सिस्टर निवेदिता कौन थी, सिस्टर निवेदिता के शैक्षिक विचार

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सिस्टर निवेदिता एक विदेशी महिला थी तथा भारत में वे स्वामी विवेकानन्द की शिष्या बनकर आयी थी । यहाँ आने पर वे भारतीय दर्शन से प्रभावित होकर पूर्णत: भारतीय सभ्यता व संस्कृति में रम गयी थी। वे एक महान शिक्षिका तथा समाज सुधारक थी। उन्होंने अपना सारा जीवन शिक्षा व छात्रों के लिए अर्पित कर दिया था। उन्होंने भारत में महिला शिक्षा का बीड़ा उठाया तथा जीवन भर उसके लिए प्रयासरत रही। वे शिक्षा को जन-जन तक पहुंचाना चाहती थी। उन्होंने धार्मिक शिक्षा पर विशेष बल दिया था और वे मानव मात्र की सेवा को ही अपना धर्म मानती थी। सिस्टर निवेदिता के शैक्षिक तथा आध्यात्मिक विचार ,आधुनिक भारतीय शिक्षा प्रणाली की समस्याओं को दृष्टिगत रखते हुए एक अमूल्य निधि है। 

वर्तमान शिक्षा प्रणाली को सार्थकता प्रदान करने में उनके शैक्षिक विचार पूर्णतया सक्षम है। उन्होंने अपनी शिक्षा में भौतिकता वादी तथा आध्यात्मिकता वादी दोनो ही लक्ष्यों को महत्व दिया था। उनका मानना था कि शिक्षा राष्ट्र निर्माण के साधनों में से एक है। वर्तमान समय में इनके शिक्षा दर्शन के मूलभूत सिद्धान्तों के आधार पर शिक्षा प्रणाली में यथोचित् परिवर्तन, परिवर्धन और परिमार्जन किया जा सकता है तथा शिक्षा प्रणाली को देश की आवश्यकताओं के अनुकूल बनाया जा सकता है।

प्राचीन काल से ही शिक्षा और समाज का घनिष्ठ संबंध रहा है और उसी काल से ही समय-समय पर उन संबंधों को सर्वोत्कृष्टता के पथ पर ले जाने के लिये उच्च कोटि के आचार्यों का प्रादुर्भाव होता चला आ रहा है। गाँधी, टैगोर, राधाकृष्णन, विनोबा भावे, जॉन डी0वी0, पेस्तालाजी, सुकरात व प्लेटो आदि ने इसे कार्य रूप देने में अपनी अहम् भूमिका निभायी है। समाज को सशक्त माध्यम देने के लिये इन्होंने शिक्षा को चुना था। ऐसे ही समाज निर्माताओं में सिस्टर निवेदिता एक ऐसी तेजस्वी विचारक थीं, जिनके व्यक्तित्व व कृतित्व से सभी परिचित हैं। सिस्टर निवेदिता बहुमुखी प्रतिभा की स्वामिनीं थीं उनका जीवन बिजली की भाँति तेजस्वी तथा लहरों के सदृश्य गतिमान और तूफान की भाँति वेगवान था। 

सिस्टर निवेदिता विषद ज्ञान का भण्डार थीं तथा इनके अन्दर गहन आध्यत्मिक अन्र्तदृष्टि थी। हम उन्हें एक महान शिक्षिका, समाज सुधारिका, लेखिका, विचारक, वक्ता, मानव प्रेमी और दूरदश्र्ाी आदि उपाधियों से विभूषित कर सकते हैं। उन्होंने अपना सारा जीवन शिक्षा व छात्रों के लिए अर्पित कर दिया था। आगामी पीढ़ी को शिक्षित व सुसंस्कृत बनाना उनके जीवन का परम लक्ष्य था।

सिस्टर निवेदिता एक विदेशी महिला थी तथा भारत में स्वामी विवेकानन्द की शिष्य बनकर आयी थीं। यहाँ आने पर वे भारतीय दर्शन, आध्यात्म, वेद, योग से प्रभावित होकर पूर्णत: भारतीय सभ्यता व संस्कृति में रम गयीं थीं। उन्होंने भारत में महिला शिक्षा का बीड़ा उठाया तथा उसके लिए प्रयासरत रहीं। बालिका शिक्षा, विधवा व स्त्री शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा हेतु इन्होंने विस्तृत कार्यक्रम की रूपरेखा बनायी।

स्त्री शिक्षा के साथ-साथ इन्होंने धर्म सुधार पर विशेष बल दिया। सिस्टर निवेदिता प्राचीन भारतीय धर्म की पुराण कथाओं, आचारों अनुष्ठानों के प्रति सम्मान की भावना रखती थी। ईश्वर की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति के रूप में वे मानव मात्र की सेवा को अपना धर्म तथा आदर्श मानती थी साथ ही दूसरों को भी इसका उपदेश देतीं थीं।

