सामाजिक परिवर्तन के चक्रीय सिद्धांत

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सामाजिक परिवर्तन के संबंध में विद्वानों ने अपने-अपने सिद्धांत का उल्लेख किया है। इन सिद्धांतों को कई प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है।

उद्वविकासवादी के प्रमुख प्रवर्तक हर्बर्ट स्पेन्सर हैं जिनके अनुसार सामाजिक परिवर्तन धीरे-धीरे, सरल से जटिल की और कुछ निश्चित स्तरों से गुजरता हुआ होता है।

संरचनात्मक कार्यात्मक सिद्धांत के प्रवर्तकों में दुर्खीम, वेबर, पार्सन्स, मर्टन आदि विद्वानों का उल्लेख किया जा सकता है। इन विद्वानों के मतानुसार सामाजिक संरचना का निर्माण करने वाली प्रत्येक इकाई का अपना एक प्रकार्य होता है और यह प्रकार्य उसके अस्तित्व को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होता है। इस प्रकार सामाजिक सरंचना और इसको बनाने वाली इकाइयों (संस्थाओं, समूहों आदि) के बीच एक प्रकार्यात्मक संबंध होता है और इसीलिए इन प्रकार्यों में जब परिवर्तन होता है तो सामाजिक संरचना भी उसी अनुसार बदल जाती है। सामाजिक ढाँचे में परिवर्तन को ही सामाजिक परिवर्तन कहते हैं। 

आगर्बन द्वारा प्रस्तुत ‘सांस्कृतिक विलम्बना’ (Cultural Lag) के सिद्धांत को भी कुछ विद्वान इसी श्रेणी में सम्मिलित करते हैं।

संघर्ष या द्वन्द्व के सिद्धांत के समर्थक कार्ल मार्क्स, कोजर, डेहर डोर्फ़ आदि हैं। इनके सिद्धांतों का सार-तत्व यह है कि सामाजिक जीवन में होने वाले परिवर्तन का प्रमुख आधार समाज में मौजूद दो विरोधी तत्वों या शक्तियों के बीच होने वाला संघर्ष या द्वन्द्व है।

चक्रीय सिद्धांत के प्रमुख प्रवर्तक स्पेगलट, परेटो आदि हैं जो कि परिवर्तन की दिशा को चक्र की भाँति मानते हैं।

सामाजिक परिवर्तन के चक्रीय सिद्धांत

सामाजिक परिवर्तन के चक्रीय सिद्धांत की मूल मान्यता यह है कि सामाजिक परिवर्तन की गति और दिशा एक चक्र की भाँति है और इसलिए सामाजिक परिवर्तन जहाँ से आरम्भ होता है, अन्त में घूम कर फिर वहीं पहुँच कर समाप्त होता है। यह स्थिति चक्र की तरह पूरी होने के बाद बार-बार इस प्रक्रिया को दोहराती है। इसका उत्तम उदाहरण भारत, चीन व ग्रीक की सभ्यताएँ हैं। 

चक्रीय सिद्धांत के कतिपय प्रवर्तकों ने अपने सिद्धांत के सार-तत्व को इस रूप में प्रस्तुत किया है कि इतिहास अपने को दुहराता है’।

चक्रीय सिद्धांत विचारानुसार परिवर्तन की प्रकृति एक चक्र की भाँति होती है। अर्थात् जिस स्थिति से परिवर्तन शुरू होता है, परिवर्तन की गति गोलाकार में आगे बढ़ते-बढ़ते पुन: उसी स्थान पर लौट आती है जहाँ पर कि वह आरम्भ में थी। विल्फ्रेडो परेटो ने सामाजिक परिवर्तन के अपने चक्रीय सिद्धांत में यह दर्शाने का प्रयत्न किया है कि किस भाँति राजनीतिक, आर्थिक तथा आध्यात्मिक क्षेत्र में चक्रीय गति से परिवर्तन होता रहता है।

