विकारी शब्द और अविकारी शब्द किसे कहते हैं ?

भाषा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंग है भाषा का प्रयोग। वर्णों के मेल से शब्द बनते हैं और शब्दों का सार्थक समूह वाक्य कहलाता है, अतः शब्दों को व्याकरण की दृष्टि से दो भागों में बाँटा जाता है- विकारी शब्द और अविकारी शब्द।

विकारी शब्द

जिन शब्दों का रूप लिंग, वचन और कारक के कारण परिवर्तित हो जाता है। विकारी अर्थात जिनमें विकार आ जाए, जो बदल जाए। विकारी शब्द वे शब्द होते हैं जो बाहरी प्रभाव से बदल जाते हैं जैसे- बूढ़ा से बुढ़ापा, बुढि़या आदि शब्द बन सकते हैं अर्थात इनमें विकार आ सकता है। उसे विकारी शब्द कहते हैं।

विकारी  शब्द के प्रकार

विकारी शब्द चार प्रकार के होते हैं-
  1. संज्ञा, 
  2. सर्वनाम, 
  3. क्रिया, 
  4. विशेषण। 

1. संज्ञा 

अर्थात नाम। किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान अथवा भाव के नाम को संज्ञा कहते हैं- जैसे- मानव दिल्ली में रहता है। वह कार से विद्यालय जाता है। इन वाक्यों में मानव व्यक्ति का, दिल्ली स्थान का और कार वस्तु का नाम है। संज्ञा के मुख्य रूप से तीन भेद होते हैं- 
  1. व्यक्तिवाचक, 
  2. जातिवाचक तथा 
  3. भाववाचक संज्ञा। 
समूहवाचक और द्रव्यवाचक संज्ञा जातिवाचक संज्ञा के ही भेद हैं।

1. व्यक्तिवाचक संज्ञा - जिस शब्द से किसी एक विशेष व्यक्ति वस्तु, स्थान या प्राणी का बोध होता है, उन्हें व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं- उदाहरणतया -

1. व्यक्तियों के नाम - राम, कृष्ण, गांधी विवेकानंद मोहन, रमा, गीता, सीता।
2. स्थान या देशों का नाम -  दिल्ली, मुंबई, भारत, अमेरिका, रूस, चीन, जापान।
3. नदियों के नाम - गंगा, यमुना, सिंधु, नर्मदा, महानदी, गोदावरी आदि।
4. शहरों के नाम - रायपुर, बिलासपुर, ग्वालियर, पटना, नागपुर, जयपुर आदि।
5. पुस्तकों के नाम  - रामायण, महाभारत, राचरितमानस, जेन्दावेस्ता, कुरान, कामायनी, गोदान, बाइबिल।

 

2. जातिवाचक संज्ञा - जिन शब्दों से किसी प्राणी पदार्थ या समूह की जाति का बोध होता है। यथा -

क. मनुष्य जाति - आदमी, औरत, लड़का, लड़की, भाई-बहिन, माता-पिता, पत्नी।
ख. वस्तुएं - पुस्तक घर मशीन, कलम, टेबिल, फेन आदि।
ग. पशु-पक्षी - गाय, बैल, कुत्ता, शेर, बंदर, तोता, मैना, चिडियां आदि।
घ. पद या व्यवसाय - प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, शिक्षामंत्री सचिव, शिक्षा, वाणिज्य, व्यापारी, लेखक, खिलाड़ी आदि।

 

3. द्रव्य वाचक संज्ञा या पदार्थ वाचक संज्ञा - वे द्रव्य पदार्थ, जिन्हें हम नाप या तौल सकते हैं, पर गिन नहीं सकते वे द्रव्य वाचक कहे जाते हैं।

क. धातुओं के नाम - सोना, चांदी, पीतल, कांसा, लोहा, आदि।
ख. खाद्य वस्तुएं - दूध, पानी, तेल, घी आदि।
ग. पदार्थ हवा, गैस, मुख्यमंत्री, शिक्षामंत्री सचिव, शिक्षा, वाणिज्य, व्यापारी, लेखक, खिलाड़ी आदि।

 

4. समूह वाचक - समूह वाचक संज्ञा से एक ही जाति के व्यक्तियों का समूह-दाल, गिरोह, समूह, झुण्ड, सेना, मेला, कक्षा, पुलिस।

