कंक्रीट क्या है और इसके प्रकार

कंक्रीट (concrete) पृथ्वी पर सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली मानवनिर्मित निर्माण सामग्री है। आसानी से उपलब्ध कच्चे माल से उत्पादित कंक्रीट में ताकत, स्थायित्व और बहुआयामी गुण होने के कारण सभी तरह के निर्माण कार्यों के लिए सही है। मूल रूप में, यह एक समुच्चय मिश्रण है, जिसमें रेत और बजरी या पानी और सीमेंट होता है। कंक्रीट मिश्रण में सीमेंट के 10 से 15% तक की मात्रा होती है। हाइड्रेशन प्रक्रिया (रसायनिक प्रक्रिया) द्वारा, कंक्रीट कठोर होकर चट्टान जैसी सख्त द्रव्यमान में परिवर्तन हो जाती है। आज यह बुनियादी ढांचे, उद्योग और आवास के विकास का अपरिहार्य अंग है। कंक्रीट के बिना हमारी आधुनिक जीवन शैली के वर्तमान स्वरूप की कल्पना भी नहीं की जा सकती है और न ही हम विकास के लक्ष्यों को हासिल कर सकते हैं।

कंक्रीट का इतिहास

कंक्रीट अपनी खोज और विकास का एक लंबा सफर तय कर चुका है। गीज़ा में ग्रेट पिरामिड से लेकर आधुनिक युग की बहुमंजिलें इमारतें तक। कंक्रीट के इतिहास में उल्लेखनीय घटनाओं और खोजों के क्रमानुसार विवरण निम्न हैंः

सबसे पहले 5000 साल पहले, पिरामिडो के निर्माण के लिए मिस्र में कंक्रीट के शुरुआती रूपों का उपयोग किया गया था। उन्होंने ईंट बनाने के लिए मिट्टी और पुआल को मिलाया और मोर्टार बनाने के लिए जिप्सम और चूने का इस्तेमाल किया था।

प्राचीन रोम वासियों (300 ईसा पूर्व से 476 ईसा पूर्व तक) ने निर्माण संरचनाओं में एक ऐसी सामग्री का इस्तेमाल किया था, जो कि आधुनिक रूप से सीमेंट के काफी करीब है, जिससे उन्होंने कई वास्तुशिल्प चमत्कारों, जैसे कि कैल्सियम और पैंथियन का निर्माण किया था। रोम वासियों ने अपने सीमेंट में पशु उत्पादों को भी प्रारंभिक रूप में इस्तेमाल किया। कुछ लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए उपयोग किए जाने वाले एडिमिक्सर, परिवर्धन आज भी उपयोग किए जाते हैं।

इंग्लैंड के जोसेफ एस्पिन को आधुनिक पोर्टलैंड सीमेंट के आविष्कार का श्रेय दिया जाता है। उन्होंने 1834 ई में आधुनिक पोर्टलैंड सीमेंट का आविष्कार किया। 1930 में, फ्रीजिंग और विगलन से होने वाले नुकसान से बचाव के लिए कंक्रीट में पहली बार एयर इन्टरेनिंग एजेंट का उपयोग किया गया था।

अपने शुरुआती स्वरूप से अब तक, कंक्रीट के वर्तमान स्वरूप में कई महत्वपूर्ण बदलाव आ चुके हैं। आज मिक्स डिज़ाइन करते समय, कई तरह के पहलूओं को ध्यान में रखा जाता है। इसके अलावा कई तरह के एडमिक्सर को आवश्यकतानुसार इस्तेमाल में लाया जाता है।

कंक्रीट के प्रकार

विभिन्न प्रकार की कंक्रीट निर्माण कार्यों के लिए उपयोग की जाती है। कुछ महत्वपूर्ण कंक्रीट के प्रकार हैं-

1. प्लेन सीमेंट कंक्रीट

इस कंक्रीट में रेत, बजरी, सीमेंट और पानी का मिश्रण होता है। प्लेन सीमेंट कंक्रीट की कम्प्रेसिव स्ट्रेन्थ काफी अच्छी होती है लेकिन टैन्साइल स्ट्रेन्थ कम होती है। प्लेन सीमेंट कंक्रीट के ब्यौरे के लिए आई एसः 456 का उपयोग किया जाता है। इस कंक्रीट की कम्प्रेसिव स्ट्रेन्थ 10 MPa-60 MPa और वाटर-सीमेंट अनुपात 0.40 से 0.60 तक होता है। यह पथ, इमारतों, बाँध, सुरंग की लाइनिंग आदि के निर्माण में उपयोग की जाती है।

2. रेन्फोस्र्ड सीमेंट कंक्रीट

इस कंक्रीट में रेत, बजरी, सीमेंट और पानी के अलावा स्टील या अन्य टैन्साइल पदार्थ का उपयोग किया जाता है। कंक्रीट की कंप्रेसिव स्ट्रेन्थ काफी अच्छी होती है और स्टील के कारण कंक्रीट की टैन्साइल स्ट्रेन्थ भी बढ़ जाती है। रेन्फोस्र्ड सीमेंट कंक्रीट के ब्यौरे के लिए आईएसः 456 का उपयोग किया जाता है। इस कंक्रीट में वाटर-सीमेंट अनुपात 0.40 से 0.60 तक होता है। इस कंक्रीट का उपयोग स्तंभ, छज्जा, छत, रिटेनिंग वाल, वाटर टेंक, पुल आदि के निर्माण में किया जाता है।

