विशेषण किसे कहते हैं इसके कितने भेद हैं ?

वे शब्द, जो किसी संज्ञा या सर्वनाम शब्द की विशेषता बतलाते हैं, उन्हें विशेषण कहते हैं। जैसे नीला-आकाश, छोटी लड़की, दुबला आदमी, कुछ पुस्तकें में क्रमशः नीला, छोटी, दुबला, कुछ शब्द विशेषण हैं, जो आकाश, लड़की, आदमी, पुस्तकें आदि संज्ञाओं की विशेषता का बोध कराते हैं। 

अतः विशेषता बतलाने वाले शब्द विशेषण कहलाते हैं वहीं वह ‘विशेषण’ पद जिस संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बतलाता है उसे ‘विशेष्य’ कहते हैं। उक्त उदाहरणों में आकाश, लड़की, आदमी, पुस्तकें आदि शब्द विशेष्य कहलायेंगे। 

परिभाषा - संज्ञा और सर्वनाम की विशेषता बताने वाले शब्दों को विशेषण कहते हैं,। प्रत्येक प्राणी या पदार्थ अपने में कुछ विशिष्टता लिये होता है, उस विशेषता को बताने के लिए जिन शब्दों का विधान या प्रयोग किया जाता है, व्याकरण और भाषा विज्ञान में वे विशेषण कहलाते हैं। उदाहरण 
  1. राम बहुत गुणी लड़का है।
  2. वह एक ईमानदार लड़की है।
  3. काली गाय का दूध मीठा होता है।
  4. दिनेश मोटा लड़का है।
इस प्रकार विशेषण शब्द संज्ञा राम की विशेषता उसे गुणी लड़का बताकर प्रकट करता है, वही वह (सर्वनाम) को एक ईमानदार लड़की बनाकर, तो दिनेश को मोटा बताकर उसकी विशेषता बताई जा रही हैं।

विशेषण के द्वारा अर्थ को मर्यादित भी किया जाता है- यथा काला घोड़ा। मीठा संतरा इत्यादि।

विशेषण के द्वारा विशेष्य की मात्रा एवं संख्या के साथ-साथ उसकी विशेषताओं का बोध होता है।

विशेषण के भेद

विशेषण मुख्यतः 5 प्रकार के होते हैं - 
  1. सार्वनामिक विशेषण 
  2. गुणवाचक विशेषण 
  3. संख्यावाचक विशेषण 
  4. परिणाम वाचक विशेषण 
  5. प्रविशेषण।

1. सार्वनामिक विशेषण

ऐसे सर्वनाम जो विशेषण के रूप में प्रयुक्त किये जाते है, उन्हें सार्वनामिक विशेषण कहा जाता है। हिन्दी में पुरुषवाचक तथा निजवाचक सर्वनाम को छोड़कर शेष का प्रयोग विशेषण के रुप में होता है। इन शब्दों का जब एकाकी रुप में प्रयोग होता है, तब तो, ये सर्वनाम होते हैं, परन्तु जब इनके साथ जब संज्ञा शब्द भी आते हैं, तो ये विशेषण का काम करते हैं। जैसे वह-नौकर, कोई राजा, क्या नहीं, कोई, कुछ यह, वह, कौन, जो, सो, जैसा, कैसा, इतना, उतना, आदि सार्वनामिक विशेषण के उदा. हैं। वस्तुत: ऐसे शब्द सर्वनाम और विशेषण दोनों का ही कार्य करते हैं। जब क्रिया के पूर्व इन शब्दों का प्रयोग होता है, तब से सर्वनाम होते हैं, और जब उनका प्रयोग किसी संज्ञा के साथ होता है, तब उन्हे विशेषण कहा जाता है-
जैसे -
सर्वनाम - विशेषण
वह पढ़ रही है - वह लड़की पढ़ रही है
यह देखो - यह कलम देखो।
वह सच बोलने से इतना घबराता क्यों है -

2. संख्यावाचक विशेषण 

संख्यावाचक विशेषण के द्वारा, संज्ञा या सर्वनाम की संख्या का ज्ञान होता है। संज्ञा या सर्वनाम की संख्यात्मक विशेषता स्पष्ट करने के कारण ही संख्यावाचक विशेषण कहा जाता है-जैसे दस हाथी, चार घोड़े सब अध्यापक, कुछ बच्चे। संख्यावाचक विशेषणों के प्रयोग में सतर्कता बरतनी चाहिए। गणित के अंको का प्रयोग ठीक है, किन्तु भाषा के अंकों को अक्षरों में ही लिखा जाना चाहिए, और इस बात का ध्यान रखना चाहिए, कि अर्थ में भ्रम उत्पन्न न हो। संख्यावाचक विशेषण के दो प्रकार होते हैं -
  1. निश्चित संख्यावाचक।
  2. अनिश्चित संख्यावाचक।
(क) निश्चित संख्यावाचक - निश्चित संख्या का बोध कराने वाले विशेषण को निश्चित संख्यावाचक विशेषण कहा जाता है। जैसे-चालीस रुपये, पंद्रह लड़कियाँ।

