सार्वजनिक व्यय के सिद्धांत

सार्वजनिक व्यय के सिद्धांत

1. फिण्डले शिराज के सिद्धांत

प्रो0 फिण्डले शिराज ने अपनी पुस्तक 'The Science Of Public Finance' में सार्वजनिक व्यय के चार सिद्धांत बताये हैं:-
  1. लाभ का सिद्धांत
  2. मितव्ययता का सिद्धांत
  3. स्वीकृति का सिद्धांत
  4. बचत का सिद्धांत

1. लाभ का सिद्धांत

इस सिद्धांत के अनुसार सरकारी व्यय की ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि अधिकतम सामाजिक लाभ व कल्याण हो अर्थात अधिक से अधिक व्यक्तियों को अधिक से अधिक लाभ हो। इस सिद्धांत में सामाजिक कल्याण का मापन ठीक प्रकार से सम्भव नहीं। इस सिद्धांत का पालन करने के लिए ये नियम उपयोगी होते है:-

1. सार्वजनिक व्यय के ये प्रभाव होने चाहिए:- 
  1. विदेशी आक्रमण से रक्षा - लेकिन इस मद पर असीमित राशि नहीं व्यय की जा सकती ; 
  2. आंतरिक शांति तथा न्याय सुव्यवस्था ;
  3. उत्पादन को प्रोत्साहन तथा उसमें वृद्धि ; 
  4. आर्थिक असमानताओं का कम होना। 
2. सार्वजनिक व्यय पूरे समाज के हित में होना चाहिए - उससे होने वाला लाभ केवल किसी एक वर्ग क्षेत्र या व्यक्ति तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यदि सार्वजनिक व्यय से निहित स्वार्थों की स्थापना होती है या उन्हें पोषण मिलता है तो ऐसा व्यय लाभ के सिद्धांत के अनुकूल नहीं होगा। 

3. सार्वजनिक व्यय किसी नीति द्वारा बाध्य होना चाहिए।

अपवाद - आमतौर से सार्वजनिक व्यय पूरे समाज के लाभ के लिए होना चाहिए लेकिन इन दशाओं में विशिष्ट व्यय विशेष व्यक्ति, वर्ग व क्षेत्र के लिए भी वांछनीय होगा।
  1. जब कि व्यय की मात्रा बहुत कम हो; 
  2. जब कि वह व्यक्ति अथवा वर्ग न्यायालय द्वारा उस व्यय की मात्रा का अधिकार प्राप्त कर सकता हो; 
  3. जब व्यय किसी अधिकृत नीति के अनुसार हो; 
  4. जब व्यय किसी पिछड़ी जाति व क्षेत्र पर किया जाय; 
  5. जब सरकार व्यक्तियों को पुरस्कार और वजीफा दे।
अल्पकाल में चाहे यह व्यय विषेश हित में मालूम हो, लेकिन दीर्घकाल में इनसे पूरे समाज को लाभ होता है और इस लिए इस विशिष्ट व्यय को जन हित में माना जायेगा।

