लक्ष्मीनारायण लाल का जीवन परिचय, लक्ष्मीनारायण लाल की रचनाएं

लक्ष्मीनारायण लाल का जीवन परिचय

आधुनिक युग में भारतीय भाषाओं में गद्य का संपूर्ण विकास हुआ और गद्य की कई विधाओं में साहित्य का सृजन समृद्ध मात्रा में हुआ है । नाटक, उपन्यास, कहानी, आत्मकथा, जीवनी, समीक्षा और निबंध साहित्य का सृजन पर्याप्त मात्रा में हुआ है । कई प्रतिभाशाली रचनाकारों ने अपनी कृतियों से आधुनिक हिन्दी गद्य साहित्य को सुसंपन्न बनाया है । भारतेन्दु युग से ले कर वर्तमान युग तक कई चरणों में हिन्दी नाटक साहित्य का विकास संपन्न हुआ है । नाटक श्रव्य एवं दृश्य काव्य है । अन्य साहित्यिक विधाओं तुलना में पाठकों या दर्शकों को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण एवं लोकाप्रिय विधा के रूप में हिन्दी नाटक का विकास हुआ है । 

युगीन परिवेश से वस्तु का चयन कर, रंग मंच के अनुकूल बना कर कई हिन्दी नाटककारों ने सामान्य लोगों को मनोरंजन प्रदान करने और युगीन समस्याओं से उन्हें परिचित कराने का प्रशंसनीय कार्य किया है ।

लक्ष्मीनारायण लाल का जीवन परिचय

डाॅ. लक्ष्मीनारायण लाल का जन्म 4 मार्च, 1925 को बस्ती जनपद के ग्राम जलालपुर में हुआ। 

डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल के पिता का नाम श्री शिवसेवक लाल तथा माँ मूंगामोती था । वे अपने माता – पिता की दूसरी सन्तान और मँझले पुत्र थे । उनके बड़े भाई का नाम बलदेव लाल तथा छोटे भाई का नाम कमलालाल था । श्यामा और सावित्री दो बहनें थी । माँ बड़ी ही धार्मिक प्रकृति की सीधी - साधी सरल महिला थीं और भक्ति के संस्कार डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल को माँ मूंगादेवी से प्राप्त हुए । पिता सेवक लाल ग्राम पटवारी थे । पारिवारिक बोझ से दबे होने के कारण आर्थिक संकटों से ग्रस्त थे । बड़े भाई बलदेव प्रसाद आयु में दस वर्ष बड़े थे और हाईस्कूल पास करके नौकरी में लग गए ।

लक्ष्मीनारायण लाल की प्रारंभिक शिक्षा ग्राम बहादुरपुर के प्राइमरी स्कूल में संपन्न हुईं । इसके बाद उन्होंने ऐंग्लो हाई स्कूल, बस्तीमें कक्षा आठ पास किया, तब वहीं स्थित सकसेरिया कॉलेज से 1946 में इण्टर पास किया । लक्ष्मीनारायण लाल तो आगे पढ़ना चाहते थे, लेकिन घर की आर्थिक परिस्थिति उन्हें इसकी इजाजत नहीं दे रही थी । इन सबके बावजूद लाल ने निश्चय कर लिया कि वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी. ए. पास करेंगे और वे घर में किसी को बताए बिना, संघर्षो से जूझने इलाहाबाद पहुँच गए । “अगस्त के महीने में प्रवेश पाना असंभव ही था, लेकिन लक्ष्मीनारायण ने अपना साहस नहीं छोड़ा। कई दिन चक्कर काटने के बाद उपकुलपति डॉ. अमरनाथ झा से उनकी भेंट हुईं । जब लक्ष्मीनारायण लाल ने बी. ए. में प्रवेश दिलवाने की प्रार्थना की, तब उपकुलपति ने उनसे पूछा कि उसमें कौन से ऐसे सुरखाव के पर लगे हैं जो इतने विलम्व के बावजूद प्रवेश दिया जाए लक्ष्मीनारायण लाल के जवाब ने उपकुलपति को प्रवेश प्रवेश देने पर बाध्य कर दिया, “मौका आने पर यह दिखाया जा सकता है कि मुझमें कौन से सुरखाव के पर लगे हुए हैं । ” लक्ष्मीनारायण लाल ने उसे सचकर दिखाया । डॉ. अमरनाथ झा मुख्य अतिथि बनकर आए जव विश्वविद्यालय में लक्ष्मीनारायण लाल का प्रथम एकांकी “ताजमहल के आँसू " का प्रदर्शन किया गया । उपकुलपति ने जव लक्ष्मीनारायण लाल को बुलवाया तब उन्होंने याद दिलाई - " सर में वही हूँ जिससे आपने एक दिन कहा था कि तुम में ऐसे कौन से सुरखाव के पर हैं जिससे विश्वविद्यालय में प्रवेश दिया जाए । सर, यह सुरखाव का एक पर है । उपकुलपति जी को पुरानी उनके व्यक्तित्व के अंग बन गए जिनका साथ उन्होंने अंत तक निभाया ।

