भारत में कृषि विपणन व्यवस्था में पाए जाने वाले प्रमुख दोषों का वर्णन

कृषि विपणन से अभिप्राय कृषि उत्पाद के क्रय विक्रय से है। भारत में कृषि विपणन की जो व्यवस्था प्रचलित है। उसमें कृषक अपने उत्पाद को मेलों तथा ग्रामीण हाॅट में बेचता है। इसके अतिरिक्त नियमित मण्डियों द्वारा सरकारी खरीद भी कृषि विपणन का हिस्सा है। भारत की कृषि विपणन व्यवस्था में अनेक दोष है। जिन्हें दूर करने के लिए सरकार ने समय समय पर अनेक कदम उठाये हैं।

भारत में कृषि विपणन व्यवस्था

कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। जिसमें देश की कुल जनता का 65 प्रतिशत संलंग्न है। इसलिए देश की जनता के कल्याण व विकास के लिए कृषि का विकास आवश्यक है। कृषि का विकास तभी होगा जब किसान को अपने उत्पाद का सही मूल्य प्राप्त होगा प्राचीन काल से भारत में कृषि जीवन निर्वाह हेतु की जाती रहीं। परन्तु स्वतंत्रता के बाद तीव्र आर्थिक विकास में कृषि व्यवस्था में अनेक बदलाव आये और हरित क्रान्ति के बाद तो तीव्र कृषि विकास ने कृषि को जीवन - निर्वाह की श्रेणी से निकाल कर व्यावसायिक रूप प्रदान कर दिया ऐसे में किसान लाभ कमानें के उद्देश्य से कृषि उत्पादन कार्य करने लगें । इस व्यवस्था के साथ ही कृषि विपणन व्यवस्था में भी समय के साथ अनेक बदलाव आयें है। भारत में कृषि विपणन की व्यवस्था इस प्रकार है - 

(1) गाॅवों में महाजन एवं व्यापारी को फसल की बिक्री - भारत के अधिकांश किसान अपने उत्पादन का बड़ा भाग गाॅव में ही साहूकारो, महाजनों तथा व्यापारियों को बेच देते है। साहूकार , महाजन तथा कमीशन किसानों की ऋणग्रस्तता का लाभ उठाते हुए, किसानों की फसल मनमाने मूल्य पर क्रय कर लेते है। ऐसी स्थिति में कमीशन ऐजेन्ट और व्यापारी बड़ी मात्रा में उत्पादन का एक हिस्सा कमीशन के रूप में वसूल लेतें है। 

(2) गाँव की हाट में बिक्री - भारत के प्रत्येक गांव में सप्ताह में एक या दो बार हाट अर्थात् स्थानीय बाजार लगता है। जहाँ से ग्रामीण निवासी अपनी आवश्यकता की वस्तुएॅ खरीदतें है। छोटे व सीमान्त किसान अपनी फसल का तथा मध्यम किसान अपनी फसल के कुछ भाग को इसी प्रकार के बाजारों में बेचते है। शहरी क्षेत्र के थोक व्यापारी इन हाट से किसानों का उत्पाद खरीद कर उन्हे ऊँची कीमतों पर शहरों की मण्डियों में बेच देते है। 

(3) मण्डियों में बिक्री - कई गावों, कस्बे अथवा शहरों में एक मण्डी होती है। इन मण्डियों में थोक व्यापारी होते है, जिन्हें आढतिया कहते है। किसान दलालों की सहायता से अपना उत्पादित मात्र आढतियों को बेचते है। अक्सर दलाल आढतियों से मिले रहते है और किसानों को उपज का ठीक मूल्य नही मिल पाता। यातायात सम्बन्धी कठिनाइयों, मण्डियों के दलालों और आढतियों के कपटपूर्व व्यवहार आदि से आंशकित होकर छोटे किसान मण्डी से अपना माल बेचने में संकोच करते है। 

(4) मेलों में बिक्री - भारत देश संसार में मेलों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ लगभग 1700 से अधिक कृषि पदार्थों के एवं जानवरो के लगतें है, जिनमें लगभग 40 प्रतिशत मेले कृषि वस्तुओं के होते है जो मुख्य रूप से बिहार, उडि़सा में पाये जातें है। मेला स्थानों के आसपास किसान इन्हें मेलों मे अपनी फसल बेच देतें है। 

(5) सरकारी खरीद - पिछले कुछ वर्षों से सरकार द्वारा भी किसानों की उपज को क्रय किया जा रहा है। इसके लिए सरकार ने स्थान-स्थान पर कुछ क्रय केन्द्र स्थापित किये है। जहाँ पर कृषक अपनी उत्पादित वस्तुऐं लाकर निर्धारित मूल्य पर बेच सकते हैं। सरकार द्वारा यह खरीद स्वयं अपने कर्मचारीयों के माध्यम से, सहाकारी समितियों के माध्यम से अथवा भारतीय खाद्य निगम के माध्यम से करती है। 

