Home loan

भारत का सामान्य परिचय

भारत की सभ्यता विश्व की प्राचीन सभ्यताओं में से एक है। भारत अनके परम्पराओं और संस्कृतियों का संगम स्थल है। भारत की संस्कृति प्राचीन होने के साथ बहुरंगी है। "हिन्दुस्तान नाम इसे ईरानियों ने दिया, इसी के चलते 'सिंधु नदी के आसपास रहने वालों को ‘हिंदू' एवं उस भू–भाग को 'हिन्दुस्तान' नाम दिया गया। यूनानियों ने भारत को ‘इंडिया' नाम दिया। वे सिंध नदी को 'इंडस' (Indus) पुकारते थे, इसी के फलस्वरूप उस क्षेत्र को इंडिया (India) एवं वहाँ पर निवास करने वालों को इंडियन (Indian) कहा गया।”

"भारत राष्ट्र की स्थापना का वर्णन श्रीमद्भागवत के पञ्चम स्कन्ध में आता है। 

श्रीमद्भागवत के अनुसार -“येषां खलु महायोगी भरतो ज्येष्ठः श्रेष्ठगुण आसीद्येनेदं वर्षं भारतमिति व्यपदिशन्ति”॥६॥

ब्रह्मा के मानस पुत्र स्वायंभुव मनु की पीढ़ी में हुए आगे भरत के नाम पर ही 'भारत' देश का नाम पड़ा। "

भारत बंगाल की खाड़ी के पश्चिम, अरब सागर के पूर्व और हिन्द महासागर के उत्तर से घिरा हुआ है। भारत की सीमाएँ पकिस्तान, अफगानिस्तान, म्यांमार, नेपाल, बांग्लादेश और भूटान से लगी हुई है। भारत और श्रीलंका के बीच हिन्द महासागर का संकीर्ण भाग है। 

"विष्णु पुराण के अनुसार श्रीलंका सहित समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण का सारा भू–भाग, जिसमें भारत की संतति निवास करती है, वह देश भारतवर्ष है - 

उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चौव दक्षिणम्।
वर्ष तत् भारतं नाम भारती यत्र संततिः। "

भारत में मुसलमानों के आगमन के साथ इस्लाम धर्म की भी शुरुवात हुई मुसलमानों का प्रभाव दक्षिण भारत पर उतना नहीं पड़ा, जितना उत्तर भारत पर पड़ा। भारत में जल्द ही मुगल शासन स्थापित हो गया। मुगलों ने भारत की सभ्यता और संस्कृति को अत्यधिक प्रभावित किया । मुसलमानों के बाद भारत में यूरोपीय जातियों का प्रवेश हुआ, जिनमें प्रमुख पुर्तगाल, डच और अंग्रेज थे। भारत को १५ अगस्त १६४७ ई. में अंग्रेजों से स्वतंत्रता मिली। 

भारत की भौगोलिक स्थिति

रूस, कनाडा, चीन, अमेरिका, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया के बाद क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व का ७वां बड़ा देश है “भारत।” भारत उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित है, भारत के - बीच में से कर्क रेखा गुजरती है। भारत का दक्षिण भाग 'प्रायद्वीपीय´ और उत्तर भाग ‘महाद्वीपीय है। भारत क्षेत्रफल और जनसंख्या की दृष्टि से एशिया का ‘उपमहाद्वीप' है।

भारत का भूगोल /भोगोलिक स्थिति भारत को संरचना के आधार पर पाँच भू- - भौतिक प्रदेशों में विभाजित किया गया है

  1. उत्तर पूर्व का पर्वतीय क्षेत्र
  2. मध्यवर्तीय मैदान
  3. पूर्वी घाट
  4. तटीय मैदान
  5. द्वीप समूह
1. उत्तर पूर्व का पर्वतीय क्षेत्र - "यह भारत की उत्तरी सीमा के साथ-साथ पकिस्तान की पूर्वी सीमा से म्यांमार की सीमा तक फैला हुआ है। इसकी तीन पर्वत मालाओं के नाम हिमाद्री (बृहत् हिमालय), हिमालय (लघु हिमालय) तथा शिवालिक (बाह्म हिमालय) है और पर्वत मालाएं एक सिरे से दूसरे सिरे तक अविच्छिन्न रूप में एक-दूसरे के सामानांतर है।”

