राजनीति विज्ञान की परिभाषा, प्रकृति एवं क्षेत्र का वर्णन

राजनीति विज्ञान समाज विज्ञान का वह हिस्सा है जो राज्य की स्थापना तथा सरकार के सिद्धांतों का अध्ययन करता है। जे.डब्लू गार्नर के अनुसार ‘‘राजनीति का प्रारम्भ और अंत राज्य के साथ होता है।’’ उसी तरह से आर.जी. गैटेल ने कहा है कि राजनीति ‘‘राज्य के भूत, वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन है।’’ 

हैरोल्ड जे. लास्की ने कहा है कि राजनीति के अध्ययन का संबंध मनुष्य के जीवन एवं एक संगठित राज्य से संबंधित है। इसलिए, समाज विज्ञान के रूप में, राजनीति विज्ञान, समाज में रहने वाले व्यक्तियों के उस पहलू का वर्णन करता है जो उनके क्रियाकलापों और संगठनों से संबंधित है और जो राज्य द्वारा बनाये गए नियम एवं कानून के अंतर्गत शक्ति प्राप्त करना चाहता है तथा मतभेदों को सुलझाना चाहता है।

राजनीति विज्ञान की परिभाषा: परम्परागत दृष्टिकोण

परम्परागत दृष्टिकोण में राजनीति शास्त्र को चार अर्थों में परिभाषित किया जाता है-
  1. राज्य के अध्ययन के रूप में
  2. सरकार के अध्ययन के रूप में
  3. राज्य और सरकार के अध्ययन के रूप में
  4. राज्य, सरकार और व्यक्ति के अध्ययन के रूप में

राजनीति विज्ञान की परिभाषा: आधुनिक दृष्टिकोण

राजनीति शास्त्र की नवीन परिभाषाओं के संदर्भ में इसका अध्ययन निम्न रूपों में किया जाता है -
  1. राजनीति शास्त्र मानवीय क्रियाओं का अध्ययन है।
  2. राजनीति शास्त्र शक्ति का अध्ययन है।
  3. राजनीति शास्त्र राजनीतिक व्यवस्था का अध्ययन है।
  4. राजनीति शास्त्र निर्णय प्रक्रिया का अध्ययन है।

राजनीति विज्ञान की प्रकृति 

राजनीति विज्ञान मूलतः समाज विज्ञानों के वर्ग में आता है। अतः यह प्राकृतिक विज्ञानों की तरह मात्र यथार्थवादी वस्तुनिष्ठ व मूल्य निरपेक्ष विज्ञान नहीं है। यद्यपि इसे राजनीति विज्ञान नाम से संबोधित किया गया है लेकिन विद्वान इस प्रश्न पर एकमत नहीं हैं कि क्या इस विषय को एक विज्ञान माना जाये। इस संबंध में गिलक्राईस्ट ने लिखा है कि ‘‘इस विषय (राजनीति विज्ञान) के विश्वस्तरीय, महानतम विद्वान अरस्तू ने राजनीति विज्ञान को सर्वोच्च विज्ञान कहा है।’’ किन्तु अनेक आधुनिक विद्वान राजनीति विज्ञान के विज्ञान होने के दावे का विरोध करते हैं। एक ओर बक्ल, काम्टे, मेटलेण्ड, एमास, बीयर्ड, ब्रोजन, बर्क आदि विचारक राजनीति विज्ञान को विज्ञान के रूप में स्वीकार नहीं करते हैं। वहीं दूसरी ओर अरस्तू ने इसे ‘‘सर्वोच्च विज्ञान’’ कहा है तथा बोदाँ, हाब्स, मान्टेस्क्यू, ब्राइस, ब्लंटशली, जेलिनेक, डाॅ. फाईनर तथा लास्की आदि अन्य विद्वान भी राजनीति विज्ञान को विज्ञान के रूप में स्वीकार करते हैं।

