निर्यात संवर्धन क्या है? निर्यात वृद्धि के लिए सरकार द्वारा अपनाये गये उपाय

निर्यात संवर्धन से अर्थ निर्यात प्रोत्साहन से लगाया जाता है जिसमें निर्यात वृद्धि के लिए पुराने निर्यातकर्ताओं को तथा नवीन कार्यकर्ताओं को निर्यात करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।’’ 
  1. इनके लिए उन्हें नगद सहायता दी जाती है। 
  2. बैंकों से ऋण प्रदान किये जाते हैं। 
  3. कुछ पूंजीगत एवं अन्य आवश्यक मशीनों व कच्चे माल को निर्यात के बदले में आयात करने की अनुमति दी जाती है।
  4. निर्यात के लिए भेजे जाने वाले माल व रेल भाड़े व सामुद्रिक भाड़े में छूट दी जाती है। 
  5. निर्यात करने वाली संस्थाओं को आय-कर में छूट दे दी जाती हैं।

भारत में निर्यात संवर्धन की आवश्यकता

भारत में निर्यात संवर्धन की आवश्यकता निम्न कारणों से अधिक है।

1. प्रतिकूल व्यापार संतुलन को कम करने के लिए - स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत का व्यापार दो वर्षाें को छोड़कर शेष सभी वर्षों में प्रतिकूल रहा है। अतः असंतुलित व्यापार को संतुलित करने के लिए निर्यात संवर्धन की आवश्यकता है।

2. विदेशी ऋण भार को कम करने के लिए - असंतुलित विदेशी व्यापार एवं आर्थिक योजनाओं के दबाव ने भारत सरकार के लिए आवश्यक कर दिया कि वह विदेशी सरकारों व अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों से ऋण ले। यह क्रम वर्षाें चलने के उपरान्त विदेशी ऋणों की मात्रा दिनों-दिन बढ़ती चली गयी है। इन ऋणों की वापसी व ब्याज आदि के भुगतान के लिए आवश्यक है कि निर्यात संवर्धन की नीति अपनायी जाये।

3. विकास योजनाओं की सफलताओं के लिए - निर्यात वृद्धि के फलस्वरूप ही विकास योजनाओं के लिए आवश्यक मशीनरी व साज-सज्जा आयात की जा सकती है। अतः निर्यात संवर्धन आवश्यक है।

4.  नवीन वस्तुओं के निर्यात के लिए - आर्थिक योजनाओं के अंतर्गत देश के अनेक नये-नये कारखाने स्थापित हुए हैं। जो देश की आन्तरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद निर्यात करने में समर्थ हो सकेंगे। अतः यह उचित ही है कि नवीन वस्तुओं से निर्यात के लिए कोई प्रोत्साहन कार्यक्रम अपनाया जाये।

5. स्वावलम्बी अर्थव्यवस्था बनाने के लिए - देश को विदेशी ऋणों के भार से मुक्ति दिलाने एवं आत्मनिर्भर बनाने के लिए यह आवश्यक है कि निर्यात बढ़ाये जायें।

निर्यात वृद्धि के लिए सरकार द्वारा अपनाये गये उपाय

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही भारत सरकार ने इस संबंध में प्रयास किये हैं तथा अनेक समितियां बिठायी हैं जैसे-गोरेवाला समिति 1949 डिसूजा समिति 1957, मुदालियर समिति 1961, टण्डन समिति 1970 तथा अलैक्जेण्डर समिति 1977। इन समितियों की सिफारिशों के फलस्वरूप निर्यात वृद्धि के लिए भारत सरकार ने निम्न प्रयास किये हैं।

1. व्यापार बोर्ड - देश के विदेशी व्यापार से संबंधित समस्याओं एवं नीतियों की समीक्षा करने एवं अपनी सलाह केन्द्रीय सरकार को देने के लिए 1962 में व्यापार बोर्ड की स्थापना की गयी है। 