हिमालय एवं पूर्वांचल के पहाड़ी क्षेत्र उत्तर पूर्व के पर्वतीय प्रदेश के अंतर्गत आते है। इस क्षेत्र में जम्मू - कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, प. बंगाल, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा राज्य आते है । अरावली पर्वतमाला विश्व की सबसे प्राचीन पर्वतमाला है। कंचनजंघा भारत की सबसे बड़ी पर्वतमाला है।

2. उत्तरी और मध्यवर्तीय मैदान - "गंगा घाटी मैदान उत्तर में हिमालय की तराई से लेकर दक्षिण के प्रायद्वीपीय भारत के पठारी क्षेत्रों के बीच पड़ता है। यह विश्व का सबसे विस्तृत मैदान है। कहा जाता है कि यह एक विशाल धंसाव था, जो हिमालय से निकलने वाली तीन विशाल नदियों सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र द्वारा लाई गई मिट्टियों से भर गया।"1

3. पूर्वी घट पश्चिम घाट और पठार - “पश्चिमी घाट या सह्याद्री तापी नदी के मुहाने से लेकर कन्या कुमारी (कोमोरिन अंतरीप) तक पश्चिमी तट के समानांतर उत्तर - दक्षिण दिशा में विस्तृत है । पूर्वी घाट दक्कन के पठार की पूर्वी सीमा का निर्माण करते है। पूर्वी घाट विभिन्न पहाड़ियों की वृहत् श्रृंखलाओं से बना है।"

“पठार अपेक्षाकृत विस्तारित सतह वाले ऊपर उठे हुए भू-भाग होते है। ये भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे प्राचीन संरचना है, जिनके उत्तर- - पूर्व में धीरे लेकिन लगातार गतिशीलता के कारण भूगर्भीय काल में टिथिस सागर में हिमालय और उत्तरी मैदान का निमार्ण हुआ।"

प्रायद्वीपय भारत के प्रमुख पठार में मेघालय का पठार, छोटा नागपुर का पठार, मालवा का पठार, बुंदेलखंड का पठार, दंडकारण्य का पठार, महाराष्ट्र का पठार, आंध्रप्रदेश का पठार और कर्नाटक के पठार सम्मलित है ।

4. तटीय मैदान - प्रायद्वीपीय भारत के दो तटीय मैदान है। बंगाल डेल्टा से लेकर कन्याकुमारी तक पूर्वी तटीय मैदान का विस्तार है । खम्भात की खाड़ी से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक पश्चिम तटीय मैदान फैला हुआ है। "पश्चिमी मैदान अरब सागर और पश्चिमी घाट के बीच स्थित है। कोंकण और मालाबार इसी के भाग है। पूर्वी मैदान बंगाल की खाड़ी और पूर्वी घाट के मध्य में स्थित है। कोरोमंडल किनारा इन मैदानों में स्थित है।"

5. द्वीप समूह -  भारत में बंगाल की खाड़ी एवं अरब सागर के द्वीप समूह शामिल है। बंगाल की खाड़ी के मुख्य द्वीप में न्यूमूर, गंगासागर, श्री हरिकोटा, पवन और बैरन आदि सम्मलित है। अंडमान निकोबार के कुल २२४ द्वीप एवं लक्ष्यद्वीप के कुल २५ द्वीप समूह सम्मलित है।

भारत की भौगोलिक सीमाएँ

पाकिस्तान, अफगानिस्तान, चीन, नेपाल, भूटान, म्यांमार और बांग्लादेश के साथ सात देशों से भारत की सीमायें जुड़ी हुई है। भारत और पाकिस्तान की एक कृत्रिम सीमा जिसे "रेडक्लिफ लाईन" के नाम से जाना जाता है एक दूसरे से जुड़े हुए है। इसी प्रकार भारत के पूर्व में स्थित अरुणाचल प्रदेश के साथ चीन की कृत्रिम सीमा है "मैकमोहन।" भारत के उत्तर में हिमालय की श्रृंखलाओं में बसे दो देश नेपाल - और भूटान है। वही भारत के दक्षिण छोर का निकटम पड़ोसी देश श्रीलंका है और एक ओर मालद्वीप एवं इंडोनेशिया समुद्रीय पड़ोसी देश है। 