क. वस्तुओं का समूह - गुच्छा, पूंज मंडल।

 

5. भाववाचक संज्ञा - भाववाचक संज्ञा से उन गुणों का बोध होता है, जिनका अनुभव हमारा मन या हृदय कर सकता है, किन्तु हम उन्हें न तो स्पर्श कर सकते हैं, न देख सकते हैं, वे भाव-वाचक संज्ञा कहलाते हैं - यथा - प्रेम, क्रोध, शत्रुता, मिठास, द्वेष मित्रता, ईमानदारी आदि। शिक्षामंत्री सचिव, शिक्षा, वाणिज्य, व्यापारी, लेखक, खिलाड़ी आदि।

2. सर्वनाम 

संज्ञा के बदले में आने वाले शब्दों को सर्वनाम कहते हैं। सर्वनाम का शाब्दिक अर्थ है - सबका नाम। जब संज्ञा के स्थान पर संज्ञा के लिए ही किसी और शब्द का प्रयोग किया जाता है तो उसे सर्वनाम कहते हैं, जैसे उपर्युक्त वाक्य में वह शब्द मानव के लिए आया है अर्थात वह के स्थान पर मानव भी लिखा जा सकता था, अतः संज्ञा मानव के स्थान पर आने के कारण इसे सर्वनाम कहते हैं। 

सर्वनाम के छह भेद होते हैं- 
  1. पुरुषवाचक, 
  2. निश्चयवाचक, 
  3. अनिश्चयवाचक, 
  4. प्रश्नवाचक, 
  5. संबंध्वाचक तथा 
  6. निजवाचक सर्वनाम।
1. पुरुषवाचक सर्वनाम - ये सर्वनाम पुरुषों के बदले आते हैं, यहां पुरुष शब्द से श्पुरुष्य तथा स्त्री दोनों का ही बोध होता है - पुरुषवाचक सर्वनाम तीन प्रकार के होते हैं-
  1. उत्तम पुरुष या प्रथम मैं, हम
  2. मध्यम पुरुष तू, तुम आप
  3. अन्य पुरुष वह, वे आप, यह ये
2. निजवाचक सर्वनाम - निजवाचक सर्वनाम का प्रयोग निज का अर्थ ज्ञान कराने के लिए होता है, जहाँ श्आप्य का प्रयोग कर्ता के रूप में आता है, वहां पुरुष वाचक सर्वनाम होता है, वहां वह स्वयं कार्य नहीं, करता, पर अपने विषय में कुछ संकेत का बोध करता है। वहां निजवाचक सर्वनाम होता है, यह कार्य उसने आप ही किया है। यहां आप खुद स्वयं निज का बोधक है।

3. निश्चयवाचक - यह सर्वनाम किसी निश्चित वस्तु का ज्ञान कराते हैं, उसे निश्चय वाचक सर्वनाम कहते हैं। पास या दूर की वस्तु का ज्ञान कराने को आधार मानकर इसके दो भेद किये गये हैं। निकटवर्ती पदार्थ का वाचक सर्वनाम और दूरवर्ती पदार्थ का वाचक सर्वनाम ही है। किंतु ये निकटवर्ती एवं दूरवर्ती सर्वनाम है। निकट की वस्तु के लिए - यह गाय मेरी है। दूर की वस्तु के लिए - काम, करो, वह आवश्यक है।

4. अनिश्चयवाचक सर्वनाम - अनिश्चय वाचक सर्वनाम उसे कहते हैं, जिससे किसी निश्चित वस्तु का बोध नहीं होता है, जैसे - कोई गीत गा रहा है। उसे कुछ तो दे दो।

5. प्रश्नवाचक -  कौन? क्या प्रश्नवाचक सर्वनाम है उनका व्यक्तियों या वस्तुओं के संबंध में प्रश्न करने के लिए होता है- यथा - कौन, क्या, आदि।