3. हाई परफाॅर्मेंस कंक्रीट

इस कंक्रीट में केवल रेत, बजरी, सीमेंट और पानी का मिश्रण ही होता है, लेकिन मिश्रण को इस तरह बनाया जाता है कि स्थायित्व और क्षमता सामान्य कंक्रीट से अधिक होती है। हाई परफाॅर्मेंस कंक्रीट के लिए आईएसः 10262 का उपयोग किया जाता है। इस कंक्रीट में वाटर-सीमेंट अनुपात 0.35 या 0.35 से कम होता है।

इस कंक्रीट की स्ट्रेन्थ कम से कम 50 MPa होती है। इस कंक्रीट का उपयोग पानी वाली जगह कंक्रीट करने, नाभिकीय सयंत्रों, समुद्री संरचना आदि के निर्माण में किया जाता है।

4. अल्ट्रा हाई परफाॅर्मेंस कंक्रीट

इस कंक्रीट में पोर्टलेन्ड सीमेंट, सिलिका फ्यूम, क्वाट्जऱ् फ्लोर, फाइन सिलिका सैंड हाई रेंज वाटर रिडूसर, पानी, स्टील या ऑर्गेनिक फाइबर का उपयोग किया जाता है। इस कंक्रीट में वाॅटर-सीमेंट अनुपात कम होता है। इस कंक्रीट की स्ट्रेन्थ कम से कम 120 MPa होती है। यह कंक्रीट अपनी क्षमता और स्थायित्व के कारण महŸवपूर्ण स्थानों पर प्रयुक्त की जाती है। जैसे पुल, प्री- कास्ट पाइल्स, प्री- स्ट्रेस ग्रीडर्स इत्यादि के निर्माण में।

5. अन्य प्रकार 

इसके अलावा कुछ कंक्रीट के प्रकार हैं- प्री-स्ट्रेसड कंक्रीट, प्रीकास्ट कंक्रीट, हाइ डेंसिटी कंक्रीट, रेडी मिक्स कंक्रीट, हाइ स्ट्रेन्थ कंक्रीट शाॅटक्रीट कंक्रीट, रोलर काॅमपैक्टिड कंक्रीट, रैपिड स्ट्रेन्थ कंक्रीट आदि।

कंक्रीट की गुणवत्ता के लिए परीक्षण विधियां

इस्तेमाल हो रहे सीमेंट की गुणवत्ता के परीक्षण के लिए सेटलिंग टाइम, साउंडनेस फाइनेस माॅड्य्ाूलस, कंप्रेसिव स्ट्रैंथ आदि के परीक्षण किए जाते हैं। 

एग्रीगेट (बजरी) की गुणवत्ता के लिए ग्रडेसन वैल्यू, फाइननेस माॅड्यूलस, स्पेसिफिक ग्रेविटी, वांटर एबसोरप्शन, इंपेक्ट वैल्यू, क्रसिंग वैल्यू, फलैकीनेस एंड इलोगेशन आदि परीक्षण किए जाते हैं। इस्तेमाल हो रहे एडमिक्शचर के लिए रिलेटिव डेंसिटी, पीएच, ड्राई मैटेरियल कंटेंट तथा क्लोराइड कंटेंट आदि के परीक्षण कराए जाते हैं। इसके अलावा प्रत्येक तीन माह में इस्तेमाल हो रहे जल की गुणवत्ता का परीक्षण कराया जाता है, जिसमें क्षारता व कठोरता आदि शामिल हैं। 

कंक्रीट पर किए जाने वाले कुछ मुख्य परीक्षण इस प्रकार हैं-

1. स्लंप टेस्ट- फ्रेश कंक्रीट पर होने वाले परीक्षणों में से, यह सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण है। इस परीक्षण के द्वारा कंक्रीट की कार्य क्षमता की जांच की जाती है। वर्कएबिलिटी पैरामीटर, कंक्रीट के कई सारे गुणों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। फ्रेश कंक्रीट की गुणवत्ता के परीक्षण के लिए सैंपल, कंक्रीट के उपयोग होने से पहले, बैचिंग प्लांट से लिए जाते हैं और अविलंव उनका परीक्षण वहीं साइट पर ही किया जाता है।

2. कंप्रेसिव स्ट्रैंथ टेस्ट- कठोर कंक्रीट पर होने वाला यह सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण है। इस परीक्षण के द्वारा कंक्रीट की कंप्रेसिव स्ट्रैंथ की माप की जाती है। कठोर कंक्रीट के कंप्रेसिव स्ट्रैंथ की जांच के लिए सैंपल का कलेक्शन बैचिंग प्लांट या इस्तेमाल की जगह से किया जाता हैं। सैंपल कलेक्शन करने की एक खास विधि है, जिसके अनुसार सैंपलिंग किया जाता है, तदुपरांत, इसे अनुकूलित ताप और आद्रता पर रखा जाता है।

इनकी कंप्रेसिव स्ट्रैंथ का परीक्षण क्रमशः 7 व 28 दिनों में कम से कम तीन-तीन सैंपलों पर किया जाता है। 7 दिन की कंप्रेसिव स्ट्रैंथ 28 दिनों की कंप्रेसिव स्ट्रैंथ का लगभग 70% होनी चाहिए। यह स्ट्रैंथ पूर्व निर्धारित मापदंड के अनुरूप होनी चाहिए, ऐसा न होने के स्थिति में कंक्रीट के उस स्लाॅट को पूर्णतः खारिज कर दिया जाता है।

किसी भी निर्माण कार्यों के किए गुणवत्ता नियंत्रण एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है ये न केवल कार्यों की गुणवत्ता सुनिश्चित करती हैं बल्कि निर्माण कार्यों की अपने निर्धारित लक्ष्य को हासिल कर सके, ये भी सुनिश्चित करती है। निर्माणावधि के दौरान कार्यों के गुणवत्ता नियंत्रण पर खास जोर दिया जाता है।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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