मंजुल भगत का जीवन परिचय

कथाकार मंजुल भगत (Manjul Bhagat) का जनम 22 जून 1936 ई. में मेरठ नगर श्री वीरेन्द्र प्रसाद जैन और उनकी भार्या श्रीमती रविकान्ता जैनजी के घर हुआ था। मंजुल भगत का नाम मंजुल जैन ही था और घर में इन्हें प्यार से 'रानी' कहकर पुकारा जाता था। जैन संस्कार का बचपन में इन पर काफी प्रभाव पड़ा। वे हिंसा तथा शोषण से काफी दूर थी ।

मंजुल जी की शिक्षा दिल्ली के मिरेण्डा कॉलेज में हुई। वही से उन्होंने बी. ए. पास किया और वहीं से अंग्रेजी विषय लेकर एम. ए. की शिक्षा का अध्ययन सफलतापूर्वक पूर्ण नहीं कर पाई और अंग्रेजी में एम. ए. की शिक्षा प्राप्त करने में असफल रही। मंजुल जी ने मेरण्डा हाउस में नाटक के रंगमंच पर भी अभिनय किया था।

मंजुल भगत के कथा - साहित्य पर मेरठ जनपद सहारनपुर, मुज्जफरनगर तथा दिल्ली आदि का गहरा प्रभाव पड़ा और इसी के साथ शिक्षा एवं निवास के कारण दिल्ली महानगर से उनका गहरा संबंध बना रहा ।

श्री वीरेन्द्र प्रसाद जैन व्यवसाय से वकील थे और उनकी पत्नी सुसंस्कृत एवं शिक्षित गृहणी थी।

मंजुल भगत की चार बहनें एवं एक भाई हैं। मंजुल जी बहन विख्यात प्रसिद्धि की शिखर छूती मृदुला गर्ग हिन्दी की लेखिका हैं और बहन रेनू जैन और चित्रा जैन अंग्रेजी की। भाई राजीव जैन भी कविताएँ लिखने का शौक रखते हैं। मंजुल भगत के दादा-दादी मेरठ नगर के निवासी थे।

मंजुल भगत का विवाह श्री ललित मोहन भगत से हुआ था । श्री ललित मोहन भगत अपने दादा के संस्कारों के भक्तिभाव में डूबे रहते थे। यही कारण था कि इनके पिता तथा इनका नाम भी 'भगत' पड़ा। श्री भगत जी के पिता मुख्य न्यायाधीश थे और देहरा गाजी खान के निवासी थे। मंजुल जी के पति का जन्म देहरादून में हुआ था । बी. ए. तक की शिक्षा उन्होंने शिमला में की फिर एम. ए. अंग्रेजी का अध्ययन उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से प्राप्त की ।

श्री ललित मोहन भगत और मंजुल जैन की भेंट 1955-56 में हुई। दोनों में कई वर्षों तक प्रेमलाप चलता रहा और 1960 में उन्होंने विवाह कर लिया।

मंजुल भगत जी एक महान कथाकार के रूप में इस धरा पर जन्म हुआ था । श्रीमती मंजुल भगत ने व्याख्या भी किया है कि इन्हें अपने परिवार से कोई भी प्रोत्साहन नहीं मिला जब उनकी पहली कहानी छपी तो इनके पति बहुत गुस्सा हो गए, परन्तु इसके बाद उनके व्यवहार में कुछ बदलाव भी आया। श्री ललित मोहन भगत के परिवार में लेखन की कोई परम्परा भी नहीं थी । शायद इसी कारण श्री भगत जी ने मंजुल भगत के लेखन में कोई अभिरुचि नहीं हो पाई हो । लेखकीय स्तर पर पति-पत्नी में कोई आपसी विवाद रहा ही नहीं अथवा कभी बन ही नहीं पाया। श्रीमती मंजुल भगत को घर में अपने पति से कोई सहयोग मिल ही नहीं पाया।

वास्तव में एक गृहस्थ महिला होते हुए भी घर का सारा काम खुद करती थी। मंजुल भगत को अपने लेखन के लिए एकांत दुर्लभ था। बस उनके पति यही चाहते थे कि समय पर भोजन मिले बच्चों की देखभाल करे उनके पास स्वयं के लिए वक्त बचता ही नहीं था ।

जब ‘अनारो’ उपन्यास की रचना कर रही थी तो उनके पति ने उनके मन को काफी आहत किया था वे यह सोच रहे थे कि यह खाना रुचिपूर्वक बना पाएगी की नहीं। 'अनारो' लेखन के समय बहुत सारी समस्याओं को याद करती हुई परिवार की बिना आवश्यक मांगे पूर्ण करती थी कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि उनका वैवाहिक जीवन कोई खास सुखमय तरीके से नहीं बीता। मृदुला गर्ग जी का कहना है कि यह विवाह ही उनके जिन्दगी का सबसे बड़ी भूल है।

श्री भगत जी की इस दौरान नौकरी छूट गई थी नए व्यवसाय भी खास जमता दिखाई नहीं दे रहा था। घर की आर्थिक समस्याओं के कारण मंजुल जी ने एक लाइब्रेरी में काम किया और जब पति का मनोबल कम न हो जाए उनके अंदर हीनता की भावना ना उत्पन्न हो । मंजुल जी ने इसी के कारण पेरिस जाने का स्कालरशिप भी छोड़ दिया। ग्यारह बजे तक घर का सारा काम करती, पसीने से लतपथ हो जाती और फिर ग्यारह बजे के बाद पढ़ने और लिखने का काम बिस्तर में लेटकर ही करती । संध्याकाल पति के लिए तैयार भी होती थी।

इनकी बेटी पूनम भगत जो एक बुटिक चलाती है तथा बेटा शरद भगत इन दोनों से काफी संतुष्ट तथा प्रसन्न रहती हैं। लेकिन कभी-कभी इनके खाने के डिमांडों से इनके कहानी के विचारों में खण्डन पैदा कर देती थी। कभी दाल पक जाती तो कहानी कच्ची रह जाती थी, कच्ची रह जाती थी । कभी कहानी पक जाती तो दाल

इसी दौरान मंजुल मधुमेह की गम्भीर बीमारी की शिकार गई आर्थिक स्थिति ठीक न होने कारण इलाज भी नियमित रूप से नहीं करवा पा रही थी। कभी-कभी पुरस्कार छोटी-मोटी धनराशि से अपनी इलाज को करवा पाती थी। अगर और कोई महिला होती तो शायद अपना लेखन कार्य छोड़ देती परंतु साहस, शक्ति, उनका मनोबल उनको जोड़कर रखा था और उन्होंने अपना लेखन कार्य किया। 31 जुलाई 1998 में एक ऐसा साहित्यकार हमारे उपन्यास जगत में आखिरी विदा कर रुकसत हुआ।

कृतित्व

उपन्यास
1) आनारो
2) बेगाने घर
3) टूटा हुआ इन्द्रधनुष
4) लेडीज क्लब
5) खातुल

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