2. निर्यात संवर्धन परिषदें - निर्यात व्यापार में उपयोजनाओं, उत्पादकों एवं निर्यातकों के सहयोग को प्राप्त करने के लिए निर्यात परिषदें स्थापित की गयी हैं। यह परिषदें उत्पादकों को निर्यात वृद्धि के लिए सलाह देती हैं। आजकल इस प्रकार की 19 परिषदें हैं जो अलग-अलग वस्तुओं के लिए हैं जैसे- काजू, सूती वस्त्रा, रेशम, रासायनिक पदार्थ, खेल का सामान, मामले, तम्बाकू, चमड़ा आदि। 

3. वस्तु मण्डल - सरकार ने कुछ वस्तुओं के लिए अलग-अलग वैधानिक निगम स्थापित किये हैं जिनका कार्य अपनी-अपनी वस्तु के उत्पादन विकास एवं निर्यात के लिए कार्य करना है। यह वस्तु हैं-चाय, काॅफी, इलायची, रबर व तम्बाकू। 

4. भारतीय विदेशी व्यापार संस्थान- नयी दिल्ली में 1964 में भारतीय विदेशी व्यापार संस्थान के नाम से एक संस्था स्थापित हो गयी है जिसका मुख्य कार्य विदेशी व्यापार के लिए कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देना व विदेशी व्यापार के संबंध में बाजार सर्वेक्षण एवं अनुसंधान करना है। 

5. निर्यात निरीक्षण परिषद - निर्यात (किस्म नियंत्रण एवं निरीक्षण अधिनियम), 1963 के अन्तर्गत, निर्यात निरीक्षण परिषद बनायी गयी है। इसका कार्य निर्यात के लिए माल लादने से पूर्व वस्तुओं का निरीक्षण करना है जिससे कि क्वालिटी की वस्तुएं ही निर्यात हो सकें। 

6. व्यापार विकास संस्थान - इस संस्थान की स्थापना 18 फरवरी, 1971 में हुई है। इसका कार्य छोटे एवं मध्यम आकार वाली संस्थाओं के साहसियों को निर्यात के लिए प्रेरित करना तथा उनको इस कार्य के लिए आवश्यक सहायता प्रदान करना है। 

7. निर्यात साख एवं गारण्टी निगम - यह निगम 1964 में स्थापित किया गया है। इसका कार्य निर्यात संबंधी जोखिम का बीमा करना एवं निर्यातकर्ताओं को इस संबंध में आर्थिक साख की सुविधाएं देना है। 

8. भारतीय व्यापार मेला एवं प्रदर्शनी परिषद तथा वाणिज्यक प्रचार निदेशालय - परिषद एक स्थायी संस्था है जिसका कार्य देश व विदेश में निर्यात संवर्धन के उद्देश्य से विदेशों में औद्योगिक एवं व्यापारिक मेले एवं प्रदर्शनियां आयोजित करना है जिससे वहां की जनता भारतीय वस्तुओं के बारे में जान सके। भारत सरकार का वाणिज्यिक प्रचार निदेशालय भी इसमें सहायता करता है और एक पूरक संस्था का पार्ट अदा करता है। इसके द्वारा विदेशों में आयोजित अन्य प्रदर्शनियों में भारतीय मण्डप लगता है जिसमें भारतीय वस्तुओं का प्रदर्शन किया जाता है। अब यह कार्य भारतीय व्यापार मेला प्राधिकरण देखता है। 

9. निर्यात गृह - 1 जुलाई, 1968 से सरकार के द्वारा उन प्रमुख संस्थाओं को मान्यता प्रदान की जाती है जो निर्यात में अग्रणी हैं। इन मान्यता प्राप्त संस्थाओं को विपणन विकास निधि से सरकार द्वारा उनकी अनेक क्रियाओं के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। 

10. शत प्रतिशत निर्यातोन्मुख इकाइयों की सुविधा - जनवरी 1981 से सरकार ने शत-प्रतिशत निर्यात करने वाली संस्थाओं को बढ़ावा देने के लिए एक योजना लागू की है जिसके अन्तर्गत इन इकाईयों को निर्यात करने के लिए सभी प्रमुख संभव सुविधाएं दी जाती हैं। 

