सामवेद के उपदेश और सामवेद की शिक्षाएं

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चारों वेदों में सामवेद यद्यपि आकार की दृष्टि से सबसे छोटा है, फिर भी इसकी प्रतिष्ठा सर्वाधिक है। भगवान श्रीकृष्ण ने भी गीता में कहा है कि ‘‘वेदानां सामवेदोऽस्मि’’। ऐसा सुनकर मन में यह भाव उदित होता है कि सामवेद में ऐसी कौन सी श्रेष्ठता और विशेषता है जिसके कारण भगवान ने इसको अपना विभूति बतलाया। विचार करने पर यह प्रतीत होता है कि यद्यपि ऋग्वेद सबसे बृहद कलेवर का है और अथर्ववेद तथा यजुर्वेद भी काफी बडे़ हैं पर सामवेद छोटा होने पर भी सबका सार रूप है। आदिम कालीन यक्षों में भगवान की जो सर्वश्रेष्ठ भावपूर्ण, मधुर और संगीतमय स्तुतियाँ की गयी थीं उन्हीं को चुनकर सामवेद के रूप में उपस्थित किया गया हैं। 

इसके अध्ययन से वैदिक ऋषियों की अति उच्च आघ्यात्मिक भावनाओं का दिग्दर्शन होता है और उन्होंने मानवमात्र के लिए जो उपदेश एवं शिक्षाएँ दी हैं उनका भी लाभ मिलता है।

सामवेद के मंत्र अमूल्य रत्नों की खान हैं उसमें जो जितना गहरा उतरेगा जितना ही परिश्रम करेगा उतने ही ज्ञान रूपी अमूल्य मणि-माणिक वह प्राप्त कर सकेगा। सामवेद के एक मंत्र में उदार बनने की बात की गयी है तथा अदानशीलता, अनुदारता संकीर्णता तथा स्वार्थपरता की तीव्र निन्दा की गयी है :-

पाहि विश्वस्माद्रक्षसो अराव्ण: प्रस्म बाजेषु नोऽव।
त्वामिद्धि नेदिष्ठं देवतातय: आपिं नक्षामहे वृधे।।

उपरोक्त मंत्र में स्वाथ्र्ाी एवं संकीर्ण व्यक्तियों से रक्षा करने की बात ईश्वर से की गयी है क्योंकि उस प्रकार लोग समाज के अधोपतन के कारण होते हैं। दानशीलता, उदारता आदि सद्गुणों से ही मनुष्य की आत्मा का उत्थान तथा समाज का विकास होता है।

मानव-जीवन में कर्मण्यता का अत्यंत ही उच्च स्थान है। संसार में ऐसे अनेक व्यक्ति हैं जो अध्यात्मिकता का दावा करते हैं, ज्ञान की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, परन्तु वे दायित्व का निर्वहन नहीं करते हैं। ऐसे लोगों पर से शीघ्र ही मनुष्य की श्रद्धा हट जाती है। मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह कर्मण्यता का पूरा ख्याल रखें। अधोलिखित मंत्र में इसी कर्मण्यता का संदेश दिया गया है:-

अदाम्य:पुरएताविशामग्निर्मानुषीणाम् तूण्र्ाी रथ: सदा नव: ।।


मनुष्य की सर्वाड़ीण उन्नति और कल्याण के लिए उसके शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक तीनों प्रकार के विकास की आवश्यकता है। सभी प्रकार के सांसारिक कार्यों को सुचारू रूप से करने के लिए सशक्त एवं स्वस्थ शरीर का होना अति आवश्यक है। इसके साथ ही मन और बुद्धि का उचित शिक्षा द्वारा विकास करना परम आवश्यक है। अंत में शरीर और मन दोनों को आत्मा के आदर्शों का भी ध्यान रखना अनिवार्य है क्योंकि हमारा अंतिम लक्ष्य आत्मकल्याण है। 

इसी आत्मकल्याण के लिए अधोलिखित मंत्र में अग्नि देवता से प्रार्थना की है:- अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये। नि होता सत्सि वर्हिषि ।।

मनुष्य का परम कर्त्तव्य यह है कि वह परोपकारी बने तथा ईश्वर की सहायता सृष्टि-संचालन में करे। इसका कारण यह है कि परोपकारी जनों से ही यह सृष्टि चल रही है। परोपकारहीन व्यक्ति तो समाज के विकास का बाधक हैं। अधोलिखित मंत्र में भगवान विष्णु से प्रार्थना की गयी है कि वह वष्टकारयुक्त हव्य ग्रहण कर उसका कल्याण करे।

वषट्ते विष्णुवास आकृणोमि तन्में जुषस्व शिपिविष्ट हव्यम्।
वर्धन्तु त्वा सुष्टुतयो गिरो में यूयं पात स्वस्तिभि: सदा न:।

सामवेद के एक मंत्र में सामरूपी परमात्मा से यह प्रार्थना की गयी है कि वे हम मनुष्यों की आत्मा को प्रकाशित करे तथा ज्ञान-विज्ञान का संचार करे क्योंकि वह समस्त ज्ञान का आधार, आकाश और पृथिवी के समान विस्तृत,अग्नि और सूर्य के समान अज्ञानरूपी अंधकार का नाशक तथा इन्द्र और विष्णु के समान सबका पोषक है -

