हिन्दुओं के प्रमुख देवी देवता कौन-कौन से हैं?

हिन्दुओं के प्रमुख देवी देवता

1. पौराणिक देवताः—

(क) ब्रह्मा :- वेदों में ब्रह्मा को प्रजापति के नाम से अभिहित किया गया है। ऋग्वेद के एक सूत्र में प्रजापति की प्रख्याति आकाश, पृथ्वी, जल और समस्त जीवित प्राणियों के रूप में की गयी है। शपथपथ ब्राह्मण के अनुसार, सृष्टि के आरम्भ में बह्मा का ही अस्तित्व था। यही धारणा लोक में भी व्याप्त है कि ब्र‌ह्मा ने ही सृष्टि का सूजन किया था। 

ब्रह्मा की सबसे प्राचीन मूर्ति गंधार की बौद्ध कला में मिलती है, यहाँ बह‌ङ्गा का अंकन बुद्ध के जन्म प्रसंग में किया गया है। मथुरा से मिली चतुर्मुख ब्र‌ह्मा की मूर्ति में इनका तीन मुख एक पंक्ति में और चौद्या मुख बीच वाले मुख के ऊपर है।

(ख) विष्णु :- विष्णु सृष्टि के पालक है। विष्णु पुराण में विश्व की सृष्टि, स्थिति और संहार का कारण विष्णु को कहा गया है। लोक में इनके विविध रूपों के विकास का आधार मनुष्य की इच्छा-भूति-क्रिया और षड्गुण (ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य तथा तेजस्) है। इसलिए लोक में विष्णु का महत्व बढ़ा और कुषाणकाल से हमें इनके विभिन्न अवतारों के स्वरूप का दर्शन होने लगता है। यथा दशावतार की मूर्तियाँ बंगाल में विण्णुपट्ट पर बनती थी, और दशावतार का अंकन संयुक्त रूप से आज भी विष्णुमंदिर के द्वार पर होता है।

(ग) शिव :- शिव लोकरक्षक और लोक कल्याणकारी देवता है। लोक में शिव के दो रूप निगुण और सगुण माने गये है। अपने निगुण रूप में यह निर्विकार, सच्चिदानन्द स्वरूप तथा परब्रह्म और सगुण रूप में जगत की उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय के कर्ता है। भगवान राम भी शिव के उपासक थे।

शिव लोक मन में समाये हुए है। यत्र-तत्र, वट एवं पीपल वृक्षों के नीचे अनगढ़ पाषाष खण्डों के रूप में लोक मानस शिव की प्रतिष्ठा कर बेल-पत्र, धतूरा के फूल, फल, भाग, पुष्प, अक्षत और धूप-दीप से पूजन होता है। माह में सोमवार के व्रत का विशेष महत्व होता है।

(घ) गणेश :- भारतीय धर्म और उपासना में गणेश की बड़ी महत्ता है। वेद में इन्हें 'ब्रह्मणस्पति' कहा गया है। गणपति शब्द का अर्थ 'गणों का पति' है। इसी अर्थ में गणों के ईश होने के कारण इन्हें गणेश भी कहा जाता है। गणेश को अनेक उपनामों यथा-एकदन्त, दन्ती, वक्रतुण्ड, विनायक, और गणपति से लोक में पुकारते हैं। भगवान गणेश की चार भुजाओं में चार हाथ है। इन भुजाओं के द्वारा यह भिन्न-भिन्न लोकों के जीवों की रक्षा अभयदान देकर करते है। अपनी भुजाओं में इन्होने पाश, अड़कुश, रद और वर धारण किया है। इनका वाहन मूषक है।

गणेश की पूजा भारत के साथ ही जावा, सुमात्रा, बाली, चीन, जापान और नेपाल आदि देशों में भी होती हैं। भारत में गणेश की मूर्ति में एक ही सिर मिलता है, जबकि नेपाल की हेरम्ब गणपति की मूर्ति में इनका पाँच सिर है, और मूषक के स्थान पर सिंह इनका वाहन है। तिब्बत में प्रत्येक मठ के अधिरक्षक देवता के रूप में गणपति की पूजा की जाती है।