उनकी दादी माँ ने उन्हें 'झड़की' नाम दिया । जलालपुर वह सुन्दर श्यामला भूमि है, जिसमें 'कुआनों' और 'मनोरमा' जैसी नदियों का कलकल निनाद करता पानी हमेशा अपने यौवन का परिचय देता रहता है तो दूसरी ओर हरियाली मन को मोह लेती तीसरी ओर गाँव के उसी परिवेश में बचपन ने जब आँख खोली जहाँ बहुरूपिया, नोटंकी, विदेसिया, सफेदी, कट घाड़वा और रामलीला तथा कृष्णलीला आदि लोक मंचीय नाट्य प्रकार कानों में लोरी के माध्यम से अज्ञात रूप से नाट्य संस्कार हृदय पर अंकित करने लगे । प्रकृति इनकी सहचरी बनी, गाँव के खेतों में परिश्रम करने वाला किसान और मजदूर का पसीना कठोर परिश्रम के पाठ सिखाने लगा तो 'मनोरमा' की लहरों के विरुद्ध दिशा में तैरने की क्रिया ने सारे समाज के विरुद्ध अकेले खड़े रहने का साहस दिया । इसीलिए " डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल का नाटकीय बोध जितना ही सूक्ष्म है उतना सहज भी लगता है, जैसे छुटपन से ही उन्होंने जीवन को एक जन्म जात नाटककार की दृष्टि से देखा है, जीवन के सुख और दुःख, द्वन्द्व और संघर्ष, तड़प और पुलक, फूल और शूल से भरे प्रत्येक रूप और दृश्य को बारी - वारी मुग्ध और विस्मित आँखों से परखा है ।

लक्ष्मीनारायण लाल ने अपने साहित्य जीवन में अनेक नाटक का सृजन करके हिंदी नाट्य-साहित्य की अभिवृद्धि में योगदान दिया।

डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल अपने जीवन में भिन्न- भिन्न संदर्भों में कई पुरस्कार प्राप्त किए और सम्मानित होते रहे -

1967 – “रातरानी” पर तथा 1970 में “करफ्यु” नाटक पर अखिल भारतीय - |कालीदास पुरस्कार

1977 - उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार

1977 – हिन्दी के प्रमुख नाटककार के लिए “राष्ट्रीय संगीत नाटक" का अकादमी पुरस्कार ।

1979 - हिन्दी साहित्य क्षेत्र में महत्वपूर्ण 'योगदान के लिए साहित्य कला परिषद दिल्ली द्वारा पुरस्कृत हुए ।

