व्यवहारवाद का शिक्षा में योगदान

बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में संरचनावाद और प्रकार्यवाद का विरोध् होने के कारण व्यवहारवाद की स्थापना हुई। इसके पहले चेतना के तत्वों के अध्ययन पर बल दिया गया, जिसे कुछ मनोवैज्ञानिकों ने निरर्थक समझा और कहा कि चेतना का हमारे शरीर पर जो प्रभाव पड़ता है उसका अध्ययन सार्थक है। इसलिए चेतना की रचना के स्थान पर उसके कार्याें पर बल दिया गया। किन्तु कुछ समय बाद चेतना का अध्ययन करने वाली पद्धति अन्तर्दर्शन विघि की कटु आलोचना होने लगी। इनमें विलियम जेम्स प्रमुख आलोचक थे। व्यवहारवाद के जन्मदाता जे. बी वाटसन थे। इस वाद का क्षेत्र व्यवहार का अध्ययन करना है। वाटसन ने चेतना जैसी अस्पष्ट वस्तु को स्वीकार नहीं किया।

इनके अनुसार प्राणी को समझने के लिए उसके शरीर के कार्य, इन्द्रियों की चेष्टाएँ और बाहरी क्रियाओं को देखना और समझना चाहिए। मानव के सम्पूर्ण व्यक्तित्व की जाँच, उसके व्यवहार और क्रियाओं से होती है। इसलिए केवल चेतना का अध्ययन करना उपयोगी नहीं बल्कि संवेदन, भाव, प्रतिभा और स्मृति के स्थान पर उसकी चेष्टा या व्यवहार पर ध्यान दिया जाए जो कि प्रत्यक्ष दिखाई देता है। ये चेष्टाएँ और व्यवहार दोनों स्वाभाविक और अर्जित होते हैं जिनका अध्ययन मनोवैज्ञानिक करते हैं।

 व्यवहारवादी सम्प्रदाय मनोवैज्ञानिकों का वह समुदाय है जो प्राणी मात्र के प्रत्यक्ष दिखाई देने वाले स्वाभाविक और अर्जित दोनों प्रकार के व्यवहारों का अध्ययन करता है। प्रमुख व्यवहारवादी मनावैज्ञानिकों में मेक्समेयर, पी. बीस, हल और टालमैन और बी. एपफ. स्किनर आदि हैं।

सन् 1912-14 में जिस समय अमेरिका में व्यवहारवादी आन्दोलन चल रहा था, उसी समय रूस में मनोवैज्ञानिक वेशेरेव और पावलोव (1857-1936) सम्बद्ध  सहज क्रिया, अभिसन्धनित सहज क्रिया और गतिवाहक सहज क्रियाओं पर प्रयोग कर रहे थे। इन लोगों ने पशु और मनुष्य दोनों पर प्रयोग किए।
 
व्यवहारवादी मत के अनुसार वातावरण में उत्तेजना के उपस्थित होने पर ही प्राणी अनुक्रिया करता है। इस वाद ने प्राणी की क्रिया पर विचार किया और मांसपेशीय तथा गं्रथीय क्रियाओं का अध्ययन किया। इसमें ‘उत्तेजना अनुक्रिया सिद्धन्त’  को प्रमुख स्थान दिया गया है। जिसके फलस्वरूप मनुष्य अपने को परिरिथति और पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए व्यवहार करता है।

व्यवहारवाद के उदय में पशु मनोविज्ञान के क्षेत्र में थार्नडाइक महोदय का उल्लेखनीय योगदान है। इन्होंने मछली, मुर्गी और बिल्लियों पर कई प्रयोग किये। इन प्रयोगों ने यह सिद्ध  कर दिया कि पशु बुद्ध कम होने के कारण प्रयास और त्रुटि  द्वारा बहुत-सी बातें सीखते हैं। पशु प्रयत्न करते-करते किसी कार्य को पूरा करने में सफल हो जाता है। अधिगम नामक अध्ययन में इन प्रयोगों का विस्तार से वर्णन किया गया है।

व्यवहारवाद का शिक्षा में योगदान

  1. व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिकों ने पशुओं पर जो प्रयोग किये उनसे सीखने के नियमों और सिद्धन्तों का प्रतिपादन हुआ। प्रयत्न और त्रुटि विधि को अधिगम में लागू किया गया। 
  2. बाल मनोविकास के अध्ययन को प्रोत्साहन मिला।
  3. मानव विकास और अभिवृद्धि पर पर्यावरण के प्रभाव और महत्त्व पर बल दिया। 
  4. अधिगम की विधियाँ, अधिगम के नियम एवं सिद्धन्त, संवेदगात्मक व्यवहार, मूल प्रवृत्तियों से सम्बन्धित आदतों आदि पर व्यवहारवादी सम्प्रदाय के मनोवैज्ञानिकों ने काफी प्रकाश डाला। इससे शिक्षा-मनोविज्ञान की प्रगति हुई। 
  5. शिक्षा का सम्बन्ध मानव व्यवहार से है। व्यवहार का वैयक्तिवफ एवं सामाजिक दोनों पक्ष होता है। इस मत का विश्वास है कि मानव के सभी व्यवहार पर्यावरण से निरन्तर अन्तःक्रिया द्वारा सम्पन्न होते हैं। 
  6. शिक्षण विधि के रूप में ‘पूर्व नियोजित अधिगम’ का विकास हुआ।
  7.  इस सम्प्रदाय ने निरीक्षण और मापन पर बल दिया।
  8. व्यवहारवादियों ने बालक के व्यक्तित्व के अध्ययन को सरल और वस्तुनिष्ठ बना दिया। विभिन्न परिस्थितियों और पर्यावरण में बालक के व्यवहार का अध्ययन करके, व्यक्तित्व का मूल्यांकन करने की उपयोगी विधियों को जन्म दिया।
  9. उत्तेजना-अनुक्रियावाद के फलस्वरूप शिशु शिक्षा प्रणाली में इन्द्रिय प्रशिक्षण पर बल दिया।

Bandey

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