स्वर्ग-नरक क्या है नरक के प्रकार ?

प्राचीन काल से ही स्वर्ग-नरक की कल्पना जनसामान्य में व्याप्त थी। अथर्ववेद में स्वर्ग-नरक का वर्णन मिलता है। स्वर्ग की कल्पना प्रकाशमय स्थान से की जाती है, जहाँ दूध, घी, दही आदि के साथ अप्सराएँ होती है। स्वर्ग में मनुष्य सभी मर्नावांछित इच्छा की पूर्ति करता है, जबकि नरक की कल्पना अधिकारयुक्त स्थान से की गई है। रामायण में भी वर्ग-नरक का उल्लेख मिलता है। तत्कालीन समाज में ऐसा विश्वास व्याप्त था कि धर्मात्मा व्यक्ति स्वर्ग को प्राप्त होता है। धर्म का परिणान सुख (स्वर्ग) और अधर्म का परिणाग दुःख (नरक) कहा जाता है।

स्वर्ग-नरक का वर्णन हमें अठारह पुराणों विशेषकर नारद, विष्णु, पद्म, मार्कण्डेय, मत्स्य, देवी भागवत, शिव और गरूड़ में मिलता है।

पद्रम पुराण में कुञ्जल ने अपने पुत्र विज्वल के प्रश्न का उत्तर देते हुए प्रत्येक भोग में शुभ और अशुभ कर्म को ही कारण बताया है। पुण्य कार्य से जीव सुख भोगता है, और पाप कर्म से जीव दुःख का अनुभव करता है।

पद्रम और नारद पुराणों में स्वर्गगामी पुरूषों का सविस्तार वर्णन करते हुए कहा गया है कि जो मनुष्य सत्य, तपस्य, ज्ञान, ध्यान तथा स्वाध्याय के द्वारा धर्म का अनुसरण करते है, वह स्वर्गगामी होते हैं। जो व्यक्ति माता-पिता का आदर, गुरूजनों की सेवा, दान न लेने वाला और युवावस्था में भी क्षमाशील एवं जितेन्द्रिय होता है, वह भी स्वर्ग जाता है।

पद्रम पुराण के अनुसार, जो मनुष्य नास्तिक, चोर, झूठा, असंयमी, निर्दय, चुगलखोर, कृतध्न, और अभिमानी होता है, वह नरक में जाता है। जो मनुष्य पितृयोग (श्राद्ध), देवयोग (यज्ञ), दूसरे के खेत, जीविता, घर और प्रेम को नष्ट करता है, अनाथ बच्चों, दीन, रोगातुर, वृद्ध पुरूषों पर दया नहीं करता, वह भी नरक में जाता है।

नरक के प्रकार

ऐसी मान्यता है कि पृथ्वी और स्वर्ग के नीचे नरक है, जिसमें पापी लोग गिराये जाते है। वामन पुराण में नरक का वर्णन दो अध्यायों यथा ग्यारहवें और पैर्तीसवे में मिलता है। ग्यारहवें अध्याय में नरकों का नाम तथा पैतीसवें अध्याय में सामान्य संकेत मिलता है। वामन पुराण के ग्यारहवें अध्याय और विष्णु पुराण के अनुसार, नरकों का नाम अद्योलिखित है :-

वामन पुराण

1. रौख नरक
2. तामिस्त्र नरक
3. अंधतामिस्त्र नरक
4. महारौख नरक
5. कालचक्र नरक
6. अप्रतिष्ठ नरक
7. घटीयंत्र नरक
8. असिपत्रवन नरक
9. तप्तकुम्भ नरक
10. कूटशाल्यलि नरक
11. करपत्र नरक
12. श्वान भोजन नरक
13. संदेश नरक
14. लोहपिण्ड नरक
15. करम्भसिकता नरक
16. भयंकर क्षार नदी नरक
17. कृमि भोजन नरक
18. वैतरणी नदी नरक
19. शोणित पूय भोजन नरक
20. क्षुराम त्रधार नरक
21. निशित चक्रक नरक
22. संशोषण नरक

विष्णु पुराण

1. रौख
2. सूकर
3. रोध
4. ताल
5. विशसन
6. महाज्चाल
7. तप्तकुम्भ
8. लवण
9. विलोहित
10. रुधिराम्भ
11. वैतरणि
12. कृमीश
13. कृमिभोजन
14. असिपत्रवन
15. कृष्ण
16. लालाभक्ष
17. दारूण
18 पूयवट
19. वहिज्वाल
20. अंधःशिरा
21. संदंश
22. कालसूत्र
23. तमस
24. अवीचि
25. श्वभोजन
26. अप्रतिष्ठ
27. अप्रचि

इन नरकों के अलावा भी अनेक प्रकार के नरक है, जिसमें दुष्कर्मी लोग नाना प्रकार की यातनाएँ भोगते और क्रम से स्थावर, कृमि, जलचर, पक्षी, पशु, मनुष्य, धार्मिक पुरुष, देवता और मुमुक्ष आदि अनेक योनियों में जन्म ग्रहण करते है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि प्रत्येक मनुष्य को अपने पाप और पुण्य का अक्षयफल अवश्य भोगना पड़ता है। प्रलय हो जाने पर भी जीव के जिन कर्मो का फल शेष रह जाता है, दूसरे कल्प में नयी सृष्टि होने पर वह पुनः अपने पुरातन कर्मों का भोग भोगता है।'

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