1987 – ‘गली अनार कली' उपन्यास के लिए "हिन्दी अकादमी दिल्ली" द्वारा - पुरस्कृत ।

1988 – भारतीय नाटक संघ द्वारा (मरणोपरान्त) पुरस्कार दिया गया ।

लक्ष्मीनारायण लाल की रचनाएं

डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल ने नाटकों के अलावा उपन्यासों की भी रचना की । उन्होंने 15 उपन्यास लिखे । उनके उपन्यास हैं :- (1 ) धरती की आँखें ( 2 ) वया का घोंसला और सॉप ( 3 ) काले फूल का पोधा रूपा जीवा (5) मन वृन्दावन (6) बड़ी चम्पा छोटी चम्पा ( 7 ) वडके भैया ( 11 ) श्रृंगार ( 12 ) बसंते की प्रतीक्षा ( 13 ) देवीनर ( 14 ) पुरूषोतम ( 15 ) कली अनारकली ।

उन्होंने निम्न लिखित कहानी संग्रहों की रचना की -  ( 1 ) सूने आंगन रस बरसे ( 2 ) एक स्वर : नई रेखाएँ ( 3 ) एक और कहानी ( 4 ) एक बूंद जल ( 5 ) डाकू आए थे (  ) आने वाला कल

इन्होंने निम्न जीवनियाँ लिखीं - ( 1 ) जयप्रकाश ( 2 ) अंधकार में एक प्रकाश : जयप्रकाश ( 3 ) स्वराज और घतश्यामदास

डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल के लेखकीय जीवन का प्रारंभ एकांकियों से ही हुआ एकांकी रचना करने में लक्ष्मीनारायण लाल का उद्देश्य कम समय में दर्शकों को सहज, स्वभाविक मनोरंजन प्रदान करना था । लक्ष्मीनारायण लाल के कुल छह एकांकी संग्रह प्रकाशित हुए ।  ( 1 )  ताजमहल के आँसू ( 2 )  पर्वत के पीछे ( 3 )  नाटक बहुरंगी ( 4 )  नाटक बहुरुपी ( 5 ) मेरे श्रेष्ठ एकाँकी ( 6 )  दूसरा दरवाजा ( 7 ) खेल नहीं नाटक ( 8 ) नया तमाशा

 उन्होंने लगभग 16-17 नाटकों की रचना की है। उनके प्रमुख नाटकों का परिचय इस प्रकार हैं- ( 1 ) मादा कैक्टस ( 2 )  अंधा कुआं ( 3 )  दर्पण ( 4 )  कलकी ( 5 )  मिस्टर अभिमन्यु ( 6 )  सूर्यमुख ( 7 )  कफ्र्यू ( 8 )  सुंदर रस ( 9 )  रक्त कमल ( 10 )  अब्दुल्ला दीवाना

1. अँधा कुआँ (1955) :- अँधा कुआँ से ही डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल पुर्णागी नाटककार के रूप में उभरकर आते हैं । अँधा कुआँ उनका पहला नाटक है । जिनकी रचना सन् 1955 में की गई । प्रस्तुत नाटक अँधा कुआँ की कहानी ग्रामीण जीवन पर आधारित है । नाटककार लक्ष्मीनारायण लाल ने जलालपुर गाँव के एक किसान परिवार में घटने वाली घटनाओं को आधार बनाकर भारतीय ग्रामीण जीवन की आंतरिक विसंगतियों को उजागर करने की कोशिश की है । आज़ादी (1947) के बाद के भारतीय ग्रामीण जीवन की गतिविधियों का चित्रण अँधा कुआँ दर्शाता हुआ ग्रामीन जीवन का अनुभव दिलाता है ।

2. मादा कैक्टस (1959) :- मादा कैक्टस सन् 1959 में प्रकाशित हुआ । इस को सर्व प्रथम डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल के निर्देशन में 6 नवम्बर 1976 को इलाहाबाद में खेला गया । 