6. संबंध वाचक - जिस सर्वनाम से वाक्य में किसी अन्य सर्वनाम या संज्ञा का संबंध बोध हो उसे संबंध वाचक सर्वनाम कहते हैं - जो, वे, सो आदि शब्द प्रधान वाक्य को आश्रित वाक्य से जोड़ते हैं- यथा -
  1. मैं वहीं करूंगा, जो तुम कहोगे।
  2. जो पढ़ता है वह अवश्य उत्तीर्ण होते हैं।
  3. यह वही मकान है, जो हरि ने खरीदा था।

3. क्रिया

जिस शब्द से किसी काम के करने या होने का बोध होता है। उसे क्रिया कहते हैं। जैसे- उपर्युक्त वाक्य में रहता है, जाता है-से किसी काम का होना पता चल रहा है, अतः ये क्रिया शब्द हैं। 

इसके मुख्य रूप से छह भेद होते हैं- 
  1. अकर्मक, 
  2. सकर्मक, 
  3. प्रेरणार्थक, 
  4. नामधतु, 
  5. द्विकर्मक तथा 
  6. संयुक्त क्रिया।
1. सकर्मक क्रिया - कुछ क्रियाएं ऐसी होती हैं जो कर्ता द्वारा संचालित भले ही हो, पर उसका प्रभाव कर्म पर ही पड़ता है। अतरू ऐसी क्रियाएं, जिनका कर्म हो या, जिनके साथ कर्म संभावित हो, या जिसके व्यापार का मुख्य रूप से कर्म प्रभाव हो, सकर्मक क्रियाएं हैं। यथा - राम रोटी खाता है। इस वाक्य में प्रयुक्त क्रिया खाता है, सकर्मक है, क्योंकि उसका एक कर्म है। रोटी खाने वाला मोहन है, परंतु उसकी क्रिया 'खाना' का फल रोटी पर पड़ता है। वह जाता है, यहां 'जाना' क्रिया सकर्मक है। इस वाक्य में यद्यपि कर्म का प्रयोग नहीं हुआ है किंतु कर्म के प्रयोग की आवश्यकता है। मैं पुस्तक पढ़ता हूं - इसमें पुस्तक, बच्चा और तू कर्म है और क्रिया पद का प्रभाव उन्हीं पर पड़ता है। मां ने बच्चे को सुला दिया। तू वहां क्यों चला आया।

2. अकर्मक क्रिया - ऐसी क्रियाएं जिसका प्रभाव या फल कर्ता पर पड़ता हो, या जिनके साथ कर्म नहीं आता हो, अकर्मक क्रियाएं कहलाती हैं। यथा -
  1. वह मेरे साथ गई थी।
  2. मेरा वहां जाना संभव नहीं था।
  3. वह रोता है।
उदाहरण के लिए - यहां प्रयुक्त रोना क्रिया अकर्मक है, क्योंकि इस वाक्य में न तो कर्म है, और न ही उसके प्रयोग की आवश्यकता ही होती है। रोना क्रिया का फल कर्ता वह पर ही पड़ रहा है।

4. विशेषण

संज्ञा और सर्वनाम की विशेषता बताने वाले शब्दों को विशेषण कहते हैं,। प्रत्येक प्राणी या पदार्थ अपने में कुछ विशिष्टता लिये होता है, उस विशेषता को बताने के लिए जिन शब्दों का विधान या प्रयोग किया जाता है, व्याकरण और भाषा विज्ञान में वे विशेषण कहलाते हैं।। जिस शब्द से संज्ञा या सर्वनाम शब्द की विशेषता का पता चलता है, उसे विशेषण कहते हैं, जैसे- समीर गोरा, लंबा और सुंदर बच्चा है। इस वाक्य में समीर और बच्चा संज्ञा शब्द हैं और गोरा, लंबा, सुंदर शब्दों के द्वारा उसकी विशेषता का पता चल रहा है, अतः इन शब्दों को विशेषण कहा जाएगा। 

