साक्षरता का अर्थ एवं परिभाषा

साक्षरता वह वैयक्तिक गुण है जो व्यक्ति के पढ़ने और लिखने की योग्यता को प्रकट करती है। पढ़ने और लिखने की कला के विकास से पूर्व समाज को साक्षरता पूर्व सांस्कृतिक अवस्था में विभाजित किया जा सकता है। साक्षरता पूर्व अवस्था से साक्षरता अवस्था में परिवर्तन 400 ई० पूर्व प्रारम्भ हुआ जो चित्रकारी विद्या से प्रारम्भ होकर धीरे वर्ण विधा में पहुँचा। 

लिखने की विधा के विकास के पश्चात् सांस्कृतिक प्रगति में साक्षरता का महत्व धीरे-धीरे बढ़ गया। यही कारण है कि जनसंख्या भूगोल में साक्षरता को सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक प्रगति का एक विश्वसनीय सूचक माना जाता है। साक्षरता का गरीबी उन्मूलन, मानसिक एकाकीपन का समाप्तिकरण, शान्तिपूर्ण तथा भाई-बन्धु वाले अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के निर्माण और जनसांख्यिकीय प्रक्रिया की स्वतंत्रता क्रियाशीलता में भारी महत्व है। 

साक्षरता मनुष्य के सोच-विचार और कार्य करने की योग्यता में वृद्धि करती है और उसे नवीन खोजों की दिशा में प्रवृत्ति करती है। आज के वैज्ञानिक एवं तकनीकी युग में साक्षरता का महत्व और भी बढ़ता जा रहा है, क्योंकि निरक्षर या अनपढ़ व्यक्ति समाज और देश की वर्तमान वास्तविक स्थिति तथा अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को समझने में असमर्थ होता है तथा तकनीकी दृष्टि से अकुशल होने के कारण आधुनिक उद्योगों तथा सेवाओं में उचित योगदान भी नहीं कर पाता है। मानव सभ्यता का विकास प्रत्यक्ष रूप से साक्षरता से सम्बन्धित रहा है और वर्तमान काल में भी वहीं देश आर्थिक रूप से अधिक सम्पन्न है जहां साक्षरता दर उच्च है। साक्षरता का अन्य जनसांख्यिकीय पक्षों जन्मदर, मृत्युदर, प्रवास, व्यवसाय, नगरीकरण आदि पर भी प्रभाव पड़ता है। अतः साक्षरता प्रतिरूप समाज के सामाजिक एवं आर्थिक विकास की गति का सूचक है।

इस प्रकार जीवन की गुणवत्ता के निर्धारण में शिक्षा और साक्षरता का अत्यन्त ही महत्वपूर्ण स्थान है। 

साक्षरता का अर्थ

साक्षरता की संकल्पना का तात्पर्य न्यूनतम साक्षरता निपुणता से है, जो एक देश से दूसरे देश मे भिन्न है। निम्नतम साक्षरता स्तर की भिन्नता मौखिक रूप से विचार विनिमय से लेकर विभिन्न प्रकार की कठिन परिकल्पनाओं तक मानी जाती है। कभी-कभी पाठशाला शिक्षा अवधि के आधार पर साक्षरता व असाक्षरता का निर्धारण किया जाता है। ट्रिवार्था (1969, पृ० 131) विद्यालयी शिक्षा की अवधि के आधार पर साक्षरता निर्धारण के पक्ष में नहीं थे। साथ ही वे देश की प्रचलित भाषा में नाम लिखने और पढ़ने की योग्यता के आधार पर साक्षरता के पक्ष में भी नहीं थे।

साक्षरता का शाब्दिक अर्थ है व्यक्ति के साक्षर (अक्षर युक्त) होने का गुण।

सामान्य अर्थ में साक्षर उस व्यक्ति को माना जाता है जो किसी भाषा को पढ़ना एवं लिखना जानता है। विभिन्न देशों में साक्षरता की परिभाषा तथा उसकी माप या निर्धारण के लिए विविध मापदण्डों (आधारों) को प्रयोग में लाया जाता है, इसलिए साक्षरता को परिभाषित करना एक कठिन कार्य है।

साक्षरता की परिभाषा

संयुक्त राष्ट्र संघ ने किसी भी भाषा में साधारण संदेश (कथन) को समझ लेने के साथ-साथ इसको पढ़ने और लिखने की योग्यता को साक्षरता निर्धारण का आधार माना है।

सन् 1930 में फिनलैण्ड में साक्षरता निर्धारण के लिए सबसे कठिन परिभाषा को अपनाया गया। इसमें केवल उन लोगों को साक्षर माना गया जो कठिन प्रश्नों को हल कर सकते थे। जो उनमें असफल रहे, उन्हें दो श्रेणियों में विभाजित किया गया-