गणेश की सबसे प्राचीन (दूसरी शती ईस्वी) मूर्ति अमरावती से मिलती है। पुराणों में गणेश की प्रतिमा का जो विधान है, इसमें चतुर्भुज गणेश का ही वर्णन है। 

गुप्तकाल तक किसी भी उपलब्ध प्रतिमा में गणेश का वाहन मूषक नही दिखाया गया है, परन्तु पूर्व मध्यकाल और मध्यकालीन प्रतिमाओं में मूषक भी प्रदर्शित है। मूषकयुक्त गणेश की प्रथम प्रतिमा उड़ीसा से मिली है।

समस्त विघ्नों को नाश कर देने की शक्ति होने के कारण घर में दरवाजे पर विनायक की मूर्ति या चित्र स्थापित किया जाता है। गणेश शुभ के दाता, विध्न विनाशक एवं मंगलकारी देवता है, इसलिए समस्त शुभ कार्य गणेश वंदना एवं पूजन से प्रारम्भ होता है।

पुत्र जन्म, मुंडन, यज्ञोपवित्र और विवाह आरि संस्कारों में सर्वप्रथम गणेश पूजन होता है। व्यवसायी अपने प्रतिष्ठान में गणेश और लक्ष्मी की मूर्ति रखकर 'श्री गणेशाय नमः' और 'शुभ-लाभ' लिखते है। 'शुभ-लाभ' गणेश के पुत्र है। दीपावली के रात्रि में लोक अपने घरों और दुकानों में गणेश ओर लक्ष्मी की पूजा गुड़, खड़ी, हल्दी, धनिया, धूप और दीप से करते है कि घर में सुख, श्री और समृद्धि बनी रहें।

(ड) सूर्य :- लोक में सूर्य का प्रत्यक्ष दर्शन होने के कारण इन्हें कलियुग का साक्षात् देवता कहा जाता है। सूर्य हिन्दूओं के 'पंचदेव' में एक है। 

सूर्योपासना का आरम्भिक स्वरूप प्रतीकात्मक था, जो चक्र और कमल आदि से व्यक्त किया जाता था। बौद्ध और जैन धर्मो में भी सूर्योपासना प्रचलित है।

(च) राम :- श्रीराम पौराणिक देवता है, चैत्र मास की नवमी को श्री रामचन्द्र जी का जन्म हुआ था, जिसे रामनवमी कहते है। मंदिरों में इस दिन श्री रामचन्द्र जी का महोत्सव होता है।'

मनोकामना पूर्ति हेतु रामायण के सुंदरकाण्ड का पाठ किया जाता है। लोक में राम मर्यादा पुरुषोत्तम के नाम से भी पुकारे जाते है।

(छ) कृष्ण :- महाभारत में भगवान ने स्वयं 'कृष्ण' शब्द की निरूक्ति में कहा है कि 'मै काले लोहे की बड़ी कील बनकर पृथ्वी का कर्षण करता हूँ, और मेरा वर्ण भी कृष्ण (काला) है। इसलिए मैं कृष्ण नाम से पुकारा जाता हूँ।''

लोक कृष्ण के बाल और लोकरंजक रूप का उपासक है। भारतीय जीवन में विशेषकर ब्रज के जन-जीवन में कृष्ण समाये हुए है। लोकगीत और लोककथा सभी कृष्ण के रंग में रंगी है। इनमें श्री कृष्ण के लोकरक्षक स्वरूप का वर्णन किया गया है।

भाद्रपक्ष की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कृष्ण जन्माष्टमी मनायी जाती है। इस अवसर पर स्थान-स्थान पर कृष्ण की झाँकी का आयोजन किया जाता है। सम्पूर्ण देश में जन्माष्टमी का उत्सव बहुत धूम-धाम से मनाया जाता है। लोक निराहार व्रत करके मध्य रात्रि में खीरे के माध्यम से भगवान का जन्म कराते है, और सम्पूर्ण वातावरण शंख की ध्वनि से गूंज उठता है।