परेटो का चक्रीय सिद्धांत

परेटो के अनुसार प्रत्येक सामाजिक संरचना में जो ऊँच-नीच का संस्तरण होता है, वह मोटे तौर पर दो वर्गों द्वारा होता है- उच्च वर्ग तथा निम्न वर्ग। इनमें से कोई भी वर्ग स्थिर नहीं होता, अपितु इनमें ‘चक्रीय गति’ (Cyclical Movement) पाई जाती है। चक्रीय गति इस अर्थ में कि समाज में इन दो वर्गों में निरन्तर ऊपर से नीचे या अधोगामी और नीचे से ऊपर या ऊध्र्वगामी प्रवाह होता रहता है। जो वर्ग सामाजिक संरचना में ऊपरी भाग में होते हैं वह कालान्तर में भ्रष्ट हो जाने के कारण अपने पद और प्रतिष्ठा से गिर जाते हैं, अर्थात। अभिजात-वर्ग अपने गुणों को खोकर या असफल होकर निम्न वर्ग में आ जाते हैं। दूसरी ओर, उन खाली जगहों को भरने के लिए निम्न वर्ग में जो बुद्धिमान, कुशल, चरित्रवान तथा योग्य लोग होते हैं, वे नीचे से ऊपर की ओर जाते रहते हैं। 

इस प्रकार उच्च वर्ग का निम्न वर्ग में आने या उसका विनाश होने और निम्न वर्ग का उच्च वर्ग में जाने की प्रक्रिया चक्रीय ढंग से चलती रहती है। इस चक्रीय गति के कारण सामाजिक ढाँचा परिवर्तित हो जाता है या सामाजिक परिवर्तन होता है।

परेटो के अनुसार सामाजिक परिवर्तन के चक्र के तीन मुख्य पक्ष हैं- राजनीतिक, आर्थिक तथा आदर्शात्मक। राजनीतिक क्षेत्र में चक्रीय परिवर्तन तब गतिशील होता है जब शासन-सत्ता उस वर्ग के लोगों के हाथों में आ जाती है जिनमें समूह के स्थायित्व के विशिष्ट-चालक अधिक शक्तिशाली होते हैं। इन्हें ‘शेर’ (Lions) कहा जाता है। समूह के स्थायित्व के विशिष्ट-चालक द्वारा अत्यधिक प्रभावित होने के कारण इन ‘शेर’ लोगों का कुछ आदर्शवादी लक्ष्यों पर दृढ़ विश्वास होता है और उन आदर्शों की प्राप्ति के लिए ये शक्ति का भी सहारा लेने में नहीं झिझकते। शक्ति-प्रयोग की प्रतिक्रिया भयंकर हो सकती है, इसलिए यह तरीका असुविधाजनक होता है। इस कारण वे कूटनीति का सहारा लेते हैं, और ‘शेर, से अपने को ‘लोमड़ियों’ (foxes) में बदल लेते हैं और लोमड़ी की भाँति चालाकी से काम लेते हैं। लेकिन निम्न वर्ग में भी लोमड़ियाँ होती हैं और वे भी सत्ता को अपने हाथ में लेने की फिराक में रहती हैं। 

अन्त में, एक समय ऐसा भी आता है जबकि वास्तव में उच्च वर्ग की लोमड़ियों के हाथ से सत्ता निकालकर निम्न वर्ग की लोमड़ियों के हाथ में आ जाती है, तभी राजनीतिक क्षेत्र में या राजनीतिक संगठन और व्यवस्था में परिवर्तन होता है।

जहाँ तक आर्थिक क्षेत्र या आर्थिक संगठन और व्यवस्था में परिवर्तन का प्रश्न है, परेटो हमारा ध्यान समाज के दो आर्थिक वर्गों की ओर आकर्षित करते हैं। वे दो वर्ग हैं- (1) सट्टेबाज (speculators) और (2) निश्चित आय वाला वर्ग (rentiers)। पहले वर्ग के सदस्यों की आय बिल्कुल अनिश्चित होती है, कभी कम तो कभी ज्यादा; पर जो कुछ भी इस वर्ग के लोग कमाते हैं वह अपनी बुद्धिमत्ता के बल पर ही कमाते हैं। इसके विपरीत, दूसरे वर्ग की आय निश्चित या लगभग निश्चित होती है क्योंकि वह सट्टेबाजों की भाँति अनुमान पर निर्भर नहीं है। सट्टेबाजों में सम्मिलन के विशिष्ट-चालक की प्रधानता तथा निश्चित आय वाले वर्ग के समूह में स्थायित्व के विशिष्ट-चालक की प्रमुखता पाई जाती है। इसी कारण पहले वर्ग के लोग आविष्कारकर्ता, लोगों के नेता या कुशल व्यवसायी आदि होते हैं। यह वर्ग अपने आर्थिक हित या अन्य प्रकार की शक्ति के मोह से चालाकी और भ्रष्टाचार का स्वयं शिकार हो जाता है जिसके कारण उसका पतन होता है और दूसरा वर्ग उसका स्थान ले लेता है। 