भारत की जलवायु

“तापमान, वायुदाब, वर्षा, ऋतुएँ और हवाओं की गति व दिशा आदि सम्मिलित रूप से किसी देश की जलवायु को निर्धारित करते है ।

भारत के दक्षिण भाग में जलवायु उष्णकटिबंधीय है, हिमालय क्षेत्रों में ध्रुवीय जैसी है, जबकि पूर्वोत्तर भारत में उष्णकटिबंधीय नम प्रकार की है और पश्चिम क्षेत्रों में शुष्क जलवायु है।

भारत की प्रमुख मृदाएँ

"पृथ्वी के धरातल पर मिट्टी (मृदा) असंघटित पदार्थों की एक परत है, जो अपक्षय और विघटन के कारकों के माध्यम से चट्टानों और जैव पदार्थों से बनी है। मिट्टी के अध्ययन के विज्ञान को मृदा विज्ञान (पेडोलॉजी) कहा जाता है ।

भारत मे अनेक तरह की मृदाएँ पाई जाती है। मृदा के वर्गीकरण के प्रकार निम्नलिखित है – जलोढ़ मृदा, लाल मृदा, काली मृदा, लेटराइट, वनीय, लवणीय एवं क्षारीण, मरुस्थलीय, पिट अथवा जैविक।

भारत की ऋतुएँ

भारत में इस प्रकार की हवाएँ वर्ष में दो बार उच्च वायु भर से निम्न वायु भर की ओर चलती है।" भारत में छः प्रकार की ऋतुएँ मानी जाती है (बसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर), परंतु भारतीय मौसम विभाग के अनुसार चार ऋतुएँ मुख्य रूप से मानी जाती है 'शीत ऋतु, ग्रीष्म ऋतु, वर्षा ऋतु और शरद ऋतु।' 

भारत की नदियाँ

भारत में बहुत सी बड़ी नदियाँ अपनी सहायक नदियाँ के साथ बहती है। हिमालय से निकलने वाली प्रमुख नदियाँ सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र आदि है ।

दक्षिण क्षेत्र से निकलने वाली नदियाँ गोदावरी, कृष्णा, कावेरी एवं महानदी जो पूर्व की ओर बहती है, जबकि नर्मदा एवं ताप्ती पश्चिम की ओर प्रवाहित होती है। कृष्णा और नर्मदा द्रोणी क्षेत्र में भी बहनें वाली नदियाँ है । भारत में कई तटवर्तीय नदियाँ है, जो कि दूसरी नदियों से छोटी है। इसके अतिरिक्त कुछ मरुस्थलीय नदियाँ है जो मरुस्थल में ही विलीन हो जाती है, जैसी लुणी, बनास इसके अलावा भी भारत में बहुत सी नदियाँ प्रवाहित होती है।

भारत की सामाजिक स्थिति

प्राचीन काल से आधुनिक काल तक भारतीय समाज में वर्ण और जाति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसकी शुरुआत समाज की व्यवस्था और संगठन को एक स्थायित्व प्रदान करने के लिए हुई थी।

"वर्ण एवं आश्रम दोनों एक-दूसरे से संबंधित थे तथा दोनों का ही संबंध व्यक्ति और समाज से था। आश्रम व्यवस्था में जीवन की प्रत्येक अवस्था में व्यक्ति के आचार को प्रशिक्षित किया जाता था । वर्ण-व्यवस्था में गुण एवं क्षमता के आधार पर समाज में स्थान निर्धारित होता था । "

पुरुषार्थ का अर्थ है जीवन का उद्देश्य, जो चार आश्रमों में बंटा हुआ है। पहला - आश्रम ब्रह्मचर्य कहलाता है, इस अवधि में वह शिक्षा प्राप्त करता है। गृहस्थाश्रम मनुष्य के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण अवस्था है। वह धर्म के अनुसार अर्थ और काम का अभ्यास करता है। वानप्रस्थ आश्रम में वन में जाकर ध्यान व साधना करता है। और अंतिम आश्रम संन्यास आश्रम है, यहाँ उसे पूर्ण वैराग्य का जीवन व्यतीत करना पड़ता है। 