3. सुंदर रस ( 1959 ) :- “सुंदर रस” नाटक सन् 1959 में प्रकाशित हुआ । प्रस्तुत नाटक “सुंदर रस” में पंडित आचार्य है । वह एक ऐसा व्यक्ति है, जिसने गुरूकुल से व्याकरण, न्याय तथा आयुर्वेद में आचार्य पद प्राप्त किया है । इन्होंने “सुंदर रस” नामक एक अनूठी औषधि का आविष्कार किया है । ताकि जिसके इस्तेमाल से बदसूरती का नाश हो । पंडित जी सबसे पहले अपनी पत्नी पर ही प्रयोग करता है, जो बदसूरत एवं मस्तिष्क विकार से ग्रस्त थी । इस में पंडित जी का प्रयोग सही निकलता है । जिसके कारण उसकी पत्नी धीरे-धीरे सुंदर तथा स्वस्थ हो जाती है ।

4. तीन आँखों वाली मछली ( 1960 ) :- इस नाटक का प्रकाशन सन् 1960 ई. में रामनारायण वेनीप्रसाद, इलाहाबाद से हुआ । इसमें तीन अंक हैं । यह नाटक कभी भी मंचीत नहीं हुआ ।

5. दर्पण ( 1962 ) :- सन् 1962 में “दर्पण” नाटक प्रकाशित हुआ । डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल द्वारा लिखा गया यह नाटक दो अंकों से युक्त एकांकी सा लगता है । प्रस्तुत नाटक दर्पण में आठ पात्र हैं । किन्तु संपूर्ण नाटक में पूर्वी एवं दर्पण के चरित्र ही छा गये हैं । आरंभ में यह नाटक पुरानी और नयी पीढ़ी के संघर्ष को लेकर चलता है और अंत में एक रहस्योदघाटन के साथ समाप्त होता है ।

6. सूखा सरोवर ( 1960 ) :- “सूखा सरोवर” सन् 1960 में प्रकाशित हुआ है । अवध की लोक कथा पर आधारित सूखा सरोवर एक गीत नाट्य की शैली में लिखा गया है । तीन अंकों से युक्त यह नाटक तीन पहलू को लेकर चलता है । पहले अंक में सरोवर का सूखजाना और रानी का आत्महत्या कर लेना, दूसरे अंक में राजा का सन्यास ले लेना और तीसरे अंक में सूखे हुए सरोवर में फिर जल आने का विवरण मिलना ।

7. रक्तकमल (1962) :- डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल द्वारा लिखा गया नाटक 'रक्तकमल' सन् 1962 प्रकाशित हुआ । इस नाटक में तीन अंक आते हैं, जिसके प्रथम एवं तृतीय अंक में क्रमश: दो दो दृश्य आ जाते हैं, और द्वितीय अंक आव्याहत है । 

8. रातरानी (1962 ) :- सन् 1962 में प्रकाशित नाटक “रातरानी" अखिल भारतीय “कालिदास” पुरस्कार से सम्मानित है । इस नाटक को रंगमंच एवं पाठ्यक्रम की दृष्टि से पर्याप्त सफलता मिली है । 

9. नाटक तोता मैना (1962) :- “नाटक तोता मैना” सन् 1962 में लोकनाट्य की शैली में लिखा गया है । लोकगाथा पर आधारित यह नाटक अंगध्वज राजा से संबंधित जीवन गाथा है । नाटक गायन-वादन करते हुए नृत्य के साथ शुरू होता है । इसमें तोता और मैना की भूमिका नट और नटी निभाते हुए कंचनपुर के प्रजा - पालक राजा अंगध्वज और उनकी रूपसी रानी की कथा को प्रस्तुत करते हैं ।

10. सूर्यमुख ( 1968 ) :- डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल द्वारा लिखा गया नाटक “सूर्यमुख" सन् 1968 में प्रकाशित हुआ । कृष्ण परिवार को लेकर डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल ने पौराणिक पात्रों द्वारा आधुनिकता का बोध दिलाया है । जिसको आधुनिक पीढ़ी की कल्पना या विंब कहा जाता है ।