समाज की समृद्धि या विकास इसी बात पर निर्भर है कि सम्मिलन का विशिष्ट-चालक वाला वर्ग नए-नए सम्मिलन और आविष्कार के द्वारा राष्ट्र को नवप्रवर्तन की ओर ले जाए और समूह के स्थायित्व के विशिष्ट-चालक वाला वर्ग उन नए सम्मिलनों से मिल सकने वाले समस्त लाभों को प्राप्त करने में सहायता दें। आर्थिक प्रगति या परिवर्तन का रहस्य इसी में छिपा हुआ है।

उसी प्रकार में अविश्वास और विश्वास का चक्र चलता रहता है। किसी एक समय-विशेष में समाज में विश्वासवादियों का प्रभुत्व रहता है परन्तु वे अपनी दृढ़ता या रूढ़िवादिता के कारण अपने पतन का साधन अपने-आप ही जुटा लेते हैं और उनका स्थान दूसरे वर्ग के लोग ले लेते हैं।

सामाजिक परिवर्तन के उतार-चढ़ाव का सिद्धांत

चक्रीय सिद्धांत से मिलता-जुलता सोरोकिन का ‘सामाजिक-सांस्कृतिक गतिशीलता का सिद्धांत’ (Theory of Socio-cultural Dynamics) या उतार-चढ़ाव का सिद्धांत है। कतिपय विद्वानों ने इसे चक्रीय सिद्धांत की श्रेणी में ही रखा है।

हैस स्पीयर के शब्दों में, सोरोकिन इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि ऐतिहासिक दृष्टि से देखने पर यह स्पष्ट पता चलता है कि कोई प्रगति नहीं हुई है, न कोई चक्रीय परिवर्तन हुआ है। सोरोकिन के अनुसार जो कुछ भी है वह केवल मात्र उतार-चढ़ाव (Fluctuation) है। संस्कृति के बुनियादी स्वरूपों का उतार-चढ़ाव, सामाजिक संबंधों का उतार-चढ़ाव, शक्ति के केन्द्रीकरण का उतार-चढ़ाव यहाँ तक कि आर्थिक अवस्थाओं में सर्वत्र ही उतार-चढ़ाव है।’’ इसी उतार-चढ़ाव में समस्त सामाजिक घटनाओं और परिवर्तनों का रहस्य छिपा हुआ है।

सोरोकिन के अनुसार सामाजिक परिवर्तन सांस्कृतिक व्यवस्थाओं के उतार-चढ़ाव में व्यक्त होता है। उतार-चढ़ाव की धारणा सोरोकिन के सिद्धांत का प्रथम आधार है। यह उतार-चढ़ाव दो सांस्कृतिक व्यवस्थाओं-चेतनात्मक संस्कृति तथा भावनात्मक संस्कृति-के बीच होता है। दूसरे शब्दों में, जब समाज चेतनात्मक सांस्कृतिक व्यवस्था से भावनात्मक सांस्कृतिक व्यवस्था में या भावनात्मक सांस्कृतिक व्यवस्था से चेतनात्मक सांस्कृतिक व्यवस्था में बदलता है, तभी सामाजिक परिवर्तन होता है। अर्थात् तभी विज्ञान, दर्शन, धर्म, कानून, नैतिकता, आर्थिक व्यवस्था, राजनीति, कला, साहित्य, सामाजिक संबंध सब-कुछ बदल जाता है। इस प्रकार सोरोकिन के सामाजिक परिवर्तन के सिद्धांत का दूसरा आधार चेतनात्मक संस्कृति और भावनात्मक संस्कृति के बीच भेद है।

सोरोकिन  के अनुसार जब एक सांस्कृतिक व्यवस्था, उदाहरणार्थ चेतनात्मक संस्कृति व्यवस्था अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाती है तो उसे अपनी गति को विपरीत दिशा, अर्थात् भावनात्मक संस्कृति व्यवस्था की ओर मोड़ना ही पड़ता है। अर्थात् पहले की व्यवस्था के स्थान पर दूसरी व्यवस्था का जन्म होता है; क्योंकि प्रत्येक व्यवस्था की-चाहे वह कितनी ही अच्छी हो या बुरी-पनपने, आगे बढ़ने अथवा विकसित होने की एक सीमा है। यही सोरोकिन का ‘सीमाओं का सिद्धांत’ है जो कि सामाजिक परिवर्तन का तीसरा आधार है।