2. मितव्ययता का सिद्धांत

1. सार्वजनिक व्यय में अधिकतम मितव्ययता बरतनी चाहिए राज्य को केवल उतना ही व्यय करना चाहिये जितना कि किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए आवश्यक हो। इस सम्बन्ध में ये स्पष्टीकरण ध्यान देने योग्य है 
  1. मितव्ययता का अर्थ यह नहीं होता, कि व्यय किया ही न जाय। वास्तव में सरकार को व्यय सावधानीपूर्वक करना चाहिए न कि कृपणतापूर्वक। इस प्रकार मितव्ययता के अर्थ यह होंगे कि सरकार कुशलता के अभीश्ट स्तर के साथ साथ किसी अभीष्ट उद्देश्य को पूरा करते हुए कम से कम व्यय करें, कहीं यह न हो कि सरकार वाॅछनीय तथा आवश्यक व्यय को ही न करें या उसमें कटौती कर दे।
  2. आमतौर से सरकारी व्यय लाभप्रद है तब भी वह हानिकारक भी हो सकता है। हानिकारक व्यय को रोकना भी मितव्ययता होगी।
  3. मितव्ययता के सिद्धांत का एक यह भी अर्थ होता है कि धन को सरकार इस प्रकार व्यय करें कि समाज की उत्पादन कुशलता व क्षमता में अधिकतम वृद्धि हो। इसके लिए यह आवश्यक है कि सार्वजनिक व्यय का लोगों की कार्य, बचत व विनियोग करने की योग्यता तथा इच्छा पर उचित प्रभाव पड़े और आर्थिक साधनों का दुरुपयोग न हो।
महत्व: इस सिद्धांत का महत्व इन तर्कों पर आधारित है:- 
  1. सार्वजनिक व्यय की मात्रा बहुत अधिक होने के कारण अपव्यय की सम्भावना अधिक होती है।
  2. सार्वजनिक व्यय स्वभाव से अव्यक्तिगत होता है अर्थात् जो धन सरकारी कर्मचारी व्यय करते है वह उनका अपना नहीं होता। अतः सार्वजनिक व्यय में लापरवाही आने की काफी सम्भावना होती है। 
  3. सार्वजनिक व्यय में इस बात की भी सम्भावना होती है कि सरकारी कर्मचारी अपने स्वार्थों की सिद्धि के लिए धन का दुरुपयोग करें। इन कारणों से सार्वजनिक व्यय में मितव्ययता बर्तना बहुत आवश्यक है।
व्यावहारिक नियम: इस सिद्धांत का पालन करने में निम्न नियम उपयोगी सिद्ध होते हैः- 
  1. सरकारी कर्मचारी व्यय करने में उतनी सावधानी से काम लें जितनी कि वे अपने व्यक्तिगत व्यय करने में लेते है। 
  2. केवल आवश्यक मदों पर तथा अनिवार्य परिस्थितियों में व्यय हों। 
  3. सरकारी विभागों में सामग्री खरीदने के लिए टेण्डर मॅगाने चाहिए, भेजे गये माल का नमूने से मिलान करना चाहिए, निम्नतम मूल्य चुकाने चाहिए तथा भुगतान की रसीद लेनी चाहिए। 
  4. स्टोर्स में दिये गये माल का समुचित लेखा होना चाहिए। 
  5. सार्वजनिक लेखों के आडिट का समुचित प्रबन्ध होना चाहिए। 
  6. संसद में विवेकपूर्ण बहस होनी चाहिए।
लाभ:
  1. व्यय किये हुये धन से जनता को प्रत्यक्ष लाभ तुरन्त या निकट भविष्य में प्राप्त होता हुआ दिखाई देगा, जिससे कर देने से होने वाला असन्तोष कम होगा। 
  2. उचित व्यय प्रणाली से जनता में सरकार के प्रति विश्वास एवं सम्मान की भावना जागृत होती है, जिससे कि सरकार अधिक सीमा तक कर लगाने में समर्थ होती है। 
  3. उत्पादन शक्ति में उन्नति होने से समाज की करदान क्षमता बढ़ेगी और भविश्य में राज्य द्वारा अधिक आय प्राप्त होने की आशा रहेगी।
  4. अपव्यय पर अंकुश रखने से कुल कर भार कम रहेगा। 
  5. उन दशाओं में जबकि सरकार को आवश्यकतानुसार कर से आय न मिलने पर घाटे का वित्त प्रबन्ध करना पड़ता है मितव्ययता के द्वारा घाटे की मात्रा घटाकर उससे होने वाली हानिकारक मूल्य-वृद्धि से भी बचा जा सकता है।

3. स्वीकृति का सिद्धांत 

इस सिद्धांत का अभिप्राय है कि किसी भी सार्वजनिक व्यय करने से पूर्व उसकी स्वीकृति उचित अधिकारियों से प्राप्त कर ली जाय। अस्वीकृत व्यय सरकार के किसी भी विभाग या कर्मचारियों को नहीं करने चाहिए। यही नहीं, जितनी राशि व्यय करने की स्वीकृति हो उससे अधिक भी नहीं व्यय करना चाहिए। साथ ही जिस कार्य, उद्देश्य, क्षेत्र के लिए व्यय करने की स्वीकृति मिली हो उसी के लिए ही व्यय करना चाहिए। स्वीकृति तीन प्रकार की होती हैः
  1. वैधानिक स्वीकृति
  2. प्रशासकीय स्वीकृति
  3. तकनीकी स्वीकृति
1. वैधानिक स्वीकृति - जनतन्त्र की स्थापना और संसदीय प्रणाली के विकास के साथ यह आवश्यक हो गया, कि जब तक कि किसी व्यय की संसद द्वारा स्वीकृति न हो जाय, व्यय न किया जाय। इसलिये संसद तथा विधान सभाओं व परिषदों के सम्मुख सार्वजनिक आय-व्यय का बजट प्रस्तुत किया जाता है और इनकी स्वीकृति मिलने पर ही उसमें उल्लिखित व्यय किया जा सकता है। यदि किसी असाधारण व आकस्मिक व्यय के लिये वैधानिक स्वीकृति तत्काल न प्राप्त हो सके तो बाद में इस स्वीकृति का लेना आवश्यक होता है।