समाज में चार श्रेणियों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र नामक वर्ण हुए। ब्राह्मण वर्ग प्रायः पुरोहित, क्षत्रिय राजनैतिक / शासन कार्य, वैश्य व्यापारी और शूद्र सेवा का काम करते थे।

वर्ण व्यवस्था में फिर परिवर्तन आया जब शक, कुषाण, इंडो-ग्रीक आदि भारत में आए। इसके साथ अर्थव्यवस्था भी परिवर्तित हुई । श्रेणी का उदय हुआ जो बाद में एक जाति बन गई।

“जाति जन्म से निश्चित होती है और व्यक्ति उसको बदल नहीं सकता। जाति ही व्यक्ति के व्यवसाय को निश्चित करती है, " जैसे सुनार का लड़का सुनार का व्यवसाय करता है, लेकिन वर्तमान समय में ऐसा हो, अब जरुरी नहीं है।

"इस प्रकार ५००ई. पूर्व से ५००ई. पश्चात जाति व्यवस्था एक प्रथा बन गई। धर्मशास्त्रों और स्मृतियों ने प्रत्येक जाति के कर्तव्यों को निर्धारित करने का प्रयत्न किया। पांचवी से सातवीं शताब्दियों के बीच भूमि अनुदान के कारण भूमिपतियों की उत्पत्ति के फलस्वरूप वैश्य किसान बन गया। इसके बाद उत्तर भारतीय समाज में राजपूत तथा बंगाल और दक्षिण भारत में मुख्यतया दो जातियाँ ब्राह्मण और शूद्र उभर कर सामने आए । मध्यकाल में दक्षिण भारत में शूद्रों को सत् (पवित्र) और असत् (अपवित्र) वर्गों में विभाजित कर दिया । " जाति, उप जाति में बटने लगी और गोत्रों के आधार पर भी लोग बटते गए । उपनाम लगाने की प्रथा का प्रचलन शुरू हुआ ।

जीवन जीने/यापन करने के लिए संस्कार और नियम की अनिवार्यता स्वीकार की गई। "ब्राह्मण धर्मग्रंथों के अनुसार व्यक्ति के सामाजिक जीवन को अच्छा बनाने के लिए संस्कारों की व्यवस्था की गई। संस्कार धार्मिक एवं कर्मकांड क्रियाओं के रूप में जन्म होने से लेकर मरणोपरांत तक किये जाते थे।" जीवन से मृत्यु तक सभी अवस्थाओं में उपनयन संस्कार को महत्वपूर्ण माना जाता था। इनमें से आज भी बहुत सारे संस्कारों का पालन किया जाता है।

भारतीयों में विवाह एक प्रमुख संस्कार है । भारत में (मनु स्मृति आदि ग्रंथों में) “आठ प्रकार की विवाह पद्धति भी हमारे यहाँ प्रचलित रही है ब्राह्म, देव, आर्ष, प्रजापत्य, - आसुर, गान्धर्व, राक्षस, पैशाच ।"1

विवाह भी कई तरह के होते है जैसे अनुलोम या प्रतिलोम विवाह, दो अलग–अलग धर्मों के बीच विवाह, दो अलग-अलग वर्गों के बीच विवाह, एक पुरुष और एक स्त्री का विवाह, एक पुरुष का कई स्त्रियों के साथ विवाह या एक स्त्री का कई पुरुषों से विवाह जैसे आशिक, अकबर, द्रोपदी आदि । बहुविवाह कई कारणों से किये जाते थे

“प्रत्येक व्यक्ति अपना जीवन परिवार के अधिकार और कर्तव्यों के बीच व्यतीत करता है, जिसे पारिवारिक संबंध कहा जा सकता है। ये ही परिवार संगठित रूप में समाज कहलाने लगते है। "

