क्रियात्मक शोध क्या है ? क्रियात्मक शोध की चरण तथा प्रक्रियाएं

अनुसंधान एक उद्देश्यपूर्ण और सविचार प्रक्रिया है इसका मुख्य उद्देश्य ज्ञान वर्धन करना एवं परिमार्जित कर उपयोगी बनाना है। यह एक वैज्ञानिक एवं बौद्धिक प्रक्रिया है। क्रियात्मक अनुसंधान द्वारा समस्याओं का अध्ययन निर्णय एवं क्रियाओं में निर्देशन सुधार एवं मूल्यांकन किया जाता है। अधिकतर क्रियात्मक अनुसंधान कक्षा कक्ष की विभिन्न स्थितियों की समस्याओं का निराकरण, निदानात्मक मूल्याकंन एवं उपचारात्मक उपाय करने में अत्यन्त महत्वपूर्ण उपयोगी एवं सामाजिक सिद्ध होता है। क्रियात्मक अनुसंधान शिक्षा से सम्बधित समस्याओं के तात्कालिक परिणाम खोजने की एक प्रक्रिया है। यह मौलिक अनुसंधान से भिन्न है, इसके परिणाम को सामान्यीकरण करना सही नहीं होता है, क्योंकि भले ही समस्या एक जैसी हो परन्तु समस्या के कारक, समस्या को उत्पन्न करने वाला परिवेश, समस्या को प्रभाव करने वाले कारक इत्यादि एक जैसे नहीं होते है। 

क्रियात्मक अनुसंधान का प्रारंभ अमेरिका के शिक्षा शास्त्रीयों कोलार, लूईन, हेरिकन एवं स्टीफन ने किया। क्रियात्मक अनुसंधान का अभिप्राय विद्यालय में कि गई उस संपादित क्रिया से है। जिसके द्वारा विद्यालय की कार्य प्रणाली में सुधार, संशोधन एवं प्रगति के लिए प्राचार्य, प्रबंधक तथा निरिक्षक विद्यालय की समस्याओं का वैज्ञानिक ढंग से मध्ययन करते है क्रियात्मक अनुसंधान विद्यालय से जूड़़ी प्रतिदिन की समस्या एवं उसके निराकरण से है शिक्षक एक शोधकर्ता के रूप में शिक्षा जगत में शोध को अपने विशेष दृष्टिकोण विशिष्ट शिक्षण प्रक्रियाओं तथा कक्षा शिक्षण में सुधार करने के लिए उपयोग करते है।

अतः स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में शोध का उद्देश्य या तो शिक्षकों द्वारा अपनी शिक्षण पद्धतियों में महत्वपूर्ण बदलाव लाना या सीखने में बच्चों की प्रतिभागिता को बढ़ावा देना होता है। शिक्षक एक शोधकर्ता के रूप में इन्हीं बातों का ध्यान में रखते हुए अक्सर अपनी कक्षाओं और स्कूल में शोध करते भी रहते है। शिक्षा जगत में शिक्षक शोधकर्ताओं ने क्रियात्मक शोध को अपने विशेष दृष्टिकोण, विशिष्ट शिक्षण प्रक्रियाओं तथा कक्षा शिक्षण में सुधार करने के लिए उपयोग किया है।

कुछ प्रमुख क्रियात्मक शोधकर्ताओं के विचार

जोहन इलियट के अनुसार क्रियात्मक शोध एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें अध्यापक अपनी शिक्षण कला की प्रक्रियाओं का आकलन करता है तथा इसके द्वारा नयी व बेहतर कक्षा शिक्षण प्रक्रियाअेां की खोज करता है। ऐसा करके, न केवल वह कक्षा शिक्षण प्रक्रियाओं केा बेहतर बनाता है अपितु वह इस समंबं में कुछ अपने स्तर के नए सिद्धांत भी बनाता है। यही सिंद्धांत प्रभावी होने पर पुराने सिद्धांतों का स्थान ले लेते है।

