कार्ल मार्क्स के सिद्धांत

अनुक्रम
मार्क्सवाद को सर्वप्रथम वैज्ञानिक आधार प्रदान करने का श्रेय कार्ल मार्क्स व उसके सहयोगी एंजिल्स को जाता है। फ्रांसीसी विचारकों सेण्ट साईमन तथा चाल्र्स फोरियर ने जिस समाजवाद का प्रतिपादन किया था, वह काल्पनिक था। कार्ल मार्क्स ने अपनी पुस्तकों ‘Das Capital’ तथा ‘Comunist Manifesto’ के वैज्ञानिक समाजवाद का प्रतिपादन किया। 

कार्ल मार्क्स के सिद्धांत 

कार्ल मार्क्स के सिद्धांत को चार भागों में बांटा जा सकता है-
  1. द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद
  2. ऐतिहासिक भौतिकवाद
  3. वर्ग संघर्ष का सिद्धांत
  4. अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत 

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का सिद्धांत कार्ल कार्ल मार्क्स के सम्पूर्ण चिन्तन का केन्द्र बिन्दु है। कार्ल मार्क्स ने हीगल के द्वन्द्ववाद को अपने इस सिद्धांत का आधार बनाया है। कार्ल मार्क्स का मानना है कि संसार में हर प्रगति द्वन्द्वात्मक रूप में हो रही है। हीगल के विचार तत्व के स्थान पर द्वन्द्वात्मक रूप में हो रही है। हीगल के विचार तत्व के स्थान पर मार्क्स ने पदार्थ तत्व को महत्वपूर्ण बताया है। कार्ल मार्क्स के अनुसार जड़ प्रकृति या पदार्थ ही इस सृष्टि का एकमात्र मूल तत्व है। इसे इन्द्रिय ज्ञान से देखा जा सकता है। जो सिद्धांत जड़ प्रकृति या पदार्थ में विश्वास रखता है, भौतिकवाद कहलाता है। 

कार्ल मार्क्स के इस सिद्धांत को समझने के लिए द्वन्द्व, भौतिक तथा वाद तीनों शब्दों का अलग-अलग अर्थ समझना आवश्यक है।
  1. ‘द्वन्द्व’ से तात्पर्य है-दो विरोधी पक्षों का संघर्ष। 
  2. ‘भौतिक’ का अर्थ है-जड़ तत्व अथवा अचेतन तत्व। 
  3. ‘वाद’ से तात्पर्य है-सिद्धांत, विचार या धारणा। 
‘द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद’ का अर्थ है वह भौतिकवाद जो द्वन्द्ववाद की पद्धति को स्वीकृत हो। अर्थात् जड़ प्रकृतिया पदार्थ को सृष्टि का मौलिक तत्व मानने वाला सिद्धांत भौतिकवाद है। द्वन्द्ववादी प्रक्रिया के अनुसार जड़ जगत में निरन्तर परिवर्तन होता रहता है। पदार्थ की विरोधमयी प्रकृति के कारण इस सृष्टि में निरन्तर होने वाला परिवर्तन या विकास द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद कहलाता है।

कार्ल मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की आधारभूत मान्यताएं या धारणाएं हैं-
  1. सृष्टि का मूल तत्व ‘पदार्थ’ है। 
  2. सृष्टि और उसमें मौजूद मानव-समाज का विकास द्वन्द्वात्मक पद्धति से होता है। 
कार्ल मार्क्स का मानना है कि यह सारा संसार ‘पदार्थ’ (Matter) पर ही आधारित है अर्थात् इस सृष्टि का स्वभाव पदार्थवादी है। इसलिए विश्व के विभिन्न रूप गतिशील पदार्थ के विकास के विभिन्न रूपों के प्रतीक हैं और यह विकास द्वन्द्वात्मरक पद्धति द्वारा होता है। इसलिए भोतिक विकास आत्मिक विकास से अधिक महत्वपूर्ण है। 

