वाक्य में पद क्रम से क्या आशय है ?

वाक्य में पदक्रम एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व हैं संस्कृत जैसे श्लिष्ट योगात्मक भाषाओं में पदक्रम इतना महत्त्वपूर्ण नहीं क्योंकि शब्द के साथ जुड़ी हुई विभक्ति सर्वत्रा अपना वही अर्थ देगी चाहे उस पद को किसी भी स्थान पर रख दें। जैसे रामः पुस्तकं पठति वाक्य में पदों के स्थान बदलने से उनके अर्थ में कोई अन्तर नहीं आएगा। पुस्तकं पठति रामः या पठति पुस्तकं रामः कैसे भी लिखें अर्थ एक ही होगा- राम पुस्तक पढ़ता है। परन्तु जो धातु वियोगात्मक हो गई है उनमें या अयोगात्मक भाषाओं में पदक्रम का बहुत महत्त्व है। इन भाषाओं में पदों के स्थान परिवर्तन के साथ ही अर्थ में परिवर्तन हो जाता है। 

वाक्य में पदक्रम

वाक्य में किस प्रकार के पदों का क्या स्थान, होता है, इसका भी अध्ययन वाक्य विज्ञान में करते हैं। वाक्य में पद-क्रम की दष्टि से भाषाएँ दो प्रकार की हैं। एक तो वे हैं, जिन वाक्य में शब्दों (पदों) का स्थान निश्चित नहीं है। इन भाषाओं में शब्दों में विभक्ति लगी होती है, अतएव किसी भी शब्द को उठाकर कहीं रख दें अर्थ में परिवर्तन नहीं होता। ग्रीक, लैटिन, अरबी, फारसी तथा संस्कृत आदि इसी प्रकार की हैं।1 इनके ही वाक्य को शब्दों के स्थान में परिवर्तन करके कई प्रकार से कहा जा सकता है। उदाहरण हैं-

अरबी
ज़रब्अ जैदुन अम्रन = जै़द ने अमर को मारा।
जरब्अ अम्रन ज़ैदन = अमर को जैद ने मारा।

फ़ारसी
जै़द अमररा ज़द = ज़ैद ने अमर को मारा।
अमररा ज़ैद ज़द = अमर को ज़ैद ने मारा।

संस्कृत
ज़ैदः अमरं अहनत् = ज़ैद ने अमर को मारा।
अमरं जै़दः अहनत् = अमर को जै़द ने मारा।

दूसरी प्रकार की भाषाएँ वे होती हैं, जिनमें वाक्य में शब्द (पद) का क्रम निश्चित रहता है। ऊपर के उदाहरणों में हम देखते हैं कि शब्दों के स्थान परिवर्तन से अर्थ में कोई फर्क नहीं आया किंतु निश्चित स्थान या स्थान-प्रधान भाषाओं में वाक्य में शब्द का स्थान बदलने से अर्थ बदल जाता है। इसका सर्वाेत्तम उदारण चीनी है। यों हिंदी, अंग्रेजी आदि आदि आधुनिक आर्य भाषाओं में भी यह प्रवृत्ति कुछ है। अंग्रेजी का एक उदाहरण है-

अंग्रेजी
Zaid killed Amar = ज़ैद ने अमर को मारा।
Amar killed Zaid = अमर ने ज़ैद को मारा (यहाँ शब्द के स्थान परिवर्तन से वाक्य का अर्थ उलट गया)
चीनी में तो यह प्रवृत्ति विशेष रूप से मिलती है-
पा ताङ् शेन = पा शेन को मारता है।
शेन ताङ् पा = शेन पा को मारता है।

अंग्रेजी में सामान्यतः कर्ता, क्रिया और तब कर्म आता है पर प्रश्नवाचक वाक्य में क्रिया का कुछ अंश पहले ही आ जाता है। विशेषण संज्ञा के पहले आता है और क्रिया-विशेषण क्रिया के बाद में। हिन्दी में कर्ता, कर्म और तब क्रिया रखते हैं। सामान्यतः विशेषण संज्ञा के पूर्व तथा क्रिया-विशेषण क्रिया के पूर्व रखते हैं। चीनी में अंग्रेजी की भाँति कर्ता के बाद क्रिया और तब कर्म रखते हैं। यद्यपि इसकी कुछ बोलियों में कर्म पहले भी आ जाता है। विशेषण और क्रिया-विशेषण हिन्दी की भाँति प्रायः संज्ञा और क्रिया के पूर्व आते हैं। प्रश्नवाचक शब्द (जैसे क्या) अंग्रेजी तथा हिन्दी में वाक्य के आरम्भ में आते है पर चीनी में वाक्य के अन्त में।
फ़ान त्स ल मा?
खाना खा लिया क्या?

