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संविधानवाद की समस्याएं व सीमाएं और उनका निराकरण

 

संविधानवाद की समस्याएं व सीमाएं

संविधानवाद की समस्याएं व सीमाएं

संविधानवाद आधुनिक लोकतन्त्र का मूल मन्त्र है। संविधानवाद के बिना लोकतन्त्रीय आदर्शों व सिद्धान्तों का न तो विकास सम्भव है और न ही उनकी रक्षा। राष्ट्र संघ की स्थापना के बाद संविधानवाद को साम्यवादी क्रान्ति ने उदारवादी प्रजातन्त्रीय सिद्धान्तों को चोट पहुंचाई और इटली में फासीवाद, जर्मनी में नाजीवाद तथा स्पेन, पोलैण्ड, यूनान, रूमानिया आदि राष्ट्रों में अधिनायकवादी शासकों के उत्कर्ष ने संविधानवाद की गहरी जड़ें भी हिलाकर रख दी। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध ने धुरी राष्ट्रों तथा अन्य अधिनायकवादी राष्ट्रों को भारी नुकसान पहुंचाया और संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के बाद विश्व में संविधानवाद फिर से अपना आधार खड़ा करने के प्रयास में सफल हुआ। 

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इटली, जर्मनी, फ्रांस, स्वीडन, स्विट्जरलैंड आदि राज्यों में अधिनायकवादी तत्व समाप्त हो गए और इन देशों में संविधानवाद का विकास करने वाले प्रजातन्त्रीय तत्वों के विकास की परम्परा शुरु हो गई। लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद संविधानवाद के विकास के जो लक्षण दिखाई देते थे, वे आज धूमिल होते नजर आ रहे हैं। आज ईराक, अफगानिस्तान, पाकिस्तान आदि देशों में सैनिकवाद और निरंकुशतावाद का जो बोलबाला है, चारों ओर अराजकता का जो माहौल है, उसके परिणामस्वरूप संविधानवाद का विकास नहीं किया जा सकता। यद्यपि गिने चुने देशों में संविधानवाद विरोधी तत्वों के होने से संविधानवाद के विकास का रास्ता नहीं बदला जा सकता, लेकिन फिर भी संविधानवाद को चुनौती देने वाली समस्याएं संविधानवाद के मार्ग में बाधक हैं। उनके निराकरण के बिना संविधानवाद का पूर्ण विकास सम्भव नहीं है। संविधानवाद के मार्ग में बाधक समस्याएं हैं :-

1. युद्ध - संविधानवाद की प्रमुख सीमा यह है कि इसे शांति काल में ही लागू किया जा सकता है और विकास किया जा सकता है। युद्ध चाहे गृहयुद्ध के रूप में हो या दो देशों व अनेक देशों के मध्य में हो, इसे कायम रखना असम्भव व कठिन दोनों होता है। युद्ध के वातावरण में संविधानिक अधिकारों व आदर्शों का महत्व शून्य हो जाता है। इसमें नागरिकों के मौलिक अधिकार स्थाई या अस्थाई तौर पर स्थगित हो जाते हैं और संविधानिक सरकार भी संविधान के विपरीत कार्य करने को बाध्य हो जाती है, इसलिए संविधानवाद जैसी वस्तु का अस्तित्व नष्ट होने लगता है। युद्ध में संविधान और संवैधानिक सरकार दोनों का आदर्श समाप्त होने से संविधानवाद स्वत: ही नष्ट हो जाता है। 

यह जरूरी नहीं है कि युद्धकाल में संविधानवाद पूरी तरह नष्ट हो जाए। यदि जनता स्वयं सरकार को अपने अधिकारों और सुविधाओं को कम करने की अनुमति दे दे या सरकार के युद्धकालीन कार्यों का समर्थन कर दे तो संविधानवाद को बचाने में मदद मिल सकती है। ऐसी स्थिति में संविधानवाद पर युद्ध का कम प्रभाव पड़ता है और युद्ध के बाद संविधानवाद को फिर से खड़ा करने में आसानी रहती है। लेकिन कई बान तानाशाही शासक इस छूट का अनुचित लाभ उठाकर उस देश में संविधानवाद की गहरी जड़ों को भी हिलाकर रख देते हैं। 

अत: युद्ध संविधानवाद की प्रमुख सीमा या उसके मार्ग में बाधा है।

2. निरंकुशतावाद - संविधानवाद और निरंकुशतावाद में विपरित सम्बन्ध है। यदि एक आगे बढ़ता है तो दूसरा पीछे हटता है और यदि दूसरा आगे बढ़ता है तो पहला पीछे हटता है। निरंकुशतावाद का रूप चाहे फासीवाद हो, नाजीवाद हो, सर्वहारा वर्ग या साम्यवादी दल की तानाशाही हो, सैनिकवादी शासन हो, किसी को भी संविधानवाद का मित्र नहीं कहा जा सकता। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद इटली में फासीवादी और जर्मनी में नाजीवादी ताकतों ने संविधानवाद को जो क्षति पहुंचाई थी, उससे निरंकुशतावाद को किसी भी रूप में संविधानवाद के लिए अनुकूल नहीं माना जा सकता। निरंकुश या सर्वसत्ताधिकारी शासक शासन का संचालन संविधान के नियमों के अनुसार न करके अपनी इच्छा के अनुसार स्वार्थ सिद्धि के लिए ही करता है। इसमें जनभावना की बजाय शासक भावना की कदर की जाती है। इसलिए निरंकुशतावाद संविधानवाद की प्रमुख सीमा है। 