(ज) हनुमान :- हनुमान के पिता का नाम पवन था, इसलिए यह पवनपुत्र कहे जाते है। हनुमान राम के अनन्य भक्त थे। इनकी स्तुति में बनाये गये 'हनुमान चालीसा' नाम स्तोत्र का पाठ लोक प्रतिदिन करते है। भारत के बाहर मारिशस, फिजी, सुनीनाम में भारतीय संस्कृत का जो जीवन्त स्वरूप दिखलाई पड़ता है, इसका श्रेय हनुमान जी की पूजा और स्तोत्र को ही है।

मंगलवार तथा शनिवार को इनकी विशेष आराधना की जाती है। 'हनुमान चालीसा' अनपढ़ ग्रामीणों को भी कंठस्थ होती है, जो इनकी लोकप्रियता का प्रमाण है। पुराणों में इन्हें रूद्र का अवतार माना गया है, इनमें सूर्य का तेज, वरूण का पाश और जल से निर्भय रहने की शक्ति तथा ब्रह्मा द्वारा प्रदत्त ब्रह्मज्ञान भी है।

वानरों को हनुमान का वंशज माना जाता है। भूत-प्रेत का भय होने और अनिद्रा में हनुमान जी के ध्यान से भयमुक्ति होती हैं। अन्य पौराणिक देवता की अपेक्षा हनुमान पर लोक की श्रद्धा अधिक है। शनि की साढ़ेसाती और अढ़इया पर लोग हनुमान जी की आराधना करते है। हनुमान बाल ब्रह्मचारी थे, इसलिए स्त्रियाँ इनका स्पर्श नही करती है। मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिए लोग राम नाम की माला लिखकर हनुमान जी पर चढ़ाते है।

2. स्थानीय देवता :-

पौराणिक देवी-देवताओं के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की है, इसके साथ ही इनकी दृढ़ आस्था स्थानीय देवताओं के प्रति भी है। पौराणिक देवताओं की उपासना में पुरोहित पक्ष मुख्य है, परन्तु स्थानीय देवताओं में लोक के निजी विश्वास है, जो लोककल्पित है। इनमे जन साधारण की दृढ़ आस्था है।

(क) भैरव :- भगवान शंकर का नितांत उग्र और भयानक रूप भैरव, कहा जाता है। वामन पुराण के अनुसार, 'इस मूर्ति की दशा भयानक थी, करोड़ो सूर्य के समान यह चमकीली थी, सिंह के चर्म से यह आवृत्त थी, जटाएँ सिर पर सुशोभित थी, गले में सर्पों का हार विराजमान था, इसके तीन नेत्र और दस भुजाएँ थी।'' भयानक रूप को धारण कर शिव ने अन्धक नामक असुर से युद्ध किया था,

रूधिर की धाराएँ चारों दिशाओं में फूट निकली और इसी घटना से भैरव की आठ यथा- विद्याराज, कालराज, कामराज, सोमराज, स्वच्छन्दराज, ललितराज और विघ्नराज मूर्तियाँ उत्पन्न हुई।

लोक का यह विश्वास है कि रात्रि को काले घोड़े पर आरूढ़ भैरव गाँव की परिक्रमा करते है, इनके साथ काला कुत्ता भी रहता है। प्रायः सभी शिव मंदिरों में रक्षक के रूप में भैख की मूर्ति स्थापित होती है। वाराणसी में भैख को नगर का कोतवाल कहा जाता है। गृहनिर्माण के पूर्व भूत-प्रेतों से रक्षा हेतु इनकी पूजा की जाती हैं। काल भैरव का रूप विकराल है। यह गले में मुण्डमाला और कानों में सर्प का कुंडल धारण करते है, काल भैरव के अट्ठारह हाथ माने जाते है। बम्बई में भैख को 'भैरवबा' कहा जाता है। कार्य में सफलता और असफलता ज्ञात करने के लिए लोग भैरव मंदिर में जाते है। 

(ख) मुंड्या :- लोक में इसे भूमि का देवता माना जाता है। पर्वतीय प्रदेश में भुंड्या को 'क्षेत्रपाल' कहते है। इसकी अनुकम्पा एवं कृपा से भूमि की उर्वराशक्ति में वृद्धि होती है। निर्विघ्न कार्य सम्पन्न करने हेतु इसकी स्तुति की जाती है। 

