अस्तित्ववाद क्या है?

अनुक्रम
अस्तित्ववाद बीसवी शताब्दी का नया दर्शन है। जहाँ विज्ञान और भौतिकवादी प्रवाह ने मनुष्य के अस्तित्व को ही मूल्यविहीन किया वही लोकतंत्रात्मक व समाजवादी राजनैतिक विचारधाराओं ने व्यक्ति के अस्तित्व से उपर समाज के अस्तित्व पर मुख्य चिन्ह लगा दिया तो मानव अस्तित्व को महत्व देने हेतु नयी दार्शनिक प्रवृत्ति का प्रादुर्भाव हुआ। इस विचारधारा ने यह अस्वीकार कर दिया कि समाज को व्यक्ति क अस्तित्व से ऊॅचा माना जाय। इसलिए इस दार्शनिक अभिव्यक्ति ने मानव की भावात्मक अभिव्यक्ति को मजबूत आधार प्रदान करने का कार्य किया।

अस्तित्ववाद का अर्थ

अस्तित्ववाद के मूल शब्द है ‘‘अस्ति’’ जो कि सस्कृत से शब्द ‘अस्’ धातु से बना है। जिसका अर्थ ‘‘होना’’ तथा अंग्रेजी का शब्द ‘इक्सिटैन्सिलिज्म’ शब्द ‘‘एक्स एवं सिस्टेरे’’ से बना है। जिसमें एक्स का अर्थ है बाहर और सिस्टेर का अर्थ है खड़े रहना अत: अस्तित्ववाद वह दार्शनिक दृष्टिकोण है जिसमे व्यक्ति अपने अस्तित्व को विश्वपटल पर स्पष्ट रुप से रखने का प्रयास करता है। अस्तित्ववाद मुख्य रुप से इस प्रश्न में रुचि रखता है कि ‘‘मनुष्य क्या है?’’ प्रो0 ब्लैकहोम ने इसे सत्तावाद या सद्वाद का दर्शन माना उनका कथन है कि -’’अस्तित्ववाद सद्वाद या सत्तावद का दर्शन है, प्रमाणित तथा स्वीकार करने और सत्ता का विचार करने तथा तर्क करने के प्रयास को न मानने का दर्शन है।’’ अस्तित्ववाद इन तथ्यों पर विचार करता है-
  1. अस्तित्ववाद का सार से अधिक महत्व-डेकार्टे का प्रमुख उद्धरण है- ‘‘मै सोचता हूँ इसलिए मेरा अस्तित्व है।’’ अस्तित्ववादी द्वारा स्वीकार नहीं किया जाता उनके अनुसार मनुष्य का अस्तित्व पहले है तभी वह विचार कर सकता है। मनुष्य अपने अस्तित्व के पश्चात ही जीवित रहने के बारे में चेतना विकसित करता है। अस्तित्व वादी मनुष्य को मूल्यों का निर्माता मानते है। प्रो0 सात्रे का कथन है-’’मै केवल अपने को सम्मिलित करता हूँ। इस प्रकार का भाव अहं बोध का भाव है और इसके कारण वह अपने किये कार्यो की कमियों केा जानकर सुधरने का प्रयास करता है।’’
  2. सत्य औैर ज्ञान-अस्तित्ववादी सहज ज्ञान में विश्वास करते है। ज्ञान मानवीय होता है। व्यक्ति द्वारा अनुभव से प्राप्त ही ज्ञान सच्चा है यही सत्य है। सत्य व्यक्ति का आत्मपरक, यर्थाथ, आत्मानुभूति की उच्चतम व्यवस्था है। यह अमूर्त की परिणति स्वरुप है।
  3. स्वतंत्रता-मनुष्य का अस्तित्व स्वीकार करने के लिए उसे ‘‘चयन करने वाला अभिकरण’’ मानना आवश्यक है। उसकी स्वतन्त्रता सम्पूर्ण है। मनुष्य को क्या बनना है। इसका चुनाव करने लिए वह पूर्ण स्वतंत्र है। चयन करने तथा निर्मित होने की प्रक्रिया मानव के स्वयं के अस्तित्व में है। व्यक्ति सूक्ष्मरुप में श्वर का प्रतिमान है, जो कि स्वतंत्रता के साथ कार्य कर सकता है।
  4. वैयक्तिक मूल्यों को प्र्रश्रय-अस्तित्ववाद में मूल्य सर्वथा वैयक्ति होते है। अत: सत एवं असत तथा शुभ एवं अशुभ केवल वैयक्तिक मूल्य है। जिनकी व्याख्या प्रत्येक व्यक्ति अपने ढ़ग से कर सकता है। अस्तित्ववाद मनुष्य को भयंकर बोझ से लदा हुआ मानता है और अपनी असफलता के लिए मानव किसी पराशक्ति में आश्राय नहीं ढूँढ सकता।
  5. मानव का स्वरुप:-अस्तित्ववादी मनुष्य को सभी गुणों से परिपूर्ण, अपने जीवन के निर्णय लेने में समर्थ एवं चेतनायुक्त मानते है। ब्लैकहोम लिखते हैं कि-’’मानव सत्ता की मानव सत्ता की परिभाणा नही दी जा सकती क्याकि वह प्रदत्त वस्तु नहीं है, वह प्रण्न है मानव सम्भावना मात्र उससे स्वयंभु बनाने की शक्ति है। उसका अस्तित्व अनिर्णित होता है क्योकि उसकी समाप्ति नहीं होती। मानव मात्र चेतन प्राणी ही नहीं अपितु अद्वितीय रुपेण वह आत्मचेतना से युक्त है वह विचार ही नही वरन् विचार के लिए भी सोचता है।’’

