संघवाद के प्रकार

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आज विश्व की संघात्मक प्रणालियों का व्यापक विश्लेषण करने के बाद राजनीतिक विश्लेषक इस बात से चिन्तित हैं कि आधुनिक संघवाद किस दिशा में जा रहा है। अपने प्राचीन स्वरूप में जो संघवाद स्थापना के समय सहकारी स्वरूप का था, वही संघवाद आज सौदेबाजी का संघवाद बन गया है। इस सौदेबाजी की व्यवस्था ने संघात्मक प्रणाली में संकीर्ण प्रान्तीय हितों को जन्म दिया है। आज केन्द्रीय व राज्य सरकारें संघ के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए आपसी विचार-विनिमय के समय सौदेबाजी करती प्रतीत होती है। 

1967 के बाद भारत में संघवाद का सौदेबाजी वाला स्वरूप स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है। इस सौदेबाजी की आड़ मेंं आज आर्थिक विकास व राष्ट्रीय सुरक्षा की आवश्यकताओं ने केन्द्रीय सरकारों को अधिक शक्तिशाली बना दिया है। प्रान्तीय सरकारों द्वारा आर्थिक विकास का बोझ न उठाए जाने के कारण इस कार्य को केन्दीय सरकारें ही कर रही हैं। इससे शक्तियों के केन्द्रीयकरण का विकास हुआ है। 

इसके परिणामस्वरूप संघवाद का एक नया रूप उभर रहा है, जिसे एकात्मक संघवाद या केन्द्रीकृत संघवाद भी कहा जाता है। 

संघवाद के प्रकार 

संघवाद के आज तीन प्रतिमान दृष्टिगोचर होते हैं :-
  1. सहकारी संघवाद 
  2. सौदेबाजी का संघवाद 
  3. एकात्मक संघवाद 

सहकारी संघवाद 

संघात्मक व्यवस्था में केन्द्र व प्रांतीय सरकारों में शक्तियों का विभाजन करने के बाद सरकार के दोनों स्तरों पर सहयोग को बढ़ाने वाली व्यवस्थाएं भी की जाती हैं ताकि संघ के वांछित लक्ष्यों को आसानी से प्राप्त किया जा सके। इस सहयोग की आवश्यकता इसलिए होती है क्योंकि सरकार के दोनों स्तर समान लक्ष्यों की दिशा में अग्रसर होते हैं। संघात्मक व्यवस्था के सामान्य उद्देश्य दोनों सरकारों के अलग-अलग कार्यों के बाद भी उनके अन्त:क्षेत्राीय सम्बन्धों को अनिवार्य बना देते हैं। 

व्हीयर का कहना है कि अन्त:क्षेत्राीय सम्बन्धों के बिना प्रादेशिक सरकारें आपसी अनुभवों के लाभों से वंचित हो जाएंगी और केन्द्रीय सरकार के अनुभवों से भी वंचित रह जाएंगी। इसलिए यह सहयोग प्रादेशिक सरकारों के मध्य होने के साथ साथ केन्द्रीय व प्रादेशिक सरकारों के बीच में भी होना आवश्यक है। इसी कारण विश्व के अनेक संघीय प्रणालियों में इस सहयोग को बढ़ाने वाले अभिकरणो की व्यवस्था की गई है। 

अमेरिका, भारत, कनाडा तथा आस्ट्रेलिया में सहयोग को बढ़ाने वाले अभिकरण कार्यरत हैं। आस्ट्रेलिया में अन्त:प्रादेशिक सम्मेलन, प्रीमियर्स कान्फ्रेंस, ऋण परिषद् के वार्षिक सम्मेलन, अमेरिका में राज्यपालों के सम्मेलन, कनाडा में डोमिनियन प्रोविन्सियल सम्मेलन, भारत में मुख्यमिन्त्रायों, राज्यपालों व क्षेत्राीय परिषदों के सम्मेलन केन्द्रीय व प्रान्तीय सरकारों के आपसी सहयोग को बढ़ाने का साधन हैं। 

भारत के संविधान में ही केन्द्र-राज्यों के अन्त:सम्बन्धों को विकसित करने वाली अनेक व्यवस्थाएं की गई हैं। वित्त आयोग अन्त:-राज्यीय समितियां, क्षेत्राीय परिषदें, योजना आयोग, राष्ट्रीय विकास परिषद आदि अभिकरण भारतीय संघ में केन्द्र-राज्य सम्बन्धों में सहयोग की प्रवृत्ति बढ़ाने की दिशा में ठोस कार्य कर रहे हैं। भारत के संविधान में ही भारत को ‘राज्यों का संघ’ कहा गया है। इसलिए भारत की संघीय प्रणाली की स्थापना का आधार ही सहकारी संघवाद है। ग्रेनविल आस्टिन ने भी भारतीय संघं को सहकारी संघ कहा है। 