सिस्टर निवेदिता के शैक्षिक विचार, जो पूरी तरह व्यवहारिक तथा प्रायोगिक शिक्षा पर बल देते हैे, आज के समय में, अत्यधिक प्रासंगिक है। उनके शैक्षिक विचारों का विश्लेषणात्मक अध्ययन करना आवश्यक है

सिस्टर निवेदिता के शैक्षिक विचार

शिक्षा का अर्थ 

स्वमी विवेकानन्द की शिष्या थीं अत: उनके विचार स्वमी जी के विचार से मेल खाते थे उनका मानना था कि शिक्षा मनुष्य में निहित आन्तरिक शक्तियों का वाºय प्रकटीकरण है उनके अनुसार अच्छी शिक्षा राष्ट्रनिर्माण के साधनों मे से एक है। देश को ऐसे शिक्षित नागरिकों की आवश्यकता है जो साहसी कुशल व दक्ष हों, आदर्श भावनाओं से अनुप्रमाणित हों, स्वार्थ के संकीर्ण दायरे से उपर हों तथा रचनात्मकता की दृष्टि से संम्पन्न हों और देश के हित में बलिदान होने को तत्पर हों। 

शिक्षा के उद्देश्य 

सिस्टर निवेदिता ने अपनी शिक्षा में भौतिकतावादी तथा आध्यात्मिकतावादी दोनों ही लक्ष्यों को समान रूप से महत्व दिया है। 

उनका मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल जीविकोपार्जन के लिए छात्र को तैयार न करके उसके अज्ञान को मिटाकर ज्ञान के प्रकाश से जीवन को उज्ज्वल बनाना है। जनमानस की मनोवृत्ति को बदलना तथा स्वतंत्रता व समानता जैसे शाश्वत मूल्यों को आत्मसात कराके राष्ट्रीय विकास को गति प्रदान करना है। 

इनके अनुसार शिक्षा के निम्न उद्देश्य हो सकते हैं-
  1. चित्त की वृत्तियों का योग द्वारा निरोध करना।
  2. केन्द्रियकरण विधि द्वारा मन का विकास।
  3. अच्छे विचार, चरित्र निर्माण, देशभक्ति तथा प्रबल इच्छा शक्ति आदि गुणों का विकास।
  4. व्यक्ति में अवलोकन की क्षमता का विकास।
  5. राष्ट्र सेवा का उद्देश्य- यानि मानव प्रेम, समाज सेवा व विश्व बंधुत्व जैसे गुणों का विकास।
  6. मनुष्य का समग्र विकास यानि शारीरिक, मानसिक, धार्मिक, नैतिक, सामाजिक, चारित्रिक, भावात्मक तथा व्यावसायिक विकास।
  7. मानव में धार्मिक चेतना का विकास यानि मनुष्य को आध्यात्मिक व मुक्ति से संबंधित शक्तियों के उपयोग हेतु तैयार करना।
  8. मनुष्य में आत्म विश्वास, आत्मश्रद्धा, आत्मत्याग, आत्मनियंत्रण, आत्मनिर्भरता, आत्मज्ञान आदि लौकिक गुणों का विकास।

पाठ्यक्रम

स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में-’’अतीत में जो कुछ भी हुआ है, वह सब हम ग्रहण करेगें वर्तमान में ज्ञान ज्योति का उपयोग करेंगे और भविष्य में आने वाली बातों को ग्रहण करने के लिये अपने हृदय के सारे दरवाजों को खुला रखेंगे।’’

सिस्टर निवेदिता ने भी इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर पाठ्यक्रम निर्माण पर बल दिया अर्थात पाठ्यक्रम में अतीत वर्तमान व भविष्य किसी की उपेक्षा नही की। सिस्टर निवेदिता का मानना था कि देश को सफल बनाने के लिए जिन-जिन विषयों को पढ़ाना जरूरी हो वे अवश्य पढ़ाए जाएं।
  1. इस प्रकार छात्रों को भाषा व साहित्य का अध्ययन करना चाहिए। संगीत व कला को भी शिक्षा में स्थान मिलना चाहिए। मातृ व स्वदेशी भाषा का ज्ञान सिस्टर निवेदिता के अनुसार आवश्यक है क्योंकि भाषा व्यक्ति को व्यक्ति से तथा समाज व देश से जोड़ती है।
  2. धार्मिक शिक्षा पर भी सिस्टर निवेदिता ने बल दिया है लेकिन धार्मिक शिक्षा से उनका तात्पर्य किसी मत/सम्प्रदाय की शिक्षा से नहीं है बल्कि सभी धर्मों के सारतत्वों से विद्यार्थियों को अवगत कराना चाहिए। इससे शांति व भाई चारे का विकास है।
  3. पाठ्यक्रम में शारीरिक प्रशिक्षण की भी व्यवस्था होनी चाहिए इससे मन व तन स्वस्थ रहता है।
  4. वेदों के अध्ययन को भी आवश्यक बताया है इससे विद्याथ्र्ाी में मूल्यों का विकास होता है।
  5. मानव जीवन की नीरसता को समाप्त करने के लिए पाठ्यक्रम में संगीत व नृत्य का भी समावेश होना चाहिए।
  6. पाठ्यक्रम में सत्य का समावेश होना चाहिए तथा जीविका से संबंधित विषय होने चाहिए।
इस प्रकार सिस्टर निवेदिता का विचार था कि पाठ्यक्रम लचीला व परिवर्तनशील होना चाहिए तथा विद्यार्थियों की आवश्यकता व उपयोग के अनुकूल होना चाहिए। पाठ्यक्रम उच्च नैतिकता एवं उदात्त आदर्शों से युक्त होना चाहिए। जिसके द्वारा हृदय को सुसंस्कृत बनाने की प्रेरणा मिले।

