स्वामी विवेकानंद के शैक्षिक विचार

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स्वामी विवेकानंद के अनुसार शिक्षा की परिभाषा अर्थात “शिक्षा मनुष्य के अंदर पहले से विद्यमान दैवीय पूर्णता की अभिव्यक्ति है”, स्वामी विवेकानंद की शैक्षिक अवधारणा को प्रतिबिम्बित करता है। उनके अनुसार, शिक्षा व्यक्ति में पहले से विद्यमान शक्ति, बुद्धि, योग्यताओं तथा संभावनाओं की अभिव्यक्ति में सहायता करती है जिसे उसने सर्वशक्तिमान या ईश्वर से प्राप्त किया है। वह दृढ़तापूर्वक विश्वास करते थे कि ज्ञान मनुष्य के मस्तिष्क में विद्यमान होता है जिसे व्यक्ति स्वयं के प्रयासों से उजागर तथा विकसित करता है।

स्वामी विवेकानंद के शैक्षिक विचार

स्वामी विवेकानंद का शिक्षा दर्शन आदर्शवाद के साथ-साथ मानवतावाद के दर्शन पर आधारित था। स्वामी विवेकानंद ने समकालीन शिक्षा पद्धति की मानवतावादी दृष्टिकोण से आलाचे ना की। वह एक मानवतावादी थे तथा उन्हानें  मनुष्य के लिए शिक्षा की वकालत की। उनके अनुसार, शिक्षा का कार्य हमारे मस्तिष्क में विद्यमान ज्ञान को उजागर करना है। 

स्वामी विवेकानंद का शैक्षिक विचार निम्नलिखित रूप में समझा जा सकता है:
  1. समकालीन शिक्षा व्यवस्था के विपरीत, स्वामी विवेकानंद ने आत्मविकास हेतु शिक्षा की वकालत की। उन्होंने आत्मविकास हेतु ब्रह्मचर्य का सुझाव दिया।
  2. स्वधर्म की पूर्ति शिक्षा का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है। इसके द्वारा, स्वामीजी ने सुझाव दिया कि दूसरों की नकल करने की आवश्यकता नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं द्वारा विकास करना चाहिए। प्रत्येक बच्चे को उसकी आंतरिक प्रकृति के अनुसार विकास के अवसर दिए जाने चाहिए।
  3. उन्होंने चरित्र निर्माण की वकालत की जो शिक्षा का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। उन्होंने कठिन परिश्रम, गुरुकुल शिक्षा पद्धति के अनुकरण हेतु नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों को उत्पन्न करने, अच्छी आदतों के निर्माण, अपनी भूल से सीखना आदि को चरित्र निर्माण के लिए शिक्षा की आवश्यकता के रूप में सुझाव दिया।
  4. आत्मविश्वास, मानव सेवा, साहस, सत्य की अनुभूति, मानव व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास, विविधता में एकता आदि शिक्षा के लक्ष्य थे।
  5. स्वामीजी ने यह स्वीकार किया कि व्यक्ति के प्रयास के सभी पक्षों में उत्कृष्टता या पूर्णता शिक्षा का महान धर्म है।

पाठ्यचर्या तथा शिक्षण विधियाँ

स्वामीजी ने शिक्षा में एक व्यापक पाठ्यचर्या की अवधारणा का सुझाव दिया। शिक्षा का लक्ष्य बच्चे के आध्यात्मिक एवं भौतिक जीवन का विकास होना चाहिए। उन्होंने पाठ्यचर्या में उन सभी विषयों एवं गतिविधियों के समावेशन की वकालत की जो भौतिक कल्याण के साथ आध्यात्मिक उन्नति को पोषित करते हैं। स्वामीजी ने धर्म, दर्शन, महाकाव्य, उपनिषद आदि को पाठ्यचर्या के भाग के रूप में परामर्श दिया। 

इनके अतिरिक्त, उन्होंने पाठ्यचर्या में भाषा, भूगोल, विज्ञान, राजनीति विज्ञान, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, कला, कृषि, औद्योगिक एवं तकनीकी विषयों के साथ खेल जैसे विषयों को सम्मिलित करने की अनुशंसा की।

स्वामीजी ने ब्रह्मचर्य, आध्यात्म, ध्यान, एकाग्रता आदि को मूलभूत शिक्षण विधियों के रूप में सुझाया। उन्होंने, योगाभ्यास, व्याख्यान, विमर्श, स्वानुभव तथा रचनात्मक गतिविधियों को भी शिक्षण विधियों के रूप में सुझाया।

अनुशासन, विद्यार्थी तथा शिक्षक की अवधारणा

स्वामीजी स्व-अनुशासन के समर्थक थे बाह्य या दूसरों द्वारा थोपे गए अनुशासन के विरुद्ध थे। उन्होंने ब्रह्मचर्य तथा ध्यान के माध्यम से मानव अनुशासन की वकालत की। उनका मानना था कि आत्मबोध या स्वयं का बोध ही वास्तविक मार्ग है। उनके अनुसार, एक बच्चा सभी प्रकार के ज्ञान का भंडार होता है। एक पौधे की तरह, बच्चा स्वयं को विकसित करता है। उन्होंने बच्चे की स्वाभाविक तथा निर्बाध (सहज) विकास में सहायता करने की वकालत की। शिक्षक की भूमिका बच्चे के स्वाभाविक तरीके से विकास एवं जीवन में सहायता करती है। उनके लिए, शिक्षक वह है जो योग, ध्यान तथा ब्रह्मचर्य का अभ्यास करता है। 