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् व पश्चिमीकरण बढ़ने से समाज के सभी पहलुओं में परिवर्तन हुए है। “नई-नई विचारधाराएँ अपनाई जाती है। पुरानी रूढ़ियाँ और परम्परा टूटती रहती है। रीति-रिवाज, फैशन, प्रथायें, तौर-तरीके, रहन–सहन के ढंग, पिता-पुत्र, देशी–विदेशी, भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के परस्पर संबंध बराबर बदलते रहते है। परिवार, विवाह, जाति सभी संस्थाओं में, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक सभी व्यवस्थाओं में घर और राज्य में, शिक्षा के आदर्शों में, स्त्री-पुरुष के संबंध में, जीवन के सभी पहलुओं में यह परिवर्तन देखा जा सकता है । "

धर्म

यहाँ हिन्दू धर्म में कोई वैष्णव, शैव, शाक्त, जैन धर्म में दिगंबर या श्वेताम्बर, बौद्ध में कोई हीनयान या महायान, इस्लाम में कोई शिया या सुन्नी है। इसके अतिरिक्त कोई ब्रह्मसमाजी, कोई आर्यसमाजी, कोई सगुण या निर्गुण भक्ति का उपासक है। कोई षट् दर्शन का अनुयायी है। विभिन्न जनजाति समूह के अपने धर्मों को मानने वाले लोगों के अनेक मत-मतान्तर मिलकर संस्कृतिक विरासत का रूप धारण करते है। इस प्रकार यहाँ हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन इत्यादि धर्मों के लोग भारतीय संस्कृति को गतिमान बनाए रखने के साथ-साथ इसको सुदृढ़ व व्यापक बनाने का प्रयास भी कर रहे है।

पर्व और त्यौहार

यहाँ विभिन्न त्योहारों पर भिन्न-भिन्न रस्में होती है जैसे मंदिर, मस्जित, गुरूद्वारे, चर्च जाना, व्रत रखना, भगवान की पूजा-अर्चना, रथ यात्रा, शोभा यात्रा, नदियों से स्नान करना, भगवान को भोग चढ़ाना, नए वस्त्रों को पहनना, गीत गान, नृत्य करना आदि। यहाँ मनाए जाने वाले प्रमुख त्योहारों में ओणम, पोंगल, बिहू, बसंत पंचमी, रामनवमी, गुरुनानक जयंती, महावीर जयंती, बैसाखी, होली, बुद्ध जयंती, गुड फ्राइडे, ईस्टर, राखी, गणेश उत्सव, नवरात्री, दशहरा, छट पूजन, दीपावली, गुरु–पर्व, क्रिसमस आदि मनाये जाते है।

कलाएँ

भारत में कलाओं को सदैव श्रद्धा व सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। ललित कला के अंतर्गत पांच कलाएँ है स्थापत्य कला, मूर्तिकला, - चित्रकला, संगीतकला (गायन, वादन और नृत्य) तथा काव्य कला। शास्त्रीय संगीत गायन से संबंधित भारत में दो मुख्य शैलियाँ है हिन्दुस्तानी (उत्तर भारत) और कर्नाटक शैली (दक्षिण भारत ) । भारत में वैदिक काल से ही स्त्री-पुरुष के मिल कर नाचने की परंपरा रही है। इन नृत्यकला का विकास दो रूपों में हुआ है लोक नृत्य और शास्त्रीय नृत्य । आज भी भारत के प्रांतों में बसे अलग–अलग जन-जातियों के अपने गीत और नृत्य प्रचार में है ।

भारतीय संस्कृति में नृत्य की धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्ता है। भारतीय नृत्य कला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह भावाश्रित और लायाश्रित दोनों है। इन नृत्यों में नर्तन के तीनों भेद नाट्य, नृत्त व नृत्य समाहित रहता है। "भारत के प्राचीन ऋषि-मुनियों ने इस कला के लिए सिर से लेकर पैर तक के समस्त अंग, प्रत्यंग, उपांग के हलन–चलन का सूक्ष्म अध्ययन किया और उन्हें नियमबद्ध किया। इस प्रकार शास्त्र के नियमों से बंधे होने के कारण इसे शास्त्रीय नृत्य कहते है।"" 

भारत जितना वैविध्यपूर्ण देश है उतने ही यहाँ के नृत्य जैसे उत्तर प्रदेश का - कथक, तमिलनाडु का भरतनाट्यम, ओडिशा का ओडिसी, मणिपुर का मणिपुरी, आंध्र का कुचिपुड़ी, केरल का कथकली और मोहिनीअट्टम और आसाम का सत्रीय नृत्य। उमंग में भरकर सामूहिक रूप से लय के साथ बिना किसी नियम से बंधे ग्रामीणों और शहरी लोगों द्वारा किया जाना वाला नृत्य लोक नृत्य कहलाता है ।