(6) सहकारी विपणन - विपणन प्रणाली की कार्य कुशलता का स्तर ऊँचा करने और किसानों को मध्यस्थों के कपटपूर्ण व्यवहार से बचाकर उन्हें अपनी फसल का उचित मूल्य दिलाने के लिए सहकारी विपणन पर जोर दिया गया है। सहकारी विपणन समितियाँ और बहु उद्देशीय समितियों सदस्यों के थोड़े-थोड़े विपणन अतिरेक्त को एकत्रित कर मण्डियों में थोक व्यापारियों के साथ प्रतियोगिता करते हुये बेचती है। इस प्रकार कृषकों को अपने उपज का उचित मूल्य मिल जाता है।

भारत में कृषि विपणन व्यवस्था के दोष

यद्यपि भारत एक कृषि प्रधान देश है तब भी यह कृषि विपणन व्यवस्था की दशा सन्तोष जनक नही है। कृषक बहुत निर्धन एवं अशिक्षित है। उसे अपनी उपज क्रय विक्रय के सम्बन्ध में पूर्ण जानकारी उपलब्ध नही है, परिणामस्वरूप उसे अपने कृषि उत्पादन का उचित मूल्य नही मिल पाता, विपणन व्यवस्था के प्रमुख दोष इस प्रकार है। 

(1) मध्यस्थों की लंबी श्रृंखला - भारतीय कृषि विपणन व्यवस्था में बिचोलियों की एक लंबी श्रृखला है। जिस कारण प्रायः किसानों को उपभोक्ताओं द्वारा दिये गये मृल्य का लगभग 50 प्रतिशत भाग ही मिल पाता है। प्रो0 डी0 एस0 सिन्धु के एक शोध से पता चलता है। कि किसानों की चावल की कीमत का मात्र 53 प्रतिशत प्राप्त हो पाता है जिसमें शेष 31 प्रतिशत बिचैलियों का हिस्सा है तथा 16 प्रतिशत विपणन लागत है। सब्जियों मे तो किसानों का हिस्सा मात्र 39 प्रतिशत और फलों में 34 प्रतिशत है। कृषि उपज की विपणन व्यवस्था में गाँव का साहूकार, महाजन, घूमता-फिरता व्यापारी, कच्चा आढतिया, पक्का आढतिया, थोक व्यापारी मिल वाला, दलाल, निर्यातकर्ता, फुटकर व्यापारी आदि शामिल है। इतने सारे मध्यस्थ विपणन व्यवस्था के लिए आवश्यक नही है। 

(2) दोषपूर्ण संग्रह व्यवस्था - ग्रामीण कृषकों के पास अपनी उपजों को संग्रह करने के लिए उचित एवं वैज्ञानिक संग्रहण व्यवस्था का अभाव है। ग्रामीण कृषक अपनी उपज को खत्तियों, कच्चे कोठों, बोरों या मिट्टी के बड़े-बड़े बर्तनों में रखते हैं जिससे उनके सड़ने-गलने और चूहों तथा कीड़े-मकोड़ों द्वारा बर्बाद होने की आशंका रहती है। खाद्यान्न जाँच समिति के अनुसार उपज की इस तरह होने वाली हानि 1.5 प्रतिशत थी। संग्रहण की अपर्याप्त और अवैज्ञानिक व्यवस्था के कारण किसानों का विवश होकर शीघ्र ही वस्तुएँ बेचनी पड़ती है। जिससे उन्हें कम मूल्य मिलता है। 

(3) अनियमित मण्डियों में प्रचलित धोखेबाजियाॅ - हमारे देश की अभी अनियऩ्ित्रत मण्डियों की संख्या बहुत अधिक है। मण्डियों में निम्नालिखित धोखेबाजियाॅ प्रचलित हैं जिनका किसान को शिकार बनना पड़ता है। मण्डियों में कृषि उपजों को तौलने या मापने के प्रमाणित बाॅट और माप नहीं होते। कृषि उत्पादन का वह भाग जो नमूने के तौर पर लिया जाता है। कृषकों को वापस नहीं किया जाता है। दलाल कपडे़ के नीचे गुप्त मूल्य निश्चित करते हैं। जिसमें वास्तविक विक्रेता कृषक निश्चित किये गये मूल्य से बिलकुल अनभिज्ञ रहता है। दलाल कृषकों की अपेक्षा आढ़तिया का अधिक पक्ष लेता है। तौल अथवा मूल्य समबन्धी विवाद होने पर कृषक के हित की कोई भी रक्षा नहीं करता और उसे खरीदार की बात मानने के लिए विवश होना पड़ता है। प्रायः मण्डियों में कृषकों से बहुत सी कटौतियाॅ जैसे - रामलील , पाठशाला, गौशाला ,प्याऊ, अनाथालय , विधवाश्रम आदि उसके भुगतान देना पड़ता है। 
(4) श्रेणी विभाजन का अभाव - भारत में ग्रामीण किसानों की अज्ञानता और कृषि उत्पादन कम होने के कारण उपजों के श्रेणी विभाजन पर ध्यान नहीं दिया जाता है समस्त उपज एक ही ढेरी के रूप में बेची जाती है। जिसे दडा प्रणाली भी कहते हैं। इस प्रकार कृषकों की उŸाम उपज का भी उन्हें कम मूल्य ही मिलता है। 