इसके मुख्य रूप से चार भेद होते हैं- 
  1. गुणवाचक, 
  2. संख्यावाचक, 
  3. परिमाणवाचक और 
  4. सार्वनामिक विशेषण।
1. सार्वनामिक विशेषण-ऐसे सर्वनाम जो विशेषण के रूप में प्रयुक्त किये जाते है, उन्हें सार्वनामिक विशेषण कहा जाता है। हिन्दी में पुरुषवाचक तथा निजवाचक सर्वनाम को छोड़कर शेष का प्रयोग विशेषण के रुप में होता है। इन शब्दों का जब एकाकी रुप में प्रयोग होता है, तब तो, ये सर्वनाम होते हैं, परन्तु जब इनके साथ जब संज्ञा शब्द भी आते हैं, तो ये विशेषण का काम करते हैं। जैसे वह-नौकर, कोई राजा, क्या नहीं, कोई, कुछ यह, वह, कौन, जो, सो, जैसा, कैसा, इतना, उतना, आदि सार्वनामिक विशेषण के उदा. हैं। वस्तुत: ऐसे शब्द सर्वनाम और विशेषण दोनों का ही कार्य करते हैं। जब क्रिया के पूर्व इन शब्दों का प्रयोग होता है, तब से सर्वनाम होते हैं, और जब उनका प्रयोग किसी संज्ञा के साथ होता है, तब उन्हे विशेषण कहा जाता है- जैसे -
  1. वह पढ़ रही है - वह लड़की पढ़ रही है
  2. यह देखो - यह कलम देखो।
  3. वह सच बोलने से इतना घबराता क्यों है -
2. संख्यावाचक विशेषण - संख्यावाचक विशेषण के द्वारा, संज्ञा या सर्वनाम की संख्या का ज्ञान होता है। संज्ञा या सर्वनाम की संख्यात्मक विशेषता स्पष्ट करने के कारण ही संख्यावाचक विशेषण कहा जाता है-जैसे दस हाथी, चार घोड़े सब अध्यापक, कुछ बच्चे। संख्यावाचक विशेषणों के प्रयोग में सतर्कता बरतनी चाहिए। गणित के अंको का प्रयोग ठीक है, किन्तु भाषा के अंकों को अक्षरों में ही लिखा जाना चाहिए, और इस बात का ध्यान रखना चाहिए, कि अर्थ में भ्रम उत्पन्न न हो।

संख्यावाचक विशेषण के दो प्रकार होते हैं -
  1. निश्चित संख्यावाचक।
  2. अनिश्चित संख्यावाचक।
(क) निश्चित संख्यावाचक - निश्चित संख्या का बोध कराने वाले विशेषण को निश्चित संख्यावाचक विशेषण कहा जाता है। जैसे-चालीस रुपये, पंद्रह लड़कियाँ।

(ख) अनिश्चित संख्यावाचक - संज्ञा या सर्वनाम की निश्चित संख्या का बोध न कराने वाले विशेषण को अनिश्चित विशेषण कहा जाता हैं। जैसे-कुछ गुलाब, सब अध्यापक, दस-बीस रोटियाँ।

3. गुणवाचक विशेषण - जिस शब्द से संज्ञा या सर्वनाम का गुण स्पष्ट होता है, उसे गुण वाचक विशेषण कहते हैं। गुण के अन्तर्गत, संज्ञा या सर्वनाम के रुप, रंग, स्थान, स्वभाव आदि स्थितियों का स्पष्टीकरण होता है। गुण से आशय, अच्छे और बुरे दोनों से है। जैसेरू- सुंदर पुरुष, गरीब किसान, दुष्ट विद्यार्थी, काला घोड़ा, दुबली स्त्री, मोटा खिलाड़ी, सूखी नदी, अनुशासित बच्चे, संस्कारवान अध्यापक, बुरा सपना।

4. परिणाम वाचक विशेषण - जिन शब्दों के द्वारा परिणाम अर्थात माप-तौल इत्यादि का बोध बहोता हैं, उन्हें परिणाम वाचक विशेषण कहते हैं- जैसे-दो सेर गेहूँ, साढ़े तीन हाथ। एक चैपाई, दो तिहाई, आधा, एक दर्जन। बहुत थोड़ा, थोड़ा बहुत, बहुत अधिक।

