शब्द और पद में अंतर

शब्द किसे कहते हैं

वर्णों के सार्थक मेल को ही शब्द कहते हैं। शब्द कैसे बनते हैं? इसका कोई नियम नहीं है। भाषा वैज्ञानिकों ने अलग-अलग सिद्धात प्रतिपादित किए हैं परंतु सर्वमान्य नियम कोई नहीं है। कुछ शब्द सप्रयास बनाए जाते हैं अर्थात उपसर्ग-प्रत्ययों आदि व्याकरणिक प्रयोगों से। जैसे-आदर, निरादर, सादर आदि। कुछ शब्द एक से अधिक अर्थ दे जाते हैं जिन्हें हम अनेकार्थी कहते हैं तो कभी-कभी एक ही अर्थ के लिए अनेक शब्द होते हैं। जैसे- ‘कमल’ के फूल के लिए जलज, नीरज, अंबुज, पंकज आदि। इस प्रकार शब्दों के अनेक भेद-उपभेद-प्रभेद हो जाते हैं।
एक उदाहरण द्वारा इसे समझें। ‘रौनक पुस्तक पढ़ता है’ इस वाक्य में चार शब्द हैं रौनक, पुस्तक, पढ़ता और है। ‘रौनक’ एक नाम है और इसमें तीन वर्ण नशर आ रहे हैं र, न, क, अब इनका संयोजन इस प्रकार किया गया कि हमको यह एक अर्थ दे रहे हैं। परंतु क्या ‘नकरौ’ से कुछ अर्थ प्राप्त होता है? निश्चित रूप से नहीं। 

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि शब्दों की संरचना किसी वस्तु के विशेष गुण, धर्म, स्वभाव, वृत्ति, देश, काल आदि के अनुसार होती है। समाज प्रतिदिन अपने हिसाब से शब्दों का निर्माण नहीं कर सकता वर्ना सबका अपना ही शब्दकोश हो जाएगा। शब्दों का अर्थ होना चाहिए और बहुसंख्यक समाज उसे स्वीकार भी करें। यही कारण है कि शब्दों को सार्थक और निरर्थक कहा गया है।

पद किसे कहते हैं

ध्वनियों के सार्थक समूह को शब्द कहते हैं और वाक्य में प्रयुक्त शब्द को पद कहते हैं। या यूँ कहें शब्द के व्यावहारिक रूप को पद कहते हैं। इस प्रकार जितने शब्द होते हैं, उतने ही प्रकार के पद हो जाते हैं। प्रयोग के आधार पर एक ही शब्द ‘संज्ञा पद’ भी हो सकता है और विशेषण पद भी। जैसे- (1) जागृत एक अच्छा छात्रा है। (विशेषण पद) (2) अच्छों के साथ रहो। (संज्ञा) यहाँ शब्द ‘अच्छा’ ही है परंतु प्रयोग में भिन्नता है, पर हैं दोनों एक ही।

शब्द और पद में अंतर

(क) पद बनने से पहले शब्द में कोई न कोई प्रत्यय अवश्य जुड़ जाता है। जैसे- लड़की विद्यालय जाती है।

इस वाक्य में ‘लड़की’ कर्ता भी है और संज्ञा भी, इसमें कर्ता कारक का शून्य परसर्ग जुड़ा हुआ है। यह ‘जाती’ है क्रिया का कर्ता भी है। इसका लड़का, लड़के, लड़की आदि प्रत्ययों से भी रूप बन सकता है।

(ख) शब्द को जब वाक्य में प्रयुक्त किया जाता है तो वाक्य में लिंग, वचन, काल, विभक्ति, पुरुष, वाच्य आदि पद पर प्रभाव डालकर उसके रूप को निर्धारित करते हैं। अर्थात शब्द के वाक्य में आते ही अनेक व्याकरणिक बिंदु उससे चिपक जाते हैं और एक निश्चित रूप प्रदान कराते हैं। जैसे- यह मेरी पुस्तक है।

इस वाक्य में ‘यह’ सर्वनाम है एकवचन है, पुल्लिंग है। इस शब्द से इन तीनों व्याकरणिक बिंदुओं ने जुड़कर ही इसे पद बना दिया है। 

(ग) शब्द का अर्थ शब्दकोश में देखा जा सकता है। शब्द का अर्थ निश्चित होता है, परंतु पद बनने पर उसका अर्थ प्रसंगानुवूफल व प्रयोग पर आधारित हो जाता है। अर्थात वाक्य में आकर शब्द अपना अर्थ स्वयं निर्धारित नहीं कर सकता, वह और शब्दों पर निर्भर हो जाता है। जैसे- (1) मित्तल सीध व्यापारी है। (2) सीधे-सीधे चलो।

प्रथम वाक्य में ‘सीध’ स्वभाव है, तो दूसरे में ‘सीधे’ का अर्थ ‘रास्ते’ से है अतः पद अपना अर्थ वाक्य में प्रयुक्त होने पर देते हैं। (घ) यहाँ एक बात ध्यान रखने योग्य यह है कि पद बनने पर केवल विकारी (संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण व क्रिया) शब्दों में ही परिवर्तन होता है। अविकारी (क्रिया विशेषण, संबंध्बोध्क, समुच्चयबोधक, विस्मयादिबोध्क) शब्दों के रूप में कोई परिवर्तन नहीं होता।  जैसे- 
    संज्ञा - लड़का, लड़के, लड़की
    सर्वनाम - मैं, मुझे, मेरा, मुझको
    विशेषण - बुरा, बुरी, बुरे
    क्रिया - चल, चलो, चलना, चलता

शब्द और पद में अंतर को जानिए

क्र.सं.शब्दपद
1.वर्णों से शब्द बनते हैं।शब्दों के पद बनते हैं।
2.शब्द स्वतंत्र रूप में आते हैं।पद अन्य शब्दों के साथ ही प्रयुक्त होते हैं। 
पद अकेले नहीं आ सकते।
इनका स्वतंत्र प्रयोग नहीं होता। 
3.शब्द का मूल स्वरूप कायम रहता है। एक शब्द में प्रत्यय जोड़कर अनेक शब्द बनाए जा सकते हैं।
जैसे- खा, खाना, खाया, खाकर, खाए आदि।
4.शब्द का मूल अर्थ एक होता है। वाक्य में प्रसंगानुसार एक ही शब्द के अनेक अर्थ हो सकते हैं।
जैसे- कर, मत, जल आदि। 
5.शब्द के साथ व्याकरण के नियम नहीं जुड़ते। पद के साथ व्याकरण के अनेक नियम जुड़ जाते हैं जैसे वाक्य में बच्चे-संज्ञा, जातिवाचक बहुवचन आदि।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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