चित्रकला में जहाँ मानवीय मनोभावों के सूक्ष्म और लालित्यपूर्ण भाव-भंगिमा के चलते अजंता, एलोरा, बादामी, सित्तलवासल के चित्र विश्व की श्रेष्ठ कलाकृतियों में से है। स्थापत्य कला में दो मुख्य शैली उत्तर भारत की "नागर शैली", दक्षिण भारत की "द्रविड़ शैली" और इन दोनों (उत्तर और दक्षिण भारत ) के मिश्रित प्रभाव से ”बैसर शैली” है। नागर शैली में निर्मित कोणार्क का सूर्य मंदिर, खजुराहों का कंदरिया महादेव मंदिर, पुरी का जगन्नाथ मंदिर, माउंट आबू का दिलवाड़ा मंदिर । द्रविड़ शैली में निर्मित मामल्लपुरम् के रथ मंदिर, तंजौर का वृहदेश्वर मंदिर, काँची का कैलाश मंदिर और बैसर शैली में निर्मित देवगढ़ का दशावतार मंदिर व एलोरा का कैलाश मंदिर विशेष उल्लेखनीय है ।

साहित्य

भारत के महाकाव्य जैसे रामायण, महाभारत और शिल्पदिकरम जैसी कालजयी कृतियों का सृजन भी हुआ है। कालिदास, शूद्रक, रवीन्द्रनाथ टैगोर, प्रेमचंद, इत्यादि के द्वारा भी साहित्यिक कृतियाँ रची गई है। इनके अतिरिक्त तमिल, तलुगु, कन्नड़, उड़िया, बंगला, असमिया, गुजरती, पंजाबी, मराठी तथा उर्दू भाषा में भी श्रेष्ठ कृतियों का सृजन हुआ है। इन सबसे भारत की साहित्यिक विरासत का पता चलता है।

भारतभूमि महापुरुषों की भूमि है। जिनमें बुद्ध, महावीर, अशोक, नानक, कबीर, सूर, तुलसी, मीरा, चौतन्य प्रभु, संत ज्ञानेश्वर, विवेकानंद, तिलक आदि नाम उल्लेखनीय है। इन्होनें सत्य, अहिंसा, शांति, सहिष्णुता, प्रेम, त्याग और समर्पण के मार्ग पर मानवमात्र को चलने का संदेश दिया। इन महापुरुषों ने अपने प्रयासों से भारत को रुढ़िमुक्त समाज बनाने का प्रयास किया।

भारत में गणित, खगोल विज्ञान और ज्योतिष जैसे गूढ़ विषयों पर प्रामाणिक और वैज्ञानिक आविष्कार हुए जैसे शून्य की खोज, अंक पद्धति का प्रयोग, पाई का शुद्धतम ज्ञान आदि। आधुनिक में रमण प्रभाव, पौधों में जीवन और ब्लैक होल आदि भारत की देन है।

विवाह

यह एक पवित्र और धार्मिक कृत्य है। भारतीय संस्कृति में विवाह को मुख्यतः सामाजिक संगठन ही माना गया है। पारंपरिक रूप से शादियाँ माता-पिता ही तय करते है। जो प्रायः एक ही जाति के होते है, लेकिन जिनका गोत्र अलग होता है। तयशुदा शादियाँ कई आधारों पर की जाती है जैसे शिक्षा, उम्र, वर्ण, पसंद, ऊँचाई, पैसा, समाज, स्थान आदि। मुस्लिम समाज और दक्षिण प्रदेश में शादियाँ ममेरे, फुफेरे रिश्तों में भी हो जाती है। भारत में शादियाँ जीवनभर का संबंध होती है, लेकिन आधुनिक युग में अनेकों कारणों से तलाक आमबात होती जा रही है।