5. व्यक्ति वाचक विशेषण - व्यक्तिवाचक संज्ञा से निर्मित विशेषणों को व्यक्ति वाचक विशेषण कहा जाता है। यथा-नागपूरी संतरे, बनारसी साड़ी, चंदेरी साड़ी, राजस्थानी पगड़ी, बंगाली मिठाई, बनारसी पान, कानपुरी चप्पलें।
प्रविशेषण रू- प्रविशेषण वे शब्द हैं, जो विशेषणों की विशेषता बतलाते हैं। यथा -
  1. शीतला अति विन्रम लड़की है - (श्अत्यि प्रविशेषण)
  2. रमेश बहुत अच्छा लड़का है - (अच्छा प्रविशेषण)
  3. वह अत्यंत परिश्रमी है - (अत्यंत)
  4. वह बड़ा होनहार है - (बड़ा)
  5. मैं पूर्णतरू स्वस्थ हूँ - (पूर्णतरू)
  6. मोहन बहुत चतुर है - (बहुत)
  7. वह शाम ठीक सात बजे आयेगा - (ठीक)

अविकारी शब्द

जिन शब्दों के रूप लिंग, वचन और कारक आदि के कारण परिवर्तित नहीं होते हैं, उन्हें अविकारी शब्द कहते हैं। अविकारी शब्द अपरिवर्तनीय शब्द हैं। ऐसे शब्द जिनमें कोई भी बदलाव नहीं आता और जो प्रत्येक दशा में एक जैसे रहते हैं, उन्हें अविकारी शब्द कहते हैं जैसे- धीरे-धीरे शब्द क्रियाविशेषण है और इसको धीरू-धीरू या धीरा-धीरा नहीं लिखा जा सकता। ये शब्द किसी भी लिंग या वचन में आएँ, एक जैसे रहेंगे। इनमें परिवर्तन नहीं हो सकता। 

अविकारी  शब्द के प्रकार

ये भी चार प्रकार के होते हैं- 
  1. क्रियाविशेषण, 
  2. संबंध्बोध्क, 
  3. समुच्चयबोध्क और 
  4. विस्मयादिबोध्क।

1. क्रियाविशेषण

जो अविकारी शब्द क्रिया की विशेषता बताते हैं, उन्हें क्रिया-विशेषण कहते हैं। जैसे - जैसे - वह धीरी-धीरे चलता है,  इसमें तेज, धीरे-धीरे, जल्दी-जल्दी क्रिया विशेषण हैं।। जो शब्द क्रिया की विशेषता को प्रकट करे अर्थात क्रिया कैसे की जा रही है यह बताए उसे क्रियाविशेषण कहते हैं जैसे- मीनाक्षी धीरे-धीरे चलती है। कैसे चलती है- धीरे-धीरे। अतः यह शब्द क्रियाविशेषण होगा। 

इसके चार भेद होते हैं- 
  1. कालवाचक, 
  2. रीतिवाचक, 
  3. स्थानवाचक और 
  4. परिमाणवाचक।
1. कालवाचक क्रिया-विशेषण - इसके द्वारा समय का ज्ञान होता है इसके तीन प्रकार है -
  1. समय वाचक - आज, कल, परसों, जब, तब सबेरे शाम तुरंत।
  2. अवधि वाचक- आजकल, नित्य, सदा, लगातार, दिन-भर, कब का
  3. पौने पुरुष वाचक- प्रतिदिन, एक दूसरे, तीसरे बार-बार बहुधा।

2. संबंधबोधक - 

जो संबंध बताए। जो शब्द संज्ञा या सर्वनाम शब्दों के बाद आकर उनका दूसरे शब्दों से संबंध स्पष्ट करें, उन्हें संबंधबोधक कहते हैं जैसे- सीता राम के बिना नहीं रह सकी, इन वाक्य में ‘के बिना’ शब्द संबंध स्थापित कर रहा है, अतः संबंधबोधक है।

1. संबंध सूचक अव्यय - संबंध सूचक वे अविकारी शब्द है, जो संज्ञा या सर्वनाम के अनंतर प्रयुक्त होता है, और वाक्य में आये हुए अन्य शब्दों के साथ उसका संबंध प्रकट करतें हैं। उदा. 
  1. सीता घर के बाहर है।
  2. बिना मेहनत के सफलता नहीं मिलती।
सम्बध सूचक के भेद - संबंध सूचक अव्यय का वर्गीकरण प्रयोग, अर्थ और व्युत्पत्ति के आधार पर अधोलिखित स्प में किया गया है -
  1. सम्बद्ध संबंध बोधक अव्यय - इसका प्रयोग वाक्य में संज्ञा की विभक्तियों के पश्चात् होता है। जैसे परिश्रम के बिना, पूजा के पहले, घर के बाहर, छत के ऊपर।
  2. अनुबद्ध संबंध बोधक - इसका प्रयोग वाक्य में संज्ञा के विकृत रुप के अनंतर प्रयुक्त होता है- जैसे मित्रों सहित, रुपयों सहित, दसवी तक।

