1857 की क्रांति की शुरुआत कैसे हुई? क्रांति के प्रमुख नेता कौन-कौन से थे?

इस काल में अंग्रेजों द्वारा भारतीय जनता का आर्थिक शोषण, तथा रजबाड़ों के परंपरागत अधिकारों पर चोट, ग्रामीण-पंचायती मेलमिलाप के स्वरूप पर प्रहार, भारतीय मुलाजिमों एवं सैनिकों को अंग्रेजों से कम वेतन दिया जाना, और जागीरदारों को कर न चुका पाने पर अपमानित कर जेल भेज देना आदि ऐसे कारण थे जिनसे जनता के मन में असंतोष जन्मा था। अंग्रेज अधिकारी भारतीयों को अपना गुलाम समझते थे। इन्हीं कारणों के फलस्वरूप सन् 1857 की क्रांति हुई थी।

1857 की क्रांति की शुरुआत

मंगल पांडे को फांसीः- इस घटना के बाद मंगल पांडे ने उत्तेजित होकर एक अंग्रेज सार्जेन्ट ह्यूजन तथा एक सिपाही की हत्या भी कर दी, इसके परिणामस्वरूप 8 अप्रैल 1857 को मंगल पांडे को अंग्रेजी अदालत में फांसी की सजा दे दी। इस घटना की सूचना धीरे-धीरे अंग्रेज छावनियों के सभी भारतीय सिपाहियों के बीच फैल गई थी। जब इसी घटना की पुनरावृत्ति के क्रम में मेरठ छावनी के भारतीय सिपाहियों ने चर्बी लगे कारतूसों का उपयोग करने से इंकार कर दिया, तब अंग्रेजी अदालत ने दस-दस वर्ष के कारावास की सजा सुना दी।

मेरठ में क्रांंति:- क्रांति की सुगबुगाहट पहले ही प्रांरभ हो चुकी थी कि अचानक अंग्रेजों के दमन के विरूद्ध 10 मई 1857 ई. को मेरठ छावनी के सैनिकों ने सशस्त्र विद्रोह खड़ा कर दिया और जेल तोड़ अपने साथियों को आजाद करा लिया। मेरठ के नागिरकों ने भी इन क्रांतिकारी सैनिकों का सहयोग किया और ये क्रांति सैनिक ‘‘हर-हर महादेव’’ एंव ‘‘दीन-दीन’’ के नारे लगाते हुए दिल्ली की ओर चल पडे़। इस प्रकार 1857 की महान क्रांति की शुरूआत हुई।

क्रांंति का फैलाव:-शीघ्र ही इस क्रांति की लपटें दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, झांसी, जगदीशपुर के प्रमुख क्षेत्रों में फैल गई। इस क्रांति के प्रमुख नेताओं में मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर, नानासाहब, तात्या टोपे, महारानी लक्ष्मीबाई, बाबू कुंअरसिंह, बेगम हजरत महल एवं शाहजादा फिरोजशाह का नाम अग्रगन्य है।

1857 की क्रांति के प्रमुख नेता

सन् 1857 की क्रांति के प्रमुख नेताओं में बादशाह बहादुरशाह जफर, पेशवा नाना साहब, तात्या टोपे, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, बिहार के बाबू कुंवरसिंह, अवध के बेगम हजरत महल और शाहजादा फिरोजशाह के नाम उल्लेखनीय हैं।

