अमरूद की खेती का वर्णन


अमरूद की खेती

अमरूद का वैज्ञानिक नाम Psidium है इसकी उत्पत्ति मूलतः उत्तरी अमेरिका के मेक्सिको से हुई है। इसकी खेती  लगभग सभी प्रदेशों में की जाती है परन्तु प्रमुख उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश, बिहार, आध्प्रदेश, झारखण्ड, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ आदि है। अमरूद के फलो मे प्रचुर मात्रा में विटामिन सी, लौह व अन्य खनिज तत्व पाये जाते है इसी कारण से इसे गरीबों के सेब के नाम से भी जाना जाता है। इसका पौधा मध्यम आकार एवं बहुत कठोर होता है अतः कम देखभाल में इसकी खेती आसानी से की जा सकती है। अमरूद को मुख्तया ताजे अवस्था मे खाया जाता है परन्तु इससे अनेको प्रकार के परिरक्षित उत्पाद भी बनाये जाते है जैसे- जैली, स्क्वैष, नेक्टर, साइडर, सीरप, कैन्डी एवं टाफी आदि प्रमुख है। 

अमरूद की खेती के बारे में जानकारी 

अमरूद की खेती कैसे करें, अमरूद की खेती करने का तरीका, अमरूद की खेती कैसे की जाती है

अमरूद के सफल उत्पादन हेतु मृदा एवं जलवायु 

अमरूद के सफल उत्पादन हेतु उचित जल निकास वाली बुलई-दोमट मृदा सर्वाधिक उपयुक्त होती है तथा ऐसी मृदा का पी0एच0 मान 7-8 के बीच उपयुक्त होता है। परन्तु यदि जिस मृदा का पी0एच0 मान सामान्य से कम होता है वहाँ पर भी अमरूद की खेती आसानी से की जाती है। अमरूद उष्ण एवं उपोषण कटिबंधीय फल वृक्ष है और कम नमी वाले क्षेत्रों मे भी इसकी खेती आसानी से की जाती है। उपोषण जलवायु में फलन वर्षभर में 2-3 बार आते है परन्तु इसमें मृग बहार के फल जो शरद ऋतु में परिपक्व होते है वे गुणवत्ता में बहुत अच्छे माने जाते है। अम्बे बहार में फल बरसात के महीने में तैयार होते है तथा इनकी गुणवत्ता  व जीवनकाल भी बहुत कम होता है।

अमरूद की प्रमुख किस्में

भारत में अमरूद की अनेकों प्रजातियाँ उगायी जाती है परन्तु उनमें से कुछ ही व्यवसायिक दृष्टिकोण से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इनमें इलाहाबाद सफेदा, सरदार (लखनऊ-49), ललित, अर्कामृदुला, श वेता, अर्का अमूल्य, पन्त प्रभात, हिसार सफेदा, हिसार सुर्खा, संगम, हरीझा, चित्तीदार, बनारसी आदि प्रमुख किस्में है।

प्रवर्धन

अमरूद के पौधे बीज एवं वानस्पतिक तरीके से तैयार किये जाते है, परन्तु व्यावसायिक दृष्टिकोण से वानस्पतिक विधि ही फायदेमंद होती है क्योंकि इस विधि से तैयार पौधों मे शीघ्र फलन प्रारम्भ हो जाता है और सत्य प्रजाति के फलों की प्राप्ति बनी रहती है। इसका व्यावसायिक प्रवर्धनगूटी, शीर्ष कलम बंधन तथा स्टूल दाब विधि द्वारा प्रमुखता से किया जाता है।

रोपण

अमरूद का पौधा अपेक्षाकृत मध्यम-छोटे कद एवं कठोर प्रवृत्तिका होता है। इसीलिए इसका रोपण 5×5 मी0 की दूरी पर वर्गाकार विधि में करते है जबकि अमरूद की सघन या अति सघन बागवानी 3‐0×2‐5,3‐5×2‐5,2-5×2-5, 3×2 या 2×1मी0 की दूरी पर लगा कर की जा सकती है परन्तु इसमें उच्च प्रबंधन एवं काँट-छाँट की नियमित आवश्यकता पड़ती है। पौधा लगाने के लिए मानसून का समय (जुलाई से सितम्बर) सर्वाधिक उपयुक्त होता है। लेकिन जहाँ सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो वहाँ पर बसंत के समय (फरवरी-मार्च) में भी पौधा रोपण किया जा सकता है। पौधा लगाने से एक माह पूर्व निश्चित दूरी पर रेखांकन करके 60×60×60 से0 मी0 आकार के गड्ढे तैयार कर लिए जात े है तथा गड्ढा ें को 15 दिनों तक खुला छोड़ने के पश्चात गड्ढे़ की ऊपरी सतह की भुरभुरी मृदा में 10-15 किग्रा0 गोबर की सड़ी खाद, 1 किग्रा0 करंज या नमी की खल्ली तथा 60 ग्राम नाइट्रोजन, फाॅस्फोरस एवं पोटाष का मिश्रण मिलाकर गडढ़े को ढ़क दिया जाता है। बरसात या फिर सिंचाई करने से गड्ढ़े की मिट्टी दब जाती है तब पौधा को गड्ढ़ों के बीचो  बीच लगाकर सिंचाई कर देते है।