स्टेनहाउस के अनुसार अध्यापक एक माली के रूप में होता है, जो हर पौधे को उसकी जरूरत के अनुसार सहेजता है , न कि किसान की तरह जिसका हर पौधे की तरफ समान व्यवहार होता है। स्टेनहाउस विद्यलाय कक्षा को एक प्रयोगशाला के रूप में देखते है।

बर्नस के अनुसार क्रियात्मक शोध

  1. क्रियात्मक शोध प्रक्रियाओं के दौरान आने वाली समस्याओं के समाधान या परिस्थितियों में सुधार का एक सशक्त साधन है।
  2. शिक्षक को सीखने-सिखाने के दौरान अपनी दक्षता में सुधार करने के अवसर प्रदान करता है ताकि सीखने-सीखाने की प्रक्रियाएं सभी बच्चों के लिए उपयोगी हो सके।
  3. शिक्षक को अपनी सीखने-सीखाने की प्रक्रियाओं संबंधी विश्लेषणात्मक क्षमता बढ़ाने में सहायक होता है।
  4. यह एक माध्यम है जो शोधकर्ता शिक्षकों को पंरपरागत प्रक्रियाओं के प्रभावहीन होने पर उनके निराकरण के लिए उपयुक्त उपाय देता है।

मिल्स के अनुसार क्रियात्मक शोध

  1. विद्यालय में अपेक्षित बदलाव को प्रोत्साहित करता है।
  2. शिक्षा में लोकतांत्रिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है।
  3. व्यक्तिगत पेशेवर विकास में बड़ोतरी करता है।
  4. शिक्षकों केा प्रेात्साहित करता है कि वे खुद पर व अपनी कार्यप्रणाली पर रिफ्लेक्ट करें।
  5. नए विचार के परीक्षण की प्रक्रिया को बढ़ावा देता है।
गेय एवं एयरसैन के अनुसार शैक्षिक आयामों के अंतर्गत क्रियात्मक अनुसंधान के अनेक प्रमाणित लाभ दिखाई पड़ते हैः
  1. शिक्षक अपने अध्यापन की जांच व्यवस्थित तरीके से कर सकते है, गहन खोज कर सकते है कि वास्तव में वे तथा उनके छात्र क्या बेहतर तरीके से कर पाते है और क्या कर पाने में विफल रहते है ?
  2. शिक्षक अपने और अपने छात्रों के बारे में गहरी समढ बना पाते है, जैसे सीखने की प्रक्रिया और सीखने-सीखाने में शिक्षक तथा बच्चे दोनों की भूमिका।
  3. शिक्षक क्रियात्मक शोध के माध्यम से उन क्षेत्रों की पहचान कर सकते है जो उन्हें समस्या के रूप में दिखती है और जिनका वे समाधान चाहते है।
हाॅपक्न्सि शिक्षको के लिए कक्षा में अनुसंधान करते समय कुछ प्रमुख बातों पर विशेष ध्यान देने के लिए कहा है।
  1. शिक्षक की प्राथमिक भूमिका सीखना-सिखाना है और यह प्रक्रिया किसी भी शोध से बाधित नहीं होनी चाहिए।
  2. शोध के लिए आंकड़ो को इकट्ठा करने में शिक्षक को ज्यादा समय न देना पड़े।
  3. शोध में प्रयुक्त पद्धति विश्वसनीय होनी चाहिए ताकि शिक्षक पूर्ण विश्वास के साथ अपनी परिकल्पनाओं को तैयार कर कक्षा की स्थित के अनुसार उचित शोध रणनीति विकसित कर सकें।
  4. शोध करते समय शिक्षक नैतिक प्रक्रियाओं को अवश्य ध्यान में रखें।

  5. कक्षा शोध यथासंभव स्कूल समुदाय के सभी सदस्यों में एक आम दृष्टि और परिप्रेक्ष्य का निर्माण करें।

क्रियात्मक शोध अन्य शोध से भिन्न कैसे ?