शिक्षण विधि

‘‘रासायन शास्त्र अपनी प्रयोगशाला में मन की सारी शक्ति को एकाग्र करके ही सफलता पाता है, ज्योतिषी एकाग्रता द्वारा ही दूरदश्र्ाी यंत्र के माध्यम से तारागणों का निरीक्षण करता है। चाहे विद्वान अध्यापक हो या फिर मेधावी छात्र हो यदि वह किसी विषय को जानने की चेष्टा कर रहा हो तो उसे ‘एकाग्रता’ से ही काम लेना पड़ेगा’’.... स्वामी विवेकानन्द। ठीक उसी प्रकार सिस्टर निवेदिता को भी तत्कालीन शिक्षण विधि (पुस्तक व स्मरण विधि) में कोई आस्था न थी। 

विवेकानन्द की भांति उनका भी मानना था कि ‘एकाग्रता’ द्वारा ही शिक्षण संभव है।’’ बालक के मन में केवल सूचनाएं भर देना ही शिक्षा नही हैं।’’ 

सिस्टर निवेदिता के अनुसार शिक्षण को सरल एवं प्रभावपूर्ण बनाने के लिये निम्न शिक्षण विधियों को अपनायी जानी चाहिये।-
  1. एकाग्रता- सिस्टर निवेदिता का मानना था कि ज्ञान की प्राप्ति का केवल एक ही मार्ग है और वह है ‘एकाग्रता’ जितनी अधिक होगी ज्ञान भी उतना ही अधिक होगा। 
  2. अनुकरण विधि- सिस्टर निवेदिता का मानना था कि बालक अनुकरण द्वारा अधिक सीखता है अत: शिक्षक को सद्चरित्र व सद्व्यवहार की मिसाल होना चाहिए ताकि छात्र शिक्षक का अनुकरण कर चरित्रवान व गुणवान बने।
  3. निर्देशन व परामर्श विधि- सिस्टर निवेदिता का मानना था कि निर्देशन व परामर्श से जहॉ एक और पारास्परिक संबंध दृढ़ होते हैं वहीं दूसरी और सहयोग द्वारा कार्य सफलता एवं तीव्रता से संपादित हो जाता है।
  4. क्रिया विधि- करके सीखा गया ज्ञान स्थायी होता है अत: निवेदिता ने क्रिया विधि पर बल दिया है। सिलाई, बुनाई, कढ़ाई, गृह सज्जा, पाक कला, बागवानी आदि विशयों को उपरोक्त विधि द्वारा आसानी से सीखा जा सकता है।
  5. भ्रमण विधि- सिस्टर निवेदिता भ्रमण के माध्यम से भी शिक्षण की हिमायती थी। उनका मानना था कि भ्रमण से संपर्क, ज्ञान, अनुभव व निरीक्षण शक्ति बढ़ती है तथा इससे समाज सेवा व विश्व बन्धुत्व की भावना का विकास होता है।
  6. योग विधि- वास्तव में योग से आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है तथा अनेक शारीरिक विकारों से भी बचा जा सकता है। अत: सिस्टर निवेदिता ने भी योग शिक्षा पर बल दिया है।
इसके अतिरिक्त सिस्टर निवेदिता ने तर्क, व्याख्यान, विचार-विमर्श को भी शिक्षा प्रक्रिया का आवश्यक अंग माना है। सच पूछा जाय तो किसी भी शिक्षा व्यवस्था में किसी एक विधि द्वारा शिक्षण करना न तो लाभदायक है और न ही संभव है। सिस्टर निवेदिता का मानना था कि समय व परिस्थितियों के अनुरूप विभिन्न पद्धतियों की सहायता से शिक्षण को प्रभावी बनाया जा सकता है।

