संप्रेषण की परिभाषा

संप्रेषण विचारों के आदान-प्रदान की ऐसी प्रणाली है जिसके माध्यम से एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकता है, उसके विचार समझ सकता है तथा दूसरे को अपने बारे में या अपने विचारों से अवगत करा सकता है। इस प्रकार, संप्रेषण एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे एक व्यक्ति को किसी वक्ता के विचार अन्य व्यक्ति के समक्ष, उसी रूप में जिसमें कि वक्ता चाहता है, प्रस्तुत करने की प्रेरणा प्राप्त होती है।

संप्रेषण की परिभाषा

संप्रेषण सम्बन्धी कुछ परिभाषाएँ प्रकार हैं :

सी0ए0 ब्राउन के विचार से, ‘‘संप्रेषण विचारों एवं भावनाओं को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को स्थानांतरित करने की प्रक्रिया है - इसका उद्देश्य सूचना पाने वाले व्यक्ति में समझ जाग्रत करना है।’’ 

लुइस ए0 एलन के अनुसार, ‘‘संप्रेषण उन बातों का योग है जो एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के मस्तिष्क में समझ उत्पन्न करने की दृष्टि से करता है। इसमें बात कहने, सुनने व समझने की एक व्यवस्थित एवं सतत् प्रक्रिया सम्मिलित रहती है।’’ 

एम0 डब्ल्यू कमिंग के विचार से, ‘‘संचार शब्द संदेशों (तथ्यों, विचारों, अभिवृत्तियों एवं रायों (सलाह या मशविरा) के प्रेषण की प्रक्रिया को व्यक्त करता है, जो एक व्यक्ति से दूसरे को किया जाता है ताकि वे एक दूसरे के विचारों या संदेशों को समझ सकें।’’ 

एफ0ए0 कार्टियर एवं के0ए0 हारवुड के अनुसार, ‘‘संप्रेषण वह प्रक्रिया है जिससे एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का ध्यान उसकी याददाश्त को आकृष्ट करने के लिए करता है।’’ 

एस0 जी0 हुनैरयागर तथा आई0 एल0 हेकमान के विचार से ‘‘संचार वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा सूचनाएँ भेजी तथा प्राप्त की जाती हैं। यह पब्र न्ध के लिए एक मूलभूत व्यवस्था है, जिसके बिना संगठन का अस्तित्व नहीं रहता। इसका कारण स्पष्ट है कि हम अपने कर्मचारियों के साथ यदि संप्रेषण नहीं कर सकते तो हम उनसे किसी प्रकार का कार्य भी नहीं करवा सकते। किस प्रकार का कार्य लेना चाहते है, कैसे कार्य करवाना चाहते हैं, कब करवाना चाहते हैं, आदि, यह कुछ नहीं बता सकेंगे।’’

    संप्रेषण के प्रकार  

    1. मौखिक संप्रेषण

    इसके अन्तर्गत आपसी बातचीत, टेलीफोनिक वार्तालाप आदि शामिल है। यह कहने-सुनने की प्रत्यक्ष विधि है जिसमें चेहरे के हाव-भाव व अंग संचालन से भी सांकेतिक संप्रेषण होता रहता है। पव्र चन देना, सीटी व घंटी बजाना आदि से श्रोता की प्रतिक्रिया का पता भी तुरन्त लग जाता है। प्राचीन काल में अधिकांश संदेश संदेशवाहकों द्वारा मौखिक रूप से ही संप्रेषित किए जाते थे। माैिखक संप्रेषण एक सशक्त विधि है। इसके प्रमुख लाभ इस प्रकार हैं। :
    1. सूचना का संप्रेषण शीघ्र होता है। 
    2. संदेश की प्रतिपुष्टि शीघ्र हो जाती है।
    3. इसमें समय व धन दोनों की बचत होती हैं। 
    4. मौखिक संप्रेषण आमने सामने की स्थिति में होता है। अत: यह प्रबन्धकों व कर्मचारियों को करीब लाता है।
    5. इससे अच्छे मानवीय सम्बन्धों के विकास में सहायता मिलती है।
    6. मौखिक रूप से (मीटिंग, संगोष्ठी आदि के द्वारा) अनेक लोगों को एक साथ संदेश देना संभव है। 
    किन्तु, मौखिक संप्रेषण की कुछ हानियाँ भी हैं, जो इस प्रकार है
    1. सन्देश का कोई लिखित प्रमाण न होने से कई बार कर्मचारी उस पर अमल करने से कतराते हैं। 
    2. इसमें भविष्य के लिए संदेश का कोई आलेख सुरक्षित नहीं रहता। अत: संदेश दाता कभी भी ऐसा संदेश देने से मुकर सकता है।
    3. यदि संदेश दाता व संदेश प्राप्तकर्ता के बौद्धिक स्तर में अधिक अंतर हो या उनके स्तर में अन्तर हो तो बहुधा संदेश के अर्थ निरूपण व क्रियान्वयन में भयावह दरार उत्पन्न हो जाती है।
    4. भाषा सम्बन्धी कठिनाइयाँ भी मौखिक संप्रेषण को लक्ष्य विहीनता की ओर ले जाती हैं। अत: मौखिक संदेश, आदेश या निर्देश देते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि इसमें कार्य से सम्बन्धित सामान्य निर्देश ही दिए जाएँ, न कि कोई नीति निर्णय अथवा गम्भीर प्रशासनिक निर्णय। 