11. कलंकी (1969 ) :- सन् 1969 में ‘कलंकी’ नाटक प्रकाशित हुआ । इस नाटक में अंधविश्वास तथा गंदी राजनीति का पर्दाफाश किया गया है ।

12. मिस्टर अभिमन्यू ( 1971 ) :- डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल द्वारा लिखत 'मिस्टर अभिमन्यू' सन् 1971 में प्रकाशित हुआ । यह नाटक दो युगों की कड़ी को जोड़ता है । पौराणिक विंव को लेकर नाटककार लाल ने आधुनिक अभिमन्यू (राजन) को चित्रित किया है, जो जिलाधीश बनकर अपनी नौकरी का सही दायित्व निभाने के लिए सदा अग्रसर है । यद्यपि अनीति एवं अन्याय के छेरों से बाहर निकलना उसके लिए असंभव हो जाता है । राजन के कलेक्टर से कमिश्नर वन जाने पर भी यह नौकरी उसको मात्र चक्रव्यूह सी होने लगती है । भ्रष्टाचारियों से मिला हुआ यह पद उसकी अंतरात्मा को चूमता रहता है । अत: राजन भ्रष्ट व्यवस्था से दूर और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ रहना चाहता है । लेकिन अपने पिताजी और पत्नी के सामने राजन को अनिवार्य अपना सर झुकाना ही पड़ता है ।

13. करफ्यू (1972) :- सन् 1972 में प्रकाशित नाटक करफ्यू प्रदर्शन की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण एवं सफल है । पति-पत्नी के बीच का आदर्श तथा पारस्परिक संबंधों को लेकर इस नाटक की रचना की गई है ।

14. अब्दुल्ला दीवाना (1983) :- अब्दुल्ला दीवाना का रचना काल सन् 1983 है । इस नाटक में डॉ. लक्ष्मीनारायण
लाल ने तानाशाही और न्यायपालिका के परिहास द्वारा स्वतंत्र भारत में व्याप्त विचारहीन और चरित्रहीन नेताओं और उनके भ्रष्टाचार की खिल्ली उड़ाई है ।

15. व्यक्तिगत (1974) :- 'व्यक्तिगत' का रचनाकाल सन् 1974 में माना जाता है । इस नाटक में “ मैं के जरिये समाज में स्वार्थलिप्सा से अपनी हर इच्छा और कामनाओं को किसी भी हालात में पूरी कर लेने वाला अहम् रूपी व्यक्तित्व का चित्रण किया गया है । व्यक्ति अपना ( अहम् ) रूपी व्यक्तित्व का चित्रण किया गया है । व्यक्ति अपना “ मैं " (अहम्) रूपी मोह के लिए असंतुष्ट होकर अंत तक इसी अंधकार में डूब जाता है, जिससे कभी नहीं ऊपर उठता ।

16. नरसिंह कथा (1975) : सन् 1975 में लिखा गया " नरसिंह कथा " पूरे तीन घंटों तक मंचित होने वाला लाल का सबसे बड़ा नाटक है । प्रस्तुत नाटक एक पौराणिक कथा से जुड़ा हुआ है । डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल ने प्रहलाद एवं हिरण्यकशिपु की लड़ाई द्वारा इस नाटक में राजनीतिक, दार्शनिक, तथा सामाजिक पहलू को बड़े अनोखे ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है ।