गुरू शिष्य संबंध

 सिस्टर निवेदिता के गुरू शिष्य संबंधी विचार भी स्वामी जी के विचारों से प्रभावित थें निवेदिता जी का मानना था कि शिक्षा गुरु गृह-वास है। वे शिक्षक को शिक्षण में महत्वपूर्ण मानती हैं। उन्होंने शिक्षक के तीन गुणों का उल्लेख किया है-पहला-विषय विशेषज्ञ, दूसरा-उत्तम चरित्र तथा तीसरा-निस्वार्थ भाव। अर्थात शिक्षक को अपने विषय का मर्मज्ञ होने के साथ-साथ छात्र की मूल प्रवृत्तियों व मनोवेगों को रूपान्तरित करने वाला तथा रचनात्मकता की और ले जाने वाला होना चाहिए। शिक्षक को पारदर्शिता, दूरदर्शिता, सहनशीलता जैसे गुणों से पूर्ण होना चाहिये तथा छात्रों के प्रति प्रेम व सहानुभूति का भाव रखते हुए सहयोगात्मक व्यवहार करने वाला होना चाहिए।

सिस्टर निवेदिता के शिक्षाथ्र्ाी सम्बन्धी दिये गये विचारों के विश्लेषण से ज्ञात होता है कि वह छात्र में भी कुछ विशिष्ट गुणों का निर्धारण करती हैं- ज्ञान पिपासा, बौद्धिक उच्चता, नैतिकता, समर्पण तथा वाणी से और कर्म की पवित्रता शिष्य में लगन तथा परिश्रम व इच्छाशक्ति अति आवश्यक है। इसके साथ ही उनमें गुरु में अटूट विश्वास, नम्रता, विनय तथा श्रद्धा भाव होना चाहिए। एक छात्र के रूप में उसकी आदर्श स्थिति का परिचय देते हुए वे कहती हैं कि उसमें बौद्धिक गुणों की उचत्ता होनी चाहिए जिससे वह अपने ज्ञान से अज्ञान को मिटाकर पूरी दुनिया में प्रकाश का पुंज फैला सके।

विद्यालय

 सिस्टर निवेदिता ने विद्यालय के वातावरण की चर्चा करते हुए कहा कि वातावरण विद्यार्थियों के अनुकूल होना चाहिए ताकि वे स्वतंत्र व उन्मुक्त होकर क्रियाओं द्वारा सीख सकें। विद्यालय का माहौल शांत तथा प्रकृति के करीब होना चाहिए। विद्यालय का संचालन इस प्रकार होना चाहिए जो छात्रों के शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक विकास में सहायक हों छात्रों के बीच किसी प्रकार का भेद भाव नहीं रखना चाहिए। योग व व्यायाम से सम्बन्धी विषयों के अध्ययन की सुविधा होनी चाहिए। इस प्रकार निवेदिता जी की विद्यालय संबंधी अवधारणा श्री अरविंदो के विचारों के काफी करीब है।

अनुशासन- 

 सिस्टर निवेदिता ने अनुशासन के दमनात्मक स्वरूप का विरोध किया है। वे आत्मानुशासन की पक्षधर थी तथा उनका मानना था कि प्रेम व सहानुभूतिपूर्ण वातावरण प्रस्तुत कर बालकों में अच्छे आचरण का विकास किया जा सकता है। विद्यार्थियों को दण्डित करने की के बजाय उन्होंने उपेक्षित करने पर बल दिया है। शिक्षक को चाहिए कि वे छात्रों के मनोवेगों को रूपान्तरित कर सृजनात्मक कार्यों की और प्रेरित करें जिससे उनकी निराशा आशा में बदल जायें

शिक्षा के अन्य पक्ष

स्त्री शिक्षा- ‘देश में स्त्रियों व पुरुषों के मध्य इतना भेद क्यों रखा गया है जबकि वेदान्त की यह घोषणा है कि सभी प्राणियों में वही आत्मा विद्यमान है।’’ ... सिस्टर निवेदिता सिस्टर निवेदिता ने स्त्री शिक्षा की व्याख्या निम्न बिन्दुओं के संदर्भ में की है-

1. स्त्री यथार्थ शक्ति पूजा- यह एक सर्वमान्य तथ्य हे कि जो देश राष्ट्र, समाज स्त्रियों का आदर नही करते वे कभी बड़े नही हो पाये हैं और न ही प्रगति/उन्नति कर पाए हैं। प्राचीन काल में हमारे देश में स्त्रियों को समाज में सम्मानजनक स्थान प्राप्त था पर आज हमने शक्ति की इन सजीव प्रतिमाओं का आदर नही किया जिसकी परिणति हमारे देश के निरंतर पतन के रूप में हो रही है। जिस समाज में स्त्रियां दु:खी हैं वे उदासीन जीवन व्यतीत कर कर रही हैं, उस समाज का कल्याण नहीं हो सकता। 