1. बहादुरशाह जफर

बहादुरशाह दिल्ली के अंतिम मुगल शासक थे, जो 1837 ई. में दिल्ली की गद्दी पर बैठे थे। लेकिन 1857 के काल में बहादुर शाह की सत्ता केवल लाल किले में अपने परिवार तक की सीमित थे। दिल्ली के शासन पर अंग्रेजों का पूरा नियंत्रण था। मेरठ के क्रांतिकारी सैनिक 14 मई 1857 ई. को दिल्ली जा पहुंचे और उन्होंने लाल किले के अंग्रेज अधिकारियों को मारकर सम्राट बहादुरशाह से प्रार्थना की वे इस क्रांति का नेतृत्व करना स्वीकार करें, पर बहुत आनाकानी के बाद 82 वर्षीय बहादुरशाह जफर ने क्रांति का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना स्वीकार कर इसके संचालन के लिए एक मंत्रीमण्डलीय समिति बना दी। इस समिति में बादशाह ने हिन्दु-मुसलमान दोनों को प्रतिनिधित्व दिया और यह तय किया कि सभी फैसले बहुमत से लिए जाएंगे। इस क्रांति के माध्यम से सम्राट बहादुरशाह के मन में पुनः एक बार यह आशा सुलग उठी थी कि वह मुगल वंश की पुरानी ताकत और सत्ता की स्थापना करने में सक्षम हो सकेगा।

बहादुरशाह ने 1 अगस्त, 1857 ई. को ईद के दिन गाय वध पर रोक लगाने का कार्य हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द की दृष्टि से किया था, जिसको संपूर्ण क्रांतिकाल में प्रेरणा के रूप में देखा गया था। अंग्रेजों की सेनांए जब दिल्ली पर कब्जा जमाने के लिए चारों तरफ से एकत्रित हो गईं तो उन्होंने 14 सिंतबर, 1857 ई. को दिल्ली पर सभी ओर से धावा बोला। दिल्ली पर आक्रमण करने वाली अंग्रेजी टुकडि़यों का नेतत्व अंग्रेज सेनापति निकलसन, जोंस, कैम्पबैल और मेजर रीड कर रहे थे। कुल छै दिन लड़ाई के बाद 20 सिंतबर 1857 को दिल्ली पर अंग्रेजों ने पुनः अधिकार कर लिया था।

अब अंतिम मुगलबादशाह बहादुरशाह जफर के दुर्यभाग्यशाली समय की शुरूआत हुई, उसे दूसरे दिन ही दिल्ली के हुमायॅंु के मकबरे से उसके समधि इलाहीबक्स ने अंग्रेजों से मिलकर पकड़वा दिया था। अंग्रेज मेजर हड़सन ने उसके पुत्रों सहित लगभग राजपरिवार के पच्चीस करीबी सदस्यों को मौत के घाट उतरवा दिया और दिल्ली को बुरी तरह लूटापाटा तथा हत्यांए कीं। इस अवसर पर बहादुरशाह को बंदी बनाकर अंग्रेजों ने उनपर 25 जनवरी, 1858 ई. को दिल्ली के लाल किले में ‘‘1857 के अधिनियम-15’’ के मुकदमा चलाया गया। यह मुकद्मा दीवाने-खास में चलाया गया, जहां मुगल बादशाह कभी राजसिंहासन पर बैठा करता था। मुकदमे के दौरान अंग्रेजों ने बादशाह का खूब मजाक उड़ाया और धक्का मुक्की कर उसे शारीरिक चोट पहुचानें का भी प्रयास किया, न्यायप्रिय अंग्रेजों ने देश के मुगल बादशाह के प्रति हुए अमानवीय व्यवहार पर कोई आपत्ति नहीं की थी। 

अंत में 2 अप्रैल, 1858 को बादशाह को अंग्रेजों की अदालत ने दोषी करार देकर, 7 अक्टूबर 1858 ई. को शेष जीवन बिताने के लिए रंगून के लिए निर्वासित कर भेज दिया। बहादुरशाह लंबी और ऊबाउ यात्रा के बाद 9 दिसम्बर 1858 ई. को रंगून पहुंचे जहां उन्हें चार फुट लंबाई व इतनी ही चैड़ाई के कमरे में शेष जीवन बिताने के लिए बंदी बना दिया गया। यहां बादशाह अपनी मृत्यु 7 नबंवर, 1862 ई. तक रहे। शायर मुगल बादशाह में जेल की कोठरी में दीवारों पर कोयले की कालिख से अंतःमन की शायरी लिखते हुए अंतिम दिन बड़े दुखी मन से व्यतीत किए। बादशाह बहादुरशाह जफर की गजलें उनके भारत प्रेम को प्रकट करती हैं। बादशाह ने सन् 1857 की महान क्रांति का नेतृत्व कर देश को एकजुटता और भाईचारे का संदेश भी दिया था।