मेटेलेण्ड का कथन है - ‘‘जब मैं ‘राजनीति विज्ञान’ शीर्षक के अन्तर्गत परीक्षा प्रश्नों को देखता हूँ तो मुझे प्रश्नों के लिए नहीं अपितु शीर्षक के लिए खेद होता है।’’ बर्क का कथन है ‘‘जिस प्रकार हम सौन्दर्य शास्त्र को विज्ञान की संज्ञा नहीं दे सकते उसी प्रकार राजनीति शास्त्र को भी विज्ञान नहीं कहा जा सकता।’’

वस्तुतः राजनीति विज्ञान सामाजिक विज्ञानों की भाँति ही तथ्यात्मक एवं मूल्यात्मक दोनों ही है। इसमें कला एवं विज्ञान दोनों के ही लक्षण पाये जाते हैं।

1. राजनीति विज्ञान के विज्ञान होने के विरूद्ध तर्क -

(1) विज्ञान जैसे प्रयोग और पर्यवेक्षण संभव नहीं - प्राकृतिक विज्ञानों में किसी विषय के बारे में पहले पूर्वानुमान किया जाता है और फिर इस पूर्वानुमान की परिकल्पना का परीक्षण करने के लिए प्रयोग एवं पर्यवेक्षण की विधि अपनाई जाती है। किन्तु राजनीति विज्ञान में किसी विषय के बारे में पूर्वानुमान तो किया जा सकता है किन्तु इसकी जाँच के लिए प्रयोग एवं पर्यवेक्षण की विधि नहीं अपनाई जा सकती। एक प्राकृतिक वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशाला में विभिन्न प्रयोग कर सकता है और प्रयोग के दौरान पदार्थों की क्रियाओं का पर्यवेक्षण कर सकता है। उचित निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए वह अपने प्रयोग को बार-बार दोहरा भी सकता है। किन्तु राजनीति विज्ञान में ऐसी प्रयोगशाला का अभाव है और समाज में किसी राजनीतिक प्रयोग को केवल एक बार किया जा सकता है उसे बार-बार दोहराया नहीं जा सकता है।

(2) कार्य-कारण में सुनिश्चित संबंध का अभाव - प्राकृतिक विज्ञानों में कार्य व कारण के बीच एक सुनिश्चित संबंध होता है जैसे -यदि हम पानी को एक निश्चित तापमान तक गर्म करेंगे तो वह अवश्य ही वाष्प में परिवर्तित हो जायेगा किन्तु राजनीति विज्ञान में किसी भी कार्य अथवा घटना का ऐसा सुनिश्चित कारण दिखाई नहीं पड़ता।

(3) सर्वमान्य सिद्धान्तों का अभाव - प्राकृतिक विज्ञानों में सुनिश्चित और सर्वमान्य सिद्धान्त होते हैं किन्तु राजनीति विज्ञान में नहीं, राजनीति विज्ञान का मूलभूत विषय राज्य है किन्तु उसकी पद्धति के बारे में विद्वानों में अत्यधिक मतभेद हैं। एक ओर आदर्शवादी विद्वान राज्य को समस्त सद्गुणों का स्रोत मानते हैं तो दूसरी ओर अराजकतावादी विद्वान राज्य को अनैतिक एवं अन्याय का स्रोत मानते हैं और वे राज्य का अन्त करना चाहते हैं।

(4) शुद्ध नाप-तोल का अभाव - विज्ञान में पदार्थ की क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है, जिन्हें पूर्ण शुद्ध रूप से मापने के लिए विज्ञान के पास आधुनिकतम उपकरण होते हैं। किन्तु राजनीति विज्ञान में हम मानव के राजनीतिक विचारों एवं व्यवहारों का अध्ययन करते हैं, जिन्हें विभिन्न प्रकार की भावनायें, आवेग और संवेग प्रभावित करते हैं जिन्हें शुद्ध रूप से मापना संभव नहीं होता है।