शिक्षा ही एक माध्यम है जिसके द्वारा स्त्रियों की समस्याओं का निवारण संभव है। किसी भी परिवार में पुत्रियों की शिक्षा, लालन, पालन, देखभाल पुत्रों की भांति की जाय तो पुत्रियों के स्तर में पर्याप्त सुधार लाया जा सकता है।

2. धर्म शिक्षा का केन्द्र बिन्दु- सिस्टर निवेदिता का मानना है कि स्त्री शिक्षा का विस्तार धर्म को केन्द्र में रखकर होना चाहिए। धार्मिक शिक्षा, चरित्र निर्माण की शिक्षा, ब्रह्मचर्य का पालन आदि की और पर्याप्त ध्यान दिया जाये। धर्म के अतिरिक्त दूसरी शिक्षाएं व्यवहारिक व सामाजिक होंगी किन्तु धर्म आध्यात्मिक व आवश्यक शिक्षा है।

3. आदर्श व त्याग की शिक्षा- सिस्टर निवेदिता का मानना है कि इस युग की वर्तमान आवश्यकताओं पर ध्यान देने पर यह दिखता है कि स्त्रियों को त्याग व बलिदान के आदर्श की शिक्षा दी जाये तो परिवार, समाज व देश का कल्याण होगा। उन्होंने सीता को अनुकरणीय बताते हुए कहा कि उनका अनुकरण कर स्त्रियां स्वत: ही पूर्ण शिक्षक बन जाएंगी क्योंकि उनमें भारतीय नारी के समस्त गुण विद्यमान थे

4. लौकिक शिक्षा - सिस्टर निवेदिता का मानना था कि सच्ची शिक्षा को यथार्थ से जोड़ना चाहिए। स्त्रियों को इतिहास व पुराण की शिक्षा दी जाये साथ ही गृहव्यवस्था व कला में निपुण बनाया जाये। गृहस्थ जीवन के कर्तव्य तथा चरित्र निर्माण की शिक्षा का समावेश भी होना चाहिए। महिलाओं को अन्य विषय जैसे- सिलाई कढ़ाई, गृहकार्य, दैनिक व्यवस्था, शिशु पालन आदि भी सिखाया जाय। साथ ही साथ जाप, पूजा व ध्यान भी अनिवार्य रूप से करवाये जायें।

5. आत्मरक्षा की शिक्षा- आधुनिक युग में समाज व परिवार में स्त्रियों को दोहरी भूमिका का निर्वहन करना पड़ रहा है अत: उन्हे आत्म रक्षा के उपाय सिखाने होंगे। भारत में उन्नति एवं प्रगति हेतु स्त्रियों को स्वयं को साबित करने की आवश्यकता है। लीलावती, अहिल्याबाई, मीराबाई आदि महान विभूतियों का उदाहरण प्रस्तुत कर इनकी शिक्षा व्यवस्था हो ताकि स्त्रियां आत्म रक्षा करते हुए घर का भरण पोषण कर सकें।

6. गृह विज्ञान की शिक्षा- स्त्रियों को सिलाई-कढ़ाई में पारंगत करना होगा तथा घरेलू कार्यों में दक्ष करना होगा। उनको हथकरघा कार्यों में पारंगत करना होगा। निवेदिता का मानना था कि स्त्री शिक्षा ऐसी हो जो उन्हें कुटीर व गृह उद्योग हेतु प्रशिक्षित भी करें तथा अर्थोपाजक भी हों

7. विज्ञान की शिक्षा- वर्तमान समय सूचना प्रौद्योगिकी तथा विज्ञान का है। विज्ञान के आविष्कारों ने जीवन को सरल बना दिया है। सिस्टर निवेदिता का मानना था कि हमें पाश्चात्य विज्ञान के ज्ञान की नितांत आवश्यकता है ताकि हम उद्योग स्थापित कर सकें और इनकी सहायता से अपना जीविकोपार्जन कर सकें।

8. संस्कृत भाषा की शिक्षा- स्वामी जी का मानना था कि भारतीय संस्कृति व संस्कृत भाषा एक दूसरे के पर्याय है। संस्कृत की ध्वनि मात्र ही मानव जाति को शक्ति, क्षमता और प्रतिष्ठा प्रदान करती है। सिस्टर निवेदिता भी संस्कृत भाषा को भारत के विकास के लिए आवश्यक मानती थी यद्यपि उनका मानना था कि वैज्ञानिक शिक्षा के लिए अंग्रेजी भाषा का विकास भी आवश्यक है।

9. राष्ट्रीयता की शिक्षा- वर्तमान समय में स्त्री व पुरुष सभी क्षेत्रों में कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं और राष्ट्र निर्माण में दोनों की भागीदारी समान है। अतएव सिस्टर निवेदिता के अनुसार स्त्रियों की शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो उन्हें राष्ट्रीय उत्तरदायित्वों का एहसास कराए कि वे भी इस राष्ट्र का अंग हैं और इसके विकास में अपना सहयोग दें। इस प्रकार हम देखते हैं कि सिस्टर निवेदिता के नारी शिक्षा के प्रति विचार काफी विकसित थे और काफी हद तक उनके विचार रवीन्द्र नाथ टैगोर के स्त्री शिक्षा संबंधी विचारों से मिलते हैं। 