11. भारतीय पैकेजिंग संस्थान - यह संस्थान 1966 में बम्बई में स्थापित किया गया है। इसका कार्य निर्यात एवं आन्तरिक सामान के पैकेजिंग का अध्ययन कर उन्नति के सुझाव देना है। इसके लिए प्रशिक्षण प्रोग्राम व विचारगोष्ठी आदि की व्यवस्था इसके द्वारा की जाती है। 

12. भारतीय पंचायत परिषद - भारतीय पंचायत परिषद् 1965 में स्थापित की गयी है जिसका कार्य व्यापारिक विवादों विशेष रूप से विदेशी व्यापार संबंधी विवादों को निपटाना है। 

13. समुद्री वस्तु निर्यात विकास संस्था - 1972 में कोचीन में समुद्री वस्तु निर्यात विकास संस्थान स्थापित की गयी जिसका कार्य समुद्री वस्तु उद्योग का विकास, निर्यातों की दृष्टि से विशेष रूप से करना है। 

14. निर्यात प्रक्रियन क्षेत्र - बम्बई में सान्ताक्रुज, काण्डला, कोचीन, मद्रास, फाल्टा व नोएडा में निर्यात प्रक्रियन क्षेत्रा स्थापित किये गये हैं। जिन इकाईयों को प्रवेश दिया जाता है उन्हें अपना शत-प्रतिशत उत्पादन निर्यात करना अनिवार्य होता है। 

15. भारतीय राज्य व्यापार निगम - भारतीय राज्य व्यापार निगम की स्थापना मई 1956 में हुई है। इसकी स्थापना का उद्देश्य उन वस्तुओं एवं पदार्थाें में आयात एवं निर्यात करना है जिनको निगम निश्चित करें। भारतीय राज्य व्यापार निगम के कार्याें में सहायता प्रदान करने के लिए पांच निगम और गठित किये गये हैं। 
  1. परियोजना एवं उपस्कर निगम,
  2. हस्तशिल्प तथा हस्तकरघा निर्यात निगम, 
  3. भारतीय काजू निगम, व 
  4. राज्य रसायन एवं भेषज निगम, 
  5. भारतीय चाय व्यापार निगम। 
इसके अतिरिक्त खनिज पदार्थाें के तथा धातुओं के लिए ‘‘खनिज एवं धातु व्यापार निगम’’ की स्थापना की गई है। 

16. व्यापारिक समझौते - भारत ने बहुत से देशों से द्विपक्षीय व बहुपक्षीय व्यापारिक समझौते किये हैं जिनके फलस्वरूप निर्यातों में वृद्धि हुई है। 

17. व्यापारिक प्रतिनिधि - भारत सरकार ने निर्यातों में वृद्धि करने के उद्देश्य से अपने 50 से भी अधिक दूतावासों कार्यालयों में व्यापारिक प्रतिनिधियों की नियुक्ति की है। इन प्रतिनिधियों का कार्य उन देशों में सर्वेक्षण कर इस बात का पता लगाना है कि वहां भारत की किन वस्तुओं की मांग हो सकती है। 

18. निर्यात को प्राथमिक क्षेत्र के रूप में मान्यता - निर्यात करने वाली संस्थाओं को प्राथमिकता के आधार पर सरकार व रिजर्व बैंक द्वारा साख सुविधाएं उपलब्ध की जाती है। उनसे कम दर पर ब्याज ली जाती है। बैंक लदान से पूर्व व लदान के बाद दोनों पर अग्रिम प्रदान करती है। रिजर्व बैंक इस प्रकार के अग्रिम व ऋणों पर पुनर्वित सुविधाएं प्रदान करती है। 

19. निर्यात आयात बैंक - 1 जनवरी, 1982 को निर्यात आयात बैंक की स्थापना की गयी है जिसका कार्य विदेशी व्यापार में वित्तीय सुविधाएं प्रदान करना है। 

20. विपणन विकास निधि - भारत सरकार ने जुलाई 1963 में विपणन विकास निधि की स्थापना की है। इस निधि में से उन भारतीय उत्पादकों व निर्माताओं को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है जो विदेशों में भारतीय वस्तुओं के निर्यात के लिए प्रयत्न करते हैं। 

