उपलब्धि अभिप्रेरणा के सिद्धांत

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उपलब्धि अभिप्रेरणा सिद्धान्त का प्रतिपादन मैक्लीलैन्ड और उनके साथियों द्वारा सन् 1951 में हारवर्ड विश्वविद्यालय में किया गया। मरे (Murray) द्वारा प्रस्तुत 20 आवश्यकताओं की सूची में उपलब्धि प्रेरक को एक मनोजात (psychogenic) आवश्यकता माना गया, परन्तु मैक्लीलैन्ड (Mccilland) और एटकिन्सन (Atkinson 1964) ने इस प्रेरणा को सर्वाधिक महत्व दिया और इस प्रेरक पर अनेक उपयोगी अध्ययन किए। यह प्रेरणा मासलो के यथार्थीकरण आवश्यकताओं से मिलती है।’’

उपलब्धि अभिप्रेरणा मैकलेलैंड के मानव प्रेरणा सिद्धान्त को बनाने वाले तीन घटकों में से एक है। यह सिद्धान्त सामाजिक मनोवैज्ञानिक डेविड मैकलेलैंड द्वारा प्रस्तावित किया गया था, जिन्होंने कार्यस्थल प्रेरणा का अध्ययन किया था। मैकलेलैंड ने प्रस्तावित किया कि तीन प्रकार की प्रेरणा है जो हम सभी को संचालित करती है, 22 इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमारी पृष्ठभूमि क्या है? इसमें उपलब्धि अभिप्रेरणा, (Achievement Motivation) संबद्धता अभिप्रेरणा (Affiliation Motivation) और शक्ति अभिप्रेरणा (Power Motivation) शामिल हैं।’’

उपलब्धि अभिप्रेरणा के सिद्धांत

उपलब्धि अभिप्रेरणा के निम्न सिद्धान्तों का वर्णन किया गया परन्तु इसमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि अभिप्रेरणा सिद्धान्त है। अभिप्रेरणा के सिद्धान्त निम्न हैं- 

1. मूल प्रवृयात्मक सिद्धांत

इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक मैक्डॅूगल (Macdougall) ने इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया। उन्होंने बताया कि छात्रों में कुछ जन्मजात शक्तियाँ या मूल प्रवृत्तियाँ होती हैं इन्ही मूल प्रवृत्तियों को उन्होंने प्रेरक (Motive) का नाम दिया है। छात्रों का व्यवहार इन्ही मूल प्रवृत्तियों द्वारा प्रवाहित संचालित होता है मैक्डूगल ने मूल प्रवृत्ति के तीन प्रधान तत्व -सामान्य उत्तेजन, क्रिया एवं लक्ष्य निर्देशन बताया। 

 2. उद्दीपन का सिद्धांत

व्यवहारवादियों द्वारा इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है (पावलॉव, स्किनर, थार्नडाइक, गुथरी आदि)। इस सिद्धान्त के अनुसार मानव का समस्त व्यवहार उद्दीपन (Stimulus) के परिणामस्वरूप शारीरिक अनुक्रिया (Response) है। मानव कुछ उत्तेजना पाने पर ही स्वाभाविक प्रतिक्रिया करते हैं। 

 3. व्यवहार का सिद्धांत

 इस सिद्धान्त के प्रतिपादक विटिंग एवं चायल्ड (Whiting and Child) है उनके अनुसार मानव जो कुछ मूल अनुप्रेरणायें शैशवकाल के प्रारम्भ से अर्जित कर लेता है, बाद के जीवन में उसके व्यवहार संस्थान (Behaviour System) में उनकी वृद्धि हो जाती है। इस व्यवहार संस्थान में अनेक प्रकार के व्यवहार एक ही मूल अभिप्रेरणा से 23 प्रभावित होते रहते हैं। चार व्यवहार सिद्धांतों का उन्होंने चयन किया- मौखिक (oral) कामुक, (Sexual) निर्भरता, (Dependence) तथा आक्राकमता (Aggressive) पहले तीन संस्थान जैविक अभिप्रेरकों से विकसित होते हैं।

 4. मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत

इस सिद्धान्त के प्रतिपादक फ्रायड (Freud) उसके साथी युंग (Yung) तथा एडलर (Adler) है। मानव बहुत सी अप्रिय बातों, इच्छाओं तथा आवश्यकताओं, भावनाओं को, जो सन्तुष्ट नहीं होती है। अपने चेतन मन (Conscious Mind) से निकाल देता है तथा ये सब दमित इच्छायें उसके अचेतन मन (Unconcious mind) में एकत्रित होती रहती है। इस सिद्धान्त के अनुसार अचेतन मन में एकत्रित हुर्इ दमित इच्छायें चेतन मन में आये बिना मानव व्यवहार को अभिप्रेरित करती है। फ्रायड ने मन को तीन स्तरों पर विश्लेषित किया है- चेतन (Conscious) अचेतन (Unconscious) अवचेतन (Sub-Conscious). 