2. पेशवा नाना साहब

नाना साहब का मूल नाम घुंडिराज था, वह मराठी सत्ता के अपदस्थ पेशवा बाजीराव द्वितीय के गोद लिए उत्तराधिकारी थे। बिठूर में नाना साहब के साथ दक्षिण से आए हुए अनेक परिवार रहते थे, उनके भी जीवन-यापन का भार नाना साहब के ऊपर था। परंतु अंग्रेजों द्वारा उनकी सभी प्रकार की आर्थिक सहायताओं पर रोक लगाने के कारण उनके सामने संकट की स्थिति निर्मित हो गई थी। इस स्थिति से निपटने के लिए नाना साहब ने अपने चतुर वकील अजीमुल्ला को ईस्ट इण्डिया कंपनी के बोर्ड आफ डायरेक्टर के पास लंदन अपील करने भेजा। परंतु अंग्रेजों ने अजीमुल्ला के किसी भी तर्क को स्वीकार नहीं किया। प्रसंगवश अजीमुल्ला की यहीं सतारा के छत्रपति प्रतापसिंह के प्रतिनिधि रंगों बापू से हुई, रंगों बापू भी अपने छत्रपति की अपील करने के लिए वहां गए हुए थे। यह मुलाकात सन् 1857 की क्रांति के प्रारंभ होने के पूर्व की एक महत्वपूर्ण कड़ी बनी। जहां अजीमुल्ला ने उत्तर भारत में नाना साहब की ओर से क्रांति की भूमिका तैयार की, वहीं रंगोजी बापू ने दक्षिण में यह कार्य सफलता पूर्वक किया।

इन अपमानों से आहत होकर नाना साहब ने 1857 की क्रांति की भूमिका तैयार करने में अभूतपूर्व चतुराई का प्रदर्शन किया। नाना साहब ने अपने वफादार अजीमुल्ला को भारत के बाहर रूस, मिश्र, यूरोप आदि देशों में अंग्रेजों के विरूद्ध प्रचार करने के लिए भेजा और वे स्वंय जनजागृति चलाने के लिए मेरठ, कानपुर और दिल्ली गए। नाना साहब के साथियों ने गंगाजल, रोटी, तथा कुरान लेकर लोगों को अंग्रेजों के विरूद्ध एकजुट रहने की कसम उठवाई। नाना साहब की चतुराई यह थी कि अंग्रेज कभी भी उनकी क्रांति की अग्रिम योजनाओं को भांप नहीं सके थे। पेशवाई सत्ता के वफादार साथी तात्या टोपे को नाना साहब ने सैनिक संगठन तैयार करने का कार्य सौंप दिया था। मेरठ क्रांति की खबर कानपुर में भी पहुॅंची और वहां के भारतीय सैनिकों ने 4 जून 1857 ई. को अंग्रेजों का खजाना लूट, जेल से अपने साथियों को छुड़ा लिया। यह क्रांति सेना दिल्ली की ओर जाना चाहती थी, परन्तु नाना साहब ने इस क्रांति सेना का नेतृत्व करना स्वीकार कर लिया। और इस क्रांति सेना ने जून 1857 के अंत में कानपुर पर अपना अधिकार स्थापित कर अंग्रेजों को वहां से पलायन करने के लिए मजबूर कर दिया। परन्तु इस बीच पलायन करने वाले अंग्रेजों की नावों पर क्रांतिकारियों ने गोली चला दी और इस अचानक आक्रमण में अधिकांश अंग्रेज परिवार सहित मारे गए। नाना साहब का गंगा नदी में हुए इस हत्याकांड की घटना में कोई हाथ नहीं था, परन्तु इस सच्चाई को उस समय अंग्रेजों ने नहीं माना।