    2. लिखित संप्रेषण

    इस विधि के अन्तर्गत संदेश लिखित में एक व्यक्ति या पक्ष द्वारा दूसरे व्यक्ति या पक्ष को संप्रेषित किया जाता है। इसके विभिन्न प्रारूप इस प्रकार हो सकते हैं - परिपत्र, मैन्युअल, प्रतिवेदन, चिठ्ठियाँ, पत्र पत्रिकाएँ, नोटिस बोर्ड, कार्ड बोर्ड, ट्रांस्पैरेन्सीज, आदि। लिखित संप्रेषण के अनेक लाभ हैं, जो निम्न प्रकार हैं। : 
    1. लिखित संदेश संक्षिप्त एवं स्पष्ट होते हैं।
    2. संदेश लिखित होने के कारण भविष्य में इनका संदर्भ के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। 
    3. इसमें संदेश दाता तथा संदेश प्राप्तकर्ता के बीच प्रतयक्ष संपर्क की आवश्यकता नहीं रहती। 
    4. लिखित संप्रेषण में प्राप्तकर्ता अर्थ का अनथर् करने की गलती नहीं करता, क्योंकि उसे इसे समझने का पर्याप्त अवसर मिल जाता है। 
    5. सूचना प्राप्तकर्ता इसके अर्थनिरूपण में अन्य लोगों या आवश्यकता पड़ने पर विशेषज्ञों की मदद ले सकता है। 
    किन्तु, लिखित संप्रेषण में कुछ दोष भी है जो निम्न प्रकार हैं। :
    1. लिखित संप्रेषण में प्राप्तकर्ता, यदि वह भाषा न समझता हो, तो उसे इसे समझने में कठिनाई होती है। 
    2. लिखित संदेश के प्रति प्राप्तकर्ता की प्रतिक्रिया को जानना कई बार असंभव हो जाता है या फिर काफी समय लगता है।
    3. इसमें गोपनीयता का हनन हो सकता है।
    4. यह अधिक खर्चीली विधि है। 
    5. लिखित संप्रेषण में मौखिक संप्रेषण की तुलना में अधिक समय लगता है। 
    इस प्रकार, दोनों विधियों में ही अनेक गुण व दोष हैं; जिनका विश्लेषण  तालिका में किया गया हैं 

          विशेषतामौखिक संप्रेषणलिखित संप्रेषण 
    1  व्यक्तिगत प्रभाव
    डालने की क्षमता
    अधिक होती है। नहीं होती है।
    2प्रश्नोत्तर सुविधा का
    प्रावधान
    होता है।  नहीं होता है।
    3 संप्रेषण में समय कम लगता हैअधिक लगता है
    4स्पष्टताविद्यमान रहती है।अधिक विद्यमान रहती है। 
    5संप्रेषण की
    प्रभाविकता
    संप्रेषणकर्ता की क्षमता
    पर निर्भर करती है।
     संप्रेषणकर्ता की लेखन
    कला पर निर्भर करती है।
    6अनौपचारिकता अधिक होती है।अभाव रहता है।
    7संप्रेषणकर्ता के हाव- भावों की
    अभिव्यक्ति
    हो पाती है।नहीं हो पाती।

