भोजन करने के नियम क्या है ?

भोजन करने के नियम

भोजन का उद्देश्य भूख को शान्त करना या जिह्वा की परितृप्ति नहीं है बल्कि इसका उद्देश्य शरीर पोषण के साथ-साथ मानसिक तथा आध्यात्मिक स्वास्थ्य में भी वृद्धि हो, क्योंकि शरीर, मन और आत्मा तीनों ही स्वास्थ्य के प्रमुख स्तम्भ हैं। जब तक तीनों स्वस्थ नहीं होंगे, तब तक पूर्ण स्वास्थ्य की संज्ञा नहीं दी जा सकती है। भारतीय शास्त्रों में भोजन को तीन भागों में विभक्त किया गया है। सात्विक, राजसिक और तामसिक। जो शारीरिक मानसिक तथा आध्यात्मिक रूप से अच्छा स्वास्थ्य चाहते है उन्हें सात्विक आहार करना चाहिए। जिनका उद्देश्य शारीरिक व मानसिक दोनों प्रकार से स्वस्थ रखना हो तो राजसिक भोजन करें। आहार शुद्ध होने पर मन की शुद्धि होती है व्यक्ति को अपनी इन्द्रियों पर नियन्त्रण रहता है तथा एकाग्रता आती है। शरीर के लिए हितकर भोजन वह है जो शरीर को बल देने वाला हो, क्षय का निवारण करने वाला हो, उचित ताप पैदा करने वाला हो सुपाच्य हो तथा स्मरण शक्ति आयु, सत्व, साहस, दया, सहयोग आदि बढ़ाने वाला हो ।

एक व्यक्ति को प्रतिदिन स्वास्थ्यवर्धक भोजन चाहिए। हमें प्रतिदिन कैसा भोजन खाना चाहिए जिससे कि हम निरोग रहें। ऐसा भोजन उत्तम माना जाता है जो संतुलित हो, सुपाच्य हो, पोषण देने वाला हो तथा हमारे शरीर तथा मन को स्वस्थ रखने वाला हो। 

भोजन करने के नियम 

  1. व्यक्ति हमेशा ताजा बना हुआ गर्म भोजन ही ले। भोजन सही मात्रा में ले 
  2. उचित स्थान पर बैठकर भोजन करना चाहिए, 
  3. अतिशीघ्र तथा अति मन्द गति से भी भोजन नहीं करना चाहिए। 
  4. बिना बातचीत किए बिना हंसी मजाक किए भोजन करना चाहिए तथा भोजन करते समय बीच-बीच में अल्प मात्रा में पानी पीना चाहिए।

1. हमेशा ताजा बना हुआ गर्म भोजन ही ले

ताजा बनाया हुआ गर्म भोजन स्वादिष्ट होता है। पाचन को बढ़ाता है। जल्दी पचता है तथा श्लेष्मा को कम करता है।
शरीर के जिए पोषक होता है, शक्ति वर्धक होता है, भूख एवं सौंदर्य बढ़ाता है, तथा इन्द्रियों को प्रसन्न रखता है।

2. उचित मात्रा में भोजन ले

उचित मात्रा में लिया हुआ भोजन दोषों की समता बनाए रखता है। भोजन आसानी से पचता है सही समय पर आंतों में गति करता है तथा दीर्घजीवी बनाता है। 

3. भोजन उचित साफ सुथरे स्थान पर करना चाहिए 

भोजन उचित साफ सुथरे स्थान पर तथा सभी उपकरण साथ रहने चाहिए। इससे मानसिक तथा भौतिक व्यवधान दूर होते हैं। उदाहरणार्थ दुर्गधित स्थान पर भोजन करना तथा डरावनी जगह पर भोजन करने से मानसिक व्यवधान पैदा होकर भूख तथा पाचन पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

4. भोजन तीव्र गति से नहीं करना चाहिए

भोजन तीव्र गति से नहीं करना चाहिए अन्न को धीरे-धीरे चबाकर उसी में मन लगाते हुए भोजन करना चाहिए। शीघ्र भोजन करने से एक तो भोजन के अच्छे स्वाद का ग्रहण नहीं हो पाता, भोजन लार से प्रथम पाचन से वंचित रहता है तथा भोजन का दांतों से पिसना नहीं हो पाता।

5. बहुत धीरे-धीरे भोजन न करें

बहुत धीरे-धीरे भोजन करने पर भी वह क्षुधा को शान्त नहीं कर पाता इससे भोजन शीत हो जाता है तथा अति मात्रा में भी खाया जा सकता है।

6. बिना बातचीत किए बिना हंसी मजाक किए भोजन करना चाहिए

यदि कोई व्यक्ति वार्तालाप करते हुए, हंसते हुए भोजन करता है तो इससे भोजन श्वास नली में फंसने का भय होता है तथा स्वाद का भी पता कम लगता है। भोजन लार से नहीं मिल पाता है। अतः खाये गये भोजन का उचित रूप में पाचन नहीं हो पाता है। अतः पूर्ण मनोयोग से प्रसन्न रहते हुए आहार ग्रहण करना चाहिए।

अपनी आत्मा के द्वारा यह विचार कर कि यह आहार द्रव्य मेरे लिए हितकर है तथा यह अहितकर, आहार की यह मात्रा उपयुक्त है तथा यह हीन या अत्यधिक है ऐसा विचार करके ही आहार करना चाहिए।

भोजन के कार्य

  1. शरीर का निर्माण करना। 
  2. शरीर को ऊर्जा प्रदान करना।
  3. शारीरिक क्रियाओं को नियमित करना और रोगों से सुरक्षा करना। 

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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