पवित्र स्थान पर संभवतः किसी कूप अथवा वृक्ष के नीचे इसका स्थान' होता है। कृषक बीज बोने के पूर्व कुछ बीज इनके थान के निकट छीट देता है। शुभ कार्य, पर्व और त्योहार पर इनकों निमंत्रण दिया जाता है, और पूजा की जाती है। संतुष्ट एवं प्रसन्न होने पर यह मनोकामना पूर्ण करते है, परन्तु क्रुद्ध और असंतुष्ट होने पर अमंगल एवं अनिष्ट करते है। भूमि की उर्वराशक्ति समाप्त कर देते है, इसलिए लोक इनकी उपासना के प्रति सजग रहते है। श्रद्धा और विश्वास से इनका पूजन करता है।

(ग) डीहबाबा :- पूर्व स्थान के देवता के रूप में डीहबाबा की मान्यता है। किसी वृक्ष के नीचे गोल या चौकोर चबूतरें के रूप में इनका स्थान' होता है। रोग, व्याधि से त्रस्त मानव इनकी कृपा की कामना करता है। डीहबाबा को 'पिठार' चढ़ाने या 'जेवनार' देने की मनौती मानी जाती है, परन्तु इनका प्रसाद स्त्रियाँ या बालिकाओं को नहीं दिया जाता है। लोक का विश्वास है कि डीहबाबा के भोज्यसामग्री बनाने का धुआँ भी बालिकाओं को नहीं लगना चाहिए। डीहबाबा को पशुबलि भी दी जाती है।

(घ) बीर :-गाँवों में स्थान-स्थान पर 'बीर' की प्रतिष्ठा होती है, अन्य देवताओं की भाँति इनका भी पूजन किया जाता है। अकाल मृत्यु से ग्रस्त, सर्पदंश से मृत, वृक्ष से गिरने पर मृत व्यक्तियों कि आत्मा की प्रतिष्ठा बीर रूप में होती है। इनकों ताड़बीर, विजुलियाबीर और नागबीर आदि नामों से भी लोक में पुकारते है। बीर की स्मृति में ग्राम में एक चबूतरा बना दिया जाता है। लोक का विश्वास है कि पूजन से संतुष्ट बीर मंगल और कल्याण करते है, परन्तु असंतुष्ठ होने पर अनिष्ट और अमंगल करते है। इनको 'रोट'' चढ़ाया जाता है।

(ड) कुल देवता :- लोक पूज्य देवताओं में कुल देवता का विशेष महत्व होता है। प्रत्येक परिवार के कुल देवता होते है, जिस स्थान पर इनकी प्रतिष्ठा होती है, उसे देवहर कहा जाता है। प्रायः स्थान रसोईघर होता है। कुल देवता की स्थापना में दिशा का भी विशेष ध्यान दिया जाता है। प्रायः सभी हिन्दू देवता पूर्वाभिमुख होते है। पुत्र जन्म, विवाह आदि शुभ कार्यों के पूर्व और पश्चात् कुल देवता की पूजा की जाती है। पुत्र जन्म एवं विवाह से वंश वृद्धि होती है, इसलिए कुल देवता की पूजा बहुत धूमधाम से की जाती है।

3. पौराणिक देवियां :-

लोक प्रचलित उपासना पद्धति और विश्वासों के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि लोक की श्रद्धा देवताओं की अपेक्षा देवियों पर अधिक है। अनुमानतः देवियों की कल्पना हमें उन आदिम जातियों से मिलती है, जो आर्यों के आगमन के पूर्व भारत में रहती थी। पौराणिक देवियों में अधिकांश देवियां दुर्गा और पार्वती का ही प्रतिरूप है।

(क) दुर्गा :- इसका वर्णन हमें भविष्य और देवीभागवत पुराणों में मिलता है। सिंहवाहिनी देवी दुर्गा आदि शक्ति स्वरूपा है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में नारद जी के प्रश्न पर श्री नारायण ने देवी के सोलह नाम- दुर्गा, नारायणी, ईशाना, विष्णुमाया, शिवा, सती, नित्या, सत्या, भगवती, सर्वाणी, सर्वमंगला, अम्बिका, वैष्णवी, गौरी, पार्वती और सनातनी का वर्णन किया, जो मनुष्यमात्र का कल्याण करने वाली है। चैत्र शुक्ल एवं आश्विन शुक्ल प्रतिपदा में लोक में नवरात्रि व्रत किया जाता है, और लोक दुर्गापाठ करते है। अष्टमी और नवमी के व्रत से भी सम्पूर्ण नवरात्रि के व्रत का पुण्य मिलता है। अष्टमी के दिन कुमारी कन्या का पूजन किया जाता है, जो देवी का स्वरूप मानी जाती है।