17. चतुर्भुज राक्षस (1976) :- इस नाटक का प्रकाशन सन् 1976 ई. में बी. एल. मिश्रा ब्रदर्स, अजमेर द्वारा हुआ । इसमें तीन अंक हैं । जिनमें क्रमश: पाँच, पाँच और चार दृश्यों का अंतर्भाव होता है । इसमें मुख्य रूप से दस पुरूष और दो स्त्री पात्र हैं । इसकी कथावस्तु अत्यन्त संक्षिप्त है । सरयू नदी के तट पर किसी गाँव में नाटक की घटनाएँ घटती हैं । गाँव पर अकाल और बाढ़ की विभीषिका छा जाती है । परिणामत: गाँव का साहूकार लोगों का रोज नये सिरे से शोषण करता है । यह एक परिवार की कथा है - मैना और गोवर्धन चमार का परिवार । उनका छोटा बेटा सुरजा भी भूख की चपेट में आता है । एक दिन गोवर्धन परिवार को छोड़कर कहीं चला जाता है । मैना चाय की दूकान खोलकर अपना पोषण करना चाहती है । परन्तु गाँव के नेता, साहूकार और गुण्डे उस पर जुल्म करते हैं । परन्तु मैना उनका पूर्ण साहस और दृढ़ता के साथ मुकाबला करती है । एक दिन सुरजा भी उसे छोड़कर चला जाता है परन्तु फिर भी वह संघर्ष करती है ।

18. यक्षप्रश्न (1976) :- डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल का सन् 1976 में लिखा गया

19. एक सत्य हरिश्चन्द्र ( 1976 ) :- डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल द्वारा सन् 1976 में लिखा गया नाटक “एक सत्य हरिश्चन्द” भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का नाटक “सत्य हरिश्चन्द" के आधार को लेकर “नौटंकी” शैली में लिखा गया है । लेकिन यहाँ पर लाल के नाटक की कथावस्तु भारतेन्दु हरिश्चन्द के “सत्य हरिश्चन्द” की कथावस्तु में भिन्न है । भारतेन्दु का “हरिश्चन्द” रूढ़ि तथा परंपरा का पालन करने वाला है, जबकि लाल का “एक सत्य हरिश्चन्द” आधुनिक स्वतंत्र भारत के परिवर्तन एवं ज्ञानी लोगों का प्रतिनिधित्व करता हुआ रूढ़ि एवं पाखंड का पर्दाफ़ाश करता है ।

20. सगुन पंछी (1977 ) :- सन् 1977 में लाल द्वारा लिखा गया “ सगुन पंछी” विश्वासयुक्त तथा विश्वासहीन स्त्री-पुरूष याने कि पति-पत्नी के संबंधों पर प्रकाश डालने वाला एक मौलिक लोक नाट्य है । इस नाटक में अमीर घरानों में पति-पत्नी के बीच होने वाला संघर्ष, तनाव एवं अविश्वास, इसके साथ किसान या गरीब परिवारों में संघर्ष, लड़ाई-झगड़ा होने पर भी उनमें विश्वास के साथ एकता से जीने का भाव - राजा अंगध्वज और रानी रूपमती तथा किसान पंचम एवं गंगा द्वारा दिखाया गया है । 

21. गंगा माटी (1977) :- सन् 1977 में लिखा गया नाटक “गंगा माटी" ग्रामीण लोगों के जीवन पर धर्म, आडम्बर, अंधविश्वास आदि के प्रभाव का चित्रण करता है । यह नाटक रूढ़ियों तथा अंधविश्वासों का पर्दाफाश करता है ।

22. सबरंग मोहभंग (1977) :- सन् 1977 में लिखा गया “सवरंग मोहभंग " एक लीला नाटक कहा जा सकता है । यह आधुनिक विडंबनायुक्त खेल है, जिसको एक सूत्रधार के जरिए रूपायत किया गया है । इस नाटक में सड़क का रोमांस, जातक - कथा का अभिनय, चूल्हे चौके का रोमांस, समुद्र-मंथन का अभिनय, बाप-बेटा-बेटी का अभिनय, दफ्तर का रोमांस, पांडव मोहभंग जैसी लीलाओं को सफलता के साथ मंचित करने का श्रेय डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल को मिलता है । नाटककार आधुनिक तथा पौराणिक प्रसंगों को लेकर लोगों को यथार्थ का खेल खिलाना चाहता है । जिस तरह अलग-अलग दर्शकों की मांग अलग-अलग तरह से होती है, उसी तरह अपनी-अपनी इच्छानुसार पूरी करने की जिम्मेदारी से - कॉमेडी, ट्रेजाडी, रोमांस आदि मसाला डालकर डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल ने प्रेक्षकों तथा पाठकों को मनोरंजन प्रदान किया है ।