यह ध्यान देने योग्य बात है कि विधान सभा व संसद द्वारा स्वीकृत सम्पूर्ण व्यय का करना किसी सरकार के लिये अनिवार्य नहीं है। वास्तव में संसदीय स्वीकृति के द्वारा व्यय की अधिकतम सीमा निर्धारित की जाती है। इस सीमा से भी अधिक कोई भी सरकारी विभाग व्यय नहीं कर सकता परन्तु यदि इससे कम व्यय करने से भी काम निकल जाय तो सबकी सब राशि व्यय करने के लिये सरकार बाध्य नहीं होती। दूसरे शब्दों में, वैधानिक स्वीकृति आदेशक नहीं होती।

2. प्रशासकीय स्वीकृति - वैधानिक स्वीकृति के पश्चात भी विभिन्न विभागों में उच्चाधिकारियों की उचित स्वीकृति प्राप्त करना आवश्यक होगा। इससे सार्वजनिक व्यय एक नियमित तथा नियंत्रित रूप में केवल आवश्यकता के समय पर ही होता है। उच्चाधिकारी अपने नीचे के अधिकारियों को इस प्रकार की स्वीकृति देते समय यह ध्यान रखते है कि वैधानिक स्वीकृति के भीतर ही सम्बन्धित विभाग में किस समय क्या व्यय किया जाय और एक निश्चित अवधि में कितनी बार में वह व्यय हो।

3. तकनीकी स्वीकृति - जब कभी सरकार को ऐसे कार्यो पर व्यय करना होता है कि जिनको पूरा करने के लिए तकनीकी समस्याओं को हल करना होता है तो सरकार व्यय करने से पहले विषेशज्ञों की अनुमति प्राप्त करती है इस अनुमति को ही तकनीति स्वीकृति कहते है।

इस स्वीकृति की आवश्यकता निर्माण कार्यो में विषेश रूप से होती है जैसे सड़के बनाना, नहर, बाॅध, विद्युत-योजना, लोहा-स्पात कारखाना आदि। कारण यह है कि विशेषज्ञ ही बता सकते है कि किसी एक योजना को जिसे सरकार जरूरी समझ रही है पूरा करना वास्तव में सम्भव भी है या नहीं और उसमें कितना व्यय होने की आषा है।

तकनीकी स्वीकृति स्वभाव से सलाहकारी होती है, और इसका मानना या न मानना सरकार पर निर्भर करता है इसके अलावा यह स्वीकृति वैधानिक तथा प्रशासकीय स्वीकृतियों से पहले ही प्राप्त की जाती है।

उपयोगी नियम: स्वीकृति के सिद्धांत को कार्यान्वित करने के लिये निम्न व्यावहारिक नियम उपयोगी सिद्ध होते है:
  1. प्रत्येक विभाग के अधिकारी तथा उप-अधिकारियों के लिए अधिकतम व्यय की सीमा-निर्धारण होना चाहिए। 
  2. किसी अधिकारी द्वारा ऐसे व्यय के लिए स्वीकृति नहीं देना चाहिये कि जिसके आगे चलकर, इतने बढ़ जाने की आशंका हो, कि उसकी स्वीकृति देना, उसके अधिकार से बाहर हो।
  3. ऋणों द्वारा किया हुआ धन केवल उन्हीं कार्यों पर व्यय होना चाहिये, जिनके लिये ऋण लिये गये हो।
  4. प्रयेणात्मक व्यय को ऋण लेकर नहीं करना चाहिये। 
  5. ऋण लिये जाने पर उसकी वापसी के लिये षोधन-कोश की व्यवस्था होनी चाहिये।
लाभ:
  1. मितव्ययता तथा अपव्यय से बचाव 
  2. सार्वजनिक कार्यों में देरी न होना 
  3. आवश्यक कार्यों को करने में धन का अभाव न होना 
  4. सार्वजनिक व्यय निर्धारित नीति के अनुसार होना