 5. मैस्लो का आत्मसिद्धि सिद्धांत

इस सिद्धान्त का प्रतिपादन मैस्लो (1954) ने किया है। मैस्लो ने अपने सिद्धान्त की व्याख्या आत्मसिद्धि के आधार पर की है। आत्मसिद्धि से तात्पर्य विद्यार्थी को अपने अन्दर छिपी हुर्इ क्षमताओं को पहचान करके उसका ठीक प्रकार से विकास करने की आवश्यकता से है। मार्गन, किंग, बिम्ब, स्कोलपनर के अनुसार ‘‘विद्यार्थी को अपनी क्षमताओं को विकसित करने की आवश्यकता को आत्मसिद्धि कहा जाता है।’’ वास्तव में आत्मसिद्धि की पहचान की आवश्यकता प्रत्येक व्यक्तियों में अलग-अलग होती है।

 6. उपलब्धि अभिप्रेरणा सिद्धांत

 इस सिद्धान्त का प्रतिपादन मैक्लीलैण्ड और उनके साथियों द्वारा 1951 में हार्बट विश्वविद्यालय मे  किया गया परन्तु एटकिन्सन एवं फीदर 1966 ने उपलब्धि अभिप्रेरणा सिद्धान्त को सर्वाधिक महत्व दिया, एटकिन्सन के अनुसार, ‘‘उपलब्धि अभिप्रेरणा व्यवहार को दिशा, तीव्रता एवं निरन्तरता प्रदान करती है। यह प्रवृत्ति उस समय अधिक पायी जाती है जहाँ सफलता प्राप्ति की सम्भावना 0.5 होती है। उपलब्धि अभिप्रेरणा दो कारकों पर निर्भर करती है- 
  1. सफलता प्राप्त करने की प्रवृत्ति (Tendency to axchieve sucess) 
  2. असफलता से दूर रहने की प्रवृत्ति (Tendency to avoide failure) 
इन दोनों प्रवृत्तियों के भी अपने-अपने अवयव होते हैं जो आपस में सह सम्बन्धित रहते है।

उपलब्धि अभिप्रेरणा में अध्यापक की भूमिका

 ‘‘बोलने से पहले, आपको दो बार सोचना चाहिए, क्योंकि आपके शब्द किसी के मन में सफलता या असफलता के बीज बो सकते हैं।’’  ‘‘विद्यार्थियों को स्कूल, पाठ्यक्रम, कोर्स आदि चुनने तथा स्कूली जीवन में समायोजित होने में दी जाने वाली सहायता प्रेरणा कहलाती है।’’

वर्तमान युग में मनोवैज्ञानिक विचारधारा के अनुसार अभिप्रेरणा और शिक्षा को जुदा नहीं किया जा सकता। शिक्षा में छात्रों का सीखना भी शामिल है और अध्यापकों का शिक्षण कार्य भी अत: अध्यापक को दोनों पक्षों में संतुलन रखना पड़ता है। शिक्षा में अभिप्रेरणा का महत्व और संबंधों का वर्णन निम्न प्रकार से किया गया है। 

1. अभिप्रेरणा और सीखना (Motivation and Learning) विद्यार्थियों को प्रोत्साहन देना, सीखने के उद्देश्यों को स्पष्ट करना, विद्यार्थियों से किसी प्रकार का भेदभाव करना, विद्यार्थियों के आत्मसम्मान को पहिचानना आदि सीखने की परिस्थितियों का निर्माण करते हैं। 

2. अभिप्रेरणा और व्यवहार (Motivation and Behaviour ) कक्षा में अभिप्रेरणा विद्यार्थियों के व्यवहार को दिशा प्रदान करता है अभिप्रेरणा से विद्यार्थियों का व्यवहार ही बदल जाता है। अत: अध्यापक को चाहिये कि वह विद्यार्थियों को कक्षा में अधिक से अधिक सक्रिय रखे और उनकी शक्ति और योग्यताओं का अधिक से अधिक प्रयोग करें। 

 3. अभिप्रेरणा और शक्ति संचार (Motivation and Energy Mobilization) अभिप्रेरणा की परिभाषाओं से स्पश्ट होता है कि अभिप्रेरणा से विद्यार्थियों में शक्ति का संचार होता है। यह शक्ति-संचार ही विद्यार्थी को कार्य करने के लिये बाध्य करता है। सफलता प्राप्ति पर विद्यार्थी में शांति उत्पन्न होती है और असफलता से विद्यार्थी शिथिल सा हो जाता हैं 

4. अभिप्रेरणा और मार्गदर्शन (Motivation and Guidance ) कक्षा में विद्यार्थियों के मार्ग-दर्शन में अभिप्रेरणा की मुख्य भूमिका होती है। यदि विद्यार्थी मार्ग-दर्शन के लिए अभिप्रेरित ही नहीं होगें तो अध्यापक के प्रयत्न सफल नहीं हो सकते। 

5. अभिप्रेरणा और रुचियों का विकास (Motivation and Development of Interests) अभिप्रेरणा और रुचियों का गहरा सम्बन्ध है यदि विद्यार्थियों को किसी कार्य में रुचि नहीं है तो वह उस कार्य को करने के लिये कभी  अभिप्रेरित नहीं हो सकता है। अत: अध्यापक विद्यार्थियों में रुचि उत्पन्न करने का प्रयास कर सकते हैं। 