(5) अध्ययन सामग्री की प्रकृति में अन्तर - प्राकृतिक विज्ञान की अध्ययन सामग्री जड़ पदार्थ है जिनमें चेतना नहीं होती किन्तु राजनीतिक विज्ञान की अध्ययन सामग्री मानव है, जो चेतनशील है और उसके व्यवहार में पदार्थों जैसी जड़ता और एकरूपता नहीं पाई जाती है।

(6) निश्चित व सटीक भविष्यवाणी का अभाव - विज्ञान के नियम सुनिश्चित होते हैं और उनके आधार पर भविष्य की घटना के बारे में निश्चित व सटीक भविष्यवाणी की जा सकती है। जैसे विज्ञान यह बता सकता है कि सूर्यग्रहण किस समय पड़ेगा एवं वह विश्व के किन-किन भागों में दिखाई देगा, किन्तु राजनीति विज्ञान में इस प्रकार की निश्चित भविष्यवाणी नहीं की जा सकती सिर्फ अनुमान लगाया जा सकता है। जैसे किसी भी आम चुनाव से पहले यह निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता कि किस राजनीतिक दल को कितने स्थान प्राप्त होंगे। इस संबंध में केवल अनुमान लगाया जा सकता है।

2. राजनीति विज्ञान के विज्ञान होने के पक्ष में तर्क -

राजनीति विज्ञान को विज्ञान मानने वाले विद्वानों का प्रमुख तर्क है कि राजनीति विज्ञान की प्राकृतिक विज्ञानों से तुलना करना अनुचित है, राजनीति विज्ञान मूलतः एक सामाजिक विज्ञान है और इस दृष्टि से विज्ञान होने के सभी प्रमुख लक्षण राजनीति विज्ञान में पाये जाते हैं। किसी भी निश्चित निष्कर्ष पर पहुंँचने के लिए ‘विज्ञान’ शब्द के वास्तविक अर्थ को समझना आवश्यक है। इस संबंध में गार्नर का यह कहना है ‘‘विज्ञान किसी विषय से संबंधित उस ज्ञान राशि को कहते हैं जो विधिवत् पर्यवेक्षण, अनुभव एवं अध्ययन के आधार पर प्राप्त की गई है और जिसके तथ्य परस्पर, संबद्ध, क्रमबद्ध तथा वर्गीकृत किये गये हैं।’’ राजनीति विज्ञान के विज्ञान होने के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये जाते हैं -

(1) क्रमबद्ध व व्यवस्थित ज्ञान - विज्ञान क्रमबद्ध, व्यवस्थित व वर्गीकृत होता है। राजनीति विज्ञान राज्य, सरकार, राजनीतिक संस्थाओं, धारणाओं व विचारधाराओं का ज्ञान इसी रूप में प्रकट करता है। यह राज्य की उत्पत्ति और विकास का क्रमबद्ध विवरण प्रस्तुत करता है और राजनीतिक विचारधाराओं का उनकी प्रकृतियों के आधार पर वर्गीकृत अध्ययन भी प्रस्तुत करता है। इस विषय के अध्ययन में तथ्यों एवं आंकड़ों का भी प्रयोग किया जाता है।

(2) सर्वमान्य सिद्धान्त - राजनीति विज्ञान में अनेक सर्वमान्य सिद्धान्तों का भी अस्तित्व है जैसे लार्ड एक्टन के इस कथन को सर्वसम्मति से स्वीकार किया जाता है कि ‘‘शक्ति भ्रष्ट करती है और सम्पूर्ण शक्ति सम्पूर्ण भ्रष्ट करती है।’’ इसी तरह से इस तथ्य को भी स्वीकारा जाता है कि व्यक्ति के सम्पूर्ण विकास के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ ही आर्थिक स्वतंत्रता भी जरूरी है।

