मुद्रा का समय मूल्य क्या है ?

मुद्रा के समय मूल्य की अवधारणा से आशय, यदि किसी व्यक्ति को वर्तमान में 50,000 रूपये लेने अथवा भविष्य में दो वर्ष पश्चात 50,000 रूपये स्वीकार करने का विकल्प प्रस्तुत किया जाता है, तो वह भविष्य की तुलना में वर्तमान में 50,000 रूपये स्वीकार करने को वरियता प्रदान करेगा। उसके इस निर्णय के परिपेक्ष्य में विभिन्न कारक यथा समय कारक, जोखिम तत्व, ब्याज की संकल्पना, उपभोग प्रवृत्ति एवं अवसर लागत आदि अहम् भूमिका निर्वाह करते हैं। व्यावसायिक चक्र मुद्रा प्रसार एवं मुद्रा संकुचन की भी इसमें सहभागिता रहती हैं। ब्याज की अवधारणा जोखिम एवं समय तत्व पर निर्भर करती हैं यदि ब्याज दर शून्य हो जाती हैं, तो मुद्रा का वर्तमान मूल्य, भविष्य में मुद्रा के वर्तमान मूल्य के बराबर ही होगा।

इस सम्बन्ध को निम्न प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है-

मुद्रा का वर्तमान प्राप्य मूल्य

मुद्रा का वर्तमान प्राप्य मूल्य = मुद्रा का भविष्य में प्राप्त मूल्य + मुद्रा का समय मूल्य, इसको एक उदाहरण के द्वारा निम्नानुसार समझा जा सकता है। यदि किसी व्यक्ति के पास यह विकल्प हैं कि वह रूपये 25000 वर्तमान समय में प्राप्त कर सकता है अथवा यहीं धनराशि रूपये 25000 तीन वर्ष पश्चात प्राप्त करने का विकल्प उसे उपलब्ध है, तो वह वर्तमान समय वाले विकल्प को प्राथमिकता प्रदान करेगा। इसी प्रकार यदि उस व्यक्ति को भुगतान करने का विकल्प वर्तमान समय में रूपये 25000 का भुगतान अथवा आज से तीन वर्ष के पश्चात् रूपये 25000 के भुगतान का विकल्प उपलब्ध है तो वह व्यक्ति भुगतान के सन्दर्भ में भविष्य के भुगतान वाले विकल्प को वरीयता प्रदान करेगा।

इस उदाहरण के विश्लेषण से मुद्रा के समय मूल्य के महत्व को समझा जा सकता है। इसमें समय तत्व की उपस्थिति के साथ-साथ जोखिम तत्व एवं मुद्रा पर मिलने वाले ब्याज की उपस्थिति भी महत्वपूर्ण कारक है।

वर्तमान में मुद्रा की क्रय शक्ति की तुलना में भविष्य में मुद्रा की क्रय शक्ति कम होने के कारक

वर्तमान में मुद्रा की क्रयशक्ति की तुलना में भविष्य में मुद्रा की क्रय शक्ति कम होने के निम्नलिखित कारक हैं-

(क) जोखिम तत्व- भविष्य के प्रति अनिश्चितता एवं जोखिम मुद्रा के मूल्य में भविष्य में उसकी क्रय क्षमता को कम कर देता है। कोई भी व्यक्ति भविष्य के प्रति मिलने वाले भुगतान को प्राप्त करने के लिये वर्तमान को ही प्राथमिकता प्रदान करता है तथा वर्तमान में भुगतान प्राप्त करने के लिये दूसरे पक्ष को कुछ नकद छूट देने के लिये भी तत्पर हो जाता है। इसके मूल में स्थित है भविष्य में राशि के डूब जाना का जोखिम तत्व अथवा भुगतानकर्ता व्यक्ति के जीवन की अनिश्चितता आदि का जोखिम तत्व का समावेश होना है। इन जोखिम कारकों के कारण भविष्य में भुगतान मिलने अथवा राशि के डूबने का खतरा बना रहता है, अतः व्यक्ति विशेष अपनी राशि को वर्तमान में अपने पास ही रखना सुरक्षित समझता है।

(ख) मुद्रा प्रसार- मुद्रा प्रसार वह स्थिति है जब वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि होती है तथा मुद्रा के मूल्य (क्रय शक्ति) में कमी होने लगती है। यह चलन में मुद्रा की मात्रा चलन वेग एवं समय अन्तराल के कारण घटित होता हैं। मुद्रा प्रसार के कारण भी वर्तमान मुद्रा का मूल्य भविष्य की मुद्रा के तुलना में अधिक होता है। मुद्रा प्रसार एक गतिशील प्रक्रिया है, जिसे भविष्य में दीर्धकाल में ही अनुभव किया जा सकता है।

(ग) वर्तमान में उपभोग को प्राथमिकता- प्रत्येक व्यक्ति वर्तमान उपभोग को प्राथमिकता प्रदान कर उपभोग्य वस्तुओं को क्रय करना चाहता है। इस हेतु उसे वर्तमान में मुद्रा की आवश्यकता होती है, तथा इसलिये उसे मुद्रा को संग्रह करना पड़ता है। यदि कोई व्यक्ति अपनी वर्तमान इच्छा को भविष्य के लिये त्याग करता है तथा अपनी मुद्रा को किसी अन्य व्यक्ति को उपभोग के लिए देता हैं, तो वह उससे क्षतिपूर्ति के रूप में मूलधन के साथ-साथ ब्याज की राशि भी भविष्य में प्राप्त करना चाहेगा।

उपरोक्त कारकों से मुद्रा की क्रयशक्ति भविष्य में कम हो जाती है। अतः स्पष्ट है कि मुद्रा का समय मूल्य की अवधारणा मुख्य रूप से ब्याज की सम्भावना पर स्थित है। बैंक ब्याज की दर शून्य होने की स्थिति में मुद्रा के समय मूल्य भी शून्य होगा। लेकिन बैंक दर, किसी भी परिस्थिति में शून्य नहीं हो सकती हैं क्योंकि ब्याज दर का निर्धारक करने वाले तत्वों में जोखिम तत्व, वर्तमान समय में उपभोग की प्रवृत्ति एवं मुद्रा स्फीति की भी इसमें मुख्य भूमिका होती है।

Bandey

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