टैगोर ने भी स्त्री शिक्षा के लिए गृह विज्ञान, सिलाई-कढ़ाई, पाककला तथा आत्मरक्षा की बात की थी। जिस प्रकार उन्होंने शांति निकेतन में स्त्री शिक्षा विभाग खोला था। उसी प्रकार सिस्टर निवेदिता ने भी स्त्री शिक्षा हेतु एक बालिका विद्यालय की स्थापना की थी।

धार्मिक शिक्षा

स्वामी विवेकानन्द धार्मिक विचारधारा के व्यक्ति थें सिस्टर निवेदिता भी स्वामी जी के विचारों का समर्थन करती थी। वे विद्यालयों में किसी धर्म विशेष की शिक्षा देने के पक्ष में नहीं थी क्योंकि इन्हें भय था कि विभिन्न धर्मों के इस देश भारत में धार्मिक शिक्षा देने से सांप्रदायिकता और बढ़ सकती है। इन्होंने सभी धर्मों के सामान्य सिद्धान्तों व नैतिक शिक्षा को ही पाठ्यचर्या में स्थान दिया। 

सिस्टर निवेदिता के अनुसार, ‘प्राचीन धर्म में नास्तिक उसे कहा गया था जो ईश्वर में आस्था नहीं रखता था किन्तु नये धर्म में नास्तिक वह है जो स्वयं में विश्वास नहीं करता।’’ इसलिए धर्म को पाठ्यक्रम में स्थान मिलना चाहिए। 

सिस्टर के अनुसार धर्म का अर्थ है- आध्यात्मिकता, धर्म का अर्थ है-वेदान्त। उपनिषदों में प्रतिपादित आत्मतत्व की अनुभूति ही धर्म है।

सिस्टर निवेदिता के अनुसार धर्म की आत्मा वे शाश्वत मूल्य है, जो व्यक्ति की आत्मा को सार्थकता प्रदान करते हैं और अपनी संपूर्ण प्रतिभा के समायोजन में शक्ति देते है, दिशा देते हैं, मार्ग दर्शन करते हैं। काम अगर धर्म से रहित हो जाता है तो समाज में अनाचार और भ्रष्टाचार बढने लगता है जैसा आज हमारे समाज में दृष्टिगोचर हो रहा है। सिस्टर निवेदिता का मानना था कि चरित्र निर्माण की शिक्षा, सकारात्मक सोच की शिक्षा, आध्यत्मिक मूल्यों की शिक्षा- यह कार्य धर्म और शिक्षा दोनों का है, शिक्षा व धर्म विपरीत धु्रव नहीं हैं। धार्मिक शिक्षा के इस स्वरूप को, आज विस्मृत किया जा रहा है, जिसकी वजह से समाज में कई विकृतियाँ आ रही हैं। धर्म रहित शिक्षा का व्यक्ति के ऊपर सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता हैं।

निवेदिता जी ने स्वामी जी की तरह अपने विद्यार्थियों के लिए जिन मूल्यों की, जिस चरित्र की आवश्यकता बताई वे इस प्रकार थे-श्रद्धा विश्वास, साहस, सत्य के प्रति निष्ठा और ब्रह्मचर्य। इस प्रकार सिस्टर निवेदिता स्वामी विवेकानन्द, गाँधीजी तथा श्री अरविंदों की भांति धार्मिक शिक्षा की प्रबल समर्थक थी।

व्यावसायिक शिक्षा

गाँधी जी शिक्षा को व्यवहारिक मानते थे ताकि जीविकोपार्जन में सहायक हो और राष्ट्र की उन्नति में भागीदारी निभाये ठीक उसी प्रकार सिस्टर निवेदिता के शैक्षिक विचारों की सबसे बड़ी बात यह है कि उन्होंने अपनी शिक्षा को सैद्धान्तिक कम, व्यावहारिक ज्यादा बनाया है। शिक्षा जीविकोपयोगी सहित अर्थोपाजक भी हो, जिसका लाभ पुरूषों के साथ-साथ महिलाएं भी उठा सकती है तथा देश की उन्नति में भागीदार बन सकती है। 

सिस्टर निवेदिता ने हस्तकौशल को शिक्षा का केन्द्र माना है जिससे गाँधी जी भी सहमत थें उन्होंने प्राविधिक शिक्षा को पाठ्यक्रम में स्थान दिया था। उनका मानना था कि इससे हमारे देश का औद्योगिक विकास होगा।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सिस्टर निवेदिता के शैक्षिक विचारों की प्रासंगिकता