विश्व के अन्य देशों में भी सहकारी संघवाद की स्थापना का प्रमुख कारण एक ही राजनीतिक व्यवस्था में एक ही संघीय ढांचे द्वारा अनेक सरकारों की स्थापना करना है। जब सरकारें एक ही संघीय ढांचे से जन्म लेगी तो वे अवश्य ही उस ढांचे से अपना सम्बन्ध रखेंगी जिसने उनको खड़ा किया है। इसी कारण सहकारी संघवाद में विविधतायुक्त संस्कृतियां, संस्थाएं, विघटनकारी शक्तियां संस्थागत आधार पर ही सहयोगरत रहती हैं। जहां पर संघीय ढांचे में सहयोग की संस्थाओं का प्रावधान नहीं होता, वहां भी परम्पराओं के रूप में प्राय: ये जन्म ले ही लेती हैं। यही सहयोग की प्रवृत्ति संघात्मक व्यवस्था को विघटन से बचाती है। 

आज आर्थिक विकास की जरूरतें, सुरक्षा की गारन्टी जैसी आवश्यकताओं ने सहकारी संघवाद को मजबूत आधार प्रदान किया है। आज का युग कल्याणकारी सरकारों का युग है। प्रान्तीय सरकारों के पास आर्थिक साधनों का प्राय: अभाव ही होता है। अचानक आने वाली प्राकृतिक आपदाएं प्रादेशिक सरकारों की अर्थव्यवस्था को झकोर देती है। उनसे उभरने के लिए केन्द्रीय सरकारों से सहयोग प्राप्त करने के सिवाय उनके सामने कोई विकल्प नहीं बचता। इसलिए अनेक समस्याएं प्रांतीय सरकारों को संघात्मक ढांचे के बुनियादी सिद्धांत की ओर अग्रसर होने के लिए बाध्य कर देती हैं। 

इसी कारण प्रान्तीय सरकारें केन्द्रीय सरकार से सहयोग करती रहती है। यह संघवाद संघात्मक शासन प्रणाली का मौलिक रूप है। आज विश्व के अनेक देशों में यह प्रतिमान भी प्राय: देखने को मिल जाता है।

सौदेबाजी का संघवाद 

यद्यपि संघवाद की स्थापना का मूल आधार केन्द्र व प्रान्तीय सरकारों में पाया जाने वाला पारस्परिक सहयोग है, लेकिन कुछ देशों में आज पारस्परिक सहयोग का स्थान सौदेबाजी ने ले लिया है। एशिया और अफ्रीका के नवोदित देशों ने पाश्चात्य संघवाद को गहरा आघात पहुंचाया है। इन देशों में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दलीय व्यवस्था के नए प्रतिमान स्थापित हुए हैं। इन राज्यों में द्विस्तरीय प्रकृति वाले राजनीतिक दलों के जन्म लेने से संघात्मक व्यवस्था में सौदेगाजी का प्रचलन बढ़ा है। 

आज बहुत से राजनीतिक दल संकीर्ण स्थानीय हितों को प्रमुखता देकर संघवाद के केन्द्रीय ढांचे को चुनौती दे रहे हैं और संघात्मक सरकार के सामान्य लक्ष्यों से मुंह फेर रहे हैं। यह सत्य है कि दोनों सरकारों के बिना संघात्मक शासन के लक्ष्य प्राप्त नहीं किए जा सकते। जब राजनीतिक दल जनता का समर्थन संकुचित व क्षेत्राीय आधार पर प्राप्त करने का प्रयास करते हैं तो इससे दो स्तरीय सरकारें ऐसे दलों के नियन्त्रण में आ जाती हैं कि उन पर राष्ट्रीय हित के लक्ष्यों को प्राप्त करने का बंधन नहीं रहता। इस प्रकार की स्थिति सौदेबाजी को जन्म देती है। 