1. अर्द्ध-शिक्षित, जो पढ़-लिख तो सकते थे पर गणितीय (वर्णनात्मक) गलतियाँ करते थे, और
2. अशिक्षित, जो न लिख सकते थे और न ही पढ़ सकते थे (यूनेस्को, 1957, पृ० 29)

इसके विपरीत सन् 1961 में हांगकांग जनगणना में कोई भी व्यक्ति, जो यह कहता था कि वह कोई एक भाषा पढ़ सकता है, उसके लिए यह अनुमान कर लिया गया कि वह लिख भी सकता है तथा उसे साक्षर माना गया।

"साक्षरता जनसंख्या का महत्वपूर्ण गुण है, किसी समूह में शिक्षा की मात्रा, उसकी वृद्धि एवं आधुनिकता का एक श्रेष्ठ मापक है। (गोसल, 1979, पृ० 150)। "किसी भाषा में समझ के साथ-साथ पढ़ने और लिखने की योग्यता वाले व्यक्ति को साक्षर के रूप में परिभाषित किया जाता है।"

जनगणना के अनुसार, साक्षरता को निम्नवत परिभाषित किया गया है- "एक व्यक्ति जो किसी भी भाषा में समझ के साथ-साथ लिख-पढ़ सकता है, वह साक्षरों के अन्तर्गत आता है। जो व्यक्ति पढ़ सकता है, परन्तु लिख नहीं सकता, वह साक्षर नहीं है।"

साक्षर होने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि व्यक्ति ने कोई औपचारिक शिक्षा प्राप्त की हो या शिक्षा सम्बन्धी कोई न्यूनतम परीक्षा उत्तीण की हो। यदि गणना करने वाले को किसी के पढ़े-लिखे होने में संदेह है तो वह निर्देश पुस्तिका के अनुसार उस व्यक्ति से पढवाकर तथा एक साधारण पत्र लिखवाकर उसके पढ़े-लिखे होने की परख कर सकता है। यदि कोई व्यक्ति अपना नाम लिख लेता है तो वह लिख सकने वाले समझदार व्यक्ति के रूप में परिभाषित नहीं होगा। कोई व्यक्ति यदि किसी भाषा में पढे-लिखे होने का दावा करता है, परन्तु वह भाषा गणना करने वाले को नहीं आता है, ऐसी स्थिति में प्रतिवादी का कथन सत्य माना जाएगा। घर का एक साक्षर व्यक्ति अन्य साक्षरों की गणना कर सकता है।

निरक्षर व्यक्तियों की श्रेणी में वे व्यक्ति आते हैं जो न तो किसी भाषा में पढ़ सकते है और न ही लिख सकते हैं या पढ़ सकते हैं, परन्तु लिख नहीं सकते। भारत के जनगणना विभाग के अनुसार 0-6 आयु वर्ग के सभी बच्चे निरक्षर माने गये हैं, भले ही उन्होंने पढ़ने-लिखने की क्षमता प्राप्त कर ली हो और स्कूल भी जाते हों। 1981 तक 5 वर्ष से कम आयु के बच्चे ही निरक्षर माने जाते थे, परन्तु 1991 की जनगणना से 7 वर्ष या उससे अधिक आयु के बच्चों को साक्षर की श्रेणी में रखा गया है।

"यद्यपि शिक्षा स्वयं सामाजिक, आर्थिक उन्नति नहीं करती किन्तु शिक्षा के अभाव में निश्चित ही विकासशील प्रक्रियाएँ बाधित होती हैं ।"

साक्षरता एक देश से दूसरे देश, एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश, एक जाति से दूसरी जाति में बदलती रहती है। कम विकसित या विकासशील देशों की तुलना में विकसित देशों में अधिक साक्षरता पायी जाती है। इसका कारण वहां की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक उन्नति है। जिसके फलस्वरूप विकसित देश विकासशील देशों की तुलना में साक्षरता में ज्यादा आगे हैं।

भारत के विकास में एक महत्त्वपूर्ण बाधा निरक्षरता तथा अज्ञानता है। विकास के विभिन्न पक्षों को समझने, अपनाने, परम्पराओं से हटकर आर्थिक कार्यों में नवीन प्रक्रियाओं को अपनाने एवं सजग नागरिक बनने के लिए शिक्षा पहली प्राथमिकता है और पहला चरण साक्षरता है।

उच्च नगरीकरण वाले क्षेत्रों में साक्षरता दर अधिक होती है और ग्रामीण क्षेत्रों में साक्षरता दर कम होती है। प्रौद्योगिकी दृष्टि से विकसित क्षेत्रों में साक्षरता दर अधिक होती है। इसके विपरीत जिन क्षेत्रों में औद्योगिक विकास निम्न होता है, वहां पर साक्षरता दर भी निम्न होती है।

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