इन सीमाओं के सिद्धांत को बीरस्टीड द्वारा प्रस्तुत एक उदाहरण की सहायता से अति सरलता से समझा जा सकता है। यदि आप प्यानों की एक कुंजी को उँगली मारेंगे तो उससे कुछ ध्वनि उत्पन्न होगी। यदि आप जरा जोर से उँगली मारेंगे तो अवश्य ही ध्वनि भी अधिक जोर की होगी। परन्तु इस प्रकार जोर से उँगली मारने और अधिक जोर से ध्वनि निकालने की एक सीमा है। एक सीमा से अधिक जोर से यदि आप प्यानों पर आघात करेंगे तो अधिक जोर से ध्वनि निकलने की अपेक्षा स्वयं प्यानों ही टूट जाएगा। यही बात सांस्कृतिक व्यवस्थाओं पर भी लागू होती है। एक सांस्कृतिक व्यवस्था एक सीमा तक पहुँच जाने के बाद फिर आगे नहीं बढ़ सकती और तब तक विपरीत प्रभाव उत्पन्न हो जाता है और टूटे हुए प्यानों की भाँति उस व्यवस्था के स्थान पर एक नवीन सांस्कृतिक व्यवस्था स्वत: उदय होती है।

सोरोकिन के सामाजिक परिवर्तन का यह है कि सांस्कृतिक अवस्था से दूसरी अवस्था में परिवर्तन होता तो अवश्य है, परन्तु होता है अनियमित रूप में। दूसरे शब्दों में, सांस्कृतिक व्यवस्थाओं के उतार-चढ़ाव को किन्हीं निश्चित बन्धनों में बाँधा नहीं जा सकता है। यद्यपि यह सच है कि संस्कृति एक गतिशील व्यवस्था है फिर भी हम यह आशा नहीं कर सकते कि एक सांस्कृतिक व्यवस्था किसी एक निश्चित दिशा की ओर स्थायी रूप में गतिशील रहेगी।

अब प्रश्न यह उठता है कि चेतनात्मक अवस्था से भावनात्मक अवस्था में या भावनात्मक अवस्था से चेतनात्मक अवस्था में जो परिवर्तन होता है उस परिवर्तन को लाने वाली कौन-सी शक्ति हैं? सोरोकिन ने इस प्रश्न का उत्तर ‘स्वाभाविक परिवर्तन का सिद्धांत’ (Principle of Immanent Change) के आधारपर दिया है और यही आपके सामाजिक परिवर्तन के सिद्धांत का आधार है। ‘स्वाभाविक परिवर्तन का सिद्धांत’ है कि परिवर्तन होने का कारण या परिवर्तन लाने वाली शक्ति स्वयं संस्कृति की अपनी प्रकृति में ही अन्तर्निहित है। परिवर्तन लाने वाली कोई बाहरी शक्ति नहीं बल्कि संस्कृति की प्रकृति में ही क्रियाशील आन्तरिक शक्ति या शक्तियाँ हैं। संक्षेप में, सोरोकिन के अनुसार, सामाजिक परिवर्तन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जोकि संस्कृति के अन्दर ही क्रियाशील कुछ शक्तियों का परिणाम होती है। सामाजिक परिवर्तन एक कृत्रिम प्रक्रिया है या किसी बाह्य शक्ति द्वारा प्रेरित होती है- ऐसा सोचना गलत है। चेतनात्मक अवस्था से भावनात्मक अवस्था का या भावनात्मक अवस्था से चेतनात्मक अवस्था का परिवर्तन एक स्वाभाविक तथा आन्तरिक प्रक्रिया है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ऐसा होना ही स्वाभाविक है। उदाहरणार्थ, गुलाब का एक बीज केवल गुलाब के ही पौधे में, न कि अन्य प्रकार के पौधे में, इसलिए विकसित होता है क्योंकि यही स्वाभाविक है या वह उस बीज के स्वभाव में अन्तर्निहित है।

