सायटिका के लक्षण और इसके मुख्य कारण

सायटिका के लक्षण

सायटिका स्नायु तंत्र से संबंधित एक गम्भीर रोग है। जिसमें शरीर की सबसे बड़ी स्नायु (सियाटिक नर्व ) मुख्य रूप से प्रभावित होता है। यह सियाटिक स्नायु कमर क्षेत्र से निकल कर नितंभ, जांघ तथा पैर की ओर संवेदना संवाहित करता है। यह स्नायु जांघ की पेशियों में विभाजित होकर घुटने, पिण्डली तथा पैर में पीछे की ओर से फैली होती है। यह अन्य स्नायु की अपेक्षा आघात एवं सूजन से अधिक प्रभावित होती है। व्यक्ति के कार्यक्षमता को प्रभावित करने वाला यह गम्भीर रोग माना जाता है।

सायटिका में तीव्र चुभन जैसा दर्द उभरता है। यह दर्द कमर की अंतिम तीन कशेरूकाओं बीच के क्षेत्र में से बढ़ते हुए नीचे पैर के पीछले हिस्से तक जाता है। अंतराकशेरूकीय गद्दी के फटने या अपने स्थान से खिसकने से सियाटिक नर्व पर अनावश्यक दबाव पड़ता है, जिससे तीव्र दर्द अनुभव होता है। यह स्नायु कमर से होकर दोनों पैरों के पिछले भाग से जांघ एवं घुटने से होते हुए एड़ी तक पहुॅचती है। यही कारण है कि सायटिका में नितंब, जांघ तथा टखनों में दर्द होता है। तीव्र दर्द की स्थिति में यदि रोगी खड़ा रहे या चलता रहे तो जांघ एवं पैर के निचले हिस्से में तनाव और बढ़ जाता है तथा दर्द असहनीय होते जाता है। ऐसी स्थिति में रोगी को लेटकर विश्राम करना चाहिए। तीव्र दर्द की स्थिति में दर्द के स्थान के आस-पास की पेशियाॅं बहुत जल्दी संकुचित हो जाती है। उस स्थान को सुरक्षाात्मक स्थिरता प्रदान करने के लिए पट्टी या प्लास्टर का प्रयोग किया जाता है। तीव्र दर्द की स्थिति में दर्द निवारक दवा का प्रयोग कर लकड़ी के तख्त पर हल्का पतला गद्दा डालकर लेटना लाभकारी होता है।

सायटिका का दर्द का दौरा रोगी को बारंबार आने से उठने-बैठने में परेशानी महसुस होता है। थोड़ा भी झुकना-मुड़ना या किसी अन्य प्रकार का तनाव जैसे छींकना, खांसना, मलत्याग के समय दबाव डालने से पीड़ा और बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में रोगी बिस्तर पर लेटे रहना अधिक पसंद करता है ताकि दर्द से आराम मिल सके। रोगी कमजोर एवं दुर्बल हो जाता है व सदा हताश-निराश-खिन्न रहता है। इस प्रकार के मानसिक विकृति के कारण उसका पारिवारिक सामाजिक व वैयक्तिक जीवन दैयनीय होता चला जाता है।

सायटिका के लक्षण

सायटिका के प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं-

  1. रोगी में दर्द की शुरूआत या तो धीरे-धीरे या तो एकाएक भी हो सकता है। यह दर्द अत्यंत तीव्र, चुभने वाला होता है जो नितंब से शुरू होकर पिछले हिस्से से जांघ, पिंडली एवं एड़ी की ओर बढ़ जाता है।
  2. रोग की गम्भीर अवस्था में रोगी पिण्डली एवं पैर की मांसपेशियों में कमजोरी महसुस करता है।
  3. कभी-कभी दर्द की तीव्र अवस्था में रोगी खड़ा तक नहीं हो पाता है, रेंगने की स्थिति में आ जाता है।
  4.  यदि दर्द अंतराकशेरूकीय गद्दी के फटने से शुरू हुआ है तो यह खासने-छिंकने, आगे झुकने, झटका लगने आदि स्थिति में और तीव्र हो जाता है। लेटकर आराम करने से यह दर्द कम होने लगता है।

सायटिका के प्रमुख कारण

  1. रीढ़ की हड्डी में किसी प्रकार का आघात, जिसमें सियाटिक स्नायु की जड़ या उसपर दबाव बढ़ जाता है।
  2. इस स्नायु के क्षेत्र में किसी प्रकार का संक्रमण होने से
  3. इस क्षेत्र की अंतराकशेरूकीय गद्दी के फटने या क्षतिग्रस्त होने या अपने स्थान से खिसकने के कारण
  4. आस्टियो आथ्र्राराइटिस के कारण
  5. अचानक दौड़ते हुए, टहलते समय या वाहन चलाते समय सियाटिक स्नायु में आघात लगने से
  6. लम्बे समय तक खड़े रहने से, कुर्सी पर एक ही किनारे पर बैठे रहने से भी रोग के लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं।
  7. मेरूरज्जू के ट्यूमर, पेल्विस के मेलिगनंेट रोग, वर्टिव्रल बाॅडी में टी.बी. आदि के कारण भी यह रोग उभर सकता है।

Bandey

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