(ख) पार्वती :- देवी पार्वती भगवान शिव जी की भाँति शीघ्र ही द्रवित होती हैं, लोक कथाओं में इनकी दयालुता का प्रचुर वर्णन मिलता है। पार्वती के चरित्र का वर्णन वामन पुराण के पच्चीसवें अध्याय में मिलता है। इनकी माता का नाम 'मेला' और पिता का नाम 'हिमालय' थे। इनकी दो ज्येष्ठ भगिनियों का नाम 'रागिणी' तथा 'कुटिला और भ्राता का नाम 'सुनाभ' था। पार्वती के अनेक उपनाम काली, उमा, गौरी, गिरिजा आदि थे।

इनका प्रथम नाम 'काली' था, इनका रंग नील अंजन के समान, नेत्र नील कमल के समान था। यह बचपन से ही तपस्या करने के लिए हिमालय पर चली गयी थी। माता ने 'उ-मा' शब्द कह कर इनसे तप करने से मना किया, परन्तु इन्होने माँ की बात नहीं मानी।' इन्हे तपस्या करता देख ब्रह्मा ने देवताओं को 'काली' को लाने को कहा, परन्तु इनके तेज के आगे कोई ठहर न सका। तब ब्रह्मा को विश्वास हो गया कि यह अवश्य शंकर की पत्नी बनेगी और तारक एवं महिष नामक राक्षसों का वध अवश्य होगा।

पर्वताराज की पुत्री होने के कारण ही काली का नाम पार्वती पड़ा। काली का मूलतः रूप कृष्णवर्ण का था। इस रूप को बदलने के लिए काली ने हिमालय पर घोर तपस्या किया, जिससे इनका शरीर सोने के समान चमकने लगा। तभी से पार्वती 'गौरी' के नाम से लोक में विख्यात हुई।

गोबर की 'गौर' (गौरी) बनाकर प्रत्येक शुभ कार्यों में इनका पूजन होता है और सुहाग की समस्त वस्तुएँ- सिन्दूर, चूड़ी, बिन्दी कंघी, आलता आदि देवी को चढ़ाया जाता है। हरितालिका तीज पर स्त्रियाँ अपने पति की दीर्घ आयु के लिए पार्वती और शिव की पूजा एवं पूरा दिन उपवास रखकर करती है। भाद्रपद की हरितालिका तीज करवाचौथ और गणेश चतुर्थी को गौरी का पूजन विशेष रूप से किया जाता है। सीता जी ने राम की प्राप्ति के लिए गौरी की प्रार्थना की थी, जिसका वर्णन रामायण में मिलता है।'

(ग) लक्ष्मीः- लक्ष्मी को धन की देवी माना जाता है। इनका वाहन उल्लू है। लोक का विश्वास है कि उल्लू को धन कोष का ज्ञान होता है, इसलिए दीपावली के दिन इसे मदिरा पिलाकर धन का पता चलाते है।

ब्रह्मवैवर्त पुराण में ब्रह्मा जी ने बहुत विस्तार के साथ उन-उन स्थानों का वर्णन किया है, जहाँ लक्ष्मी निवास करती है।

(घ) सरस्वतीः- सरस्वती विद्या की देवी है, और इनका वाहन हंस है। बसंत पंचमी के दिन इनकी मूर्ति प्रतिष्ठित कर पूजा किया जाता है, और आम्रमंजरी, बेर, फूल, हल्दी और फल देवी को अर्पित किया जाता है। देवी को चढ़ाने के बाद ही बेर फल को खाया जाता है। अश्विन शुक्लपक्ष में नवरात्र के मध्य सरस्वती शयन करती है। इस दिन विद्या की कामना करने वाले पुस्तकों की पूजा करके देवी की स्थापना कर शयन कराते है। 