(3) कार्य कारण में पारस्परिक संबंध - यद्यपि प्राकृतिक विज्ञानों की भाँति राजनीति विज्ञान में कार्य-कारण के बीच सुनिश्चित संबंध की स्थापना नहीं की जा सकती किन्तु विशेष घटनाओं के अध्ययन से कुछ सामान्य निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। जैसे - विभिन्न क्रान्तियों के अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि शासकों के दम्भपूर्ण व्यवहार, प्रशासनिक अकुशलता, राजनीतिक व आर्थिक भ्रष्टाचार, सामाजिक भेदभाव आदि से उत्पन्न जन असंतोष के कारण क्रान्तियों का जन्म होता है।

(4) पर्यवेक्षण तथा प्रयोग संभव - राजनीति विज्ञान में पर्यवेक्षण तथा प्रयोग सम्भव है। उदाहरणार्थ प्रयोग के आधार पर ही यह निष्कर्ष निकाला गया है कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों की स्थापना के लिए लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को अपनाना आवश्यक है। इसी प्रकार विभिन्न राज्यों के कार्यक्षेत्र के आधार पर यह परिणाम निकाला जा सकता है कि राज्य के कार्यक्षेत्र को सीमित रखने के स्थान पर लोक कल्याणकारी राज्य की नीति ही उपयुक्त है। राजनीति विज्ञान में प्रयोग भी किये जा सकते हैं किन्तु ये प्रयोग प्राकृतिक विज्ञानों से भिन्न प्रकार के होते हैं। प्राकृतिक विज्ञान में एक निश्चित प्रयोगशाला होती है। जबकि राजनीति विज्ञान में सम्पूर्ण मानव समाज ही एक प्रयोगशाला होता है।

गार्नर का कथन है, ‘‘प्रत्येक नये कानून का निर्माण, प्रत्येक नई संस्था की स्थापना और प्रत्येक नई नीति की शुरूआत एक प्रयोग है क्योंकि उस समय तक उसे एक अस्थाई प्रावधान के रूप में स्वीकारा जाता है जब तक कि उसके परिणाम उसे स्थाई रूप देने के पक्ष में प्रकट न हों।

(5) भविष्यवाणी की क्षमता - यद्यपि अनेक प्राकृतिक विज्ञानों की भाँति राजनीति विज्ञान में एक सुनिश्चित भविष्यवाणी किया जाना संभव नहीं है किन्तु इसमें अनुमान के रूप मंे ऐसी भविष्यवाणी की जा सकती है जो लगभग सत्य के निकट हो। डाॅफाईनर के शब्दों में ‘‘हम निश्चिततापूर्ण भविष्यवाणियाँ नहीं कर सकते लेकिन संभावनायें तो व्यक्त कर ही सकते हैं।’’ यदि भविष्यवाणी की सत्यता को ही विज्ञान होने की कसौटी माना जाये तो प्रकृति विज्ञान को भी विज्ञान नहीं कहा जा सकता क्योंकि उनके द्वारा मौसम संबंधी की गई भविष्यवाणियाँ अनेक बार गलत सिद्ध होती हैं।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि राजनीति विज्ञान को विज्ञान मानने के संबंध में विद्वानों में मतभेद हैं। डी.डब्ल्यू ब्रोगन का कथन है, ‘‘जब तक राजनीति के क्षेत्र में डार्विन और मेण्डिल जैसे महारथी नहीं होंगे, जो राजनीति के अटल सिद्धान्त प्रस्तुत कर सकें, तब तक हम राजनीति को विज्ञान नहीं कह सकते’’ इस मत की आलोचना में सर फ्रेडरिक पोलक का कथन है, ‘‘यदि उनका अभिप्राय यह है कि इसमें ऐसे निश्चित नियम नहीं हैं जिसमें कोई प्रधानमंत्री, बहुमत को सदैव अपनी ओर बनाये रखने के अचूक उपाय जान सके तो उनका ऐसा कहना तथ्यात्मक दृष्टि से तो सही होगा किन्तु इससे यही प्रकट होता है कि वे वास्तविक रूप से यह नहीं जानते हैं कि विज्ञान क्या होता है।’’

