संस्मरण क्या है ? संस्मरण कितने प्रकार के होते हैं ?

स्मृति के आधार पर और स्वयं के अनुभवों के आधार पर जो लिखा जाता है। उसे संस्मरण कहते हैं। संस्मरण में लेखक जो कुछ स्वयं देखता है और स्वयं अनुभव करता है उसी का चित्रण करता अथवा करवाता है। संस्मरण लेखन की एक परंपरागत विधा है ओर साहित्य में भी इसका विशेष महत्व है। 

संस्मरण के प्रकार

संस्मरण मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं। 
  1. आत्म संस्मरण 
  2. दूसरे से सुनकर लिखे गए संस्मरण 
आत्म संस्मरण के केन्द्र में लिखने वाला व्यक्ति मुख्य होता हैं। वह अपनी स्मृति से, अपने देखे, सुने या भोगे हुए यथार्थ को लिखता है। जबकि दूसरे से सुन कर लिखे जाने वाले संस्मरण में लेखक किसी व्यक्ति से बातचीत करके, उसकी स्मृति को टटोल कर, उसे लिपिबद्ध करता है। 

संस्मरण भी साहित्य की एक विधा है और बहुत से विद्धानों ने जीवन के अपने अनुभव, अपने संघर्ष और अपनी सफलताओं को साहित्य में संस्मरणों के रूप में लिख कर अमर कर दिया हैं। महादेवी वर्मा की ‘स्मृति की रेखाएं’ और ‘अतीत के चलचित्र’ शिवानी की ‘जालक’, ‘कैंजा’, तथा नरेन्द्र कोहली की ‘स्मरामि’ आदि संस्मरण साहित्य की उल्लेखनीय कृतियाॅं हैं। 

लेकिन पत्रकारिता में भी संस्मरणों का योगदान कम नहीं है। विशिष्ट अवसरों पर संस्मरणों के आधार पर विशेष सामग्री का प्रकाशन किसी भी अखबार को अलग बना देता है। आजादी की पच्चीसवीं, पचासवीं वर्षगांठ जैसा अवसर हो या किसी बड़ी खेल प्रतियोगिता में कोई खास अवसर, संस्मरणों के आधार पर पाठक को अतीत की जानकारी भी मिल जाती है और वर्तमान के लिए लक्ष्य भी। विश्वकप क्रिकेट को ही लीजिए। इसके आयोजन के दौरान पूर्व विश्वकप विजेता टीम के सदस्यों के संस्मरण पढ़ना किसे अच्छा नहीं लगेगा। इसी तरह किसी विशिष्ट व्यक्ति के जीवन के किसी खास मौके पर उससे जुड़े लोगों के अनुभवों के संस्मरण पाठक को रोचक भी लगते हैं और उसे उनसे कुछ सीखने को भी मिल जाता है। 

संस्मरण लेखन एक कला है और इसके लेखन में इस बात का सबसे अधिक ध्यान रखा जाना चाहिए कि जो कुछ लिखा जाए वो सत्य हो। बढ़ा चढ़ा कर लिखी गई बातें या असत्य बातें संस्मरणों की दुश्मन हैं। यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि संस्मरणों से किसी भी छवि या मान-मर्यादा को अकारण कोई क्षति न पहुॅंचे। संस्मरणों में इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि देश अथवा समाज के व्यापक हितों को हानि पहुंचाने वाली बातें न लिखी जाएं। संस्मरण की भाषा सरल और रोचक होनी चाहिए। 

संस्मरण में कहानी की तरह की गति और सरसता होनी जरूरी है। पत्र-पत्रिकाओं में संस्मरण बड़े लेखों के रूप में भी प्रकाशित होते है और एक-एक, दो-दो वाक्यों के रूप में भी इनका इस्तेमाल होता है। कई बार संस्मरणों के छोटे-छोटे अंश, फीचर को रोचक बनाने के लिए भी इस्तेमाल किए जाते हैं। किसी घटना अथवा दुर्घटना से जुड़े समाचारों को विशिष्टता देने के लिए भी उनमें संस्मरणों के छोटे-छोटे अंशों का इस्तेमाल किया जाता है। पत्र-पत्रिकाओं में पत्रकारों के लिए संस्मरण लिखने की कला में माहिर होना इसलिए भी जरूरी है कि इसके जरिए वो किसी भी व्यक्ति से अत्यन्त महत्वपूर्ण जानकारी हासिल कर सकते हैं। जिस तरह संस्मरण लिखना एक कला है उसी तरह संस्मरण हासिल करना भी एक कला है। इसके लिए पत्रकार में धैर्य होना चाहिए। उसे उस व्यक्ति की उपलब्धियों, उसके जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं आदि की पर्याप्त जानकारी होनी चाहिए। उसे इस बात पर अपना पूरा ध्यान केन्द्रित रखना चाहिए कि जिस व्यक्ति से वह संस्मरण सुन रहा है वह मुख्य विषय से भटक न जाए। ऐसा होने से सही जानकारी हासिल करने में अनावश्यक विलम्ब होता है। सुनाने वाले की तो यह इच्छा होती ही है कि वह अपना सारा ज्ञान, सारे अनुभव सामने वाले के सम्मुख उंडेल दे। इसलिए इस बात का खास ध्यान रखा जाना चाहिए कि जानकारी हासिल करने के लिए बात घुमा फिरा कर न पूछी जाए। यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि बात ऐसे भी न पूछी जाए कि किसी की संवेदनाओं और भावनाओं को चोट पहुॅंचे। 

चूंकि संस्मरण का अर्थ स्मृति के आधार पर किसी विषय या व्यक्ति पर लिखा आलेख होता है, इसलिए इसमें किसी व्यक्ति पर व्यक्तिगत आक्षेपों से बचा जाना चाहिए ताकि संस्मरण की विश्वसनीयता बरकरार रहे और उससे कटुता भी न पैदा हो। यात्रा साहित्य भी संस्मरण की एक विधा है।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं। मैंने अपनी पुस्तकों के साथ बहुत समय बिताता हूँ। इससे https://www.scotbuzz.org और ब्लॉग की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

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