कर क्या है कर के प्रकार?

आधुनिक सरकारों के लिए कराधान आय का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। लोकतंत्र में कराधान ही सरकार की राजनीतिक गतिविधियों को स्वरूप प्रदान करता है। कर करदाता द्वारा किया जाने वाला ऐसा अनिवार्य अंशदान है जो कि सामाजिक उद्देश्य जैसे आय व संपत्ति की असमानता को कम करके उच्च रोजगार स्तर प्राप्त करने तथा आर्थिक स्थिरता व वृद्धि प्राप्त करने में सहायक होता है।

कर की परिभाषा

एडम स्मिथ के अनुसार, “कर नागरिक द्वारा राज्य की सहायता के लिए दिया जाने वाला अंशदान है।”

फिन्डले षिराज़ के अनुसार, “कर सिद्धान्त प्राधिकरण को दिया गया अनिवार्य योगदान है। जिससे सरकार के वे सामान्य व्यय पूरे होते हैं जो विषेश लाभों के प्रसंग के बिना जन कल्याण के लिए किए जाते हैं।”

इस प्रकार, कर एक ऐसा भुगतान है जो आवश्यक रुप से सरकार को उसके बनाए गए कानूनों के अनुसार दिया जाता है। इसके बदले में किसी सेवा प्राप्ति की आशा नहीं की जा सकती है।

करारोपण के उद्देश्य

कर लोगों द्वारा किया जाने वाला अनिवार्य भुगतान है। यदि कोई व्यक्ति कर का भुगतान नहीं करता है, तो उसे कानून द्वारा दंडित किया जा सकता है। आय, संपत्ति तथा किसी वस्तु की खरीद के समय कर लगाया जाता है। कर सरकार की आय का मुख्य स्रोत है। करारोपण के मुख्य उद्देश्यों को निम्न प्रकार से रेखांकित किया जा सकता है:
  1. आय प्राप्त करना
  2. नियमन तथा नियन्त्रण करना
  3. साधनों का आबंटन
  4. असमानता को कम करना
  5. आर्थिक विकास
  6. कीमत वृद्धि पर नियन्त्रण

कर के प्रकार

सरकार द्वारा कई प्रकार के करों को लगाया जाता है। इनके वर्गीकरण को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है:

1- प्रत्यक्ष कर: प्रत्यक्ष कर ऐसे कर हैं जो विधिगत रूप से जिस पर लगाए जाते हैं उसे ही इसका भुगतान करना पड़ता है। जैसे: आय कर।

2- परोक्ष कर: परोक्ष कर या अप्रत्यक्ष कर एक व्यक्ति पर लगाए जाते हैं जबकि ये पूर्णत: या आंशिक रूप से दूसरे व्यक्ति द्वारा दिए जाते हैं। जैसे - बिक्री कर, सीमा शुल्क परोक्ष कर हैं क्योंकि इनका भार व्यापारी से उपभोक्ता को स्थानांतरिक होता है।

3- अनुपातिक कर: आनुपातिक कर में कर की मात्रा समान रहती है। सभी आयों पर एक दर से कर लगाया जाता है। इसका करदाता की आय से कोई संबंध नहीं होता। इसे एक रेखाचित्र द्वारा दिखाया जा सकता है:

4- प्रगतिशील कर: प्रगतिशील कर में व्यक्ति की आय में परिवर्तन के साथ परिवर्तन होता है। आय की दर जितनी अधिक होती है। कर की दर भी उतनी ही अधिक होती है। भारत में प्रगतिशील कराधान को ही अपनाया गया है। 

5- प्रतिगामी कर:प्रतिगामी कराधान में करदाता की आय जितनी अधिक होगी कर के रूप में वह उतना ही कम अनुपात सरकार को देगा। यह प्रगतिशील करों के विपरीत है। 

6- अधोगामी कर: अधोगामी कर प्रगतिशील करों और प्रतिगामी करों का मिश्रण है। इसमें एक निश्चित सीमा तक कराधान की दर में वृद्धि होती है और उसके बाद आय में परिवर्तन के साथ कर की दर स्थिर रहती है। 

7- एक कर: इसमें कर केवल एक मद अथवा शीर्ष पर लगाया जाता है। इसमें एक वस्तु पर कर लगता है जैसे - भूमि कर। यह कर प्रत्येक माह या प्रत्येक वर्ष एकत्रित किए जाते हैं।

8 - बहु कर: इसमें अनेक वस्तुओं पर एक साथ कर लगाया जाता है। जैसे:- उत्पादन कर, बिक्री कर इत्यादि।

9- विशिष्ट कर: जो कर वस्तुओं के विशिष्ट गुणों पर आधारित हो उन्हें विशिष्ट कर कहा जाता है। ये कर वस्तु के भार, आकार और मात्रा आदि के अनुसार लगाए जाते हैं। जैसे:- कपड़े पर शुल्क उसकी लंबाई  के आधार पर लगाया जाता है।

10- मूल्यानुसार कर: यह कर वस्तु पर उसके मूल्य के अनुसार लगाए जाते हैं। इस प्रकार के कर योग्य वस्तु के मूल्यांकन के पश्चात लगाए जाते हैं। जैसे निर्यात अथवा आयात शुल्क 5 पैसे प्रति रूपए या वस्तु के मूल्य के 5 प्रतिषत की दर पर लगाया जाता है।

11- दोहरे कर: यदि एक व्यक्ति एक ही सेवा के लिए दो बार कर देता है तो उसे दोहरा कर कहा जाता है। उदाहरण के रूप में, यदि भारत का व्यक्ति विदेष में आय प्राप्त करता है तो उसे एक ही आय पर दो बार कर देना पड़ेगा एक तो विदेश में और फिर एक भारत में भी।