(ड) अन्नपूर्णाः- लोक का विश्वास है कि अन्नपूर्णा की कृपा से परिवार अन्न-धन से पूर्ण रहता है। वाराणसी में विश्वनाथ मंदिर के समीप अन्नपूर्णा देवी का मंदिर स्थित है, जिसका दर्शन किये बिना विश्वनाथ मंदिर के दर्शन का फल नहीं मिलता। प्रति वर्ष धनतेरस से लेकर भैया दूज तक यहाँ सोने की अन्नपूर्णा जी के दर्शन का विशेष महत्व है, जिसमें प्रसाद के रूप में लोगों को 'धान' और पैसा मिलता है। लोक का यह विश्वास है कि प्रसाद में मिले धान और पैसे को तिजोरी में रखने से घर में साल भर श्री और समृद्धि बनी रहती है। अन्नपूर्णा मन्दिर के श्रृंगार में भगवान शिव को हाथ में 'खप्पड़' लेकर देवी अन्नपूर्णा से भिक्षा मांगते दिखाया जाता है, जिसका अभिप्राय यह होता है कि काशी में कोई भी व्यक्ति भूखा या नंगा नहीं रहता है।

4. स्थानीय देवियाँ :-

जगदम्बा, जालपा, विन्ध्यवासिनी, अष्टभुजा, संकठा और सौभाग्यगौरी आदि अनेक धार्मिक एवं पौराणिक देवियों की उपासना लोक करता है। शुभ कार्यों और विपत्ति में अपनी इष्टदेवी का आश्रय लेना लोक नहीं भूलता है, क्योकि उसका पूर्ण विश्वास है कि देवी सर्वशक्तिमान है, जिसकी कृपा से उसका कष्ट दूर हो जायेगा।

सम्पूर्ण भारत में शुभ कार्यों में सर्वप्रथम पाँच देवीयों और गणेश का गीत गाया जाता है। लोक जीवन में देवियों के पारिवारिक और सुलभ रूप के दर्शन होते है, जिन्हें स्थानीय देवियाँ कहा जा सकता है। इस वर्ग में लोक कल्पित देवियाँ भी आती है। यथा सती देवी आदि। स्थानीय देवियों की संख्या अगण्य है। लोक की भक्ति भावना, आस्था एवं विश्वास पत्थर में भी देवत्व की कल्पना करने में समर्थ है और वह कोई भी नाम देकर इनकी स्थापना करता है।

(क) काली माई :- इनका रूप विकराल, काला वर्ण, हाथ में खप्पर और त्रिशूल लिए रहती है, परन्तु देवी का हृदय कोमल होता है। प्रत्येक शुभ कार्य यथा पुत्रजन्म, मुण्डन, यज्ञोपवीत और विवाह में देवी को 'पियरी' चढ़ाई जाती है। देवी को 'कहाड़ी' चढ़ाने की परंपरा प्रचलित है। 

(ख) शीतला देवी :- देवी सात बहन है। इनमें शीतला सबसे दयालु है। लोक में शीतला माता चेचक रोग की अधिष्ठातृ देवी मानी जाती है। जब कोई बालक या अन्य व्यक्ति चेचक से पीड़ित होता है, तब यह माना जाता है कि शीतला देवी का प्रकोप उस पर हो गया है। अतः इस देवी की शान्ति के लिए पूजा पाठ किया जाता है।

लोक में इस देवी की पूजा प्रारम्भ करते समय घर में एक स्थान को गोबर से लेप कर, मिट्टी का ढेला या लोहड़ा रखकर, इसे देवी का रूप मानकर पूजन किया जाता है। पूजन सामग्री में अइपन, रौली, अक्षत, फूल, बताशा, गुलगुला और पूरी चढ़ाई जाती है। तीन दिन तक इसी प्रक्रिया से देवी का पूजन किया जाता है।

शीतला देवी का वाहन गधा है, इसलिए इनके मंदिरों में इनका वाहन भी होता है। काशी में शीतला घाट पर शीतला देवी का मंदिर है। हरिद्वार में कनखल नामक स्थान पर शीतला देवी का मंदिर है, यहाँ इन्हें 'तुर्किन' कहा जाता है।'