3. समुच्चयबोधक

दो शब्दों, वाक्यांशों, या वाक्यों को परस्पर जोडने वाले, अविकारी शब्द समुच्चय बोधक अव्यय कहलाते हैं।
जैसे - वह गरीब हैं, किन्तु ईमानदार है, बादल गरजे, और बारिश होने लगी। वह परिश्रमी है, इसलिए सफल हैं। घंटी बजी और छुट्टी हो गयी।। योजक वे शब्द होते हैं जो दो शब्दों, वाक्यों या वाक्यांशों को आपस में मिलाते हैं जैसे- राम और सीता वन में गए, इस वाक्य में ‘और’ के द्वारा राम और सीता को मिलाया गया है। इसके दो भेद हैं- 
  1. समानाधिकरण बोधक अव्यय और 
  2. व्यधिकरण बोधक अव्यय।
1. समानाधिकरण समुच्चय बोधक - समानाधिकरण समुच्चय बोधक उन अव्ययों को कहते हैं, जो मुख्य वाक्यों या समान स्थिति वाले पदों अथवा वाक्य खंडों को जोड़ते हैं। इनके चार उपभेद निम्नलिखित हैं -
  1. संयोजक - और तथा, एवं अब और श्व्य
  2. विभाजक - या, वा, अथवा, किंवा, किं, न कि,
  3. विरोध दर्शक - बल्कि, मगर, परन्तु, किन्तु, लेकिन, वरन्, पर।
2. व्यधिकरण समुच्चय बोधक - व्यधिकरण समुच्चय बोधक अव्यय उसे कहते हैं, जिसका प्रयोग प्रधान वाक्य या उसके समानाधिकरण वाक्य खंडों को जोडने के लिए होता है। इसके चार उपभेद निम्नलिखित हैं -
  1. कारक वाचक - क्योंकि, चूंकि, कि, कारण, इसलिए जो, कि।
  2. उद्देश्य वाचक - कि, जो इसलिए, कि, ताकि।
  3. संकेत वाचक - जो-तो, यदि-तो चाहे, परन्तु, यद्यपि, तो-भी अगर-कि।
  4. स्वरुप वाचक - कि, जो, अर्थात् याने, माने।

4. विस्मयादिबोधक 

जो अव्यय, हर्ष, घृणा, शोक, भय, आश्चर्य आदि मनोभावों को व्यक्त करते हैं, उसे विस्मयादि बोधक अव्यय कहते हैं। इसका संबंध वाक्य के किसी भी पद से नहीं होता जैसे - हाय! अब वह नही रहा। अरे! आप कब आये?। जो शब्द आश्चर्य, विस्मय, हर्ष, शोक, लज्जा, घृणा आदि मनोभावों को प्रकट करते हैं, उन्हें विस्मयादिबोधक शब्द कहते हैं जैसे- आह! कितना सुहाना मौसम है। हाय! उसका घोड़ा मारा गया।

हाय तथा अरे। का संबंध वाक्य के किसी भी पद से नहीं हैं। इसके निम्नलिखित प्रकार हैं -
  1. विस्मयबोधक - अरे! ओहो! ए ऐ! क्या ओह!
  2. शोक सूचक - आह! ओह! ऊह! हे राम! हाय राम!
  3. हर्ष बोधक - आह! वाह! धन्य! धन्य! क्या खूब! बहुत अच्छा!
  4. प्रोत्साहन - शाबाश! साधु-साधु ! धन्य!
  5. भय बोधक - बाप रे! बचाओ! बचाो! अरे बाप रे!
  6. क्रोध बोधक - अबे! धत! चुप!
  7. घृणा और तिरस्कार सूचक - धिकू, धत्! हट! छि! छि!
  8. अनुमोदक - ठीक! हाँ! जी हाँ!
  9.  चेतावनी - होशियार!
  10. संबोधन - हे अजी!

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

1 Comments

Previous Post Next Post