नाना साहब की सेनाओं और अंग्रेजों की सेनाओं के बीच कानपुर-विठूर जिसे ब्रह्नावर्त क्षेत्र के नाम से जाना जाता है, लगातार 1857 जुलाई से 1858 फरवरी तक अनेक मुठभेडें़ हुई। इन युद्धों में कभी नाना साहब का, तो कभी अंग्रेजों का पलड़ा भारी रहा। इस क्रांति के दौरान नाना साहब ने झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, अवध की बेगम हजरत महल आदि को अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ने में आवश्यक सहायता और मंत्रणा प्रदान की। नाना साहब तत्कालीन समय के सभी प्रमुख क्रांतिकारियों से सहयोग करने को आतुर रहते थे। जब 1857 की क्रांति की आग, 1858 ई. के बाद ठण्डी पड़ गई और क्राति के प्रमुख योद्धाओं का अवसान हो गया। तब नाना साहब ने नेपाल की तराई की ओर पलायन कर अपना शेष जीवन बिताया। परन्तु अंग्रेजों के सामने कभी समर्पण नहीं किया, यहीं नेपाल में अक्टूबर, सन् 1859 ई. में नाना साहब ने अंतिम सांस ली।

3. तात्या टोपे 

सन् 1857 की क्रांति का नायक तात्या टोपे सैनिक चतुराईयों का विशेषज्ञ था, अंग्रेज भी उसकी गुरिल्ला-लड़ाईयों का कोई तोड़ नहीं निकाल सके थे। उसका मूल नाम रामचंन्द पांडुरंग येवाल्कर था, तात्या तो उसका उपनाम था, एक बार बाजीराव पेशवा ने उसे प्रसन्न होकर एक टोप उपहार में दिया था, तब से वह तात्या टोपे के नाम से प्रसिद्ध हुआ। तात्या टोपे ने अपने क्रांति जीवनकाल में लगभग डे़ढसौ लड़ाईयां अंग्रेजों के साथ लड़ीं थीं। कानपुर, विठूर, कालपी के 1857-58 के अंग्रेज विरोधी अभियानों में तात्या टोपे ने नाना साहब से कंधे से कंधा मिलाये रखा था। वह बुन्देलखण्ड में भी चरखारी, भाण्डेर के क्षेत्रों में संगठन की दृष्टि से गये थे और उसने रानी लक्ष्मीबाई की अंग्रेजों से टक्कर के समय सहायता करने का गंभीर प्रयास किया था। 

अप्रैल, 1858 ई. में तात्या टोपे ने कालपी को अपना प्रमुख सैनिक ठिकाना बना लिया था। यहीं इस समय झांसी की रानी भी आई थीं। तात्या टोपे ने झांसी की रानी को साथ लेकर कोंच ्रऔर कालपी के युद्धों में अंग्रेजों से जोरदार टक्कर ली थी। कालपी के क्रांतिकारियों की यह सम्मलित सेना जून 1858 ई. में ग्वालियर पर अधिकार स्थापित करने में सफल हो गई थी। इस सफलता में तात्या टोपे का योगदान था, उन्होंने सिंधिया राज्य के तमाम सिपाहियों और वफादारों को क्रांति सेना का सहयोग करने के लिए मना लिया था।

तात्या टोपे के व्यक्तित्व की यह विशेषता थी कि वे कभी युद्धों के परिणामों से हतोत्साहित नहीं हुए। जब रानी लक्ष्मीबाई की जून, 1858 में ग्वालियर में मृत्यु के बाद मध्य भारत के क्रांतिकारियों की प्रगति रूक गई थी। तब तात्या टोपे ने जनता का क्रांति के लिए पुनः समर्थन प्राप्त करने के उद्देश्य से गांव-गांव में ढोल पिटवा कर एंव पोस्टर लगवा कर प्रचार किया था, कि उनकी सेनाएं अंग्रेज फिरंगियों से युद्ध लड़ रहीं हैं न कि गांव वालों से। अतः उनकी सेनाओं के गांव में आने पर वहां के निवासी भागें नहीं, बल्कि सेना की रसद पूर्ति में योगदान करें, उन्हें रसद की पूरी कीमत तत्काल चुकाई जाएगी। सन् 1858 के बाद तात्या टोपे ने अंग्रेजों से मुकाबला करने के लिए ‘‘ हमला करो और भाग लो’’ की गुरिल्ला नीति का पालन किया था।

