नैराश्य का अर्थ, परिभाषा, प्रकार, प्रभाव

व्यक्ति की बहुत इच्छायें और आवश्यकतायें होती है। व्यक्ति उनको सन्तुष्ट करने की कोशिश करता है। पर यह जरूरी नहीं है कि वह ऐसा करने में सफल ही हो। उसके रास्ते में रुकावट आ सकती हैं। वे रुकावट उसकी आशाओं को पूरी तरह से या अपूर्ण रूप से भंग कर सकती है। ऐसी दशा में वह नैराश्य का अनुभव करता है। 

उदाहरण, हम सुबह 4 बजे की गाड़ी से कोलकाता जाना चाहते हैं। समय से पहले उठने के लिए अलार्म घड़ी में चाभी लगा देते हैं, लेकिन वह बजती नहीं है। हम उठ नहीं पाते हैं और जाने से रह जाते है। या मान लीजिए कि हम समय पर स्टेशन पहुंच जाते है। पर भीड़ के कारण हमें टिकट नहीं मिल पाती है या हम गाड़ी में नहीं बैठ पाते हैं और वह चली जाती है। दोनों दशाओं में दिल्ली जाने की हमारी इच्छा में  रुकावट उत्पन्न होता है। वह पूरी नहीं होती है, जिसके कारण हम ‘नैराश्य‘ का शिकार बनते हैं।

‘नैराश्य‘ तनाव और असमायोजन की वह दशा है, जो हमारी किसी इच्छा या आवश्यकता के मार्ग में रुकावट आने से होती है। 

नैराश्य की परिभाषा

1. गुडे के अनुसार - किसी इच्छा या आवश्यकता में रुकावट  से उत्पन्न होने वाला संवेगात्मक तनाव।‘‘

2. कोलेसनिक - ‘‘नैराश्य उस आवश्यकता की पूर्ति या लक्ष्य की प्राप्ति में अवरुद्ध होने या निष्फल होने की भावना है, जिसे व्यक्ति महत्त्वपूर्ण समझता है।‘‘

नैराश्य के प्रकार

नैराश्य के दो प्रकार है-

1. बाहरी - बाहरी नैराश्य उस परिस्थिति का प्रतिफल होता है, जिसमें कोई बाहरी रुकावट, व्यक्ति को अपना लक्ष्य प्राप्त करने से रोकती है। उदाहरण, नियमों, कानूनों या दूसरों के अधिकारों या इच्छाओं का परिणाम बाहरी नैराश्य हो सकती है।

2. आन्तरिक - आन्तरिक नैराश्य उस बाधा का प्रतिफल होता है, जो स्वयं व्यक्ति में होती है। उदाहरण, भय जो व्यक्ति को अपना लक्ष्य प्राप्त करने से रोकता है या व्यक्तिगत कमियों (जैसे- पर्याप्त ज्ञान, शक्ति, साहस या कुशलता का अभाव) का परिणाम-आन्तरिक नैराश्य हो सकती है।

नैराश्य का प्रभाव

नैराश्य की दशा में  व्यक्ति चार प्रकार का व्यवहार करता है-

  1. वह आक्रमण करनेवाला बन जाता है।
  2. वह आत्मसमर्पण कर देता है।
  3. वह कुछ समय के लिए अकेले में रहनेवाला बन जाता है।
  4. वह किसी रोग से ग्रस्त होने का विचार करता है। पर यह आवश्यक नहीं है कि इस प्रकार का कोई व्यवहार करने वाला व्यक्ति-नैराश्य का शिकार है। इस विचार की समर्थन करते हुए मोर्स एवं विंगो ने लिखा है- ‘‘जो व्यक्ति, नैराश्य का शिकार होता है, वह इन चारों प्रकार के व्यवहार में से किसी प्रकार का व्यवहार करता है, पर यह जरूरी नहीं है कि इन चारों प्रकार से व्यवहारों में से किसी प्रकार का व्यवहार करने वाला व्यक्ति, नैराश्य का शिकार है।‘‘

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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