(ख) अनिश्चित संख्यावाचक - संज्ञा या सर्वनाम की निश्चित संख्या का बोध न कराने वाले विशेषण को अनिश्चित विशेषण कहा जाता हैं। जैसे-कुछ गुलाब, सब अध्यापक, दस-बीस रोटियाँ।

3.  गुणवाचक विशेषण 

जिस शब्द से संज्ञा या सर्वनाम का गुण स्पष्ट होता है, उसे गुण वाचक विशेषण कहते हैं। गुण के अन्तर्गत, संज्ञा या सर्वनाम के रुप, रंग, स्थान, स्वभाव आदि स्थितियों का स्पष्टीकरण होता है। गुण से आशय, अच्छे और बुरे दोनों से है। जैसे- सुंदर पुरुष, गरीब किसान, दुष्ट विद्यार्थी, काला घोड़ा, दुबली स्त्री, मोटा खिलाड़ी, सूखी नदी, अनुशासित बच्चे, संस्कारवान अध्यापक, बुरा सपना।

4. परिणाम वाचक विशेषण 

जिन शब्दों के द्वारा परिणाम अर्थात माप-तौल इत्यादि का बोध बहोता हैं, उन्हें परिणाम वाचक विशेषण कहते हैं- जैसे-दो सेर गेहूँ, साढ़े तीन हाथ। एक चैपाई, दो तिहाई, आधा, एक दर्जन। बहुत थोड़ा, थोड़ा बहुत, बहुत अधिक।

5. व्यक्ति वाचक विशेषण

 व्यक्तिवाचक संज्ञा से निर्मित विशेषणों को व्यक्ति वाचक विशेषण कहा जाता है। यथा-नागपूरी संतरे, बनारसी साड़ी, चंदेरी साड़ी, राजस्थानी पगड़ी, बंगाली मिठाई, बनारसी पान, कानपुरी चप्पलें।

प्रविशेषण - प्रविशेषण वे शब्द हैं, जो विशेषणों की विशेषता बतलाते हैं। यथा -
  1. शीतला अति विन्रम लड़की है - (श्अत्यि प्रविशेषण)
  2. रमेश बहुत अच्छा लड़का है - (अच्छा प्रविशेषण)
  3. वह अत्यंत परिश्रमी है - (अत्यंत)
  4. वह बड़ा होनहार है - (बड़ा)
  5. मैं पूर्णतरू स्वस्थ हूँ - (पूर्णतरू)
  6. मोहन बहुत चतुर है - (बहुत)
  7. वह शाम ठीक सात बजे आयेगा - (ठीक)

विशेषण की अवस्थाएँ

विशेषण की तुलनात्मक स्थिति को अवस्था कहते हैं। अवस्था के तीन प्रकार माने गये हैं- 

(1) मूलावस्था: जिसमें किसी संज्ञा या सर्वनाम की सामान्य स्थिति का बोध होता है। जैसे- रहीम अच्छा लड़का है। 

(2) उत्तरावस्था: जिसमें दो संज्ञा या सर्वनाम की तुलना की जाती है। जैसे-अशोक रहीम से अच्छा है। या प्रशान्त अभिषेक से श्रेष्ठतर है। 

(3) उत्तमावस्था: जिसमें दो से अधिक संज्ञा या सर्वनामों की तुलना करके, एक को सबसे अच्छा या बुरा बतलाया जाता है वहाँ उत्तमावस्था होती है। जैसे - अकबर सबसे अच्छा है। रजिया कक्षामें श्रेष्ठत्तम छात्रा है। अवस्था परिवर्तन: मूलावस्था के शब्दों में ‘तर’ तथा तम प्रत्यय लगा कर या शब्द के पूर्व से अधिक, या सबसे अधिक शब्दों का प्रयोग कर क्रमशः उत्तरावस्था एवं उत्तमावस्था में प्रयुक्त किया जाता है, जैसे - 
 
मूलावस्था उत्तरावस्था  उत्तमावस्था
उच्च उच्चतर उच्चतम
श्रेष्ठ श्रेष्ठतरश्रेष्ठतम
तीव्र तीव्रतर तीव्रतम
अच्छा  से अच्छासबसे अच्छा 
 ऊँचा से अधिक ऊँचा सबसे ऊँचा

विशेषण की रचना

संज्ञा, सर्वनाम क्रिया तथा अव्यय शब्दों के साथ प्रत्यय के मेल से विशेषण पद बन जाता है।

(1) संज्ञा से विशेषण बनना: प्यार-प्यारा, समाज-सामाजिक, पुष्प-पुष्पित, स्वर्ण-स्वर्णिम, जयपुर-जयपुरी, धन-धनी, भारत-भारतीय, रंग-रंगीला, श्रद्धा-श्रद्धालु, चाचा-चचेरा, विष-विषैला, बुद्धि-बुद्धिमान, गुण-गुणवान, दूर-दूरस्थ। 
(2) सर्वनाम से विशेषण: यह-ऐसा, जो-जैसा, मैं-मेरा, तुम-तुम्हारा, वह-वैसा, कौन-कैसा। 

(3) क्रिया से विशेषण: भागना-भगोड़ा, लड़ना-लड़ाकू, लूटना-लुटेरा। 

(4) अव्यय से विशेषण: आगे-अगला, पीछे-पिछला, बाहर-बाहरी

Bandey

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