21. अन्य उपाय - निर्यात वृद्धि के लिए कई उपाय किये गये हैं जैसे- 
  1. निर्यात प्रक्रिया को सरल बनाना, 
  2. निर्यात की जाने वाली वस्तुओं के लिए आयातों पर कम आयात शुल्क लगाना या बिल्कुल न लगााना, 
  3. कुछ वस्तुओं के लिए निर्यात लाइसेंस आवश्यक न होना, 
  4. निर्यात के लिए नगद सहायता देना, आदि।

निर्यात वृद्धि के लिए सुझाव

भारत के निर्यात व्यापार में और वृद्धि लाने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिये जाते हैंः ;

1. निर्यात विपणन अनुसंधान - भारत सरकार, व्यापारिक संघों व भारतीय विदेशी व्यापार संस्थान आदि को विपणन अनुसंधान कराना चाहिए और इस बात का पता लगाना चाहिए कि विदेशों में किन-किन वस्तुओं की मांग है जिससे कि उस प्रकार की वस्तुओं का उत्पादन कर निर्यात किया जा सके। 

2.  अधिक एवं प्रभाव प्रचार - भारत सरकार व व्यापारियों को विदेशों में भारतीय वस्तुओं का विज्ञापन एवं प्रचार करना चाहिए जिससे कि वहां पर उत्पाद की मांग उत्पन्न हो सके और उसको पूरा कर निर्यातों को बढ़ाया जा सके।

3.  निर्यात उत्पादों की किस्म एवं डिजाइनों में सुधार - विदेशों में प्रतिस्पर्धा से मुकाबला करने के लिए भारतीय निर्माताओं को अपनी-अपनी वस्तुओं की किस्में व डिजाइनों में सुधार करना चाहिए तथा किस्म नियंत्राण पर विशेष आंख रखनी चाहिए जिससे कि विदेशियों को अपनी आशाओं के अनुरूप वस्तु मिल सके। इससे निर्यात वृद्धि को सहायता मिलेगी। 

4. वस्तुओं की लागत में कमी - निर्माताओं को वस्तुओं की लागतों में कमी करनी चाहिए जिससे कि वस्तुएं अन्तर्राष्ट्रीय लागतों पर तैयार हो सकें और प्रतियोगिता में सफलता प्राप्त कर सकें। 

5.  निर्यात प्रोत्साहन प्रेरणाएं - भारत सरकार को निर्यात प्रोत्साहन के लिए और अधिक प्रेरणा देनी चाहिए। इसके लिए (1) सहायता (2) आयात अधिकार जैसे कारगर हथियारों का अधिकाधिक उपयोग किया जा सकता है। सहायता से अर्थ निर्यात की रकम का एक निश्चित प्रतिशत निर्यातकर्ता को नकद देने से है। आयात अधिकार में निर्यातकर्ता को उसके द्वारा अर्जित विदेशी मुद्रा की मात्रा का एक निश्चित प्रतिशत के मूल्य की वस्तुआंे के आयात के लिए अनुमति दे दी जाती है। 

6. वित्तीय व अन्य सुविधाएं - यद्यपि निर्यात करने वाले उद्योगों को रिजर्व बैंक व अन्य वित्तीय संस्थाओं द्वारा वित्तीय सहायता दी जा रही है लेकिन फिर भी इसमें गति लाने की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त इन उद्योगों को कच्चा माल व बिजली आदि को भी प्राथमिकता के आधार पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए जिससे कि वे अवरुद्ध उत्थान कर सकें और निर्यात वृद्धि में अपना पूर्ण योग दे सकें। 

7. व्यापारिक समझौते - जिन देशों ने विदेशी माल के आयात पर प्रतिबन्ध लगा रखे हैं उन देशों से भारत को द्विपक्षीय व बहुपक्षीय समझौते करने चाहिए जिससे कि भारतीय माल वहां प्रवेश कर सके और कुल निर्यात बढ़ सके।

Bandey

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