तात्या टोपे अपनी जीवटता के लिए प्रसिद्ध था। वह कभी भी सुविधा का सामान लेकर नहीं चलता था, घोड़ा के बीमार हो जाने पर वह उसे छोड़ देता था और अपने जरूरत के लिए अंग्रेज परस्तों की लूटमार कर काम चला लेता था। वह पैर में जूते के स्थान पर चीथड़े कपड़ों को बांध कर अपना काम चला लेता था और प्रतिदिन लगभग 70 किलोमीटर तक भाग जाता था। वह इस देश का अप्रतिम क्रांतिकारी था। उसकी तस्वीर ‘‘राबिनहुड’’ जैसी थी। वह सर्वव्यापी योद्धा था, वह कभी राजस्थान में, कभी मालवा में, कभी बुन्देलखण्ड में होता था, उसने एक बार उफनती नर्मदा को भी पार कर लिया और इसकी भनक उसका पीछा करने वाली अंग्रेजी सेनाओं को भी नहीं हुई थी।

अप्रैल, सन् 1859 ई. तक देश के प्रमुख क्रांतिकारी वीरगति को प्राप्त हो चुके थे, पर तात्या टोपे अंग्रेजो की पकड़ में नहीं आ सका था और वह अंग्रेजों की आंख की किरकिरी अभी तक बना हुआ था। अंग्रेज मेजन मीड को तात्या टोपे को मारने या बन्दी बनाए जाने का कार्य सौंपा गया था। मीड ने तात्या टोपे के एक विश्वासी मानसिंह को लालच देकर और उसके परिवार की महिलाअेंा को बंदी बना कर अपनी ओर मिला लिया। अंतोगत्वा महान क्रांतिवीर तात्या टोपे मानसिंह के धोखे के कारण 7 अप्रैल, 1859 ई. को शिवपुरी-कोलारस के पाड़ौन के जंगल से अंग्रेजो द्वारा बंदी बना लिया गया। और बाद में अंग्रेजों ने तात्या टोपे पर मुकदमा चलाकर 18 अप्रैल, 1859 ई. को शिवपुरी में फांसी पर चढ़ा दिया था। सन् 1857 की क्रांति का महान दीपक अंग्रेजों ने उस समय जरूर बुझा दिया था, पर वह आज भी जन-मानस की स्मृति को पुनः-पुनः झंकृत करता रहता है। वह आज भी युवाओं की प्रेरणा का बड़ा स्त्रोत बना हुआ है।

4. झांसी की रानी लक्ष्मीबाई

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का बचपन का नाम मणिकर्णिका था और उनका बचपन बिठूर में नाना साहब, रावसाहब और तात्या टोपे के साथ बीता था, यहीं उन्होंने बचपन में सैनिक प्रशिक्षण प्राप्त किया था। झांसी के राजा गंगाधर राव से सन् 1842 में उनकी शादी के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई पड़ा था। झांसी के गंगाधर राव का निधन 21 नवंबर, 1853 को हो गया था, इसके पूर्व राज्य के नवजात उत्तराधिकारी की मृत्यु सन् 1851 में जन्म के तीन माह बाद ही हो चुकी थी। अतः गंगाधर राव ने अपने अंतिम समय में एक संबंधी के बच्चे को गोद लेकर उसे अपना उत्तराधिकारी नियत किया और उसका नाम दामोदर राव रखा। परन्तु अंग्रेजों ने अपनी सोची समझी झांसी को हड़पने की नीति के तहत झांसी के इस उत्तराधिकारी को मान्यता प्रदान नहीं की। और मार्च 1854 ई. में झांसी राज्य का अंग्रेजी साम्राज्य में विलीनीकरण कर रानी को पेंशन बांध, उन्हें दुर्ग से बाहर निकाल झांसी शहर के एक छोटे से महल में रहने को विवश कर दिया। रानी ने इस अवसर पर अंग्रेजों से काफी लंबा पत्र व्यवहार किया, परन्तु अंग्रेजों ने उनके एक भी तर्क-विनय को नहीं माना।