किसी भी भाषा के शब्दों के स्थान की निश्चितता के ये नियम निरपवाद नहीं है। यहां तक कि इस प्रकार की प्रधान चीनी में भी नहीं। ऊपर का चीनी वाक्य को इस प्रकार भी कहा जा सकता है-
त्स फ़ाल ल मा?
खा खाना लिया क्या? = खाना खा लिया क्या?
पदक्रम के सम्बन्ध में डा. द्विवेदी का विवेचन इस प्रकार है-

1. विश्व की अधिकांश भाषाओं में वाक्य में पद-क्रम निश्चित है। उसी क्रम से उस भाषा में वाक्यों का प्रयोग होता है। पद-क्रम की दृष्टि से विश्व की भाषाओं को दो वर्गों में बाँटा जा सकता है-
  1. परिवर्तनीय पद-क्रम,
  2. अपरिवर्तनीय पद-क्रम।
(i) परिवर्तनीय पद-क्रमः परिवर्तनीय पद-क्रम वाली वे भाषाएँ हैं, जिनमें वक्ता की इच्छा के अनुसार पद-क्रम में परिवर्तन किया जा सकता है। ऐसी भाषाएँ हैं- संस्कृत, ग्रीक, लैटिन, अरबी, फ़ारसी आदि। इनमें शब्द में विभक्तियाँ लगी होती हैं, अतः स्थान बदलने पर भी कर्ता आदि का भेद ज्ञात होने से अर्थ में अन्तर नहीं पड़ता। जैसे- रामः रावणं हन्ति (राम रावण को मारता है), रावणं हन्ति रामः।

(ii) अपरिवर्तनीय पद-क्रमः अपरिवर्तनीय पद-क्रम वाली वे भाषाएँ हैं, जिनमें पद-क्रम में परिवर्तन नहीं किया जा सकता है। इनमें पद-क्रम में परिवर्तन से अर्थ में अन्तर हो जाता है, जैसे- चीनी भाषा। चीनी भाषा में पदक्रम है-
कर्ता, क्रिया, कर्म। (ताङ् मारना)।

वाङ् ताङ् चाङ् - वाङ् चाङ् को मारता है।

हिन्दी और अंग्रेजी में प्रश्नवाचक शब्द (क्या, why, when आदि) वाक्य आदि में आते हैं, परन्तु चीनी भाषा में अन्त में आते हैं। जैसे-
वाङ् श्येन शेङ् त्साई ज्या मा - क्या श्री वाङ् पर हैं?
(श्येन शेङ् = श्री, श्रीमान्, त्साई = पर, ज्या = घर, मा = क्या)

हिन्दी, अंगे्रजी आदि में भी सामान्यतया पदक्रम अपरिवर्तनीय रहता है।

2. वाक्य में स्वाराघातः वाक्य में संगीतात्मक और कलात्मक दोनों प्रकार का स्वराघात प्राप्त होता है। संगीतात्मक स्वराघात से आश्चर्य, शंका, निराश आदि का भाव व्यक्त किया जाता है। जैसे- ‘वे चले गए’ के अनेक अर्थ होंगे। संगीतात्मक स्वराघात वाक्य-सुर के रूप में होता है। किसी पद-विशेष पर बल देने से बलात्मक स्वराघात होता है। जैसे- ‘मैं अभी जाऊँगा’ में मैं, अभी और जाऊँगा में से जिस पर बल देंगे, वह अर्थ मुख्य होगा।

3. वाक्य में पद-लोपः प्रयोग और व्यवहार के आधार पर वाक्य में संक्षेप के लिए पदों का लोप हो जाता है। ऐसे स्थानों पर क्रिया का लोप रहता है और उसका अध्याहार (स्मरण) करके पूर्ण अर्थ का ज्ञान होता है। जैसे- कुतः? (कहाँ से, कहाँ से आ रहे हो?)
प्रयागात् (प्रयाग से, अर्थात् प्रयाग से आ रहा हूँ)।

इस प्रकार कर्ता, क्रिया आदि से हीन वाक्यों में यथायोग्य कर्ता, क्रिया आदि का अध्याहार कर लिया जाता है। 

4. वाक्य और पदक्रम-विषयक तथ्यः वाक्य और पदक्रम के संबन्ध में विचार करते समय निम्नलिखित तथ्यों का ध्यान रखना चाहिएः-
  1. भाषा यदि दीर्घकाल से चली आ रही है तो उसकी वाक्य-रचना दो विभिन्न कालों में भिन्न हो सकती है।
  2. वाक्य-रचना पर अन्य भाषाओं का भी प्रभाव पड़ता है। आधुनिक बोल-चाल की हिन्दी पर अंगे्रजी वाक्य-रचना का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। जैसे- ‘उसने कहा कि में प्रयाग नहीं जाऊँगा’ के स्थान पर ‘उसने कहा कि वह प्रयाग नहीं जाएगा’।
  3. शिक्षा के प्रभाव के कारण शिक्षितों के द्वारा प्रयुक्त भाषा में कुछ कृत्रिमता रहती है, अतः शिक्षितों की अपेक्षा अशिक्षितों की भाषा में प्रयुक्त पदक्रम अधिक मान्य एवं विश्वसनीय होता है।
  4. पदक्रम के विशिष्ट अध्ययन के लिए पद्यात्मक काव्यों आदि की अपेक्षा गद्य की भाषा अधिक उपयोगी होती है। 
  5. पदक्रम के ज्ञानार्थ अनुवाद आदि की अपेक्षा मूल पाठ अधिक उपयुक्त होता है।
  6. पदक्रम के अध्ययन के लिए अलंकृत काव्यात्मक भाषा की अपेक्षा सरल सुबोध अधिक उपयुक्त है। इसमें भाषा का स्वाभाविक प्रवाह देखने को मिलता है।
  7. पदक्रम के अध्ययन के लिए लिखित भाषा की अपेक्षा उच्चरित भाषा का अधिक महत्त्व है। उच्चरित भाषा मंे भाषा के स्वाभाविक रूप का साक्षात्कार होता है।

Bandey

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