फासीवाद के प्रमुख सिद्धांत

बेनिटो मुसोलिनी का जन्म सन् 1883 में हुआ था। उसका पिता समाजवादी विचारधारा का समर्थक था, इसलिए मुसोलिनी भी अपने पिता के विचारों से प्रभावित हुआ था। उसकी माता अध्यापनकार्य करती थीं। उनकी प्रेरणा से मुसोलिनी ने भी एक छोटे स्कूल में अध्यापन प्रारंभ कर दिया। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए वह स्विट्जरलैण्ड चला गया। उसकी क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण उसे स्विट्जरलैण्ड से निष्कासित कर दिया। वहां से मुसोलिनी इटली वापस आ गया और इटली की जनता में अपने क्रांतिकारी विचारों का प्रचार करना प्रारंभ कर दिया।

सन् 1908 में सरकार ने उसे बंदी बनाकर जेल भेज दिया किन्तु कुछ समय पश्चात् उसे जेल से छोड़ दिया गया। सन् 1912 में मुसोलिनी ने विख्यात समाजवादी पत्रिका ‘अवन्ति’ का सम्पादन कार्य प्रारंभ कर दिया। इस पत्रिका में उसके अनेक लेख प्रकाशित हुए जिनके माध्यम से मुसोलिनी के राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक विचारों का ज्ञान जनता को सरलता से हो गया। उसके विचारों पर माक्र्सवाद तथा संघवाद का स्पष्ट प्रभाव था। मुसोलिनी इटली के राष्ट्रीय ध्वज एवं चर्च का कट्टर विरोधी था। 

सन् 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध प्रारंभ होने पर जब इटली की सरकार ने युद्ध से अलग रहने का निर्णय लिया तो मुसोलिनी ने सरकार के इस निर्णय की कटु आलोचना की। इस कृत्य के आरोप में उसे ‘अवन्ति’ पत्रिका के संपादन कार्य से मुक्त कर दिया गया। किन्तु साहसी मुसोलिनी निराश नहीं हुआ और अपने विचारों को निरंतर जनता में फैलता रहा। फलस्वरूप सरकार को अपना निर्णय बदलकर सन् 1915 में मित्रराष्ट्रों के पक्ष में युद्ध में सम्मिलित होने की घोषणा करनी पड़ी। इस घटना के कारण मुसोलिनी की लोकप्रियता में और अधिक वृद्धि हो गयी। उसने एक सैनिक के रूप में प्रथम विश्वयुद्ध में भाग लिया था। वह कहता था- ‘‘आज का यह युद्ध जनता का युद्ध है। कालान्तर में यह एक क्रांति के रूप में विकसित होगा।’’

इटली में फासीवादी दल की स्थापना

प्राचीन रोम में फासी (Fasces) को सत्ता का चिन्ह माना जाता था। फासी का अर्थ छडि़यों का गðर होता है।मुसोलिनी का मानना था कि व्यक्तियों को छडि़यों की भांति एकता के सूत्र में बांध कर शक्तिशाली बनाया जा सकता है। फासिस्ट के लिये एक राज्य, एक नेता, एक झण्डा महत्वपूर्ण था। फासीवाद के अनुयायी काली कमीजधारी कहलाते थे। फासीवाद चूँकि साम्यवाद का विरोधी था, अतः पूँजीवादी इससे खुश थे।

मार्च, 1919 ई. में वोल्शेविज्म के विरोध स्वरूप इटली में फासीवादी दल की स्थापना हुई। मुसोलिनी इस दल का सर्वेसर्वा प्रधान कमाण्डर था। प्रथम विश्वयुद्ध में इटली विजयी लोगों की कतार में होते हुए भी पेरिस शांति सम्मेलन से खाली हाथ वापस लौटा था। इससे इटली की जनता आक्रोशित थी। मुसोलिनी ने इटली की जनता की दुखती रग पर हाथ रखकर इटली को एक महान राष्ट्र बनाने का दावा किया। मुसोलिनी के व्यक्तित्व एवं फासीवादी सिद्धांतों के प्रति जनता का अत्यधिक उत्साह था। धीरे-धीरे इटली में फासीवादियों की संख्या बढ़ती गई। 1921 ई. में इसके 3 लाख सदस्य हो गये।

इस समय इटली का प्रधानमंत्री ग्योविनि था। फासीवाद के बढ़ते प्रभाव से इटली का राजा चिंतित था। वह समझ गया था कि इटली को ग्रह युद्ध से बचाने के लिये सत्ता मुसोलिनी को सौंपना आवश्यक है।

27 अक्टूबर, 1922 ई. को 40 हजार फासिस्ट स्वयं सेवकों के साथ मुसोलिनी ने रोम पर आक्रमण ‘मार्च आफ रोम’ किया। इन परिस्थितियों में 31 अक्टूबर, 1922 ई. को अन्ततः मुसोलिनी को प्रधानमंत्री बना दिया गया। 1925 ई. में इटली की समस्त सत्ता मुसोलिनी के हाथ में केन्द्रित हो गयी।

फासीवाद के प्रमुख सिद्धांत

फासीवाद के प्रमुख सिद्धांत निम्न थे -

1. व्यक्तिवाद विरोधी: फासीवाद व्यक्ति की स्वतंत्रता के विरूद्ध था। इसके अनुसार हर चीज राज्य के अधीन थी। वह व्यक्तिवाद का विरोधी था।

2. जनतंत्र विरोधी: मुसोलिनी ने स्वयं कहा था - ‘हम जनतंत्र के विरोधी हैं। फासीवाद राजनीतिक, चिन्तन एवं जनतंत्र के आधारभूत सिद्धांतों को अस्वीकार करता है।’

3. साम्यवाद विरोधी: नाजीवाद की तरह फासीवाद भी साम्यवाद विरोधी था। 

4. उदारवाद विरोधी: उदारवाद से सत्ता शक्ति प्राप्त नहीं कर सकती, अतः फासीवाद उदारवाद का विरोधी था। मुसोलिनी कहता था कि उदारवाद कालातीत हो चुका है।

5. शांतिवाद विरोधी: फासीवाद के अनुसार विश्व शांति की कल्पना एक धोखा है। जीवन को वे एक संघर्ष मानते थे। शक्ति के द्वारा ही सत्ता हासिल की जा सकती है। फासीवाद राष्ट्र को सैन्य राष्ट्र बनाने का समर्थक था।

इस प्रकार हम देखते हैं कि फासीवाद एवं नाजीवाद के सिद्धांत प्रायः एक ही थे। दोनों राज्य को सर्व महत्वपूर्ण मानते थे। दोनों अधिनायक तंत्र के समर्थक थे। जर्मनी में अधिनायक को फ्यूहरर एवं इटली में ड्यूस कहा गया। दोनों प्रचार, युद्ध, हिंसा के समर्थक थे। अन्तर था तो इतना कि मुसोलिनी चर्च को मानता था, नैतिकता पर बल देता था। हिटलर न तो चर्च को मानता था न वह पूर्णतः नैतिक था।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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