एक सामाजिक विज्ञान के रूप में राजनीति विज्ञान यथार्थपरक विज्ञान के साथ ही आदर्शपरक विज्ञान भी है। राजनीति विज्ञान के अध्ययन में वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग संभव है और अन्य सामाजिक विज्ञानों की भाँति राजनीति विज्ञान में भी कार्य व कारण के पारस्परिक संबंधों की तर्कपूर्ण व विश्वसनीय व्याख्या संभव है।

राजनीति विज्ञान एक कला के रूप में

कला का अर्थ- कला वह ज्ञान है जो व्यक्ति के जीवन को सुंदर बनाता है इस अर्थ में राजनीति विज्ञान भी एक कला है क्योंकि राजनीति विज्ञान विषय का ज्ञान मनुष्य को अच्छा नागरिक बनाता है।

राजनीति विज्ञान अपनी प्रकृति से एक कला भी है। प्राचीन काल से ही बृहस्पति, मनु, शुक्र, कौटिल्य आदि भारतीय राज शास्त्रियों ने इसे शासन की एक कला के रूप में मान्यता दी है और प्लेटो जैसे प्राचीन यूनानी विद्वान ने भी अपने ग्रंथ ‘‘स्टेट्समेन’’ में राजनीति को शासन की एक श्रेष्ठ कला के रूप में चित्रित किया है। किसी भी विद्या को कला होने के लिए उसमें दो लक्षणों को होना आवश्यक है, प्रथम उस विषय के सैद्धान्तिक ज्ञान को व्यवहार में लागू करना संभव हो तथा द्वितीय वह विषय मूल्यात्मक हो ताकि वह जीवन को अधिक सुखमय बना सके। राजनीति विज्ञान में यह दोनों ही लक्षण पाये जाते हैं। अतः वह विज्ञान होने के साथ-साथ एक कला भी है। राजनीति विज्ञान अपने सैद्धान्तिक ज्ञान का प्रयोग शासन कला के रूप में करता है और प्रशासनिक संगठन के द्वारा अपनी सैद्धान्तिक नीतियों को लागू करता है। इन प्रयत्नों के पीछे एक मूल्यात्मक उद्देश्य रहता है और वह है मानव के जीवन को अधिक सुखमय बनाना। यह केवल उतना ही अध्ययन नहीं करता कि अतीत में राजनैतिक जीवन कैसा रहा है बल्कि यह अध्ययन भी करता है कि वह वर्तमान में कैसा है और उसे कैसा होना चाहिए। इन आदर्शों और मूल्यों को क्रियान्वित करने के लिए राजनीति विज्ञान अनेक व्यावहारिक प्रयत्न भी करता है। अतः वह एक कला है।

एक न्याय पूर्ण व अपराध मुक्त समाज की स्थापना के लिए प्लेटो से लेकर आज तक अनेक विद्वानों ने अपनी विचारधारायें प्रस्तुत की हैं और राजनीतिक सिद्धान्तों को लागू करने का प्रयत्न किया है। मानव जीवन को अधिक सुखमय बनाने के लिए ही राजनीति विज्ञान मंे ‘लोक कल्याणकारी राज्य’ के सिद्धान्त को स्वीकारा गया है। राजनीति विज्ञान सम्पूर्ण समाज के हित की कामना करता है। अतः वह अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति पर बल देते हुए राष्ट्रों के बीच शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व व सद्भाव की नीति के आदर्श को स्वीकारता है और इसी उद्देश्य की प्राप्ति हेतु संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की गई है।

अपनी प्रकृति से राजनीति विज्ञान एक विज्ञान व कला दोनों ही है। हालांकि यह एक प्राकृतिक विज्ञान नहीं है किन्तु सामाजिक विज्ञान अवश्य है। अपने उद्देश्यों एवं कार्यों की दृष्टि से यह एक श्रेष्ठ कला भी है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि जब राजनीति विज्ञान अपने विषय का केवल सैद्धान्तिक अध्ययन करता है तब तक यह विज्ञान होता है, जब राजनीति विज्ञान इन सिद्धान्तों को मानव जीवन के सुख मंे वृद्धि करने के लिए लागू करता है तब यह एक कला होता है।