अस्तित्ववाद दर्शन के सिद्धान्त

अस्तित्ववाद दर्शन के अपने कुछ सिद्धान्त है, जिसके विषय में हमारा ज्ञान आवश्यक है और ये सिद्धान्त है-
  1. व्यक्तिगत मूल्यों एवं प्रयासों को महत्व दिया जाना। 
  2. अस्तित्ववाद व्यक्तिगत मनुष्य की स्वतंत्रता एवं मुक्ति पर बल देता है। मुक्ति असीमित है। 
  3. अस्तित्ववाद सर्वश्रेण्ठता के अन्तयुर्द्ध से उठकर नैतिक बनकर साथ रहने पर बल देता है। 
  4. अस्तित्ववाद मनोविश्लेषणात्मक विधियों को अपनाने में विश्वास करता है। 
  5. अस्तित्ववाद मानव के अस्तित्व में विश्वास करता है, इसका आभास हमें प्रो0 ब्लैकहोम शब्दों में निम्नलिखित रुप में मिलता है-’’अस्तित्ववाद सद्भाव या सत्तावाद का दर्शन है, प्रमाणित तथा स्वीकार करने और सत्ता का विचार करने और तर्क करने को न मानने का दर्शन है।’’

अस्तित्ववाद एवं शिक्षा 

अस्तित्ववादी दर्शन इतना क्रान्तिकारी तथा जटिल है कि शिक्षा की दृष्टि से इस पर कुछ कम विचार हुआ है। अस्तित्ववाद का पादुर्भाव एक जर्मन दार्शिनिक हीगेल के ‘‘अंगीकारात्मक या स्वीकारात्मक’’ आदर्शवाद का विरोध है। हम पूर्व में भी पढ़ चुके है कि यह अहंवादी दर्शन की एक खास धारा है।’’ मानव को चेतना युक्त, स्वयं निर्णय लेने अपने जीवन दशाओं को तय करने के योग्य मानते है तो ऐसी दशा में शिक्षा की आवश्यकता स्वयं सिद्ध हो जाती है। भारतीय दर्शन में इस दर्शन का प्रभाव परिलक्षित नहीं हुआ। परन्तु पाण्चात्य दर्शन ने इसका उल्लेख स्पष्ट रुप में मिलता है। अस्तित्ववाद के शैक्षिक विचार पर प्रथम पुस्तक 1958 में प्रकाशित हु और इस ओर मुख्य योगदान प्रो0 मारिस, प्रो0 नेलर तथा प्रो0 ब्रूबेकर आदि का है।

अस्तित्ववादी शिक्षा का अर्थ -  

अस्तित्ववादी शिक्षा को मनुष्य की एक क्रिया या प्रवृत्ति मानते है। शिक्षा मनुष्य के अपने व्यक्तिगत अनुभूति के रुप में पायी जाती है। अस्तित्ववादी शिक्षा को मनुष्य को अपने अस्तित्व की प्रदर्शित करने का माध्यम मानते है। अस्तित्ववादी के अनुसार शिक्षा व्यक्तिगत प्रयास है।