यद्यपि आज तक व्यापक स्तर पर ऐसी सौदेबाजी किसी भी देश में नहीं हुई है, लेकिन इसके सीमित प्रयोग के संकेत अनेक संघात्मक देशों में प्रकट हुए हैं। भारत में 1967 के बाद सौदेबाजी का सिलसिला प्रारम्भ हुआ था। इसी कारण मोरिश जोन्स ने भारतीय संघात्मक शासन प्रणाली को सौदबाजी का संघ कहा है। सांझा सरकारों की आवश्यकता ने सौदेबाजी के संघवाद को अधिक पुष्ट किया है। आज भारत में राष्ट्रीय सरकार को अपने हितों को पूरा करने के लिए प्रांतीय सरकारों के सहयोग की आवश्यकता है। यह सहयोगात्मक आधार ही संघवाद की प्राथमिक शर्त है। लेकिन आज संकीर्ण स्वार्थों से परिपूर्ण प्रांतीय क्षेत्रों में कार्यरत क्षेत्रीय दल केन्द्र-राज्य सहयोग को कम करके सौदेगाजी की दिशा में धकेल रहे हैं। परन्तु चाहे सौदेबाजी पर आधारित ये राजनीतिक दल राष्ट्रीय दलों के साथ कितना ही खेल खेलें, संघात्मक व्यवस्था का अन्त नहीं कर सकते। 

जिस देश में संविधानिक व्यवस्थाएं इतना प्रबल हों कि वे संकीर्ण क्षेत्रीय हितों को राष्ट्रीय हितों के साथ आसानी से मिला दें, वहां पर संघवाद को कोई हानि नहीं हो सकती। भारत जैसे विविधता वाले देश में तो क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय लक्ष्यों से अलग प्रादेशिक हित निर्धारित करके अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकते। आधुनिक परिस्थितियों में सुरक्षा व आर्थिक विकास की आवश्यकता ने संकीर्ण प्रांतीय हितों का राष्ट्रीय हितों के साथ सामंजस्य स्थापित कर दिया है। 

संघात्मक शासन व्यवस्था में सौदेबाजी के अंकुर तब तक अवश्य फूटे रहेंगे जब तक दो पृथक स्वतन्त्रा सरकारों का अस्तित्व रहेगा। लेकिन ये अंकुर संघात्मक शासन व्यवस्था का विघटन कभी नहीं कर सकेंगे। सौदेबाजी के लक्ष्य यदा-कदा ही किसी संघात्मक शासन में परिलक्षित हो सकते हैं, लेकिन इनसे संघात्मक शासन व्यवस्था पर कोई विशेष प्रभाव पड़ने वाला नहीं होता।

एकात्मक संघवाद 

संघात्मक व्यवस्था एक गतिशील व्यवस्था है। अनेक उप-व्यवस्थाओं को अपने में समेटते हुए यह जटिल प्रक्रिया को जन्म देती है। इस जटिल प्रक्रिया में प्रादेशिक सरकारें अपना पृथक व स्वतन्त्रा अस्तित्व कायम रखने में परेशानी महसूस करती है। आज संघात्मक सरकार का व्यवहार अनेक गैर-राजनीतिक संस्थाओं व तत्वों से भी प्रभावित होने लगा है। संघात्मक व्यवस्था का बारीकी से अवलोकन करने पर यह तथ्य उजागर होता है कि संघात्मक व्यवस्था एकात्मक व्यवस्था की तरफ अग्रसर हो रही है। कई बार व्यवहार में केन्द्र व राज्यों की सरकारों का सीमांकन करना असम्भव होता है। यही स्थिति एकात्मक संघवाद की स्थिति होती है। पहले जो कार्य प्रादेशिक सरकारों द्वारा सम्पादित किए जाते थे, वे अब केन्द्रीय सरकार को पूरे करने पड़ रहे हैं। 

लोकतन्त्र में तो जनता सुविधाएं व सुरक्षाएं चाहते हैं, चाहे वे केन्द्रीय सरकार से मिले या राज्य सरकार से। बदलते विश्व परिवेश में सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक विकास की प्रवृ़त्ति ने केन्द्रीय सरकारों को अधिक शक्तिशाली बना दिया है। के0सी0 व्हीयर ने भी केन्द्रीय सरकारों के पक्ष में शक्तियों के झुकाव की बात स्वीकार की है। 