सिस्टर निवेदिता शिक्षा को उपाधियों अथवा प्रमाण-पत्रों को प्राप्त करने की प्रक्रिया न मानकर बौद्धिक विकास व आत्म निर्भर बनाने वाली प्रक्रिया मानती थी। परन्तु आज शिक्षा का अर्थ मात्र परीक्षा पास कर डिग्रियां बटज्ञैरने तक सीमित रह गया है। इससे छात्रों की बौद्धिकता व सृजनात्मकता का विकास अवरुद्ध हुआ है। ऐसे में सिस्टर निवेदिता जी की ज्ञान और कौशल केन्द्रित शिक्षा व्यक्ति को आत्म निर्भर बनाने में सक्षम है।

सिस्टर निवेदिता का मानना था कि अच्छी शिक्षा राष्ट्र निर्माण के साधनों मे से एक है। वर्तमान समय में सभी और यह कहा जा रहा है कि शिक्षा में राष्ट्रीय मूल्यों का समावेश होना चाहिए। राष्ट्र की सफल्ता नागरिकों की कुशलता व क्षमता पर निर्भर है। अच्छा नागरिक, साहसी, ईमानदार सहिष्णु एवं सद्भावनापूर्ण होता है। इन गुणों का विकास शिक्षा के द्वारा ही संभव है। अतएव इन विचारों को बल देने वाली सिस्टर निवेदिता की शिक्षा वर्तमान समय में अति महत्वपूर्ण है।

सिस्टर निवेदिता ने शिक्षा को जनमानस तक पहुँचाने तथा सभी को शिक्षित करने का संदेश दिया है। यह कार्य वर्तमान समय में तेजी से प्रगति में है। यही कारण है कि जन-साधारण को शिक्षित करने के लिए विभिन्न शैक्षिक कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। इन कार्यक्रमों में साक्षरता आंदोलन, वंचित वर्ग की शिक्षा, निरक्षरता उन्मूलन कार्यक्रम, राष्ट्रीय प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम आदि के द्वारा सभी को सामाजिकता, राष्ट्रीयता तथा मानवीयता का पाठ पढ़ाया जा रहा है। ऐसे समय में निवेदिता जी की शिक्षा हमारा मार्गदर्शन करती है।

सिस्टर निवेदिता ने हस्तकौशल को शिक्षा का केन्द्र माना है जिससे गाँधी जी भी सहमत थें निवेदिता जी ने पढ़ाई लिखाई के साथ-साथ सिलाई, पेन्टिंग, संगीत, कुटीर उद्योग आदि के प्रशिक्षण की व्यवस्था की बात पर बल दिया है। उनका मानना था कि शिक्षा मनुष्य को स्वावलंबी बनाये। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद के द्वारा तैयार की गई ‘राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005’ में भी इसका उल्लेख है कि पूर्व-प्राथमिक से उच्चतर माध्यमिक स्तर की स्कूली पाठ्यचर्या का पुनर्गठन करना चाहिए ताकि काम को ज्ञान अर्जन का शिक्षाशास्त्रीय माध्यम बना कर मूल्यों व कौशलों का विकास किया जा सके और काम की समस्त शिक्षाशास्त्रीय संभावनाएं हासिल की जा सकें। वर्तमान में हस्त कौशल व कुटीर उद्योग को पाठ्यक्रम में मुख्य स्थान दिया जा रहा है। सिस्टर निवेदिता का यह योगदान आज के समय में अनुकरणीय है।

आधुनिक समय में शिक्षा को मनुष्य के सर्वांगीण विकास के साधन के रूप में स्वीकार किया गया है। शिक्षा बालक की प्रकृति के अनुरूप हो तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र (सामाजिक, आर्थिक, व्यावसायिक) में सामंजस्यीकरण में सहायक हों सामाजिक व्यवस्था बनाये रखने के लिये भौतिक और आध्यात्मिक आवश्यकताओं वाले मूल्यों के पारस्परिक समन्वय पर जोर दिया जा रहा है, जिससे समाज विरोधी व समाज संयोगी शक्तियों के बीच संतुलन बना रहे। भौतिकता व अध्यात्मिकता के बीच की दूरी को कम करने का प्रयास किया जा रहा है जिससे समाज में बढ़ते भ्रष्टाचार, व्यभिचार, नरसंहार तथा अमानवीयता को दूर किया जा सके। ऐसे उद्देश्यों को पूर्ण करने वाली विचारधाराओं में सिस्टर निवेदिता की विचार यात्रा पूर्णत: फलीभूत हो रही है।

वर्तमान शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में मनोविज्ञान शब्द का व्यापक प्रयोग हो रहा है। इसके अन्तर्गत शिक्षा बालक की रूचि आयु व योग्यतानुकूल होनी चाहिए। प्रत्येक वर्ग के लिए शिक्षण विधियां भी अलग-अलग निर्धारित की गयी है। कुल मिलाकर शिक्षण सिद्धांतों के साथ-साथ शिक्षा ग्रहण करने वाले समूहों की आवश्यकताओं को भी महसूस किया जा रहा है। जिसकी पूर्ति करने में निवेदिता जी के शैक्षिक विचार लाभदायक व अनुकरणीय है।