(5) विपणन हेतु वित्त  का अभाव - विपणन व्यवस्था को सुचारू रूप से से चलाने के लिए वित्त की आवश्यकता होती है। सहकारी समितियों से उपलब्ध वित्त का लाभ प्रायः बडे़ किसानों को ही हो सकता है। छोटी किसान अभी भी वित्त के लिए साहूकार या महाजन तथा व्यापारियों पर निर्भर रहता हैं। साहूकार तथा महाजन किसान केा मण्डी में अपना बेचने के लिए हतोत्साहित करते है। स्वयं ही उसे खरीद लेते है। जिससे इन कृषकों को अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता । 

(6) अल्प विकास परिवहन व्यवस्था - भारतीय गाॅवों की मण्डियों को शहर से जोड़ने के लिए परिवहन सुविधाएं पर्याप्त नही है। बहुत थोड़े गाॅव रेल और पक्की सड़कों ,द्वारा पण्डियों से जुड़ है। कच्ची सड़कों पर मोटर परिवहन प्रायः सम्भव नहीं है। बरसात में में पुल-पुलियों के अभाव में बन्द हो जाती है। और उन पर केवल बैलगाडि़या ही आ जा सकती है। अनुमानतः परिवहन साधनों के पिछडे़पन के फलस्वरूप विपणन लागतों में 20 प्रतिशत वृद्धि हो जाती है । ऐसी परिस्थितियों में किसान गाॅवों में ही फसल बेचने की बाध्य होते है। 

(7) मूल्य सम्बन्धी सूचना का अभाव - ग्रामीण किसानों के लिए दूर -दराज की विभिन्न मण्डियों में समय -समय पर प्रचलित मूल्यों के विषय में सही सूचना प्राप्त कर पाना सम्भव नहीं हाो पाता। अधिकांश कृषक तो मण्डी के साथ कोई भी सम्पर्क नहीं रख पाते। इस कारण व्यापारी उन्हें जो मूल्य देता है। उसे वे ले लेते है। 

(8) विपरीत परिस्थितियों में विपणन - भारत में जमींदारी उन्मूलन से पूर्व सामान्यतः सभी कृषकों को लगान का भुगतान करने के लिए उपज का एक भाग फसल काटने के तुरन्त बाद ही बेचना पड़ता था। जमींदारी उन्मूलन के बाद कृषि सम्बन्धों में परिवर्तन हुआ जिसके परिणामस्वरूप एक सम्पन्न किसान वर्ग पैदा हो गया है। यह वर्ग भूमि का स्वामी हेाता है। 

(9) उत्पादकों में संगठन का अभाव - भारत में विपणन प्रणाली का सबसे बड़ा दोष उत्पादकों में अच्छे सामूहिक संगठन का अभाव हैं कुछ व्यापरिक फसलों यथा-कपास, तिलहन , पटसन, और गने के खरीददार बहुत अच्छी तरह संगठित रहते है, जबकि इनके वास्तविक उत्पादक छोटे- छोटे कृषक है जो कि बहुत बडी़ संख्या में एक बहुत बडे़ क्षेत्र में फैले हुए है। ऐसे स्थान पर जहाॅ उत्पादक असंगठित हों तथा उनका पथ-प्रदर्शन करने वाला और उनके हितों की रक्षा करने वाला कोई न हो के्रता संगठित रूप से हों और राज्य तटस्थ हो तो वहाॅ के उत्पादनकर्ताओं का बुरी तरह शोषण होता है। हमारे देश में ऐसी ही स्थिति बनी हुई है। 

(10) अन्य - देश कृषि विपणन व्यवस्था में उपर्युक्त दोषों के अतिरिक्त कुछ अन्य दोष भी है जो विपणन व्यवस्था के विकास के मार्ग में अवरोधात्मक है , जैसे - कम उजप और निम्न कोटि की उजप , किसानों की ऋणग्रस्तता और निर्धनता , किसानों की अज्ञानता और निरक्षरता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि भारत की वर्तमान कृषि उपज की विपणन व्यवस्था को भूमि सम्बन्धो से स्वतन्त्र रूप में देख सकना सम्भव नहीं है। बाजारों के नियन्त्रण आकाशवाणी ,द्वारा भावों के प्रसारण, यातायात व्यवस्था में सुधार आदि से पूॅजीवादी ढंग से खेती करने वाले किसानों को तो लाभ हुआ है। और वे अपने विपणन आधिक्य ’ की उचित मूल्य पाने में सफल हुए हैं किन्तु इन सब सुविधाओं को लाभ लघु एंव सीमान्त कृषकों को बहुत कम मिल पाया है। 

सन्दर्भ -
1- Bilgrami, S.A.R. ‘An Introduction to Agricultural Economics;’ (2006) Himalaya Publishing House Delhi
2- Sadhu, A.N. and Amarjit Singh ‘Fundamentals of Agricultural Economics’, (2006) Himalaya Publishing House Delhi.

Bandey

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