुक्त साधन नहीं हैं। वर्तमान प्रमाण राशि हमें उस समय के उन्नत शिखर पर पहुॅँचाने में असमर्थ है। अत: बेवर ने काल-निर्णय के सन्दर्भ में स्पष्टतः: कुछ भी नहीं कहा है।

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