सिस्टर निवेदिता विद्यालयों में किसी धर्म विशेष की शिक्षा देने के पक्ष में नहीं थी। उन्होंने सभी धर्मो के सामान्य सिद्धान्तों व नैतिक शिक्षा को पाठ्यक्रम में स्थान देने की बात कही है इसके अनुसार धर्म की आत्मा तो वे शाश्वत मूल्य हैं, जो व्यक्ति की आत्मा को सार्थकता प्रदान करते हैं और उसे अपनी संपूर्ण प्रतिभा के समायोजन में शक्ति देते हैं, दिशा देते हैं, मार्ग दर्शन करते हैं। अत: इन मूल्यों को शिक्षा में शामिल करना अति आवश्यक है। उनका मानना था कि धार्मिक शिक्षा के इस स्वरूप को विस्मृत कर देने से ही आज समाज में कई विऔतियां आ रही हैं। आज पुन: सिस्टर निवेदिता कि इस बात को दोहराया जा रहा है। 

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 में भी इस बात का उल्लेख है कि शिक्षा के लक्ष्यों में शाश्वत मूल्यों तथा मानवीय आदर्शो को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए। कह सकते हैं कि सिस्टर निवेदिता के शिक्षा दर्शन का अपना अलग स्थान है। इनकी शैक्षिक विचारधारा के मूलभूत सिद्धान्तों के आधार पर शिक्षा प्रणाली में यथोचित परिवर्तन, परिवर्धन और परिमार्जन किया जा सकता है तथा शिक्षा प्रणाली को देश की आवश्यकताओं के अनुकूल बनाया जा सकता है।

सिस्टर निवेदिता के शैक्षिक तथा अध्यात्मिक विचार, आधुनिक भारतीय शिक्षा प्रणाली की समस्याओं को दृष्टिगत रखते हुये एक अमूल्य निधि है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली को सार्थकता प्रदान करने में उनके शैक्षिक विचार पूर्णतया सक्षम हैं। एक और उन्होंने पुस्तकीय शिक्षा का विरोध कर व्यवहारिक ज्ञान की वकालत की, दूसरी और अर्थोपाजक शिक्षा तथा आत्मनिर्भर शिक्षा पर बल दिया। उन्होंने शिक्षा को जन-जन तक, चाहे स्त्री हो या पुरूष, युवा हो, बालक हो या फिर प्रौढ़, पहुँचाने का प्रयास किय और इसके लिये पाठ्यक्रम उनके अनुकूल बनाया। उनकी शिक्षा में चारित्रिक विकास, आध्यात्मिक विकास तथा मानसिक विकास पर पूर्णत: बल दिया गया है।

सन्दर्भ -
  1. अलमोड़ा मायावती, ‘स्वामी विवेकानन्द’ इण्डिया अद्वैत आश्रम, कलकत्ता, 1947।
  2. आत्माप्राणा प्रवराजिका, सिस्टर निवेदिता’ राम कृष्ण शारदा मिशन, नई देहली,1961।
  3. आत्माप्राणा प्रवराजिका, ‘सिस्टर निवेदिता ऑफ रामकृष्ण विवेकानन्द’- प्रवराजिका
  4. स्वरूपरानी, सैक्रेटरी, सिस्टर निवेदिता गल्र्स स्कूल, 5, निवेदिता लेन, कलकत्ता, 1977।
  5. त्रिपाठी सूर्यकान्त ‘निराला’, ‘भारत में विवेकानन्द’ तृतीय संस्करण अद्वैत आश्रम, कलकत्ता, 1963।
  6. सिस्टर निवेदिता, ‘द मास्टर एज आई सॉ हिम’ अद्वैत आश्रम, कलकत्ता, 1963।
  7. सिस्टर निवेदिता, ‘नोट्स ऑफ सम वन्डरिंगस स्वामी विवेकानन्द’ अद्वैत आश्रम, कलकत्ता, 1963।
  8. सिस्टर निवेदिता, ‘हिन्टस ऑन नेशनल एजुकेशन अद्वैत आश्रम, कलकत्ता, 1966।
  9. सिंह परमेश्वर प्रताप,’सिस्टर निवेदिता’ संस्कृति साहित्य, दिल्ली, 1965।
  10. सिंह राणा प्रताप, भागिनी निवेदिता’ ‘राष्ट्र धर्म पुस्तक प्रकाशन, लखनऊ, 1977।
  11. राष्ट्रिय पाठ्चर्या की रूपरेखा 2005, एन0सी0ई0आर0टी0, श्रीअरविन्द मार्ग, नई दिल्ली, 2006।

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