(ग) मंशा देवी :- हरिद्वार से तीन चार मील ऊँची पहाड़ी पर मंशा देवी का मंदिर हैं। लोक का यह विश्वास है कि इस देवी के दर्शन से मनोकामना पूर्ण होती है और व्यक्ति का कार्य सिद्ध होता है। व्यक्ति फल, फूल, पुष्प, ध्वज और नारियल से इस देवी का पूजन करता है। लोग मंदिर के समीप वृक्ष में निशान लगाकर कपड़ा बांध देते है और मनोकामना पूर्ण होने पर मंदिर में जाकर इसे खोलते है और देवी का पूजन तथा यज्ञ करते है।

(घ) विन्ध्यांचल देवी :- विन्ध्यांचल पर्वत पर स्थित विन्ध्यवासिनी देवी का मंदिर विश्व प्रसिद्ध है। यहाँ अश्विन और चैत्र मास की नवरात्र पर बहुत बड़ा मेला लगता है। लोक का यह विश्वास है कि इस मंदिर के दर्शन से मनोकामना पूरी होती है। लोग रौली, अक्षत, चुनरी और नारियल से देवी का पूजन करते है। कुछ परिवारों में देवी के मंदिर में ही पुत्रों और पुत्रियों का मुण्डन और यज्ञोपवीत संस्कार करने की परंपरा प्रचलित है।

(ड) अष्ठभुजा देवी :- विन्ध्यांचल पर्वत पर ही अष्टभुजा देवी का मंदिर हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, जब कंस ने देवकी की आठवीं संतान को शिला पर पटका तो वह कन्या शिला पर न गिरकर आकाशगामी हो गई और उसने ही अष्टभुजा देवी का रूप धारण कर विन्ध्यांचल पर्वत पर स्थित हो गयी। इनके दर्शन से मनोकामना पूर्ण होती है और रोग एवं शोक से मुक्ति मिलती है। पान, फूल, ध्वजा, नारियल, और चुंदरी से इनका पूजन किया जाता है। लोक का यह विश्वास है कि बिना अष्टभुजा देवी का दर्शन विन्ध्यवासिनी देवी का दर्शन पूर्ण नही माना जाता है।

(च) सती माई :- सम्पूर्ण आर्यावर्त में सती प्रथा थी, जिसमें स्त्रियाँ पति के शव के साथ चिंता में सोलह श्रृंगार कर बैठती थी। इनकी स्मृति में स्थान-स्थान पर चौरा बनाया जाता था। अन्य देवी-देवताओं के साथ इनका भी पूजन किया जाता था। शुभ कार्यों में सती माता का पूजन लोक में किया जाता था। यथा राम के विवाह के पश्चात् अन्य देवी-देवताओं के साथ कौशल्या ने सती माता का भी पूजन करवाया था।' सती को ग्राम की संरक्षिका के रूप में भी मान्यता प्राप्त है। गाँव की सुरक्षा और समृद्धि के लिए इनका पूजन होता है।

विवाह के उपरान्त गंगा पूजा के पश्चात् वर-वधू को सती पूजा करायी जाती है, इसमें सुहाग और श्रृंगार की सभी वस्तुएँ सती माता पर चढ़ायी जाती है। सती माता के मंदिर में बाँस पर लाल झण्डा अवश्य लगा रहता है, क्योंकि लोक का यह विश्वास है कि सती की आत्मा इस पर आकर बैठती है। इसलिए स्त्रियाँ सौभाग्य और सुख की वृद्धि के लिए सती पूजा करती है।

(छ) पथवारी माता :- मालवा में पथवारी माता को ग्राम रक्षिका देवी माना जाता है। यात्रा पर जाने वालों के लिए पथवारी देवी पूज्य है। यह बिछड़ों को मिलाती है और भूल-भटके लोक को मार्ग दिखाती है। प्रस्तर शिलाओं के रूप में पथवारी माता की पूजा की जाती है। शुभ कार्यो में 'उठो रानी रुक्मा पूजो पथवारी' आदि लोक गीत शुभ कार्यों में गाया जाता है।

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