सोम: पवते जनिता मतीनां जनिता दिवो जनिता पृथिव्या:।
जनिताग्नेर्जनिता सूर्यस्य जनितेन्द्रस्य जनितोत विष्णो:।।

मनुष्य संसार में जितने भी प्रकार से काम करता है उसका मुख्य साधन उसका शरीर और इन्द्रियाँ ही होती है। इन्हीं के द्वारा वह शुभ और अशुभ कर्म करने में समर्थ होता है। अतएव सामवेद के एक मंत्र में दसों इन्द्रियों को दस घोड़ों की उपमा दी गयी है और कहा गया है कि इनको मन रूपी लगाम और संयमरूपी चाबुक से वश में रखना चाहिए अन्यथा मनुष्य कुमार्गगामी होकर विपद्ग्रस्त हो सकता है। अधोलिखित मंत्र में मित्र देव तथा वरूण देव से प्रार्थना की गयी है कि वे हमें सुमार्गगामी बनावें-

आ नो मित्रावरूणा वृतैर्गव्यूतिमुक्षतम्। मध्वा रजाँ-सि सुक्रत् ।।

सत्य ज्ञान का द्रष्टा, मनुष्यों में अग्रणी, सबको प्रभावित करनेवाला विद्वान् वही हो सकता है जो इस अध्यात्म तत्त्व को स्वयं जानता है और दूसरों को भी ज्ञान प्रदान करता है। अधोलिखित मंत्र में यह बताया गया है कि ज्ञान का दान करना हमारा एक पवित्र कर्त्तव्य होना चाहिए :-

ऋष्र्वप्र: पुरएता जनानामृभूध्र्ाीर उशना काव्येन।
स चिद्विवेदन निहितं यदा सामपीच्यां गृह्यं नाम गोनाम् ।।

वर्तमान समय में अधिकांश लोगों की यह प्रवृत्ति देखने में आती है कि वे अकारण जमाने को दोष देते रहते हैं किन्तु वास्तविकता यह है कि वे स्वयं दूषित विचार रखते हैं वैसे ही कार्य भी करते हैं और फिर अपने को निर्दोष साबित करने के लिए जमाने को दोषी बताते हैं। सामवेद के एक मंत्र में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि परमात्मा कभी किसी को अकारण दण्डित नहीं करता है। इसका मतलब यह है कि जो लोग कष्ट पाते हैं वे अपने दुष्कर्मों के फल भोगते हैं। बुरे कर्म का फल बुरा होता है और अच्छे कर्म का फल अच्छा। मनुष्य को आत्म सुधार कर सुकर्म करना चाहिए ताकि उसका जीवन सम्पन्न एवं समुन्नत हो सके:-

कदाचन स्तरीरसि नेन्द्र सश्चसि दाशुषे।
उपोपेन्नु मघवन भूय इ ते दानं देवस्य पृच्यते।।

मनुष्य को हमेशा सत्यमार्ग का अवलम्बन करना चाहिए क्यों कि ‘सत्यमेव जयते नानृतम’ यह प्रसिद्ध उक्ति है। ईश्वर भी वस्तुत: उन्हीं की सहायता करता है जो सच्चा है। सत्यवादी व्यक्ति के हरेक कामनाओं को ईश्वर पूर्ण करता है। वह परमात्मा न्यायकारी और सत्यप्रिय है वह कभी किसी असत्यावादी को आश्रय नहीं देता है। जो मुनष्य असत्यावलम्बी होता है वह शीघ्र ही सभी के नजरों में गिर जाता है तथा विपद्ग्रस्त हो जाता है। सामवेद के अधोलिखित मंत्र में इसी सत्य की महिमा को उद्घाटित किया गया है:-
अलर्षिरातिं वसुदामुप स्तुहि भद्रा इन्द्रस्य रातय:।
यो अस्य काम विधतोतन रोषति मनो दानाय चोदयन्।।

भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि जब-जब पृथ्वी पर धर्म की हानि होती है तथा अधर्म का उत्थान होता है तब धर्म की स्थापना के लिए मैं अवतरित होता हूँ। अगर सच्चे लोगों को संरक्षित न करे और दुष्टों को दण्डित न करे तो सृष्टि की गति ही रुक जाएगी। इतिहास साक्षी है कि इस धरातल पर जितने भी अत्याचारी हुए हैं उनका सर्वनाश अवश्य हुआ है। इसके विपरीत जो सज्जन कष्ट सहकर भी परोपकार और सदाचार में संलग्न रहे हैं, उनकी स्थिति कल्याणदायिनी रही है। अर्थात ईश्वर बड़ा ही न्यायप्रिय है, वह दुर्जनों को दुर्गति तथा सज्जनों को सद्गति प्रदान करता है। इसी बात को सामवेद के अधोलिखित मंत्र में बताया गया है:-
सनेभि त्वमस्मदा अदेवं कं चिदत्रिणम्। साहवाँ, इन्दो परि बाधो अपद्वयुम्।।

संदर्भ-
  1. सामवेद उत्तरार्चिक 15-1-2.4, पृ0 252, पं0 श्री राम शर्मा आचार्य, संस्कृति संस्थान,बरेली, सं02006

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