व्यंजन

भोजन पर जाती, धर्म, समुदाय का भी प्रभाव पड़ा है जैसे उत्तर भारत के खाने में मुगल प्रभाव देखते है। भारतीय व्यंजनों की खास बात उनमें प्रयोग होने वाले मसाले है। यह मसालें भोजन को रंग, स्वाद और सुगंध प्रदान करते है। इन मसालों के पीछे कई विदेशी लोग भी यहाँ आये जैसे पुर्तगालियों ने मसालों और अन्य चीजों की चाह में भारत के पश्चिमी तट पर आधिपत्य स्थापित कर लिया । पूर्वी क्षेत्र के व्यंजन तिब्बती शैली से प्रभावित है। भारत की भौगोलिक स्थिति व जलवायु अलग-अलग होने से हर क्षेत्र के मौसम भी भिन्न होते है, जिससे वहाँ उगने वाली फसलें और भोजन बनाने के तरीके भी अलग होते है। विभिन्न क्षेत्रों के पकवान भारत के लोगों के इतिहास व संस्कृति को दर्शाते है।

प्राचीन काल में भारत में जमीन पर बैठकर भोजन करने की परंपरा थी । भोजन पत्तों पर या धातुओं की थालियों में परोसा जाता था। भोजन एक धार्मिक कृत्य है। भोजन बनाते समय स्त्रियों का पवित्र रहना आवश्यक था क्योंकि भोजन पहले पारिवारिक देवता को भोग लगाया जाता था। पहले पुरुष और बच्चे फिर स्त्रियाँ भोजन करती थी। भोजन अँगुलियों से खाया जाता था । आधुनिकरण के कारण भोजन मेजों पर किया जाता है और अविकारी इस्पात (स्टेनलेस स्टील) तथा काँच के बर्तनों का उपयोग किया जाता है। खाना अंगुलिओं के अलावा चम्मच, कांटे और चॉपसटीकस से खाया जाता है

शिक्षा, ऊँची आमदनी और पश्चिमीकृत शैली होने की वजह से भोजन की प्रविधि के साथ-साथ भोजन के समय और वस्तुओं में भी मूलभूत परिवर्तन आया है। भोजन संस्कृति का हिस्सा होते है और संस्कृति बदलने पर यह भी बदल जाते है जैसे पंजाब में सरसों का साग और मक्के की रोटी, राजस्थान के दाल-बाटी, पूर्व में चावल-मछली और रोशोगुल्ला और दक्षिण में इडली-डोसा । भोजन बनाने या पकाने को पाक कला में रखा गया है।

“पाक शास्त्रियों ने ५६ प्रकार के व्यंजनों का उल्लेख किया है और ये सभी षट्स के अंतर्गत समाहित हो जाते है मधुर, अम्ल, लवण, तिक्त, कषैलेपन, कटु | "

खेल

ऐसे बहुत सारे खेल है जिनका जन्म भारत में हुआ। युद्ध कला का सबसे पहले विकास भारत में हुआ और इसे पूरे एशिया में बौद्ध धर्म प्रचारकों ने फैलाया। पहले "क्षत्रियों के शारीरिक विकास के लिए रथ दौड़, धनुर्विद्या, तलवारबाजी, घुड़सवारी, मल्लयुद्ध, कुश्ती, तैराकी, नौका दौड़ आदि का प्रशिक्षण दिया जाता था । शतरंज का आविष्कार रावन की पत्नी मंदोदरी ने सबसे पहले किया। अमरकोश के अनुसार इसका प्राचीन नाम चतुरंगिनी था, फारसियों के प्रभाव के चलते इसे शतरंज कहा जाने लगा। सांप-सीढी खेल को मोक्ष - पट भी कहते है ।

इस खेल का वर्तमान स्वरुप कवी संत ज्ञानदेव द्वारा तैयार किया गया था। इसके बाद अंग्रेज इसे यूरोप ले गए, वहाँ के देशों में यह स्नेक्स और लेडर्स (Snakes and Ladders) के नाम से फैल गया। इसी तरह कबड्डी, खो-खो, चौपड़ (पचीसी, चौरस), पोलो या सगोल कंगजेट, तीरंदाजी, गंजिफा आदि खेल भारत से उत्पन्न हुए है। आधुनिक काल में भारत का राष्ट्रीय खेल हॉकी है। इसके अलावा यहाँ क्रिकेट, बैडमिंटन, फुटबाल, वॉलीबॉल, तैराकी आदि खेल खेले जाते है।