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई एक सूझबूझ भरी और साहसी महिला थी और वे आस्थावान, धार्मिक महिला के रूप में झांसी की जनता के बीच प्रसिद्ध थीं। उनके परंपरागत हक-उसूलों, सुविधाओं पर अंग्रेजों द्वारा रोक लगाने के कारण झांसी की जनता अंग्रेजों से मन ही मन काफी चिढ़ने लगी थी। इसी बीच मई 1857 में मेरठ में क्रांति का विस्फोट हो गया था। झांसी की बारहवीं छावनी के सिपाही पहले से ही अंग्रेजों से असंतुष्ट थे, इस क्रांति की खबर सुन उन्होंने भी झांसी में जून, 1857 ई. में क्रांति का बिगुल बजा अंग्रेजों के खजाने को लूट लिया और अपने साथियों को भी जेल से छुड़ा लिया। और इस बीच यह भी दुर्घटना हुई कि अंग्रेज अधिकारियों के परिवार सहित दुर्ग से बाहर जाने के लिए क्रांतिकारियों की ओर से आश्वासन मिल जाने के बाबजूद उनकी क्रांतिकारियों द्वारा हत्या कर दी गई। अंग्रेजों ने इन हत्याओं के लिए झांसी की रानी को उत्तदायी माना। झांसी छावनी के क्रांतिकारी सिपाही जिनका नेतृत्व अहसान अली,बख्शीस अली एवं काले खां कर रहे थे, ये सभी लोग दिल्ली जाना चाहते थे। 

इन क्रांतिकारियों ने झांसी की रानी पर दबाब बना उनसे कम से कम एक लाख रूपये के आभूषण प्राप्त कर लिए और यह नारा लगाते हुए ‘‘खल्क खुदा का मुल्क बादशाह का तथा राज रानी लक्ष्मीबाई का’’, दिल्ली की ओर चले गए। इस सुयोग का लाभ उठाते हुए झांसी की रानी ने अंग्रेजों से पत्र व्यवहार करते हुए झांसी का शासन पुनः संभाल लिया। पर वे जानंती थी कि अंग्रेज झांसी पर पुनः कब्जा जमाने के लिए आएंगे और वे किसी भी कीमत पर अंग्रेजों को झांसी देने के लिए तैयार नहीं थीं, उनका नारा था ‘‘ मैं अपनी झाँसी नहीं दूंगी’’।

5. बाबू कुवंर सिंह:-

बिहार दानापुर छावनी के सिपाहियों ने 25 जुलाई, 1857 ई. को अंग्रेजों के विरूद्ध क्रांति का झण्डा खड़ा कर कुवंर ंिसंह से उसका नेतृत्व करने का आग्रह किया, जिसे उस बूढे शेर ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। कुंवर ंिसंह तात्या टोपे जैसी कुशल सैन्य संचालन की योग्यता रखते थे। उन्होंने अंग्रेजों की आरा छावनी को लूट लिया, जब अंग्रेजों ने क्रोधित होकर उनकी रियासत जगदीशपुर पर अधिकार कर लिया, तो उन्होंने पलायन का दिखावा कर पुनः बेफ्रिक हो चुकी अंग्रेजी सेना पर धावा बोल उसको गहरा आघात पहुंचाया। कुंवरसिंह गुरिल्ला युद्ध पद्धति पर चलते थे और सदैव असावधान अंग्रेजी सेना को हानि पहुंचाते थे।