अस्तित्ववाद एवं शिक्षा के उद्देश्य  -

प्रा0े आडे के अनुसार अस्तित्ववादी शिक्षा के उद्देश्य अग्राकित अविधारणा पर आधारित है- 1. मनुष्य स्वतंत्र है, उसकी नियति प्रागनुभूत नहीं हैं। वह जो बनना चाहें, उसके लिए स्वतंत्र है। 2. मनुष्य अपने कृत्यो का चयन करने वाला अभिकरण है उसे चयन की स्वतंत्रता है। इनके आधार पर उद्देश्य निर्धारित है-
  1. स्वतंत्र व्यक्तित्व का विकास-चयन करने वाला अभिकरण होने के नाते चयन प्रक्रिया में व्यक्ति को समग्र रुप से अन्त:ग्रसित हो जाना पड़ता है। अत: शिक्षा का यह उद्देश्य है कि वह बालक के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विकास करे।
  2. व्यक्तिगत गुणों व मूल्यों का विकास:-अस्तित्ववादी मानते है कि मानव स्वयं अपने गुणों एव मूल्यों को निर्धारित करता है। अत: शिक्षा को बालक में व्यक्तिगत गुणों और मूल्यों विकास की योग्यता विकसित करनी चाहिए। 
  3. मानव में अहं व अभिलाषा का विकास करना-इस सम्बन्ध में प्रो0 मार्टिन हीडेगर का कथन है-’’सच्चा व्यक्तिगत अस्तित्व ऊपर से थोपे गये और अन्दर से इच्छित किये गये अभिलाषाओं का संकलन है।’’ अत: अस्तित्ववाद यह मानता है कि शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य की अहं भावना के साथ अभिलाषा का भी विकास करना होना चाहिये। 
  4. वास्तविक जीवन हेतु तैयारी:-मानव अस्तित्व जीवन में यातना एवं कष्ट सहकर ही रहेगी। अत: अस्तित्ववादियों के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य बालक को इस योग्य बनाना है कि वह भावी जीवन में आने वाले संघर्षो, कष्टों और यातनाओं को सहन कर सके जो उत्तरदायित्व पूर्ण जीवन में आ सकते है। अस्तित्ववादी मृत्यु की शिक्षा देने के पक्ष में है। 
  5. व्यक्तिगत ज्ञान या अन्तर्ज्ञान का विकास करना:-इस सम्बन्ध में प्रा0े बिआउबर का कहना है-’’मानव एक पत्थर या पौधा नहीं है’’ और अस्तित्ववाद इसके अनुसार दो-बाते मानते है कि मनुष्य अपनी बुद्धि और सूझ बूझा से काम करते है अत: अस्तित्ववादियों के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य व्यक्तिगत सहज ज्ञान या अन्तर्ज्ञान का विकास करना है और मानव को अपने क्रियाओं हेतु निर्णय लेने में सहायता देना है।

अस्तित्ववादी शिक्षा में शिक्षक एवं शिक्षार्थी

अस्तित्ववाद के अनुसार हमे छात्र के अस्तित्व को महत्व देना चाहिये। अस्तित्ववादी विद्यार्थी के कुछ कर्तव्य निर्धारित करते है। विद्यार्थी स्वयं में महत्वपूर्ण और सन्निहित होते है। अस्तित्ववाद के अनुसार, विद्यार्थी एक मुक्त या निश्चित परिश्रमों एवं विचारणील प्राणी होता है। विद्यार्थियों की शिक्षा अलग-अलग प्रकार से उनकी योग्यता एवं व्यक्तित्व के अनुसार होनी चाहिए। प्रत्येक विद्यार्थी को अपने व्यक्तित्व के विकास एवं पूरा ध्यान देना चाहिये। अस्तित्ववादी बालक के व्यक्तित्व में इन गुणों की परिकल्पना करते है-
  1. आत्मबोध, आत्मनियर्णय या आत्मनियंत्रण की शक्ति। 
  2. आत्मशुद्धि व आत्मकेद्रिता के गुण। 
  3. विचारों, एवं इच्छाओं को प्रकट करने की क्षमता। 
  4. सौन्दर्यबोध की क्षमता। 
  5. जीवन पर्यन्त ज्ञान की इच्छा का विकसित करते रहने की क्षमता। 
  6. अध्यापक के साथ सम्बन्ध स्थापन की क्षमता। 
  7. भावात्मक पक्ष की सुदृढ़ता
जैसा कि छात्र संकल्पना में स्पष्ट किया गया है कि अस्तित्ववाद स्वतंत्रता में विश्वास करता है। अस्तित्ववादी अध्यापको को स्वतंत्र विचार करने वाला स्वेच्छा से काम करने वाला, स्वतंत्र मूल्यों को स्थापित करने वाला, आशावादी, व्यावहारिक एवं निर्भीक होना चाहियें। अस्तित्ववादी मानते है कि अध्यापक में विद्यार्थी को उसके अनुकूल तैयार करने की अभिक्षमता होनी चाहिए। शिक्षक को जीवन के वास्तविक अनुभव प्राप्त कर उसके अनुकूल विद्यार्थी तैयार करने हेतु तैयार रहना चाहिये। अस्तित्ववादी यह मानते है कि विद्यार्थियों को आत्मानुभूति के लिए तैयार करना चाहिए और विद्यार्थियों को निजता की अनुभूति करते हुये जीवन के सत्य का बोध कराये। अस्तित्ववादी अनुभूति के माध्यम से विद्यार्थी के व्यक्तित्व का विकास करे और इस प्रकार से अस्तित्ववादियों के अनुसार शिक्षक के दायित्व बहुत अधिक है और उसमे विशेष गुण की आवश्यकता होगी उससे अपेक्षा की जाती है कि-
  1. वह विषय सामग्री के प्रस्तुतिकरण में विद्यार्थियों को उसके सत्य के खोज के लिए स्वतंत्रता प्रदान करे।
  2. विद्यार्थियों में मस्तिष्क का स्वयं संचालक एवं नियंत्रण की क्षमता विकसित करे। 
  3. विद्यार्थियों को चरित्र गठन कर स्वयं सिद्ध सत्य मानने की क्षमता उत्पन्न करे। 
  4. विद्यार्थियों को चयन करने की स्वतंत्रा प्रदान करें। 
  5. विद्यार्थियों को स्वयं की अनुभूति करने का अवसर प्रदान करे।