राजनीति विज्ञान का अध्ययन क्षेत्र

राजनीति विज्ञान के क्षेत्र का पर्याय इसकी विषय-वस्तु है, परन्तु राजनीति विज्ञान के क्षेत्र के विषय-वस्तु पर राजनीतिक वैज्ञानिक एकमत नहीं है। सभ्यता, संस्कृति तथा विकासशीलता के कारण राजनीति विज्ञान का क्षेत्र परिवर्तनशील रहा है। इस प्रकार राज्य, सरकार और मानव तीनों ही राजनीति विज्ञान के अध्ययन की विषय वस्तु हैं। इन तीनों में से किसी एक के बिना भी राजनीति विज्ञान के क्षेत्र को पूर्णत्व प्राप्त नहीं हो सकता। उपर्युक्त विवेचन के आधार पर राजनीति विज्ञान के अध्ययन क्षेत्र में सम्मिलित विषय सामग्री है-
  1. राज्य का अध्ययन 
  2. सरकार का अध्ययन 
  3. मनुष्य का अध्ययन 
  4. संघों एवं संस्थाओं का अध्ययन 
  5. अन्तर्राष्ट्रीय कानून एवं संबंधों का अध्ययन 
  6. वर्तमान राजनीतिक समस्याओं का अध्ययन 

1. राज्य का अध्ययन 

राजनीति विज्ञान के अध्ययन का प्रमुख तत्व राज्य है, क्योंकि डॉ. गार्नर ने तो यहाँ तक लिखा है, ‘‘राजनीति विज्ञान के अध्ययन का आरंभ और अंत राज्य के साथ होता है।’’ प्रो. लास्की ने कहा है- ‘‘राजनीति विज्ञान के अध्ययन का संबंध संगठित राज्यों से संबंधित मानव-जीवन से है।’’ गिलक्राइस्ट ने लिखा है- ‘‘राज्य क्या है? राज्य क्या रहा है? और राज्य क्या होना चाहिए?’’ राजनीति विज्ञान यह बताता है। 

अत: स्पष्ट है कि राजनीति विज्ञान में राज्य के अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों कालों का ही अध्ययन किया जाता है, जिसका विवेचन निम्नवत् है-

1. राज्य का अतीत या ऐतिहासिक स्वरूप- राज्य के सही अध्ययन के लिए राज्य के अतीत या उसके ऐतिहासिक स्वरूप को जानना आवश्यक है, क्योंकि अतीत में राज्य को ‘नगर-राज्य’ कहा जाता था और राज्य में ईश्वर का अंश मानते हुए उसे ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था। राजा की आज्ञा सर्वोपरि कानून थी। इस प्रकार राज्य के पास असीमित शक्तियाँ थीं, परन्तु धीरे-धीरे नगर राज्यों के आकार में वृद्धि होती गयी और राज्य संबंधी विचारधाराओं में भी परिवर्तन होता रहा। 

राज्य के अतीत के अध्ययन में राज्य की उत्पत्ति, उसके संगठन, उसके आधारभूत तत्वों, यूनानी शासन-व्यवस्था, प्रजातान्त्रिक विचारों का विकास, राजनीतिक क्रान्तियाँ, उनके कारण और परिणाम, राज्य के सिद्धांत, उद्देश्य एवं प्रभुसत्ता का ऐतिहासिक स्वरूप आदि सम्मिलित हैं और ये तत्व ही राजनीति विज्ञान के अध्ययन की विषय वस्तु है जिनका परिणाम राज्य का वर्तमान स्वरूप है।