संविधानवाद को तानाशाही व सैनिक शासन में न तो लागू किया जा सकता है और न इसे लागू रखा जा सकता है। पाकिस्तान में सैनिक शासकों के कारण वहां पर लम्बे समय से न तो संविधान के आदर्शों का पालन हो रहा है और न ही वहां पर संविधानिक सरकार है। इसी तरह ईराक व अफगानिस्तान में भी लम्बे समय तक ऐसी ही स्थिति का रहना संविधानवाद के मार्ग में निरंकुशतावाद को बाधक बनाता है। 

अत: निरंकुशतावाद संविधानवाद के मार्ग में प्रमुख बाधा है। संसदीय संस्थाओं के पास कार्यभार की अधिकता 
यदि संसदीय संस्थाओं के पास कार्यभार अधिक होगा तो वे अपने संविधानिक उत्तरदायित्वों का निर्वहन सरलता से नहीं कर सकती। आधुनिक युग प्रजातन्त्र का युग है। इसमें राज्य को कल्याणकारी राज्य का दर्जा दिया गया है। आज इन संस्थाओं के पास राजनीतिक कार्यों के साथ आर्थिक कार्यों का बोझ भी है। ऐसी स्थिति में ये संस्थाएं अपने संविधानिक उत्तरदायित्व को उचित रूप से निभाने में असमर्थ हैं। इससे संविधानवाद का विरोध होता है। इसलिए संसदीय संस्थाओं का अधिक कार्य संविधानवाद की सीमा भी है और इसके मार्ग में प्रमुख बाधा भी है

3. राजनीतिक समानता का सिद्धान्त  - “प्रत्येक नागरिक को एक माना जाएगा, एक से अधिक नहीं” - यह लोकतन्त्र का प्रमुख सिद्धान्त है। यह सूत्र कम या अधिक विकसित देशों में तो ठीक हो सकता है, पिछड़े हुए या विकासशील देशों में नहीं, इन देशों में यह श्रमिकों को खुश करने की बजाय उन्हें नाराज ही करता है।

4. संविधान और संविधानिक सरकार द्वारा प्रदान की गई अधिक छूटें व स्वतन्त्रताएं - जिन देशों में लोगों को आवश्यकता से अधिक स्वतन्त्रताएं और दूसरी सुविधाएं प्रदान की जाती हैं, वहां पर नागरिक कई बार उनका अनुचित फायदा उठाने का प्रयास करते हैं। 

उदाहरण के लिए जिन देशों में प्रैस को अधिक स्वतन्त्रता दी गई है, वहां पर प्रैस कई बार अपनी स्वतन्त्रता का दुरुपयोग करके सरकार विरोधी वक्तव्य जारी करती रहती है। इससे सरकार के खिलाफ एक ऐसा जनमत तैयार हो जाता है कि सरकार के सामने दो ही विकल्प शेष रह जाते हैं कि या तो वह अपना पद छोड़ दे या सरकार विरोधी तत्वों को सख्ती से कुचल दे। इससे सरकार के सामने संविधानिक संकट व निरंकुशतावाद दोनों की समस्या पैदा होती है। लेकिन लोगों के आन्दोलन को सख्ती से दबाना संविधानवाद के हित में हो, यह आवश्यक नहीं है। दमन से संविधान और संविधानवाद दोनों को नुकसान पहुंचता है। इसलिए संविधानवाद शासन द्वारा जनता को आवश्यकता से अधिक छुट देने से सरकार विरोधी तत्व संविधान के आदर्शों को नुकसान पहुंचाने की चेष्टा करते हैं। इससे संविधानवाद को हानि पहुंचती है।

5. संवैधानिक शासन का स्थगन - कई बार आपात स्थिति में युद्ध या किसी अन्य संकट के समय अस्थायी रूप से संविधानिक शासन को स्थगित कर दिया जाता है। जैसे राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा के समय देश के शासक या सरकार द्वारा नागरिकों को दी जाने वाली सुविधाओं और अधिकारों को कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया जाता है और युद्ध समाप्त होने या आपातस्थिति के टल जाने पर उन्हें फिर से उसी स्थिति में लौटा दिया जाता है। लेकिन यह आवश्यक नहीं कि आपातकाल में प्राप्त अधिकारों को शासक वर्ग फिर से विकेन्द्रित कर दे। जर्मनी और इटली में प्रथम विश्वयुद्ध के बाद हिटलर और मुसोलिनी ने राष्ट्रीय आपातकाल के नाम पर जो सुविधाएं जनता से ली थी, उन्हें वापिस नहीं की। लम्बे समय तक इन देशों ने अपने अपने देश की शासन की बागडोर निरंकुश शासकों के रूप में संभाली। इससे उन देशों में संविधानवाद को गहरा आघात पहुंचा। इसी तरह पाकिस्तान में जरनल मुशर्रफ ने भी शासन की बागड़ोर अपने हाथ में लेकर अब तक भी जनता को संवैधानिक शासन की स्थापना के अधिकार नहीं दिए हैं। अत: संवैधानिक शासन का स्थगन संविधानवाद के मार्ग में कई बार बहुत बड़ी बाधा बन जाता है।

