वुड के घोषणा पत्र की विशेषताएं

भारतीय शिक्षा के प्रवर्तकों में प्रायः ऐसे लोग आते हैं, जिन्होंने भारतवर्ष में रहकर तथा यहां की शैक्षिक परिस्थितियों और आवश्यकताओं की न्यनाधिक जानकारी प्राप्त कर अपने विचारों या कार्यों से उसके विकास में योगदान दिया । किन्तु उसके प्रवर्तकों में एक ऐसा भी व्यक्ति था, जिसने भारत भूमि से सहस्त्रों को दूर इंग्लैण्ड में बैठकर भारतीय शिक्षा- प्रणाली को व्यवस्था दी। यह व्यक्ति था सर चाल्र्स वुड जो किसी समय ईस्ट- इण्डिया कम्पनी के बोर्ड आफ कन्ट्रोल का अध्यक्ष रह चुका था। भारतवर्ष की स्थिति और आवश्यकताओं का उसका अध्ययन इतना विस्तृत तथा गहन था कि जब कभी इस देष की सैनिक, प्रशासनिक, न्यायिक तथा अन्य क्षेत्रों में व्यवस्था का प्रारूप प्रस्तुत करने का काम उसी के मत्थे पडा।

वस्तुस्थिति यह थी कि समय-समय पर दिये गये विभिन्न आदेशों और आज्ञा- पत्रों द्वारा शिक्षा का उत्तरदायित्व लेने की सिफारिशें की गई थीं। किन्तु कम्पनी शासन उन्हें पूर्णतःवहन करने के लिए स्वच्छन्दता से तत्पर न हो सका। अतएव इस बात की आवश्यकता थी कि उस समय तक के लिए सभी निर्णयों और प्रयासों को दृष्टि में रखते हुए ऐसी सम्पूर्ण शिक्षा - योजना बनाई जाये जो भारतीय शिखा को दृढता एवं स्थिरता दे सके। यद्यपि वुड को इस सम्बन्ध में कोई व्यक्तिगत अनुभव नहीं थे, किन्तु सन् 1853 के चार्टर एक्ट के लिए पाॅर्लियामेन्टरी कमेटी के सम्मुख दी गई साक्षियों थ अन्य प्रतिवेदनों और टिप्पणियों ने उनके कार्य के लिए पयाप्र्त सामग्री प्रस्तुत कर दी। इस पृष्ठभूमि में वुड ने अपना प्रेषण लिखकर भारतीय शिक्षा को व्यवस्थित ढांचे में रखने का प्रयास किया यह प्रेषण क्रमांक 49, दिनांक 19 जुलाई, 1854 को ईस्ट- इण्डिया कम्पनी के डायरेक्टर्स की ओर से भारत के गर्वनर-इन -कोसिल को भेजा गया था। इसके अन्त में जिन दस व्यक्तियों के हस्तांक्षर हैं उनमें चाल्र्स वुड का नाम नहीं, ओर ऐसी शंका व्यक्त की जाती हे कि इसका मूल रचियता कम्पनी के इंग्लैण्ड स्थित कार्यालय में लेखक का कार्य करने वाला जान स्टुअर्ट मिल था। किन्तु किसी प्रकार वुड का नाम इस प्रेषण से जुड गया, जिससे वह वुड का ’शैक्षणिक घोषणा पत्र ‘ प्रसिद्ध हुआ। हो सकता है कि प्रथम प्रारूप तैयार करने में एक या अनेक लोगों का हाथ रहा हो, किन्तु उसकी अन्तिम रूप देने का श्रेय चाल्र्स वुड को ही हो, जो कम्पनी के बोर्ड आफ कन्ट्रोल का अध्यक्ष था। तत्कालीन भारत की परिस्थितयों का जो ज्ञान और उसके समाधान की जो प्रतिभा उसने अन्य विभागों के व्यवस्थीकरण में प्रदर्शित की, वह इसमें भी विद्यमान है। यह प्रेषण इतना महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ है कि इसे भारत में ”अंग्रेजी शिक्षा का मैग्ना चार्टा“ की संज्ञा दी जाती है।

वुड के घोषणा पत्र की विशेषताएं

इस घोषणा पत्र में सर्वप्रथम अनेक विवादग्रस्त पहलुओं पर विचार किया गया था, और बाद में अनेक सुझावात्मक सिफारिशें की थीं। इस घोषणा-पत्र में शिक्षा का कर्तव्य कम्पनी का एक प्रमुख कर्तव्य बतलाया गया और कहा कि शिक्षा प्रचार तथा प्रसार करना कम्पनी का एक पुनीत कार्य है।

किन्तु इस पुनीत कार्य के पीछे एक कूटनीति छिपी हुई थी। इस शिक्षा के द्वारा भारतीयों को केवल इंग्लैण्ड की उच्च कला, विज्ञान, दर्शन तथा साहित्य का ही ज्ञान कराना था।

प्राच्य-पाष्चात्य विवाद पर अपना विचार रखते हुए घोषणा-पत्र प्राच्य भाषाओं ने साधारण ज्ञान को अच्छा समझता है किन्तु ”इम जोरदार शब्दों में घोषणा करते हैं कि जिस शिक्षा का हम भारत में प्रसार करना चाहते हैं, उसका उद्देश्य यूरोपीय उच्च कला, विज्ञान, दर्शन तथा साहित्य अर्थात् संक्षेप में यूरोपीय ज्ञान है।“ माध्यम के प्रश्न पर घोषणा-पत्र प्राच्य तथा पाश्चात्य दोनों की भाषाओं को ‘भारतीय षिक्षालयों में फलना-फूलना’ देखना चाहता है।