क्रांतिकारी कुवंरसिंह सिंतबर-अक्टूबर, 1857 में मिर्जापुर, रीवा, बांदा के क्षेत्रों में अंग्रेजों से टक्कर लेते हुए घूमते रहे। वे बिठूर के नाना साहब के भी संपर्क में थे और उन्होंने कानपुर और कालपी में भी अंग्रेजों से भिंडन्तें की थीं। फरवरी, 1858 में कुवंरसिंह लखनऊ-आजमगढ़ के क्षैत्रों में अंग्रेजों से युद्ध कर रहे थे। इस वृद्ध क्रांतिकारी का नाम 1857 के इतिहास में इसलिए अमर है कि इस उम्र में जब लोग बिस्तर पकड़ लेते हैं, तब वह युवाओं जैसी जीवटता के साथ देश के विभिन्न भागों में अंग्रेजों से जूझे थे। अंत में जब वे पुनः अपनी रियासत के क्षेत्रों की ओर जाने के लिए गंगा पार कर रहे थे, उसी समय 23 अप्रैल 1858 ई. को अंग्रेजों द्वारा तोप से दागे गए एक गोले से वे घायल हो गए। अभूतपूर्व साहस और चपलता दिखाते हुए उस वृद्ध शेर ने अपनी घायल बांह को काटकर गंगा को इसलिए समर्पित कर दिया कि कहीं उसका जहर पूरे शरीर में न फैल जाए।

बाबू कुंवरंिसंह की 1857 क्रांतिकाल की यह विलक्षण मिशाल अत्यंत ही वंदनीय है। इस घायल अवस्था में भी उन्होंने अपने थके वीर सैनिकों के साथ अंग्रेज सेनापति लिगैंड सहित डे़ढसौ सैनिकों को मार गिराया था। इस घटना के दूसरे दिन ही 24 अप्रैल, 1858 ई. को उस वीर शेर कुवरंसिंह ने स्वर्ग की राह पकड़ी।

6. बेगम हजरत महल

अवध के नबाब वाजिद अली शाह की पत्नि बेगम हजरत महल 1857 के क्रांति इतिहास की एक और जुझारू महिला सेनानी थी। विलासी प्रकृति के कारण नबाब को अंग्रेजों ने मार्च 1856 ई. में कलकत्ता में नजर बंद कर दिया था। अंग्रेजों के इस फैसले का विरोध करते हुए बेगम ने अपने बारह वर्षीय पुत्र बिरजीस कदर को अवध का नबाब घोषित कर लखनऊ की गद्दी पर बैठा दिया था। इस प्रकार बेगम ने स्वंय अवध प्रांत के शासन सूत्र अपने हाथ में लेकर सेना का पुर्नगठन प्रारंभ कर दिया और अंग्रेजों के विरूद्ध जन समर्थन जुटाने के लिए पूरे प्रांत की स्वंय यात्राएं कीं। इस बीच 1857 की क्रांति की लहर चलने पर जुलाई माह में बेगम ने लखनऊ के अंग्रेज केप्टन विलसन तथा हडसन को मौत के घाट उतरवा दिया। बेगम ने इस अवसर पर नाना साहब और तात्या टोपे से संपर्क कर उनसे भी विचार विमर्श किया। परन्तु कूटनीति का सहारा ले 21 मार्च 1858 ई. को अंग्रेजों ने लखनऊ पर अधिकार कर लिया। अब बेगम ने बौंडी, वर्तमान नाम बहराइच के मजबूत किले को अपना सैनिक मुख्यालय बना उन अवध प्रांत के ताल्लुकेदारों से धन वसूल किया जो अंग्रेजों के वफादार थे। यहीं बेगम ने रूहेलखण्ड पर भी अधिकार कर वहां से अंग्रेजा ेंको भगाए जाने की योजना बनाई थी।

