भारतीय परिषद अधिनियम 1861 क्या है ?

ब्रिटिश सरकार द्वारा घोषित उद्देश्य के अनुसार संसद ने भारत में शासन व्यवस्था के संचालन हेतु दिशा निर्देश देने के लिये सन् 1861 ईसवी में यह अधिनियम पारित किया था। अन्तर्निहित वास्तविकता यह भी थी कि 1857 के विद्रोह की भावनाएँ अभी अस्तित्व में थीं, जिनका समूल दमन करने के लिये भारतीयों को सुधारों का प्रलोभन दिया जाना अनिवार्य था। इसी अनिवार्यता को ध्यान में रखते हुये यह अधिनियम परिकल्पित किया गया।

भारतीय परिषद अधिनियम 1861 के प्रावधान

इस अधिनियम के प्रमुख प्रावधान निम्नांकित थे-

(अ) गवर्नर जनरल एवं वायसराय की शक्तियों में वृद्धि करते हुये उसको विशेष परिस्थितियों में अध्यादेश पारित करने का अधिकार प्रदान किया गया। यह अध्यादेश बिना अनुमोदन के छह सप्ताह तक प्रभावशील रह सकता था। गवर्नर जनरल को नये प्रान्तों का गठन करने और वहाँ पर लेफ्टिनेंट की नियुक्ति करने का अधिकार दिया गया। पंजाब तथा उत्तर-पश्चिम सीमा प्रान्त में उसको विशेषाधिकार प्रदान किये गये। वायसराय को कार्यकारिणी के कार्यों के सुचारू संचालन के लिये नियम बनाने की शक्ति दी गई।

(ब) गवर्नर जनरल की परिषद् में सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 6 से 12 कर दी गई। इनमें से न्यूनतम आधे सदस्य गैर सरकारी होना आवश्यक रखा गया। गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी के सदस्यों की संख्या 4 से बढ़ाकर 5 कर दी गई। पांचवाँ सदस्य वित्त मंत्री होगा। इसी तरहप्रान्तीय व्यवस्थापिकाओं के सदस्यों की संख्या भी बढ़ाई गई। प्रान्तों को विधि निर्माण का अधिकार पुनः प्रदान किया गया।

भारतीय परिषद अधिनियम 1861 की समीक्षा

कुछ कारणों से 1861 के भारतीय परिषद् अधिनियम का विशेष महत्व है। इसको भारत में संवैधानिक विकास के प्रारंभिक दौर का महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। इसमें पहली बार गैर सरकारी सदस्यों की परिषद् में नियुक्ति की व्यवस्था की गई। इससे भारतीयों को भी परिषद् में प्रविष्ट होकर विधि निर्माण में सहभागी बनने का अवसर प्राप्त हुआ। यही कारण है कि इस अधिनियम को भारत में उदार निरंकुशता की नीति का प्रवर्तक माना जाता है। गवर्नर जनरल को अध्यादेश जारी करने की शक्ति दिये जाने से विषम परिस्थितियों में त्वरित निदान की व्यवस्था हो सकी। प्रान्तों को विधि निर्माण की शक्ति दिये जाने से विकेन्द्रीकरण की प्रथा प्रारम्भ हुई।

इसमें अनेक दोष भी थे, जिससे यह भारतीयों के लिये अधिक लाभदायक सिद्ध नहीं हो सका। गैर सरकारी सदस्यों को परिषद् में सम्मिलित किये जाने से भारतीयों का विशेष हित नहीं सध पाया, क्योंकि सरकार उन्हीं भारतीयों को परिषद् में स्थान देती थी, जो उसके विश्वासपात्र होते थे। अधिकांश गैर सरकारी सदस्य अंग्रेजों के पिट्ठू बने रहे। गवर्नर जनरल की शक्तियों में अत्यधिक वृद्धि हो जाने से वह मनमाने निर्णय लेने की स्थिति में आ गया। परिषद् शक्तिहीन थी, उसकी सलाह मानने के लिये गवर्नर जनरल बाध्य नहीं था। अध्यादेश जारी करने के अधिकार के रूप में उसको ऐसा शस्त्र प्राप्त हो गया, जिसका उपयोग उसने ब्रिटिश साम्राज्य के हितों के संवर्धन के लिये बहुत ही अलोकतांत्रिक तरीके से किया। स्पष्ट है कि अधिनियम में धनात्मक पहलुओं की अपेक्षा ऋणात्मक पहलुओं का आधिक्य था। इससे भारतीयों की अपेक्षाएँ पूर्ण नहीं हो सकीं और सुधारों की माँग पूर्ववत् बनी रही।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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