अस्तित्ववादी पाठ्यक्रम एवं शिक्षण विधियाँ

पाठ्यक्रम-

अस्तित्ववादी जैसा कि पढ चुके है व्यक्ति की वैयक्तिकता को महत्व देता है। अत: यह स्पष्ट है कि पाठ्यक्रम में हम ऐसे विशेषताओं को अवश्य पायेंगे जिनमें मानव जीवन का अस्तित्व प्रधान है। अस्तित्ववादी पाठ्यक्रम को विशाल रखना चाहते है। क्योकि उसमें सम्पूर्ण परिवेश (प्रकृति एवं जीवन) का अनुभव सम्मिलित हो पायेगा। अस्तित्ववाद समाज विज्ञान को स्थान प्रदान करता है पर फिर भी यह पक्ष विचारणीय रहता है कि इसके अध्ययन द्वारा विद्याथ्र्ाी को अपने आप की निरीहता तथा अस्तित्व हीनता का अहसास करवाया जाता है। अस्तित्ववादी वैज्ञानिक विषयों के अध्ययन को महत्व नही देता है क्योकि वैज्ञानिक अध्ययन निवर्ैयक्तिक होता है। उसमे निजता समाप्त होती है। अस्तित्ववादी वैज्ञानिक सत्य को पूर्ण सत्य नहीं मानते है। उनके अनुसार व्यक्ति द्वारा जो चयन किया जाता है वहीं पूर्ण सत्य एवं स्वीकार्य है। अस्तित्ववादी पाठ्यक्रम में कला, साहित्य, इतिहास, विज्ञान, भूगोल, संगीत, दर्शन, मनोविज्ञान, तथा वििभान्न विषयों एवं क्रियाओं को विशेष स्थान दिया जाता है। कला खेलकूद एवं व्यायाम को यथोचित स्थान मिलना चाहिए क्योकि यह विद्यार्थियों के अस्तित्व को स्पष्ट करते हुए संसार को ज्ञान देते है एवं स्वतंत्र आत्मप्रकाशन का अवसर देते है।

शिक्षण विधि-

अस्तित्ववादी ज्ञान मिमासा के अनुसार व्यक्ति स्वयं अपने प्रयत्नों से ज्ञान प्राप्त करता है। जो भी धारणाएँ तथ्य आदि उसने ग्रहण किये है। और उसका उत्तरदायित्व उसका स्वयं है। ज्ञान मानवीय होता है।अस्तित्ववादी सामूहिक विधि का विरोध करते है। वह शिक्षण प्रक्रिया को पूर्णतया व्यक्ति केन्द्रित बनाने के प्रबल समर्थक है। सामूहिक विधि वैयक्तिकता के विकास में बाधक है। विद्यार्थी को एकल शिक्षा दी जानी चाहियें। पश्थक शिक्षा के साथ ‘‘स्वप्रयत्न द्वारा शिक्षा’’ का अवसर दिया जाना चाहिये। अन्तर्ज्ञान विधि की परिस्थितिया भी विद्यार्थी को दी जानी चाहियें। अस्तित्ववादी प्रश्नोत्तर विधि से प्रयोग को भी आवश्यक मानते है। क्योकि यह बालक को प्रदर्शन का अवसर उपलब्ध कराती है। अस्तित्ववादी आत्मीकरण के साथ समस्या विधि के प्रयोग को उचित मानते है क्योकि इससे वैयक्तिक योग्यता एवं आत्मदर्शन का पूरा अवसर मिलता है। शिक्षा में अस्तित्ववाद का पूर्णरुपेण नूतन है परन्तु व्यक्तिवादी विचार के कारण शिक्षा मे इसका प्रभाव काफी स्पष्ट है क्योंकि वर्तमान स्वतंत्र युग में व्यक्ति महम्वपूर्ण हो गया है।
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