6. गृह-युद्ध - जब किसी देश में किसी कारणवश गृह युद्ध की शुरुआत होती है तो ऐसी स्थिति में संविधान विरोधी ताकतें सक्रिय हो जाती हैं और वे संविधानवाद के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बन जाती हैं। संविधानिक सरकार को इन तत्वों को कुचलने के लिए ताकत का प्रयोग करना पड़ता है। कई बार गृह-युद्ध को समाप्त करना सरकार के काबू से बाहर हो जाता है। गृह-युद्ध में प्राय: सरकार विरोधी निरंकुश ताकतें ही अपने उद्देश्यों में कामयाब रहती हैं। ऐसी स्थिति में देश का शासन न तो संविधान के अनुसार ही चलाया जा सकता है और न ही सरकार का रूप संविधानिक रहता है। अत: गृह-युद्ध संविधानवाद के लिए बहुत बड़ी बाधा है।

संविधानवाद की समस्याओं या बाधाओं का निराकरण

यदि हमें संविधानवाद का लक्ष्य प्राप्त करना है तो इसके मार्ग में आने वाली प्रमुख बाधाओं का निराकरण करना आवश्यक हो जाता है। संविधानवाद की प्रमुख समस्याओं के समाधान के तरीके हैं :-
  1. सरकार को हर अवस्था में संविधान के आदर्शों व मूल्यों की रक्षा के लिए तैयार रहना चाहिए। उसे कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए, जिससे संविधानिक आदर्शों को हानि पहुंचती हो।
  2. राज्य व सरकार को अराजकता की स्थिति से निपटने में सक्षम होना चाहिए। यदि सरकार अराजकता से निपटने में असक्षम रहती है तो वह कभी भी संविधानवाद की रक्षा नहीं कर सकती। उसे अराजकता की स्थिति से निपटने के लिए प्रभुसत्तात्मक शक्तियां अपने पास सुरक्षित रखनी चाहिए ताकि अराजकता उत्पन्न करने वाली ताकतों का सफाया किया जा सके। लेकिन इस कार्य को करते समय सरकार को बड़ा सोच-समस्कर ही कदम उठाना चाहिए। जो सरकार अराजकता को समाप्त करने में असमर्थ रहती है, वह स्वयं भी अराजकता की पोषक बन जाती है और उसे किसी भी अवस्था में संवैधानिक नहीं माना जा सकता।
  3. राजनीतिक दलों को लोगों को राजनैतिक शिक्षा देने का अपना उत्तरदायित्व पूरा करना चाहिए ताकि लोगों में जागृति आए और वे न तो कोई असंवैधानिक कार्य करें और न दूसरे को करने की अनुमति दें। संविधानवाद के लिए शिक्षित व राजनीतिक रूप से जागरूक जनता से बढ़कर कोई दूसरा अस्त्र नहीं है। 
  4. सरकार व राज्य को ऐसे कार्य करने चाहिए कि जनता को यह विश्वास हो जाए कि शासक-वर्ग उनकी भलाई के लिए ही कार्य कर रहा है और वे अपने भाग्य के स्यवं निर्माता हैं। सरकार को संवैधानिक सत्ता का प्रयोग इस प्रकार करना चाहिए कि व्यक्तिगत अधिकारों का कोई नुकसान न हो। बहुमत को सदैव अल्पमत के हितों का ख्याल रखते हुए ही राज्य के अवयवों का गठन और विकास करना चाहिए। इससे संगठित अल्पमत के मन में शासन-सत्ता के प्रति विश्वास कायम होगा और वे असंवैधानिक मार्ग द्वारा अपनी मांगों के लिए आन्दोलन नहीं करेंगे। इसलिए राज्य व सरकार को प्रभुसत्ता की जटिल समस्याओं को ध्यान में रखकर ही कार्य करना चाहिए।
  5. संसदीय संस्थाओं के कार्यभार को कम करके संसदीय व्यवस्था को संविधानवाद के मार्ग में मित्र के रूप में खड़ा किया जा सकता है। जब तक संसदीय संस्थाओं के पास कार्य की अधिकता रहेगी, तब तक वे जनता के प्रति उदासीन ही बनी रहेंगी और उनका जनता से सम्पर्क टूटता जाएगा और असंवैधानिक मार्गों का द्वार खुल जाएगा। 
  6. अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों का विकास करके भी संविधानवाद का विकास किया जा सकता है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों ने निरंकुशतावादी ताकतों पर जो दबाव बनाया है, वह संविधानवाद के रक्षक के रूप में कार्यरत है और इसने कई प्रकार से संविधानवाद की रक्षा की है। 

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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