2. राज्य का वर्तमान स्वरूप- राज्य का वर्तमान स्वरूप, उसके अतीत के क्रमिक विकास का ही परिणाम है, जो कि प्राचीन ‘नगर-राज्यों’ की सीमाओं में वृद्धि हो जाने के कारण ही संभव हो सका। उन्होंने ‘राष्ट्रीय राज्यों’ का रूप धारण कर लिया है और इससे भी अधिक अब तो ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना के आधार पर सम्पूर्ण विश्व के लिए ही एक राज्य अर्थात् ‘विश्व राज्य’ की कल्पना की जाने लगी है। इसीलिए विदेश नीति, अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाएँ एवं अन्र्तराष्ट्रीय सन्धि एवं समझौते भी राजनीति विज्ञान के अध्ययन की विषय वस्तु बन गये हैं। आधुनिक युग में राज्य को एक लोक-कल्याणकारी संस्था माना जाता है। अत: आज मानव-जीवन का को भी ऐसा पक्ष नहीं है, जो किसी न किसी रूप में राज्य के संपर्क में न आता हो। इसीलिए मानव व सामाजिक जीवन को सुखी बनाने और उसके सर्वांगीण विकास हेतु राज्य द्वारा किये गये कार्यों का अध्ययन व राजनीति विज्ञान के अध्ययन के क्षेत्र में सम्मिलित है।

3. राज्य की भविष्य या भावी स्वरूप- राज्य के अतीत के आधार पर वर्तमान के आधार पर राज्य के भावी आदर्श एवं कल्याणकारी स्वरूप की कल्पना की जाती है। इस प्रकार वर्तमान सदैव ही सुधारों का काल बना रहता है। अतीत एवं वर्तमान की त्रुटियों एवं असफलताओं के दुष्परिणाम के अनुभवों से भविष्य का पथ प्रशस्त होता है। इन अनुभवों के आधार पर ही राज्य के भावी आदर्श स्वरूप के निर्धारण में इस प्रकार की व्यवस्थाएँ करने का प्रयास किया जाता है कि अतीत औ वर्तमान की समस्त उपलब्धियाँ तो राज्य के आधार के रूप में बनी रहें, परन्तु त्रुटियों एवं असफलताओं की पुनरावृत्ति न हो। राज्य के अतीत और वर्तमान स्वरूप के अध्ययन के आधार पर ही विभिन्न राजनीतिक विचारकों द्वारा एक आदर्श राज्य के स्वरूप की भिन्न-भिन्न रूपरेखाएँ प्रस्तुत की ग हैं। इस प्रकार राजनीति विज्ञान राज्य के एक श्रेष्ठ, सुखद, कल्याणकारी एवं आदर्श स्वरूप की कल्पना करता है।
      उपर्युक्त विवेचना से स्पष्ट है कि राजनीति विज्ञान का अध्ययन, राज्य के अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों ही कालों से घनिष्ठ रूप में संबंधित है।

      2. सरकार का अध्ययन 

      राज्य के अध्ययन के साथ ही साथ राजनीति विज्ञान में राज्य के अभिन्न अंग सरकार क भी अध्ययन किया जाता है। प्राचीन काल में जहां निरंकुश राजतन्त्र थे, वहाँ आज लोकतान्त्रिक सरकारें हैं। इस समय राजा की आज्ञा ही सर्वोपरि कानून थी, परन्तु आज सरकार के तीनों अंगों (व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका) में शक्ति- पृथक्करण का सिद्धांत क्रियाशील है और राजा की आज्ञा कानून न होकर लोकतांत्रिक सरकारों की वास्तविक शक्ति जनता में निहित है।

      3. मनुष्य का अध्ययन 

      मनुष्य, राज्य की इकाई है। मनुष्यों के बिना राज्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती, अत: मनुष्य राजनीति विज्ञान के अध्ययन का प्रमुख तत्व है। मनुष्य का सर्वांगीण विकास एवं कल्याण करना ही राज्य का प्रमुख कर्तव्य हैं परन्तु जहाँ नागरिकों के प्रति राज्य के कर्तव्य होते है वहा राज्य के प्रति नागरिकों के भी कर्तव्य होते हैं। आदर्श नागरिक ही राज्य को आदर्श स्वरूप प्रदान कर सकते हैं और उसकी प्रगति में योगदान कर सकते हैं।