23. संस्कार ध्वज तथा पंचपुरुष (1978) :-  इस नाटक का प्रकाशन श्रीराम मेहरा एण्ड संस, आगरा से हुआ । इसका प्रथम प्रकाशन सन् 1976 ई. में हुआ । 

24. राम की लड़ाई (1979) :- इस नाटक का प्रकाशन अंवर प्रकाशन, नई दिल्ली से सन् 1979 ई. में हुआ । यह एक अंकरहित नौ दृश्यों का नाटक है । इसमें बारह पुरुष पात्र और तीन स्त्री पात्रों का समावेश है । इसमें स्वातन्त्र्योत्तर भारत के राजनीतिक जीवन तथा समाज के विभिन्न पहलुओं को सजीव और सशक्त दृष्टिकोण से उजागर करने का प्रयास किया गया है । लोकनाट्य शैली में लिखे हुए इस नाटक में राम कथा से संबद्ध 'धनुष यज्ञ' प्रसंग को एक मिथक के रूप में चित्रित करते हुए आधुनिक संदर्भों से जोड़ा गया है । 

25. कजरीबन (1980) :- इस नाटक का प्रकाशन आरती पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली द्वारा सन् 1980 ई. हुआ । इसमें कुल चार अंक हैं । 

26. लंकाकाण्ड (1983) :- इस नाटक का प्रकाशन स्टार बुक सेन्टर, नई दिल्ली से सन् 1983 ई. में हुआ 

27. गुरु / अरुण कमल एक ( 1984 ) :- 'अरुण कमल एक' नाटक का प्रकाशन पीताम्बर पब्लिशिंग कम्पनी, दिल्ली से सन् 1984 ई. में हुआ । परन्तु इससे पहले इस नाटक का प्रकाशन सन् 1975 ई. में 'गुरू' के रूप में हुआ था । 

28. मन्नू ( 1984 ) :- इस नाटक का प्रकाशन पीताम्बर पब्लिशिंग कम्पनी, दिल्ली से सन् 1984 ई. में हुआ । 

29. बलराम की तीर्थयात्रा (1984) :- इस रचना का प्रकाशन सन् 1983 ई. में पीताम्बर पब्लिशिंग कम्पनी, नई दिल्ली द्वारा हुआ । इसमें कुल पाँच अंक हैं । जिनमें क्रमश: 4, 3, 1, 3 और 2 दृश्यों का समावेश है । इस नाटक में बलराम के प्रतीकात्मक मिथक द्वारा आज के मानव के आहत् अहं, अनास्था और पलायनवादी वृत्ति को वाणी प्रदान की गई है । नाटक में करणम् का चरित्र बलराम के अंतरमन की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है । 

30. हँसने वाली लडकियाँ ( 1988 ) :- इस नाटक का प्रकाशन सन् 1988 ई. में लोकभारती प्रकाशन, इलाहावाद से हुआ । डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल के जीवनकाल में दिनांक 4 फरवरी, 1987 को ही 'हस्ताक्षर' दिल्ली द्वारा 'थियेटर वैष्णवी' में इसका प्रथम मंचन हुआ था डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल का यह तीन अंकी नाटक है । 

31. कथा विसर्जन (1987) :- सन् 1987 में लिखा गया " कथा विसर्जन " डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल का संस्कार- प्रधान नाटक है । इस नाटक में डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल ने परंपरा और संस्कार को लेकर दो पीढ़ीयों के बीच होने वाले संघर्ष का चित्रण किया है । नाटककार स्वयं संस्कार युक्त

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