    इस प्रकार आवश्यकता को ध्यान में रखकर दोनों ही विधियों का इस प्रकार उपयोग किया जाना चाहिए कि इनके दोषों का यथा सम्भव निवारण हो सके। दोनों विधियों का सम्मिलित प्रयोग अधिक उचित है। आधुनिक युग में लिखित विधि का उपयोग अधिक किया जाता है।

    संप्रेषण प्रक्रिया के तत्व

    1. प्रेषक

    संवाद की प्रक्रिया प्रेषक से ही आरम्भ होती हैं। संवादकतार् को यह ध्यान में रखना चाहिए कि : (i) वे क्या भावनाएँ, विचार अथवा सूचनाएँ हैं, जो भेजनी हैं ?, (ii) ये सूचनाएँ किसे भेजनी  है? (iii) क्या प्रेषिती सूचना प्राप्त करने के लिए तैयार है?; (iv) संदेश के लिए कूट शब्दों का उपयोग करना है या नहीं; यदि हाँ, तो संदेश का कूटबद्धीकरण कैसे करना है ?; (v) संदेश को कैसे प्रभावकारी बनाया जाए?; तथा (vi) संप्रेषण का माध्यम क्या हो? इस प्रकार, सारे संवाद, उसकी गुणवत्ता, व प्रभावकारिता प्रेषक की कुशलता पर निर्भर है, क्योंकि वही संचार प्रक्रिया का पहलकर्ता होता है।

    2. प्रेषिती

    संवाद प्राप्तकर्ता संप्रेषण का दूसरा छोर होता है। वही संदेश सनु ता या प्राप्त करता है; वही उसकी कूट भाषा का रूपान्तरण करता है; तथा संदेश को सही अर्थो में समझकर कायर्व ाही करता है। इसीलिए, प्रेषिती को मामले की पर्याप्त समझ व ज्ञान होना चाहिए। तभी संप्रेषण के उद्देश्यों को हासिल किया जा सकता हैं। प्रेषिती के समर्पित एवं समझदारीपूर्ण आचरण से ही संप्रेषणप्रक्रिया को प्रभावी बनाया जा सकता है।

    3. सन्देश 

    वह सूचना, विचार अथवा निर्देश जो प्रेषक द्वारा प्रेषिती को भेजा जाता है, संदेश कहलाता है। सन्देश बहुत ही स्पष्ट, लिपिबद्ध, उद्देश्यपूर्ण, समयानुकूल तथा नियंत्रण एवं कार्यवाही के योग्य होना चाहिए। सन्देश ही संप्रेषण प्रक्रिया का प्रमुख तत्व है।

    4. संप्रेषण का माध्यम 

    संचार चैनेल प्रेषक व प्रेषिती के मध्य सेतु का कार्य करता है। सन्देश एक छोर से दूसरी छोर पर पहुँचाने के लिए प्रत्यक्ष संदेश, पत्र, पत्रिकाएँ, टेलीफोन, रेडियो, टेलीविजन, सेमीनार, मीटिंग, आदि का इस्तेमाल किया जाता है। इन्हें ही संचार के माध्यम के रूप में जाना जाता है।

    कार्यवाही 

    किसी भी सन्देश को भेजने व प्राप्त करने का अन्तिम उद्देश्य किन्हीं लक्ष्यों की प्राप्ति ही होता है। इसलिए सन्देश की सफलता इसी बात में निहित है कि प्रेषिती उसे सही रूप में समझ ले व यथा आवश्यकता आगे की कार्य वाही सुनिश्चित करे। इस प्रकार, इच्छित प्रतिफल की प्राप्ति के लिए संदेश की प्रतिक्रिया स्वरूप कार्यवाही का होना अनिवार्य है।

    संचार की प्रक्रिया

    Bandey

    मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं। मैंने अपनी पुस्तकों के साथ बहुत समय बिताता हूँ। इससे https://www.scotbuzz.org और ब्लॉग की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

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