करों के सिद्धान्त

कराधान के सिद्धान्तों को विभिन्न अर्थषास्त्रियों द्वारा प्रतिपादित किया गया है। इसकी निम्नलिखित प्रकार से व्याख्या की जा सकती है:

1- समानता का सिद्धान्त: इस सिद्धान्त के अनुसार व्यक्ति की कर देने की क्षमता के अनुरूप ही उस पर कर लगाया जाना चाहिए। अमीर लोगों पर गरीबों से अधिक कर लगाया जाना चाहिए। अर्थात् अधिक आय पर अधिक कर और कम आय पर कम कर।

2- निश्चितता का सिद्धान्त: प्रत्येक व्यक्ति द्वारा दिया जाने वाला कर निश्चित होना चाहिए तथा उसमें कुछ भी असंगत नहीं होना चाहिए। प्रत्येक करदाता का भुगतान का समय, भुगतान की राशि भुगतान का तरीका, भुगतान का स्थान, जिस अधिकारी को कर देना है, वह भी निश्चित होना चाहिए। निश्चितता का सिद्धान्त करदाताओं व सरकार दोनों के लिए जरूरी है।

3- सुविधा का सिद्धान्त: सार्वजनिक अधिकारियों को यह ध्यान में रखना चाहिए कि करदाता को कर के भुगतान में कम से कम असुविधा हो। उदाहरण के लिए भू-राजस्व को फसलों के समय ले लिया जाना चाहिए।

4- मितव्ययता का सिद्धान्त: कर संग्रहण में कम से कम धन खर्च किया जाना चाहिए। संग्रह की गई  राशि का अधिकतम अंष सरकारी खजाने में जमा करवाया जाना चाहिए। इस प्रक्रिया में फालतू खर्च से बचा जाना चाहिए।

5- उत्पादकता का सिद्धान्त: इस सिद्धान्त के अनुसार अनेक अनुत्पादक कर लगाने के स्थान पर कुछ उत्पादक कर लगाए जाने चाहिए। कर इतने अच्छे तरीके से लगाए जाने चाहिए कि वह लोगों की उत्पादन क्षमता को निरूत्साहित न करें।

6- लोचषीलता का सिद्धान्त: कर इस प्रकार के लगाए जाने चाहिए कि उनके द्वारा एकत्र होने वाली राशि को समय और आवश्यकतानुसार कम से कम असुविधा से घटायाया बढ़ाया जा सके।

7- विविधता का सिद्धान्त: इसके अनुसार देष की कर व्यवस्था में विविधता होनी चाहिए। कर का बोझ विभिन्न वर्ग के लोगों पर वितरित होना चाहिए।

करों के प्रभाव

कराधान के प्रभावों की व्याख्या निम्न प्रकार से की जा सकती है:

1- कराधान के उत्पादन पर प्रभाव: कराधान से कार्य करने, बचत करने तथा निवेश की क्षमता और कार्य करने, बचत करने तथा निवेष करने की इच्छा प्रभावित होती है। कर इन्हें कम करता है। परन्तु जब सरकार कराधान द्वारा एकत्रित धन खर्च करती है तो उससे देष के नागरिकों को सुविधाएं एवं सुगमताएं प्राप्त होती है। इसलिए कार्य करने, बचत करने और निवेष करने की योग्यता पर विचार करते समय सार्वजनिक व्यय के प्रभावों को भी ध्यान में रखा जाए।

2- कराधान के वितरण पर प्रभाव: आधुनिक कल्याणकारी सरकार का मुख्य उद्देश्य है आय और सम्पति की असमनताओं को कम करना। समान वितरण की प्राप्ति के लिए सार्वजनिक व्यय इस प्रकार किया जाये जिससे निर्धन लोगों की आय बढ़े। करारोपन का प्रबन्ध इस प्रकार किया जाये जिससे समृद्ध लोगों की आय और सम्पति में वृद्धि पर रोक लगे।

3- मुद्रा स्फीति पर करों का प्रभाव: मुद्रा स्फीति के समयपर कराधान का लक्ष्य होता है उपभोक्ता की क्रय शक्ति को कम करना। इस दिषा में आय और व्यय पर करारोपण, सार्वजनिक व्यय को नियन्त्रित करने में उपयुक्त होता है। आयातषुल्कों में कमी और वस्तुओं की पूर्ति में वृद्धि भी अर्थव्यवस्था पर स्फीतिकारी दबावों को कम करती है।

4- करारोपण का मन्दी के समय में प्रभाव: मन्दी की स्थिति से निपटने के लिए करारोपण में कमी आवष्यक है। विषेश रूप से उन करो को घटाना आवष्यक है जो निम्न आय वर्गों पर पड़ते है। वस्तुकरों में कमी से उपभोग की प्रवृति में बढ़ोतरी होगी और बाजार मांग बढ़ेगी। ऐसे समय में प्राय: घाटे वाले बजटों को प्राथमिकता दी जाती है।

5- करारोपण का उपभोग पर प्रभाव: उपभोग की मात्रा तथा प्रकृति पर नियन्त्रण कुछ वस्तुओं की बिक्री पर भारी कर लगाकर किया जा सकता है। राष्ट्रीय सीमाओं से पार से आने वाले उत्पादो का नियमन आयात-निर्यात शु ल्क लगा कर किया जा सकता है।

इस प्रकार कर सरकार की आय का मुख्य स्रोत है। इसके कुछ सिद्धान्त और प्रभाव है। इसका प्रयोग इस प्रकार से किया जाना चाहिए कि आर्थिक विकास और कल्याण में अधिकतम वृद्धि हो सके।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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