      4. संघों एवं संस्थाओं का अध्ययन 

      प्रत्येक राज्य में अनेक समाजोपयोगी संस्थाएं होती है, जो नागरिकों के उत्थान एवं विकास के लिए कार्य करती हैं। इन संस्थाओं में राज्य एक सर्वोच्च संस्था होती है और अन्य सभी संस्थाएँ राज्य द्वारा ही नियन्त्रित होती हैं।

      5. अन्तर्राष्ट्रीय कानून एवं संबंधों का अध्ययन 

      आधुनिक युग में को भी राष्ट्र पूर्णत: स्वावलम्बी नहीं है। विश्व के समस्त राष्ट्र किसी न किसी न रूप में एक-दूसरे पर निर्भर हैं। इस पारस्परिक निर्भरता के कारण ही आज एक राष्ट्र की घटना से अन्य राष्ट्र भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। इस प्रकार विश्व के विभिन्न राष्ट्रों की पारस्परिक निर्भरता ने उन्हें एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप में संबंध कर दिया है। यातायात एवं संचार-साधनों के माध्यम से आज समस्त राष्ट्र एक दूसरे के बहुत ही निकट आ गये हैं और उनमें परस्पर विभिन्न प्रकार के संबंध स्थापित हो गये हैं। अतएव विश्व के समस्त राष्ट्रों के पारस्परिक, सांस्कृतिक, व्यापारिक, राजनयिक एवं अन्य विभिन्न प्रकार के अंतराष्ट्रीय संबंध, राजनीति विज्ञान के अध्ययन के प्रमुख विषय बन गये हैं।

      6. वर्तमान राजनीतिक समस्याओं का अध्ययन 

      वर्तमान राजनीतिक समस्याओं का अध्ययन राजनीति विज्ञान का प्रमुख विषय है। प्रत्येक राष्ट्र में, चाहे वहाँ शासन प्रणाली किसी भी प्रकार की क्यों न हो, स्थानीय या राष्ट्रीय स्तर की अनेक समस्याएँ उत्पन्न होती ही रहती हैं। उदाहरणार्थ, भारत इस समय सम्प्रदायवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद, एवं भाषावाद जैसी अनेक समस्याओं से ग्रसित है। इसी प्रकार विश्व के अन्य देश भी अपनी-अपनी समस्याओं से जूझ रहे हैं। इस प्रकार, विभिन्न राष्ट्रों की स्थानीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की समस्त राजनीतिक समस्याओं का अध्ययन राजनीति विज्ञान के अध्ययन में सम्मिलित है।

      निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है कि अब राजनीति विज्ञान के क्षेत्र में समुदाय, समाज, श्रमिक, संगठन, राजनीतिक दल, दबाव समूह और हित समूह आदि का अध्ययन भी सम्मिलित है, इसके साथ ही साथ आधुनिक व्यवहारवादी दृष्टिकोण की नूतन प्रवृत्तियों ने स्वतंत्रता, समानता और लोकमत जैसी नवीन अवधारणाओं तथा मानव-जीवन के अराजनीतिक पक्षों को भी उसकी विषय वस्तु में सम्मिलित करके राजनीति विज्ञान के क्षेत्र को अत्यधिक व्यापक बना दिया है।

      वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डालते हुए रॉबर्ट ए. डहल ने लिखा है, ‘‘राजनीति आज मानवीय अस्तित्व का एक अपरिहार्य तत्व बन चुकी है। प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी रूप में किसी न किसी प्रकार की राजनीतिक व्यवस्था से संबंद्ध होता है।’’

      Bandey

      मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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