 6. अभिप्रेरणा और आवश्यकताएँ (Motivation and Needs) अध्यापक कक्षा में विद्यार्थियों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर अपना शिक्षण कार्यक्रम निर्धारित करे जिससे विद्यार्थियों की आवश्यकता की पूर्ति होने से वे कार्य करने या सीखने के लिये अभिप्रेरित हो सकें। 

 7. अभिप्रेरणा और ध्यान (Motivation and Attention) कक्षा में विद्यार्थियों के ध्यान को केन्द्रित करने के लिये अभिप्रेरणा का विद्यमान होना अति-आवश्यक है। अभिप्रेरणा ध्यान को केन्द्रित करने में सहायक सिद्ध होती है। अत: अध्यापक विषय-वस्तु में विद्यार्थियों का ध्यान केन्द्रित करने के लिये अभिप्रेरित करने का प्रयत्न करें। 8. अभिप्रेरणा और चरित्र-निर्माण (Motivation and Guidance) अभिप्रेरणा विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण में भी सहायक है। अभिप्रेरणा द्वारा अध्यापक विद्यार्थियों को अच्छी-अच्छी बातें सीखने के लिये और जीवन के नैतिक मूल्यों के ज्ञान के लिये उन्हें प्रेरित कर सकते हैं। 

 9. अभिप्रेरणा और समाजिकता (Motivation and Socialization) कक्षा में विद्यार्थियों को सामाजिक गुुणों के ज्ञान के लिये अध्यापक द्वारा दी गर्इ अभिप्रेरणा अत्यन्त महत्वपूर्ण होती है। अध्यापक विद्यार्थियों को सामाजिक आयोजनों में भाग लेने के लिये प्रभावी ढंग से अभिप्रेरित कर सकते हैं। 

10. अभिप्रेरणा और लक्ष्य प्राप्ति (Motivation and Achievement of Goals) कक्षा में अध्यापक विद्यार्थियों को लक्ष्य-प्राप्ति के लिये अभिप्रेरित कर सकता है ऐसा करना उसके लिये आवश्यक भी है। जब लक्ष्य स्पष्ट दिखार्इ दे तो उसे प्राप्त करने के लिये विद्यार्थियों की अभिप्रेरणा शीघ्र और निश्चित होती है। 

उपरोक्त अध्ययन से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि वर्तमान शिक्षा-प्रणाली में अभिप्रेरणा का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। इसके लिये अनुभव, योग्यता, सूझ-बूझ, 28 रुचि, आत्मविश्वास, दूरदर्शिता आदि विशेषताओं का अध्यापक में विद्यमान होना अति आवश्यक है, तभी वह विद्यार्थियों को अभिप्रेरित कर सकता है। ‘‘आधुनिक युग में उपलब्धि अभिप्रेरणा को व्यक्तिगत एवं सामाजिक प्रगति के लिए एक महत्वपूर्ण कारक माना जाता है। शिक्षा की व्यवस्था एवं छात्रों की समायोजन क्षमता उपलब्धि अभिप्रेरणा पर आधारित है। 

उपलब्धि अभिप्रेरणा एक अभियान है जो कि छात्रों का मनोबल बढ़ाती एवं सीखने के लिये प्रेरित करती है। स्मिथ (1961) उपलब्धि अभिप्रेरणा कुछ हासिल करने की प्राथमिक स्थिति है। यह एक मजबूत मकसद है, जो छात्रों को महत्वाकांक्षी ऊर्जावान और उत्कृष्टता के स्तर को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है। मुक्ति 1938 द्वारा उपलब्धि अभिप्रेरणा को पहली बार लोकप्रिय किया गया था बाद में डेविड मैक्लैण्ड और एटकिसन ने उपलब्धि अभिप्रेरणा के अध्ययन पर ध्यान केन्द्रित किया। 

मैक्लैण्ड (1966) ने सही कहा है, अगर किसी देश को स्कूली छात्रों की उत्कृष्टता के लिए चिन्ता है, तो उस देश में काफी प्रगति हो सकती क्योंकि उस देश की प्रगति छात्रों पर निर्भर करती है और छात्रों की प्रगति उनके शैक्षिक वातावरण पर निर्भर करती है।’’30 शैक्षिक उपलब्धि से प्रेरित विद्यार्थी सफलता के लिए पुरस्कार में दिलचस्पी नहीं रखता है। वह केवल अपना लक्ष्य प्राप्त करने की ओर ध्यान देता है। 

इस प्रकार के विद्यार्थी प्रेरणा से आगे बढ़ते हैं पुरस्कार से नहीं। उपलब्धि अभिप्रेरणा के साथ-साथ विद्यार्थियों में समायोजन क्षमता का विकास करना भी अति आवश्यक है। विद्यार्थी अपने आस-पास के परिवेश एवं शैक्षिक वातावरण में किस प्रकार समायोजन स्थापित कर सकते हैं यह ज्ञात करन के लिए प्रस्तुत शोध प्रबंध में समायोजन क्षमता का अध्ययन करना परम आवश्यक है।

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