सामाजिक परिवर्तन के रेखीय परिवर्तन का सिद्धांत

यह सामाजिक परिवर्तन का वह स्वरूप है; जिसमें परिवर्तन की दिशा सदैव ऊपर की ओर होती है। परिवर्तन एक सिलसिले या क्रम से विकास की ओर एक ही दिशा में निरन्तर होता जाता है। जो आविष्कार आज हुआ है उससे आगे ही आविष्कार होगा, जैसे रेडियों के बाद टेलीविजन का अविष्कार हुआ उसे और विकसित करके टेलीफोन से बात करते समय दूसरी ओर से बात करने वाले को देखा भी जा सकेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि परिवर्तन के इस प्रतिमान में परिवर्तन रेखीय होता है और उसे हम एक रेखा से प्रदर्शित कर सकते हैं। इस परिवर्तन की गति तीव्र या मंद हो सकती है।

आदिम समाज में परिवर्तन धीमी गति से था जबकि आधुनिक समाजों में गति तीव्र है, परन्तु दोनों समाजों में परिवर्तन एक रेखा में ही अर्थात आगे बढ़ता हुआ है। सामाजिक परिवर्तन के रेखाीय सिद्धांत को स्पष्ट रूप से समझने के लिए अगर इसका अन्तर चक्रीय सिद्धांत से किया जाए तो इसकी प्रकृति को सरलतापूर्वक समझा जा सकता है। दोनों में अन्तर निम्न प्रकार से किया जा सकता है-
  1. रेखीय सिद्धांत इस विचार पर आधारित है कि सामाजिक परिवर्तन की प्रवृत्ति एक निश्चित दिशा की ओर बढ़ने की होती है, इसके विपरीत चक्रीय सिद्धांत के अनुसार सामाजिक परिवर्तन सदैव उतार-चढ़ाव से युक्त होते हैं अर्थात प्रत्येक परिवर्तन सदैव नई दिशा उत्पन्न नहीं करता बल्कि इसके कारण समूह द्वारा कभी नई विशेषताओं और कभी पहले छोड़ी जा चुकी विशेषताओं को पुन: ग्रहण किया जा सकता है।
  2. रेखीय सिद्धांत के अनुसार सामाजिक परिवर्तन की दिशा साधारणतया अपूर्णता से पूर्णता की ओर बढ़ने की होती है। चक्रीय सिद्धांत में परिवर्तन के किसी ऐसे क्रम को स्पष्ट नहीं किया जा सकता, इसमें परिवर्तन पूर्णता से अपूर्णता अथवा अपूर्णता से पूर्णता किसी भी दिशा की ओर हो सकता है। 
  3. रेखीय सिद्धांत के अनुसार परिवर्तन की गति आरम्भ में धीमी होती है लेकिन एक निश्चित बिन्दु तक पहुँचने के बाद परिवर्तन बहुत स्पष्ट रूप से तथा तेजी से होने लगता है। प्रौद्योगिक विचार से उत्पन्न परिवर्तन इस कथन की पुष्टि करते हैं। जबकि इसके विपरीत चक्रीय सिद्धांत के अनुसार एक विशेष परिवर्तन को किसी निश्चित अवधि का अनुमान नहीं लगाया जा सकता । परिवर्तन कभी जल्दी-जल्दी हो सकते हैं और कभी बहुत सामान्य गति से। 
  4. रेखीय सिद्धांत की तुलना में चक्रीय सिद्धांतों पर विकासवाद (Evolutionism) का प्रभाव बहुत कम है। तात्पर्य यह है कि रेखाीय सिद्धांत के अनुसार परिवर्तन की प्रवृत्ति एक ही दिशा में तथा सरलता से जटिलता की ओर बढ़ने की होती है। इसके विपरीत चक्रीय सिद्धांत सांस्कृतिक और सामाजिक परिवर्तन में भेद करते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि विकासवादी प्रक्रिया अधिक से अधिक सामाजिक परिवर्तन में ही देखने को मिलती है जबकि सांस्कृतिक जीवन और विशेष मूल्यों तथा लोकाचारों में होने वाला परिवर्तन उतार-चढ़ाव से युक्त रहता है। 
  5. रेखीय सिद्धांत सैद्धान्तिकता (indoctrination) पर अधिक बल देते हैं, ऐतिहासिक साक्षियों पर नहीं। जब कि चक्रीय सिद्धांत के द्वारा उतार-चढ़ाव से युक्त परिवर्तनों को ऐतिहासिक प्रमाणों के द्वारा स्पष्ट किया गया है इस प्रकार उनके प्रतिपादकों का दावा है कि उनके सिद्धांत अनुभवसिद्ध हैं। 
  6. रेखीय परिवर्तन व्यक्ति के जागरूक प्रयत्नों से संबंधित है। इतना अवश्य है कि रेखीय परिवर्तन एक विशेष भौतिक पर्यावरण से प्रभावित होते हैं लेकिन भौतिक पर्यावरण स्वयं मनुष्य के चेतन प्रयत्नों से निर्मित होता है। जबकि चक्रीय सिद्धांत के अनुसार सामाजिक परिवर्तन एक बड़ी सीमा तक मनुष्य की इच्छा से स्वतंत्र है। इसका तात्पर्य यह है कि प्राकृतिक दशाओं, मानवीय आवश्यकताओं तथा प्रवृत्तियों (Attitudes) में होने वाले परिवर्तन के साथ सामाजिक संरचना स्वयं ही एक विशेष रूप ग्रहण करना आरम्भ कर देती है। 
  7. रेखीय सिद्धांत परिवर्तन के एक विशेष कारण पर ही बल देता है और यही कारण है कि कुछ भौतिक दशाएँ सदैव अपने और समूह के बीच एक आदर्श सन्तुलन अथवा अभियोजनशीलता (Adjustment) स्थापित करने का प्रयत्न करती है। जबकि चक्रीय सिद्धांत परिवर्तन का कोई विशेष कारण स्पष्ट नहीं करते बल्कि इनके अनुसार समाज में अधिकांश परिवर्तन इसलिए उत्पन्न होते हैं कि परिवर्तन का स्वाभाविक नियम है।
  8. रेखीय सिद्धांत इस तथ्य पर बल देते हैं कि परिवर्तन का क्रम सभी समाजों पर समान रूप से लागू होता है। इसका कारण यह है कि एक स्थान के भौतिक अथवा प्रौद्योगिक पर्यावरण में उत्पन्न होने वाले परिवर्तन को शीघ्र ही दूसरे समाज द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है। बल्कि चक्रीय सिद्धांत के अनुसार एक विशेष प्रकृति के परिवर्तन का रूप सर्वव्यापी नहीं होता; अर्थात विभिन्न समाजों और विभिन्न अवधियों में परिवर्तन की प्रक्रिया भिन्न-भिन्न प्रकार से मानव समूहों को प्रभावित करती है।

