अलीगढ़ आंदोलन का क्या उद्देश्य था

अलीगढ़ आंदोलन सामाजिक सुधार आंदोलन के दौर में सैय्यद अहमद खाॅ (1817-98) एक प्रमुख मुस्लिम सुधारक के रूप में उभरे। उनके द्वारा प्रारंभ किये गये आंदोलन को ‘अलीगढ़ आंदोलन’ के नाम से जाना जाता है क्योंकि इस आंदोलन का कार्यक्षेत्र अलीगढ़ था। 

अलीगढ़ आंदोलन के उद्देश्य

यह आंदोलन सर सैयद अहमद खाँ के नेतृत्व में प्रारंभ हुआ जिसका उद्देश्य मुसलमानों के दृष्टिकोण का आधुनिकीकरण करना था। इसके अतिरिक्त इस आंदोलन द्वारा सामाजिक कुरीतियों को भी दूर करने का प्रयत्न किया। जैसे इस आंदोलन द्वारा पीर-मुरीदी प्रथा को समाप्त करने का प्रयत्न किया गया तथा दास प्रथा को इस्लाम के विरूद्ध बताया गया। इसका प्रचार सैयद अहमद खाँ ने अपनी पत्रिका तहजीब उल अखलाक (सभ्यता और नैतिकता) द्वारा किया।

इस आंदोलन में गति लाने हेतु 1875 में उन्होंने एक मुस्लिम ऐंग्लों ओरिएन्टल स्कूल की स्कूल की स्थापना की जिसका उद्देश्य पाश्चात्य विज्ञान और मुस्लिम धर्म की शिक्षा का समन्वित ज्ञान देना था।

इस प्रकार अलीगढ़ मुस्लिम सम्प्रदाय का धार्मिक एवं सांस्कश्तिक धर्म सुधार एवं आधुनिकीकरण का केन्द्र के रूप में लोकप्रिय हो गया। बाद में 1920 में यही स्कूल अलीगढ़ विश्वविद्यालय के रूप में स्थापित हुआ। उन्होंने कुरान पर टीका लिखी जिसमें अपने विचारों को व्यक्त किया गया ।

वे स्वयं सुशिक्षित एवं प्रगतिशील विचारों के होने की वजह से तत्कालीन मुस्लिम समाज में व्याप्त संकीर्णता, धर्मान्धता एवं पिछड़ेपन को देखकर काफी क्षुब्ध थे और वह मुसलमानों की दशा में सुधार करना चाहते थे।

भारतीय मुसलमानों ने उस समय तक अपने आपको न केवल अंग्रेजी शिक्षा और सभ्यता से पृथक रखा था बल्कि अंग्रेजों से उनके संबंध भी अच्छे न थे और यहीं उनकी अवनति का मुख्य कारण भी था। इस कारण सैयद अहमद खां ने अपने जीवन के दो प्रमुख उद्देश्य बनाये:-
  1. अंग्रेजों और मुसलमानों के संबंधों को ठीक करना।
  2. मुसलमानों में आधुनिक शिक्षा का प्रसार करना।
अलीगढ़ आंदोलन कतिपय उद्देश्यों को लेकर प्रारंभ किया गया था। 1857 ई. के विद्रोह में मुसलमानों की भूमिका से अंग्रेज काफी बौखलाए हुए थे और वे षडयंत्र कारी के रूप थे देखे जाते थे। सर सैय्यद अहमद खाॅ ने मुसलमानों का अंग्रेजो के साथ बेहतर संबंध बनाने को ही अपना मुख्य लक्ष्य व उद्देश्य घोषित किया जिससे कि मुसलमानों की षडयंत्रकारी वाली छवि बदले। फिर मुस्लिम समाज कई सामाजिक कुरीतियों एवं अंधविश्वासों के जाल में भी उलझा हुआ था।

सर सैय्यद, राजा राममोहन राय की तरह मुस्लिम समाज में आधुनिक शिक्षा के जरिए नई जान फूंकना चाहते थे और इसे उन्होंने अपना एक उद्देश्य भी घोषित किया।