7. शाहजादा फिरोजशाह

फिरोजशाह मुगलवंश मंे उत्पन्न हुए थे और सन् 1857 के मई माह में वे मक्का की यात्रा से वापस आए और दिल्ली की ओर जाते समय मालवा के मंदसौर नामक स्थान पर जाकर उन्होंने अपने को बादशाह घोषित कर दिया तथा क्रांति की घोषणा की। लेकिन मंदसौर के अंग्रेज सेनापति ने उन्हें वंहा से बाहर खदेड़ दिया, लेकिन वे वहीं शहर के बाहर एक मस्जिद में जम गए और एक बड़ी सेना एकत्रित कर पुनः मंदसौर पर अधिकार कर लिया। जब इंदौर के अंग्रेज एजेंट कर्नल ड्यूरंड ने सितंबर, 1857 में उन आक्रमण कर उन्हें वहां से पलायन करने के लिए विवश कर दिया। तब वे अवध के प्रांतों में जा पहुंचे और उन्होंने वहां फरूखाबाद में अंग्रेजों को मात दी।

 सन् 1858 में शाहजादा वहां से बुन्देलखण्ड के क्षेत्रों में रानी लक्ष्मीबाई की सहायता करने के लिए जा पहुंचे। जहां से वे पुनः एक बार लखनऊ की ओर गए और उन्होंने वहां अंग्रेजों को शाहजहांपुर की लड़ाई में पराजित किया। इस प्रकार शाहजादा फिरोजशाह ने मालवा, अवध, बुन्देलखण्ड के क्षेत्रों में अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों को चलाया।

सन् 1859 ई. के प्रारंभ में वे राजस्थान में तात्या टोपे के साथ हो गए और उन्होंने तात्या के साथ मिलकर अंग्रेजों से कई लड़ाईयां लड़ीं। अंत में वे अलवर में अंग्रेज सेना से भिडं़त के बाद तात्या टोपे से अलग हो गए थे। इसी काल में शाहजादा फिरोजशाह से अंग्रेज गर्वनर के एजेंट रिचर्ड शेक्सपियर ने समर्पण की वार्ता की, परन्तुं अक्खड़ शाहजादा की अंग्रेजों से नहीं बनी। इसके बाद वे देश छोड़कर सन् 1860 में अफगानिस्तान, पर्शिया, मध्य एशिया के भागों में घूमते हुए मक्का जा पहुंचे। यहीं 17 दिसंबर 1877 ई. में उनका निधन हो गया। 

इन सभी नेताअेां ने अपने-अपने क्षेत्रों के साथ देश के अन्य भागों में भी अंग्रेजों से भी लोहा लिया था।

संदर्भ-
  1. विपन चंद्र, भारत का स्वतंत्रता संग्राम, नेशनल बुक ट्रस्ट इण्डिया, नई दिल्ली, 1972।
  2. सुरेन्द्रनाथ सेन, अठारह सौ सत्तावन का स्वतंत्रता संग्राम, प्रकाशन विभाग सूचना मंत्रालय दिल्ली, 2006।
  3. मुरली मनोहर प्रसाद सिंह (संपादक), 1857 इतिहास-कला-साहित्य, राजकमल दिल्ली, 2007।
  4. आदित्य अवस्थी, दिल्ली क्रांति के 150 वर्ष, कल्याणी शिक्षा परिषद दिल्ली, 2008।
  5. रामविलास शर्मा, भारत में अंग्रेजी राज और माक्र्सवाद, भाग-दो, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली, 1982।
  6. केशव कुमार ठाकुर, भारत का राष्ट्रीय आंदोलन, अनु प्रकाशन जयपुर, 2006।
  7. कृपाकांत झा, 1857 के महान क्रांतिकारी, लिट्रेसी हाउस दिल्ली, 2001।
  8. विजयदत्त श्रीधर, समग्र भारतीय पत्रकारिता, लाभचंद प्रकाशन इंदौर, 2001

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

Post a Comment

Previous Post Next Post