सामाजिक परिवर्तन के द्वन्द्व या संघर्ष का सिद्धांत 

द्वन्द्व या संघर्ष का सिद्धांत इस मान्यता पर आधारित है कि समाज में होने वाले परिवर्तनों का प्रमुख आधार समाज में मौजूद दो विरोधी तत्वों व शक्तियों के बीच होने वाला संघर्ष या द्वन्द्व है। इस सिद्धांत के समर्थक यह मानने से इन्कार करते हैं कि समाज बिना किसी बाधा, गतिरोध या संघर्ष के उद्विकासीय ढंग से सरल से उच्च व जटिल स्तर तक पहुँच जाता या परिवर्तित होता है। उनके अनुसार समाज की प्रत्येक क्रिया, उप-व्यवस्था (sub-system) और वर्ग का विरोधी तत्व अवश्य होता है और इसीलिए उनमें विरोधी प्रतिक्रिया या संघर्ष अवश्य होता है। इस संघर्ष के फलस्वरूप ही सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक परिवर्तन घटित होता है। साथ ही, ये परिवर्तन सदा शान्तिपूर्ण ढंग से होता हो, यह बात भी नहीं है क्योंकि समाज विस्फोटक तत्वों या शक्तियों से भरा हुआ होता है। इसलिए क्रान्ति के द्वारा भी परिवर्तन घटित हो सकता है। क्रान्ति के इस कष्ट को सहन किए बिना नए युग का प्रारम्भ उसी प्रकार सम्भव नहीं जैसे प्रसव पीड़ा को सहन किए बिना नव सन्तान का जन्म सम्भव नहीं। इसी सन्दर्भ में संघर्ष के कुछ सिद्धांतों की विवेचना है।
  1. कार्ल मार्क्स का सिद्धांत
  2. कोजर का सिद्धांत
  3. दहेरेन्डॉर्फ़ का सिद्धांत
  4. वेबलन का का सिद्धांत
  5. टोयनोबी का सिद्धांत

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