सर सैय्यद अहमद खां का विश्वास था कि मेरे नेतृत्व में अलीगढ़ आंदोलन ने, मुस्लिम समाज की शिक्षा, सामाजिक, आर्थिक उन्नयन और उनके आधुनिकीकरण के लिए अनेक कार्य किये। 1864 ईमें उन्होंने ‘‘साइंटिफिक सोसाइटी’’ की स्थापना की, जहां अंग्रेजी पुस्तकों का उर्दू अनुवाद प्रकाशित किया जाता था। 1875 ई. में उन्होंने अलीगढ़ में ‘‘मोहम्मद एंग्लो ओरियण्टल काॅलेज’’ की स्थापना की जो आगे चलकर अलीगढ़ विश्वविद्यालय के रूप में विकसित किया। सर सैय्यद ने इस्लाम धर्मं में ख्याति सामाजिक कुरीतियों को दूर करने का भी प्रयत्न किया। उन्होंने दास प्रथा को भी इस्लाम के विरूद्ध बताया अपने विचारों का प्रचार करने के लिए सर सैय्यद ने ‘‘तहजीब-उल-अखलाक’’ (सभ्यता और नैतिकता) नामक पत्रिका निकाली। उन्होंने कुरान की वैज्ञानिक व्याख्या भी की थी।

मुस्लिम पुनरूत्थान के लिए बहुत कुछ अंशों में अलीगढ़ आंदोलन उत्तरदायी था। सर्वप्रथम देश के विभिन्न भागों में फैली हुई मुसलमान जनता को संगठित होने के लिए अलीगढ़ आंदोलन के रूप में मंच मिल गया। इसने उन्हें नये विचार और सांझी भाषा उर्दू प्रदान की। सैय्यद अहमद खां ने इस आंदोलन के द्वारा मुसलमानों की स्थिति को महत्वपूर्ण और प्रभावशाली बना दिया था। अहमद खां ने अपने जीवन के अंतिम वषों में मुसलमानों को उदीयमान राष्टवादी आंदोलन में शामिल होने से रोका। उनके विचार में समय की मांग थी कि मुसलमानों के लिए राजनीति की अपेक्षा शिक्षा अपरिहार्य है।

उनकी धारणा थी कि भारतवासी अंग्रेजों को तभी चुनौती दे सकेंगे जब वे उनकी भांति चिन्तन और अपने क्रियाकलापों में आधुनिक हो जायेंगे। इसलिए उन्हांेने अंग्रेजों का विरोध नहीं किया। इस स्थिति में उन्होंने साम्प्रदायिकता और पृथकतावाद को प्रोत्साहन दिया। इसके बदले में सरकार ने उन्हे ‘‘सर’’ की उपाध् िा देकर सम्मानित किया।

इस प्रकार कह सकते है कि अलीगढ़ आंदोलन मुस्लिम साम्प्रदायिकता को बढ़ाने में बहुत सहायक हुआ। वह भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के विरोध में रहा और पाकिस्तान के निर्माण में भी उसका बहुत बड़ा हाथ रहा। परन्तु इस आंदोलन का दूसरा पहलू भी है। जहां तक मुसलमानों का प्रश्न है, यह आंदोलन उनके लिए अवश्य लाभदायक था। जो कार्य भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और हिन्दु सामाजिक एवं धार्मिक आंदोलन ने हिन्दुओं के लिए किया वहीं कार्य अलीगढ़ आंदोलन ने भारतीय मुसलमानों के लिए किया। 

इस आंदोलन ने मुस्लिम सम्प्रदाय को अकर्मण्यता और निराशा से बचाया तथा उसे मध्य युग से आधुनिक युग में लाने में सफलता प्राप्त की। इसी प्रकार यह भी स्वीकार किया जाता है, कि मुसलमानों की शिक्षा समाज सुधार और जागृति के लिए जो कार्य सर सैयद अहमद खां ने किया वह उस समय तक किसी भी अन्य भारतीय मुसलमान ने नहीं किया था। उन्होंने मुस्लिम समाज और धर्म में सुधार करके उन्हे आधुनिक परिस्थितियों के अनुकूल बनाने का प्रयत्न किया। उन्होंने की मुसलमानों को पश्चिमी शिक्षा और सभ्यता के संपर्क में लाकर उन्हें प्रगतिशील बनाने का प्रयत्न किया। अपने इस लक्ष्य में उन्होंने सफलता भी प्राप्त की। 

इस प्रकार यह स्वीकार करते हुए भी कि सर सैय्यद अहमद खां और अलीगढ़ आंदोलन भारतीय राष्ट्रीयता के विरूद्ध थे यह मानना पड़ता है कि भारतीय मुसलमानों की शिक्षा, सुधार और आधुनिकीकरण के लिए उन्होंने, निस्संदेह, महत्वपूर्ण कार्य किया।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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