भाषा के कार्य क्या है ?

भाषा क्या है? “भाषा वह साधन है जिसके माध्यम से हम अपने विचारों को दूसरों पर व्यक्त करते हैं या सोचते हैं।” इस प्रकार भाषा मुंह से उच्चारित ध्वनियों द्वारा अभिव्यक्ति के साथ-साथ मौन चिंतन का साधन एवं सांकेतिक अभिव्यक्ति भी है। परंतु यदि हम थाडे ़ी गहराई में जाकर समझें तो भाषा केवल अभिव्यक्ति का साधन मात्र नहीं  है अपितु यह सोचने, समझने, महसूस करने एवं चीजांे से जुड़ने का भी माध्यम है।

भाषा की परिभाषा

कुछ अन्य भाषाविदों द्वारा दी गई भाषा की परिभाषाएं इस प्रकार हैं-

ब्रिटेनिका एनसाइक्लोपीडिया के अनुसार, “भाषा यादृच्छिक मौखिक प्रतीकों की व्यवस्था है जिसके द्वारा मनुष्य समाज का सदस्य तथा संस्कृति का प्रतिभागी होने के नाते परस्पर क्रिया-प्रतिक्रिया एवं विचारों का आदान-प्रदान करता है।”

कामता प्रसाद गुरु के अनुसार, “भाषा वह साधन है, जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचार दूसरों पर भली-भांति प्रकट कर सकता है और दूसरों के विचार स्पष्टतया समझ सकता है।”

क्रोचे के अनुसार, “भाषा ऐसी ध्वनियों का संगठन है जो अभिव्यक्ति की दृष्टि से उच्चरित एवं सीमित है।”

स्वीट के अनुसार, “विचारों को ध्वयन्यात्मक शब्दों द्वारा प्रकट करने का साधन ही भाषा है।”

बान्द्रिए के अनुसार, “भाषा एक प्रकार का संकेत है। संकेत से तात्पर्य  उन प्रतीक चिह्नों से है जिनके द्वारा मनुष्य अपने विचारों को प्रकट करता है। जैसे- नेत्रग्राह्य, कर्णग्राह्य, स्पर्शग्राह्य। कर्णग्राह्य प्रतीक ही भाषा की दृष्टि से मान्य है।”

ब्लॉक एवं ट्रागोर के अनुसार, “भाषा यादृच्छिक मौखिक प्रतीकों की व्यवस्था है जिसके द्वारा एक मनुष्य समुदाय के लोग परस्पर विचारों का आदान-प्रदान करते हैं।”

भाषा के कार्य

भाषा के निम्न कार्य होते हैं -

1. भाषा की सबसे बड़ी उपयोगिता यह है कि यह हमारे भावों एवं विचारों की अभिव्यक्ति का साधन है। जब हम किसी भाषा को सीखने लगते है तो हमारे भीतर भाव एवं विचार स्फुरित होने लगते हैं। भाषा किसी बालक के शारीरिक एवं मानसिक विकास के साथ जुड़ी हुई होती है। हमारे भावों एवं विचारों की अभिव्यक्ति का समाज में बहुत महत्व है। व्यक्तियों का पारस्परिक संबंध भाषा द्वारा ही सभ्ंव है। परस्पर वार्तालाप, किसी भी मुद्दे पर विचार विमर्श करना, सामाजिक आयोजनों में सहभागिता आदि भाषा के द्वारा ही संभव है।

2. मनुष्य के भावों का भाषा के साथ गहरा संबंध है। ओग्डेन और रिचर्ड के अनुसार भाषा के दो भेद है- भावात्मक एवं प्रतीकात्मक। भावात्मक भाषा को वे संवेगों की भाषा कहते हैं जबकि प्रतीकात्मक भाषा वह है जो चिंतन से संबंधित है। भाषा के द्वारा ही किसी बच्चे का भावात्मक विकास किया जा सकता है। किसी भी भाषा के साहित्य के द्वारा प्रेम , उल्लास, क्रोध, करुणा आदि मनोवेगों का उदात्तीकरण किया जा सकता है।

3. भाषा के द्वारा किसी बच्चे की सृजनात्मकता का विकास किया जा सकता है। विशेषतः मातृभाषा में बच्चे की सृजनात्मक शक्ति का विकास होता है। ऐसा क्यों होता है? इस संदर्भ में निरंजन कुमार सिंह लिखते हैं- “मातृभाषा का संबंध अपने भौगोलिक, प्राकृतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश तथा उसके परंपरागत इतिहास से जुड़ा होता है। इस परिवेश में ही उसका उद्भव और विकास हुआ रहता है, अतः व्यक्ति का संबंध केवल बाह्य साधन के रूप में न होकर आंतरिक भावात्मक रूप ग्रहण कर लेता है।”

4. भाषा का संबंध हमारी बुद्धि एवं उसके विकास से है। ऐसे कई प्रयोग हुए है जहां यह सिद्ध किया गया है कि जिन बच्चों में भाषायी क्षमता का विकास नहीं हो पाता वे बुद्धि परीक्षाओं में सफल नहीं हो पाते। (जी. एस. थॉमसन, 1924) भाषा का हमारी विचार प्रक्रिया से संबंध होता ा है। भाषा के बिना हमारी बुद्धि सक्रिय नहीं हो पाती। भाषा हमारी बुद्धि को क्रियाशील एवं प्रखर बनाती है।

5. भाषा हमारी समस्त सामाजिक क्रियाओं का आधार है। प्रसिद्ध भाषाविद ब्लमू फील्ड इस संदर्भ में लिखते है कि “मनुष्य के समस्त व्यवहार एवं क्रिया-कलापां े का आधार भाषा है क्योंकि बाह्य एवं आंतरिक उत्तेजना के फलस्वरूप व्यक्ति की प्रतिक्रिया जब तक वाणी के रूप में नहीं प्रकट होती तब तक क्रिया-सम्पादन में दूसरों का सहयोग नहीं प्राप्त होता।” मनुष्य एक भाषायुक्त सामाजिक प्राणी है। भाषा मात्र विचारों का सम्प्रेषण नहीं है अपितु यह सामाजिक नियंत्रण का साधन भी है। हम जिस भाषा में व्यवहार करते हैं उसमें हमारे सामाजिक जीवन की परंपरा, रीति-नीति, आचरण आदि का ज्ञान भी निहित होता है।

6. भाषा हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है। किसी भी क्षेत्र की भाषा में वहाँ की संस्कृति निहित होती है। किसी भी भाषा के अध्ययन से हम उस क्षेत्र की संस्कृति से, वहाँ के निवासियों से भी जुड़ाव महसूस करते है। डॉ. रामविलास शर्मा अपनी पुस्तक ‘भाषा और समाज’ में लिखते हैं कि “हम अपने भाषा के शब्दों को इसलिए प्यार नहीं करते कि वे विभिन्न पदार्थों और व्यापारांे की ओर संकेत करते है बल्कि इसलिए भी कि वे हमारे हैं, उनसे हमारा एवं हमारे पूर्वजों का संबंध रहा है। इसलिए भारतीय बच्चे जब मां को मम्मी और पिता को डैडी कहते हैं तो वस्तुगत अंतर न होता हुए भी हमें अच्छा नहीं लगता।” हमारे सांस्कृतिक विकास के साथ-साथ हमारी भाषा का भी विकास होता है।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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