वर्तमान समय में संघवाद की जो स्थिति है, वह न तो विशुद्ध रूप में संघात्मक है और न ही एकात्मक, बल्कि दोनों के बीच की स्थिति एकात्मक संघवाद है। एकात्मक संघवाद का जन्म केन्द्रीय सरकार के पक्ष में शक्तियों के अधिक झुकाव का परिणाम है। इस झुकाव के प्रमुख कारण हैं :-
  1. युद्ध राजनीति।
  2. लोक-कल्याण की राजनीति।
  3. दल राजनीति।
  4. टेकनो या शिल्पी राजनीति।
  5. आर्थिक मदद की राजनीति।
  6. मंदी की राजनीति।
  7. अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति।
आज युद्ध-राजनीति राष्ट्रीय सुरक्षा की समस्या को जन्म देने वाला प्रमुख तत्व है। द्वितीय विश्व युद्ध इसी वैचारिक युद्ध-राजनीति का परिणाम था। अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आज केन्द्रीय सरकारें प्रान्तीय सरकारों की अपेक्षा अधिक शक्तियां केन्द्रित कर रहीं हैं, ताकि आपातकालीन परिस्थितियों का सामना किया जा सके। आज लोक कल्याण के विचार की कोई भी सरकार अवहेलना नहीं कर सकती। प्रान्तीय सरकारें सीमित आर्थिक साधनों के कारण लोक कल्याण का जिम्मा केन्द्रीय सरकार का ही समझने लगती हैं। इसी कारण धीरे-धीरे लोक कल्याण के लिए केन्द्रीय सरकार आर्थिक साधनों पर अपना पूर्ण नियन्त्रण स्थापित कर रही है ताकि आर्थिक साधनों का प्रादेशिक सरकारों द्वारा दुरुपयोग न किया जा सके। आज दल-राजनीति भी क्षेत्रीय हितों का राष्ट्रीय हितों के सााि अपनी राष्ट्रव्यापी प्रवृत्ति के कारण सामंजस्य स्थापित करने का सशक्त माध्यम है। बढ़ती राजनीतिक जागरूकता के कारण आज दलों का स्वरूप भी राष्ट्रीय स्तर का होता जा रहा है। 

भारत को छोड़कर किसी भी संघात्मक व्यवस्था वाले देश में क्षेत्रीय दलों का चरित्रा भी राष्ट्रीय प्रकृति का है। आज वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति ने शासनतन्त्रा के व्यवहार को प्रभावित करना शुरु कर दिया है। आधुनिक सरकारें नौकरशाही तन्त्रा पर आधारित होती जा रही हैं। यह नौकरशाही तन्त्र प्रादेशिक सरकारों तक भी छा गया है। इस नौकरशाही तन्त्रा की भर्ती केन्द्रीय सरकार द्वारा ही की जाती है और विशेषज्ञों के रूप में उनकी भूमिका केन्द्र को अधिक शक्तिशाली बना देती है। 

आज आर्थिक विकास के लिए प्रादेशिक सरकारें केन्द्र पर ही निर्भर होती जा रही हैं। आर्थिक सहायता के नाम पर केन्द्रीय सरकारों प्रादेशिक सरकारों पर अपना अप्रत्यक्ष नियन्त्राण स्थापित कर रही हैं। आज जनता आर्थिक मन्दी के दौर से गुजर रही है। जनता का प्रादेशिक सरकारों पर आर्थिक मन्दी को दूर करने की मांग का भारी दबाव पड़ रहा है। इसी कारण प्रादेशिक सरकारें केन्द्रीय सरकार पर अधिक आश्रित होती जा रही हैं। इन सभी कारणों के साथ-साथ आज राष्ट्रीय सम्बन्धों पर अन्तर्राष्ट्रीय जगत में अपनी महान भूमिका अदा करना चाहती है। बढ़ती राजनीतिक चेतना प्रादेशिक सरकारों को राष्ट्रीय हित के लिए अपने संकीर्ण स्वार्थों को छोड़ने को विवश करती हैं और प्रादेशिक सरकारें स्वयं भी इस बात को अच्छी तरह समझने लगी हैं कि अन्तर्राष्ट्रीय जगत में सम्मान प्राप्त किए बिना उनका अस्तित्व भी सुरक्षित नहीं है। इसलिए आज संघात्मक सरकार के केन्द्रीय ढांचे की तरफ अधिक रूझान बढ़ रहा है और विश्व में संघवाद का झुकाव एकात्मकता की तरफ बढ़ रहा है। 

यह एकात्मक संघवाद आज समय की मांग है और आर्थिक विकास की एक आवश्यकता है। लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं हो सकता कि इससे प्रांतीय या प्रादेशिक सरकारों की राष्ट्र-विकास में भूमिका समाप्त हो गई है। यह तो राजनीतिक व्यवस्था की गत्यात्मक प्रकृति है जो केन्द्र व इकाइयों के सहयोग से ही आगे बढ़ती है। इसी कारण संघात्मक व्यवस्था भी कठिन व जटिल होते हुए भी अपने को लचीली व अनुकूलनशील बनाए रखने में सफल रहती है।

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