4. बचत का सिद्धांत

इस सिद्धांत के अनुसार सरकार को अपने बजट में व्यय से अधिक आय रखनी चाहिए जिससे कि बजट में कुछ बचत हो जाय। दूसरे शब्दों में, सरकार को अपने बजट में बचट दिखानी चाहिए। फिन्डले षिराज के अनुसार, यदि किसी राज्य का बजट बचत दिखाता है तो उससे देश के वित्त मंत्री की कुषलता का परिचय मिलता है।

आवश्यकता: इस बचत की आवश्यकता निम्न कारणों से होती है:- 
  1. बजट में किये गये व्यय के अनुमान से अधिक व्यय वास्तव में करना पड़े।
  2. परिस्थिति में परिवर्तन होने के कारण अनुमानित व्यय से अधिक व्यय करना पड़े। 
  3. आकस्मिक दुर्घटना के कारण असाधारण व्यय करना पडे़।
कठिनाइयाॅ: ऐसी स्थिति में यदि बचत नहीं होगी तो ये कठिनाइयाॅ आवेगीः- 
  1. सार्वजनिक कार्यों को पूरा करने में देरी होगी।
  2. सार्वजनिक कार्यों को धन के अभाव से अधूरा छोड़ना पडे़गा, जिससे कि जो कुछ व्यय हुआ भी होगा वह भी बेकार जावेगा। 
  3. धन के उपयोग से जनता में असंतोष उत्पन्न होगा। अतः बजट में बचत रखना चाहिये। लेकिन यह बचत बहुत अधिक नहीं होना चाहिए क्योंकि फिर कर का भार अधिक होगा और इसके अनुचित प्रभाव होवेंगे।

अन्य सिद्धांत

1. लोच का सिद्धांत

इस सिद्धांत का तात्पर्य है कि व्यय का सामान्य ढाॅचा लचीला हो अर्थात् राजकीय व्यय में आवश्यकतानुसार परिवर्तन हो सके। यह उल्लेखनीय है कि सार्वजनिक व्यय में वृद्धि करना तो सरल होता है पर आपत्ति काल में बहुधा उसे घटाना आसान नहीं होता और न ही यह सरल होता है कि किसी एक मद पर व्यय को घटाकर, दूसरी मद पर व्यय को बढ़ाया जा सके। इसलिये यह अत्यधिक आवष्यक है, कि राजकीय व्यय का ढाॅचा ऐसा लचीला हो, कि संकट के समय उसमें कमी की जा सके।

2. उत्पादकता का सिद्धांत

जो सार्वजनिक व्यय पूॅजी निर्माण की गति बढ़ाने नये-नये उद्योगो की स्थापना करने बेकारी दूर करने, रोजगार के अवसर बढ़ाने उपभोग वस्तुओ का उत्पादन बढ़ाने जनता का स्तर उठाने तथा सामाजिक हित अग्रसर हित अग्रसर करने में सहायक हो वे उत्पादक कहे जायेगें और उचित होंगे। यही कारण ह कि एक सीमा तक सुरक्षा व्यय भी उत्पादक माना जाता है, क्योंकि वह राजनैतिक षांति के लिये आवष्यक है, और बिना राजनैतिक षंाति के कोई भी उत्पादन कार्य सम्भव नहीं। इसी प्रकार सामाजिक सेवाओं तथा सामाजिक सुरक्षाओं पर होने वाला व्यय भी उत्पादक होता है, क्योंकि उससे व्यक्तियों की कार्य क्षमता में वृद्धि होती है।

3. न्यायपूर्ण वितरण का सिद्धांत

सार्वजनिक व्यय का उचित होना इस बात पर भी निर्भर करता है, कि कहाॅ तक वह धन के वितरण में समानता उत्पन्न करने में सहायक हुआ है। विषेश रूप में अर्द्ध विकसित तथा पिछडे़ हुये देषों में तो यह ध्येय बहुत महत्व का होता है। इस दृश्टि से निर्धन वर्ग के लोगो का जीवन स्तर सुधरेगा और इस व्यय के बिना वे इन सुविधाओं से वंचित रह जाते। दूसरी और ऐसा व्यय जो घनी वर्ग के लाभ के लिये हो धन की असमानताये बढ़ाएगा और इस सिद्धांत के प्रतिकूल होगा।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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