यह एक ऐसा विषय है जिस गहराई से समझने की आवश्यकता है। इसकी समझ होने से केवल इनके बीच के मौलिक अंतर को समझने में सक्षम होंगे यह भी जान रहे होगे कि क्रियात्मक शोध कौन कर सकता है और किन-किन परिस्थितियों में इसे किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर

शीर्षक-1:- ‘‘कक्षा तीन में भाषा केा लेकर सीखने-सीखाने संबंधी अनुभवों के आधार पर पाठ्यक्रम में बदलाव करना ’’

शीर्षक-2:- ‘विद्यालय गतिविधियों में समुदाय की प्रतिभागिता सुनिश्चित करना’’

शीर्षक-3:- ‘‘विद्यालय में कक्षा पहली सेे कक्षा पंाचवी तक अध्ययनरत सभी बच्चों का गणित, विज्ञान एवं भाषा विषय में उपलब्धि स्तर’’

अगर आप शीर्षक 1 और 2 को गहराई से सोचें यह दोनों समस्याऐं क्रियात्मक अनुसंधान के अंतर्गत नहीं आते हैं क्योंकि दोनों शीर्षकों में शिक्षक ने न तो अपनी कार्यशैली में सुधार कर सकता है एवं न ही कार्य की गुणवत्ता की बढ़ा सकता है। जबकि तृतीय शीर्षक समस्या शिक्षक के कार्यशैली से सीधा जुड़ा हुआ है। इसलिए तृतीय शीर्षक क्रियात्मक अनुसंधान के क्षेत्र में आता है।

क्रियात्मक शोध की चरण तथा प्रक्रियाएं

क्रियात्मक शोध की सभी परिभाषाओं में पांच मूलभूत चरण पर बात की गई है। ये चरण है:-
  1. समस्या का पता लगाना
  2. आंकड़ो का संचयन और उसकाे व्यवस्थित करना
  3. आंकड़ो की विवेचना
  4. आंकड़ो के विवेचन से प्राप्त जानकारी पर कार्य करना।
  5. चिंतन करना।

1. समस्या का पता लगाना

शिक्षण करते हुए शिक्षक को अनेक प्रकार की समस्याओं से गुजरना पड़ता है। प्रश्न यह उठता है कि क्या हर समस्या पर क्रियात्मक शोध किया जा सकता है ?

1. समस्या ऐसी हो जिसका समाधान आपके अपने हाथ में हो जैसे, शिक्षकों के लिए बच्चों के द्वारा मात्रा पहचानने में गलती क्रियात्मक शोध के संदर्भ में समस्या हो सकती है न कि कोई अन्य प्रशासनिक समस्या अर्थात् शैक्षिक समस्या को अनुसंधान का आधार बनाया जा सकता है।

2. समस्या का वर्णन करते समय उस समस्या को कैसे, कब, कहाॅ, कौन, क्या, क्यों की कसौटी पर जांच लें।

3. समस्या शिक्षक के द्वारा स्वयं पहचानी गई हो न कि किसी अन्य द्वारा सुझाई गई अर्थात् कोई ऐसी समस्या जिसे शिक्षक ने अपना कार्य करते हुए महसूस किया हो और यह पाया हो कि इस समस्या का उपाय करना बहुत आवश्यक है।

2. आंकड़ो को संचयन और उनको व्यवस्थित करना

आंकड़ो को संचित करके तत्पश्चात उनको व्यवस्थित करना क्रियात्मक शोध का एक अहम हिस्सा होता है। ये आंकड़े रिपोर्ट कार्ड, परीक्षा की काॅपी, बच्चों की नोटबुक, क्लास का वीडियो, बच्चों की समस्या को जांचने के लिए उपयोग किए गए प्रारूप आदि हो सकते है। इन आंकड़ों को क्रमबद्ध किया जाना जरूरी है। अच्छा यह होगा कि आप किसी समस्या के लिए आंकड़े संचित करते हुए विभिन्न अलग स्रोतों का उपयोग करें।