जब तक एक शिक्षक अध्यात्म की प्राप्ति के मार्ग को नहीं जानता/जानती है वह बच्चे को आध्यात्मिक के विकास के लिए नहीं पढ़ा सकता। स्वामी जी ने शिक्षक को “एक दार्शनिक, मित्र तथा बच्चे को स्वयं की दिशा में गमन की सहायता के लिए निर्देशक के रूप में परिभाषित किया है।

स्वामी विवेकानंद का शिक्षा दर्शन आदर्शवाद के साथ-साथ मानवतावाद के दर्शन पर आधारित था। स्वामी विवेकानंद ने समकालीन शिक्षा पद्धति की मानवतावादी दृष्टिकोण से आलोचना की। वह एक मानवतावादी थे तथा उन्हानें मनुष्य के लिए शिक्षा की वकालत की। उनके अनुसार, शिक्षा का कार्य हमारे मस्तिष्क में विद्यमान ज्ञान को उजागर करना है। 

स्वामी विवेकानंद का शैक्षिक विचार निम्नलिखित रूप में समझा जा सकता है:
  1. समकालीन शिक्षा व्यवस्था के विपरीत, स्वामी विवेकानंद ने आत्मविकास हेतु शिक्षा की वकालत की। उन्होंने आत्मविकास हेतु ब्रह्मचर्य का सुझाव दिया।
  2. स्वधर्म की पूर्ति शिक्षा का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है। इसके द्वारा, स्वामीजी ने सुझाव दिया कि दूसरों की नकल करने की आवश्यकता नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं द्वारा विकास करना चाहिए। प्रत्येक बच्चे को उसकी आंतरिक प्रकृति के अनुसार विकास के अवसर दिए जाने चाहिए।
  3. उन्होंने चरित्र निर्माण की वकालत की जो शिक्षा का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। उन्होंने कठिन परिश्रम, गुरुकुल शिक्षा पद्धति के अनुकरण हेतु नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों को उत्पन्न करने, अच्छी आदतों के निर्माण, अपनी भूल से सीखना आदि को चरित्र निर्माण के लिए शिक्षा की आवश्यकता के रूप में सुझाव दिया।
  4. आत्मविश्वास, मानव सेवा, साहस, सत्य की अनुभूति, मानव व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास, विविधता में एकता आदि शिक्षा के लक्ष्य थे।
  5. स्वामीजी ने यह स्वीकार किया कि व्यक्ति के प्रयास के सभी पक्षों में उत्कृष्टता या पूर्णता शिक्षा का महान धर्म है।

पाठ्यचर्या तथा शिक्षण विधियाँ

स्वामीजी ने शिक्षा में एक व्यापक पाठ्यचर्या की अवधारणा का सुझाव दिया। शिक्षा का लक्ष्य बच्चे के आध्यात्मिक एवं भौतिक जीवन का विकास होना चाहिए। उन्होंने पाठ्यचर्या में उन सभी विषयों एवं गतिविधियों के समावेशन की वकालत की जो भौतिक कल्याण के साथ आध्यात्मिक उन्नति को पोषित करते हैं। स्वामीजी ने धर्म, दर्शन, महाकाव्य, उपनिषद आदि को पाठ्यचर्या के भाग के रूप में परामर्श दिया। इनके अतिरिक्त, उन्होंने पाठ्यचर्या में भाषा, भूगोल, विज्ञान, राजनीति विज्ञान, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, कला, कृषि, औद्योगिक एवं तकनीकी विषयों के साथ खेल जैसे विषयों को सम्मिलित करने की अनुशंसा की।

स्वामीजी ने ब्रह्मचर्य, आध्यात्म, ध्यान, एकाग्रता आदि को मूलभूत शिक्षण विधियों के रूप में सुझाया। उन्होंने, योगाभ्यास, व्याख्यान, विमर्श, स्वानुभव तथा रचनात्मक गतिविधियों को भी शिक्षण विधियों के रूप में सुझाया।

अनुशासन, विद्यार्थी तथा शिक्षक की अवधारणा

स्वामीजी स्व-अनुशासन के समर्थक थे बाह्य या दूसरों द्वारा थोपे गए अनुशासन के विरुद्ध थे। उन्होंने ब्रह्मचर्य तथा ध्यान के माध्यम से मानव अनुशासन की वकालत की। उनका मानना था कि आत्मबोध या स्वयं का बोध ही वास्तविक मार्ग है। उनके अनुसार, एक बच्चा सभी प्रकार के ज्ञान का भंडार होता है। एक पौधे की तरह, बच्चा स्वयं को विकसित करता है। उन्होंने बच्चे की स्वाभाविक तथा निर्बाध (सहज) विकास में सहायता करने की वकालत की। 

शिक्षक की भूमिका बच्चे के स्वाभाविक तरीके से विकास एवं जीवन में सहायता करती है। उनके लिए, शिक्षक वह है जो योग, ध्यान तथा ब्रह्मचर्य का अभ्यास करता है। जब तक एक शिक्षक आध्यात्म की प्राप्ति के मार्ग को नहीं जानता/जानती है वह बच्चे को आध्यात्मिक के विकास के लिए नहीं पढ़ा सकता। 

स्वामीजी ने शिक्षक को “एक दार्शनिक, मित्र तथा बच्चे को स्वयं की दिशा में गमन की सहायता के लिए निर्देशक के रूप में परिभाषित किया है।

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