सघाई एवं काँट-छाँट

अमरूद के पौधो  को आकर्षक छत्रक जैसा मजबूत ढाँचा देन े के लिए शुरूआती 2-3 वर्षाें तक कटाई-छटाई की जाती है। ढाँचा निर्माण के समय इस बात का विशेष ध्यान देना चाहिए कि मृदा सतह से 30-40 सेमी0 तक मुख्य शाखा को न बढ़ने दिया जाए। इसके पश्चात मुख्य तने से 3-4 शाखाओं को चारों ओर समान रूप से बढ़ने देना चाहिए। अमरूद में पुष्पन एवं फलन नये शाखाओं (30-45 दिन पुरानी) पर ही आता है, इसीलिए नये प्ररोहों के विकास के लिए न्यायोचित काँट-छाँट की आवश्यकता होती है। अमरूद मे प्रतिवर्ष दो या तीन बार फल प्राप्त होते है अतः क्षेत्र की अनुकुलता एवं उपयुक्त मौसम की फलत लेने हेतु काट -छाँट का समय एवं गहनता का निर्धारण करके गुणवत्तायुक्त अधिक उपज हासिल किया जाता है।

खाद ,उर्वरक एवं सिंचाई

खाद एवं उर्वरक की उचित मात्रा सही समय पर देना आवश्यक होता है अतः इसकी मात्रा का निर्धारण पौध की आयु एवं क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग होता है, लेकिन सामान्यतया एक वर्ष पुराने पौधे को 60ः30ः30 ग्राम एन.पीके. देने की संस्तुति की जाती है तथा उर्वरक की यही मात्रा प्रतिवर्ष बढ़ाई जाती है जो कि 6 वर्षों के बाद उर्वरक की मात्रा बढ़कर 360ः180ः180 ग्राम एन.पी.के. हो जाती हैतथा उसके बाद उर्वरक की यही मात्रा प्रतिवर्ष दी जाती है। पौधे की वार्षिक खाद जरूरत को दो भागों मे अलग करके पहला भाग फरवरी-मार्च एवं दूसरा भाग अक्टबूर माह मे दिया जाता है। फरवरी-मार्च में गोबर की सड़ी खाद (20-25 किग्रा) एवं उपरोक्त एन.पी.के. में से फाॅस्फोरस एवं पोटाष की पूरी मात्रा नाइट्रोजन की आधी मात्रा मुख्य तने से 1मी0 दूरी पर पौधे के छत्रक के नीचे चारों ओर 15 सेमी0 गहरी पट्टी में देकर मृदा से ढक दे तथा शेष नाइट्रोजन की मात्रा अक्टूबर मे देने के बाद सिंचाई अवश्य कर देना चाहिए। 

अमरूद के छोटे एवं नये पौधों को गर्मियों में 10-15 दिन एवं सर्दियों में 20-25 दिन के अंतराल पर परिवर्तित थाला विधि से नियमित सिंचाई करने से पौधों का विकास अच्छा होता है। पुआल या घास का पलवार बिछाने से पानी का अधिक उपयोग, खरपतवारों पर नियंत्रण, उपज एवं गुणवत्ता में धनात्मक वृद्धि होती है। 

परिवक्वता एवं फल तोड़ाई 

फल लगने के 60-120 दिनों के भीतर फल तुडाई योग्य हो जाते है। यद्यपि अमरूद में सभी फल एक साथ नहीं पकते अतः 2-3 दिन के अंतराल पर 6-7 तुडा़ई करके पौधे से अच्छी उपज मिल जाती है। जब फलांे का रंग गहर े हर े से हल्के पीले रंग मे बदल जाए तब फल तुड़ाई के योग्य होते है। उपज अमरूद के एक विकसित पौधे से लगभग 40-42 किग्रा0 फल प्रतिवर्ष प्राप्त किये जा सकते है। 

सघन बागवानी वाले बगानों से प्रति पौधा उपज तो कम होती है परन्तु प्रति इकाई क्षेत्रफल से अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। सामान्यतया 5×5 मी0 दूरी पर लगाये बागो  से 15-17 मैट्रिकटन प्रति हेक्टेयर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। 

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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