3. आंकड़ो की विवेचना

अंाकड़ो दो तरह के हेाते है। पहला वे आंकड़े होते है जिन्हे आसानी समझा जा सकता है या फिर अंको में बदला जा सकता है जैसे-आप आसानी से यह जांच सकते है कि कितने बच्चों को मात्रा में समस्या है ? कितने बच्चों को ‘ओ’ की मात्रा पहचानने में समस्या है ? प्रत्येक बच्चे द्वारा लिखे गए वाक्यों में मात्रा की कितनी गलतियां है आदि।

दूसरी तरह के आंकड़े ऐसे होते है जिन्हे आप अंको में नही बदल सकते जैेसे कक्षा का कोई बच्चा जो घर के व्यवसाय जैसे कि दुकान चलाना (जिसमें पैसो का लेन-देन होता हो) में परिवार की मदद करता है वह भले ही लिखित गणना न कर पाए लेकिन मौखिक गणना कर लेता है। अगर हम समस्या की कसौटी देखें तो अक्सर ‘क्यों’ वाले प्रश्न इस श्रेणी के होते है। जैसे कुछ अन्य बच्चों की तुलना में धीरे क्यों सीखते है।

इस तरह के आंकड़ो का विश्लेषण करने के लिए यह आवश्यक होता है कि उन्हें सही से व्यवस्थित किया जाए और वर्गीकृत किया जाए। इन आंकड़ो की व्याख्या करके उनसे कुछ निष्कर्ष निकाले जांए।

4. आंकड़ो के विवेचन से प्राप्त जानकारी पर कार्य करना

एक बार समस्या का प्रकार और विस्तार तय हो जाए तो अगला कार्य है समस्या के समाधान के लिये कार्य योजना करना। एक क्रियात्मक शोधकर्ता को तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर कोई एक कार्य योजना बनाकर और उस पर अमल करना चाहिए। इस कार्य

योजना पर अमल करते हुए यह बहुत ही महत्वपूर्ण है कि जो कुछ किया जा रहा है उसका अच्छी तरह से दस्तावेजीकरण किया जाए।

5. चिंतन करना

कार्ययोजना को क्रियान्वित करते समय यह चिंतन करना आवश्यक है कि इस योजना से समस्या के समाधान ढॅूंढना में क्या मदद मिल रही है? समय-समय पर यह प्रश्न पूछना ठीक रहता है कि क्या आप उन उद्देश्यों को प्राप्त कर पा रहे हैं या नहीं जिनके लिए आपने क्रियात्मक शोध को चुना है। विश्लेषण करें कि क्या समस्या का समाधान हो गया है या फिर सिर्फ उपरी तौर पर ऐसा लग रहा है।

अगला चरण:- अगर समस्या का समाधान हो गया हो तो क्रियात्मक शोध पूरा हो गया। अगर समस्या का समाधान नही हो पाया तो आप फिर से एक नयी विधि के अनुसार नई कार्य योजनाएं बनाए। जैसे पूर्व में दिए गए उदाहरण में अगर मात्रा कार्ड या अक्षरित खेल के माध्यम से सभी बच्चे मात्रा को ठीक से पहचान कर उसको पढ़ या लिख पाते है तो हमें मान लेना हेागा कि समस्या का समाधान हो गया है। किन्तु अधिकतर बच्चे यदि यह नहीं कर पाते है तो शिक्षक को पुनः आंकड़ों का विश्लेषण कर सही समस्या का पता लगाना चाहिए और किसी अन्य विधि जैसे बारहखड़ी के खेल आदि के माध्यम से प्रयास करना चाहिए। इस तरह तब तक क्रियात्मक शोध के चक्र को दोहराना हेागा जब तक कि बच्चे मात्रा नहीं सीख जाते।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

Post a Comment

Previous Post Next Post