धर्मनिरपेक्षता क्या है? धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की विशेषताएं

धर्मनिरपेक्षता वह तत्व है, जिसके अनुसार राज्य के कार्यों में धर्म तथा धार्मिक कार्यों का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।’’ धर्मनिरपेक्षता अति उच्चस्तरीय धार्मिक व्यापकता तथा सहिष्णुता है, जो किसी संकीर्ण धार्मिक सिद्धांतों पर आधारित न होकर सहनशीलता, स्वतंत्रता, धैर्य, मानवीयता व सार्वभौमिक भातृत्वभाव पर आधारित है।
उपर्युक्त विवेचना से भारतीय धर्म-निरपेक्ष राज्य-व्यवस्था के बारे में निम्नांकित बातें स्पष्ट होती हैं -
  1. राज्य किसी धर्म विशेष को आश्रय/संरक्षण नहीं प्रदान करता है।
  2. सभी धर्मों को समानता की दृष्टि से देखते हुए उनके मानने, प्रचार करने आदि की स्वतन्लत्रता देता है।
  3. प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने, प्रचार करने का अधिकार देता है।
  4. धार्मिक संस्थाओं के प्रबन्ध की स्वतन्त्रता प्रदान करता है।
  5. धार्मिक संस्थाओं न्यासों को धार्मिक शिक्षा की स्वतन्त्रता देता है।
  6. किन्तु राज्य पोषित एवं राज्य से अनुदान प्राप्त संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा की इजाजत नहीं देता।
इस प्रकार वर्तमान भारतीय समाज को पूर्णरूपेण धर्म-निरपेक्ष समाज बनाने के लिये सभी प्रावधान किये हैं, जिससे कि हमारे बहुधर्मी समाज में सर्व धर्म सद्भाव के माध्यम से समन्वित समाज-व्यवस्था स्थापित हो सके।

धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की विशेषताएं 

धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की निम्न विशेषताएं हैं -
  1. धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र का कोई धर्म नहीं होता है।
  2. धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र सभी धर्मों का समान आदर करता है।
  3. धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र किसी भी नागरिक से धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाता।
  4. धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र धर्म के गलत प्रयोग पर हस्तक्षेप करता है।
  5. धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बिना किसी धर्म के भेदभाव के सभी नागरिकों के कल्याण के लिए कार्य करता है।
  6. धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में नागरिक किसी भी धर्म को अपनाने के लिए स्वतंत्र है।
इस समाज-व्यवस्था की पृष्टि के लिये संविधान में निम्नलिखित प्रावधान किये गये हैं -

1. संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 - ये इसी उद्देश्य से शामिल किये गये थे कि राज्य का धर्म/धर्मों के प्रति दृष्टिकोण स्पष्ट हो जाए। ये उपलब्ध एक ओर जहाँ प्रस्तावना में दी गई विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता का विस्तार है, वहाँ दूसरी ओर राज्य को धर्म विषेष से दूर रखने की ओर प्रयास भी है।

2. अनुच्छेद 25 (1) - इसमें सभी व्यक्तियों को अन्तःकरण की स्वतन्त्रता तथा धर्म के अबाध रूप से मनाने, आचरण करने का अधिकार है।
  1. राज्य कानून बनाकर निम्नलिखित आधारों पर प्रतिबन्ध लगा सकता है।
  2. धार्मिक आचरण से सम्बद्ध किसी आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक क्रियाओं को नियमित एवं प्रतिबन्धित करने के लिये।
  3. सामाजिक कल्याण और सुधार के लिये।
उपर्युक्त अनुच्छेद में निम्नांकित तीन वाक्यांश शामिल हैं -

अ) अन्तःकरण की स्वतन्त्रता - इसमें वह आंतरिक स्वतन्त्रता शामिल है, जिसमें व्यक्ति अपने विश्वास, इच्छानुसार ईश्वर से सम्बन्ध स्थापना के लिये स्वतन्त्र है।

ब) धर्म का मानना एवं आचरण करना है - यह प्रथम का बाह्य रूप है, जिसमें धर्म विशेष द्वारा बताये गये कर्तव्यों, कर्मकाण्डों और धार्मिक कृत्यों को प्रदर्शित करने की स्वतन्त्रता है किन्तु यह सब सार्वजनिक व्यवस्था, सदाचार एवं जनता के स्वास्थ्य के अनुरूप ही होगा।

स) धर्म का प्रचार करना - इसमें अपने विचारों को दूसरों तक सम्प्रेषित करना, प्रकाशित करना, बिना दबाव के उन्हें मनवाने के लिये दूसरों को समझाना-बुझाना शामिल है, किन्तु बलात् धर्म-परिवर्तन के लिये बाध्य करना शामिल नहीं है।

3. (अनुच्छेद 26) - प्रचार, प्रसार एवं धार्मिक आचरण हेतु धार्मिक संस्थायें चाहियें। इन संस्थाओं के प्रबन्ध की स्वतन्त्रता के बिना, धार्मिक स्वतन्त्रता अधूरी ही रहती है। अतः इन स्वतन्त्रता का प्रावधान किया गया जिसका अर्थ है -
  1. धार्मिक कार्यों की पूर्ति हेतु संस्थाओं की स्थापना एवं उनका संचालन।
  2. धार्मिक कार्यों सम्बन्धी विषयों का प्रबन्ध करना।
  3. उक्त उद्देश्य की पूर्ति हेतु चल, अचल सम्पत्ति का अर्जन करना।
  4. धर्म विशेष की उन्नति के लिये राज्य द्वारा कर नहीं लगाना। (अनुच्छेद 27)।
यह अनुच्छेद यह उपबन्धित करता है कि किसी भी व्यक्ति को किसी विशेष धर्म अथवा सम्प्रदाय की उन्नति के लिये कर देने के लिये बाध्य नहीं किया जायेगा। इससे राज्य की धर्म निरपेक्षता और अधिक स्पष्ट हो जाती है।

4. अनुच्छेद (28) - यह राज्य पोषित शिक्षा-संस्थाओं में धार्मिक-शिक्षा या उपासना का निषेध करता है और निम्नांकित उपबन्ध करता है -
  1. राज्य-निधि से पूरी तरह से पोषित किसी शिक्षा-संस्था में कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जायेगी।
  2.  राज्य से मान्यता प्राप्त या राज्य-कोष से पोषित होने वाली शिक्षा संस्था में किसी व्यक्ति को धार्मिक शिक्षा या उपासना में भाग लेने के लिये बाध्य नहीं किया जायेगा।
अनुच्छेद 28 में चार प्रकार की शिक्षा-संस्थाओं का उल्लेख है -
  1. राज्य द्वारा पूरी तरह पोषित (सरकारी शिक्षण संस्थायें)
  2. राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त।
  3. राज्य से अनुदान प्राप्त।
  4. किसी धर्मस्व या न्यास के अधीन स्थापित।
प्रथम प्रकार की संस्थाओं में किसी प्रकार की धार्मिक शिक्षा नहीं दी जायेगी। दूसरी एवं तीसरी प्रकार की संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा दी जा सकती है बशर्ते इसके लिये अभिभावक एवं छात्र की सहमति हो। चौथे प्रकार की संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा देने के बारे में कोई प्रतिबन्ध नहीं है।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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