घोषणा-पत्र में 100 अनुच्छेद हैं और शिक्षा के विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार व्यक्त करने के उपरान्त घोषणा-पत्र में निम्नांकित सिफारिशें की गई-

1. शिक्षा का उद्देश्य- घोषणा-पत्र में शिक्षा का उद्देश्य निर्धारित करते समय अंग्रेजों के स्वार्थों का पूरा-पूरा ध्यान रखा गया है। शिक्षा के द्वारा ऐसे व्यक्ति उत्पन्न किये जायेंगे जो ब्रिटिश साम्राज्य को सुदृढ़ बनाने के लिए भिन्न-भिन्न पदों पर विश्वास के साथ नियुक्त किये जा सकें

2. शिक्षा का विषय- पाठ्य-विषयों की दृष्टि से आधुनिक भारतीय भाषाओं तथा प्राच्य भाषाओं को अत्यन्त दोषपूर्ण बताया गया है तथा पाश्चात्य साहित्य और विज्ञान का अध्ययन भारतीयों के लिए उपयुक्त कहा गया है।

3. शिक्षा का माध्यम- शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रजी भाषा के उपयोग उन्हीं व्यक्तियों के लिए किया जायेगा जो इसका समुचित ज्ञान रखते हैं। शेष लोगों के लिए शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाएँ ही रहेंगी, परन्तु भारतीय भाषाओं के द्वारा जो शिक्षा प्रदान की जायेगी, वह यूरोपीय विज्ञान तथा साहित्य से सम्बन्धित होगी।

4. विश्वविद्यालयों की स्थापना- घोषणा-पत्र में सुझाव दिया गया कि बम्बई तथा कलकत्ता में और आवश्यकता पड़ने पर मद्रास तथा अन्य स्थानों पर विश्वविद्यालय स्थापित किये जायें। विश्वविद्यालयों के सामने लन्दन विश्वविद्यालय आदर्श के रूप में रहेगा। विश्वविद्यालयों के कार्य रहेंगे-
  1. शिक्षण संस्थाओं को सम्बद्ध करना,
  2. आधुनिक भारतीय भाषाओं, प्राच्य भाषाओं, विधि, अभियान्त्रिकी आदि की शिक्षा का प्रबन्ध करना,
  3. सम्बद्ध संस्थाओं को निरीक्षण करना।
5. क्रमबद्ध विद्यालयों की स्थापना- उच्च शिक्षा की प्राप्ति के लिए घोषणा-पत्र में क्रमबद्ध विद्यालयों की आवश्यकता पर बल दिया गया।
 
6. शिक्षा विभाग- प्रत्येक प्रान्त में शिक्षा विभाग स्थापित किया जाय तथा उसका अध्यक्ष जन शिक्षा संचालक हो।

7. जन-साधारण की शिक्षा- घोषणा-पत्र में जनसाधारण की शिक्षा के प्रसार के लिए व्यवस्था की गई। दिषा शिक्षा के महत्व को स्वीकार करने के अलावा यह भी स्वीकार किया गया कि अब तक इस षिक्षा की पूर्ण अवहेलना की गई है। इस प्रकार, निस्यन्दन सिद्धान्त का त्याग कर दिया गया। घोषणा-पत्र ने हायर सेकण्डरी स्तर पर भारतीय भाषाओं को माध्यम के रूप में स्वीकार किया।

8.सहायता अनुदान- घोषणा-पत्र सहायता अनुदान की व्यवस्था करने की सिफारिश की गई और सहायता-अनुदान प्राप्त करने के लिए षिक्षालयों के लिए निम्नांकित नियम बना दिये-
  1. शिक्षालय पक्षपात रहित धर्म-निरपेक्ष प्रदान करता हो।
  2. संचालन में स्थानीय व्यक्तियों का हाथ हो।
  3. छात्र निःषुल्क शिक्षा प्राप्त करते हों।
  4. संचालकगण सरकारी निरीक्षण तथा सहायता-अनुदान के अन्य नियमों का पालन करते हों।
9. शिक्षक प्रशिक्षण- घोषणा-पत्र में प्रत्येक प्रेसीडेन्सी में शिक्षकों के प्रशिक्षण हेतु स्कूल स्थापित करने की सिफारिषें की गई। प्रतिक्षण कला में अध्यापकों को छात्रवृत्तियाँ भी देने की बात पत्र में कही गयी थी।

10. स्त्री-शिक्षा- घोषणा-पत्र में स्त्री-शिक्षा की प्रगति करने के लिए सुझाव दिये गये। यह भी कहा गया कि लड़कियों के विद्यालयों को उदारतापूर्वक अनुदान दिये जायें।

11. व्यावसायिक शिक्षा- घोषणा-पत्र में भारतीय जनता की व्यावसायिक शिक्षा प्रदान करने की दृष्टि से भारत में औघोगिक कालेजों तथा ऐसे स्कूलों की स्थापना की सिफारिश की गई जिनमें कारखाने के कार्य सिखलाये जायें। इसके अतिरिक्त, शिक्षित व्यक्तियों को उनकी योग्यतानुसार सरकारी सेवाएँ प्रदान करने के लिए भी सिफारिश की गई।

12. मुसलमानों की शिक्षा- घोषणा-पत्र में कहा गया कि मुसलमान लोग शिक्षा के क्षेत्र में बहुत पिछड़े हुए हैं, अतः उन्हें शिक्षा देने के लिए विशेष प्रयास तथा व्यवस्था की जाये।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

Post a Comment

Previous Post Next Post