भारत की भाषाएँ

भारत में भाषा विकास की यह विशेषता रही है कि अलग–अलग युगों में अलग–अलग भाषाओँ का निर्माण हुआ। भारत बहुभाषी देश है। भारत में 'अनेकता में एकता' तथा ‘एकता में अनेकता' की विशिष्टता के कारण ही इसे अद्वितीय सांस्कृ तिक लोक माना जाता है। यूरोप एवं एशिया महाद्वीप के भाषा परिवारों में से 'दक्षिण एशिया में मुख्यतः चार भाषा परिवारों की भाषायें बोली जाती है। भारत में भी सामी भाषा परिवार की अरबी के अपवाद के अलावा इन्हीं चार परिवारों की भाषायें बोली जाती है ।

ये चार भाषा परिवार इस प्रकार है

  1. भारोपीय परिवार,
  2. द्रविड़ परिवार,
  3. आस्ट्रो-एशियाटिक परिवार,
  4. तिब्बत-बर्मी परिवार ।

1. भारोपीय परिवार

"भारतीय भाषाओँ का आदान-प्रदान केवल भारत या एशिया तक सीमित नहीं है, यह यूरोप तक फैली। यूरोप में भी आर्य भाषाएँ बोली जाती है। इसी आधार पर 'भारोपीय परिवार' की संरचना हुई । "

विश्व की अधिकांश महत्वपूर्ण भाषाएँ इसी परिवार की है । अंग्रेजी, हिंदी-उर्दू, स्पेनी, फ्रेंच, जर्मन, रुसी, बंगला भाषाएँ दूसरे देशों की राजभाषा, अकादमी, तकनीकी एवं प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। धर्म, दर्शन, संस्कृति एवं विज्ञान संबंधी चिंतन संस्कृत, पाली, प्राकृत, लैटिन, ग्रीक, अवेस्ता भाषाओँ में मिलता है और यह सभी भाषाएँ इसी परिवार की है ।

2. द्रविड़ परिवार

आर्य परिवार नामकरण मैक्समूलर और द्रविड़ परिवार नामकरण पादरी राबर्ट काल्डवेल ने किया है । द्रविड़ शब्द का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। द्रविड़ शब्द का प्रयोग ब्राह्मणों के लिए होता था और ये ब्राह्मण दक्षिण देश से संबंधित माने गए है। दक्षिण भारत का प्रमुख भाषा परिवार द्रविड़ है।

"आज द्रविड़ परिवार की भाषाओँ के चार प्रदेश है आंध्र (तेलुगु भाषा), तमिलनाडु - (तमिल भाषा), केरल (मलयालम भाषा) और कर्नाटक (कन्नड़ भाषा)। इन चारों प्रदेश का राजनैतिक विभाजन भाषाओँ के आधार पर हुआ है । "1

3. आस्ट्रो-एशियाटिक परिवार -

भारत में इस परिवार की तीन शाखाएँ है । खासी शाखा की प्रमुख भाषा 'खासी' मेघालय में खासी और जयंतिया क्षेत्र में रहने वाले लोगों द्वारा, निकोबारी शाखा की 'निकोबारी' भाषा निकोबार द्वीप समूह की जनजातियों द्वारा और "तीसरी शाखा की भाषाओँ को ‘मुंडा उपपरिवार की भाषाओँ के नाम से जाना जाता है, जो पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओड़िशा, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश एवं आंध्रप्रदेश के जनजाति के लोगों द्वारा बोली जाती है।"

4. तिब्बत -बर्मी परिवार -

"सिनो - तिब्बती परिवार की स्यामी / थाई / ताई उपपरिवार की अरुणाचल प्रदेश में बोली जाने वाली भाषा 'खम्प्टी / खम्प्ती को छोड़कर भारत में तिब्बत -बर्मी उपपरिवार की बोली जाने वाली भाषाओँ की मुख्य रूप से दो प्रमुख शाखाएँ है तिब्बत की हिमालयी और बर्मी की असमिया । कुछ विद्वान तिब्बत-बर्मी का सिनो ( चाईनीज) से संबंध नहीं मानते।"

Post a Comment

Previous Post Next Post