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की विशेषताएं –कार्ल मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की विशेषताएं हैं:-
  1. कार्ल मार्क्स के अनुसार इस भौतिक जगत में समस्त वस्तुएं व घटनाएं एक-दूसरे से सम्बन्धित है। इसका कारण इस संसार का भौतिक होना है। यहां पदार्थ का अस्तित्व विचार से पहले है। संसार में सभी पदार्थ व घटनाएं एक-दूसरे पर आश्रित है अर्थात् उनमें पारस्परिक निर्भरता का गुण पाया जाता है। 
  2. कार्ल मार्क्स का मानना है कि आर्थिक शक्तियां संसार के समस्त क्रिया-कलापों का आधार होती है। ये सामाजिक व राजनीतिक विकास की प्रक्रिया पर भी गहरा प्रभाव डालती है। ये आर्थिक शक्तियां स्वयं भी परिवर्तनशील होती हैं और सामाजिक विकास की प्रक्रिया को भी परिवर्तित करती हैं। यह सब कुछ द्वन्द्ववादी प्रक्रिया पर ही आधारित होता है। इसलिए विश्व में कुछ भी शाश्वत् व स्थायी नहीं है। प्रकृति निरन्तर रूप बदलती रहती है। परिवर्तन ही सृष्टि का नियम है।
  3. कार्ल मार्क्स का मानना है कि प्रकृति में पाया जाने वाला प्रत्येक पदार्थ गतिशील है। जो आज है, कल नहीं था, कल था वह आज नहीं है और जो आज है वह कल नहीं होगा। गतिशीलता का यह सिद्धांत इस जड़ प्रकृति में निरन्तर कार्य करता है और नई-नई वस्तुओं या पदार्थों का निर्माण करता है। इसलिए यह भौतिकवादी विश्व सदैव गतिशील व प्रगतिशील है। इसे गतिशील बनने में किसी बाहरी शक्ति की आवश्यकता नहीं होती है। स्वत’ ही गतिशील रहता है क्योंकि गतिशीलता जड़ प्रकृति का स्वभाव है।
  4. प्रकृति में परिवर्तन एवं विकास साधारण रीति से केवल परिमाणात्मक (Quantitative) ही नहीं होते बल्कि गुणात्मक (Qualitative) भी होते हैं। ये परिवर्तन क्रान्तिकारी तरीके से होते हैं। पुराने पदार्थ नष्ट होकर नए रूप में बदल जाते हें और पुरानी वस्तुओं में परिमाणात्मक परिवर्तन विशेष बिन्दु पर आकर गुणात्मक परिवर्तन का रूप ले लेते हैं। जैसे पानी गर्म होने के बाद एक विशेष बिन्दु पर भाप बन जाएगा और उसमें गुणात्मक परिवर्तन आ जाएगा। इस गुणात्मक परिवर्तन की प्रक्रिया को क्रान्तिकारी प्रक्रिया कहा जाता है। ये परिवर्तन धीरे-धीरे न होकर झटके के साथ व शीघ्र होते हैं। इसी से पदार्थ का पुराना रूप नष्ट होता है और नया रूप अस्तित्व में आता है।
  5. कार्ल मार्क्स का मानना है कि प्रत्येक वस्तु में संघर्ष या प्रतिरोध का गुण अवश्य पाया जाता है। यह विरोध नकारात्मक व सकारात्मक दोनों होता है। जगत के विकास का आधार यही संघर्ष है। संघर्ष के माध्यम से ही विरोधी पदार्थों में आपसी टकराव होकर नए पदार्थ को जन्म देता है। इस संघर्ष में ही नई वस्तु का अस्तित्व छिपा होता है।
द्वन्द्वदात्मक भौतिकवाद के नियम – कार्ल मार्क्स के द्वन्द्वदात्मक भौतिकवाद के नियम हैं:-
  1. यह नियम मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का प्रमुख भाग है। इसे द्वन्द्ववाद का सार तत्व भी कहा जा सकता है। यह नियम प्रकृति, समाज और चिन्तन के विकास की द्वन्द्ववादी प्रक्रिया को समझने के लिए अति आवश्यक है। इस नियम के अनुसार संसार की सभी वस्तुओं के अन्दर विरोध अन्तनिर्हित है। विरोधों के संघर्ष के परिणामस्वरूप ही जगत के विकास की प्रक्रिया चलती है। इसी के द्वारा मात्रात्मक परिवर्तन गुणात्मक परिवर्तन में बदलते हैं। 
  2. कार्ल मार्क्स का कहना है कि मात्रा में बड़ा अन्तर आने पर गुण में भी भारी अन्तर आ जाता है। यही नियम प्रकृति में होने वाली आकस्मिक घटनाओं की व्याख्या का आधार है। 
  3. यह नियम प्रकृति के विकास का अन्तिम नियम प्रकृति के विकास की सामान्य दशा पर प्रकाश डालता है। ‘निषेद्य’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग हीगल ने विचार तत्व के विकास के लिए किया था। कार्ल मार्क्स ने इसका प्रयोग भौतिक जगत में किया। निषेद्य शब्द का अर्थ किसी पुरानी वस्तु से उत्पन्न नई वस्तु का पुरानी वस्तु को अभिभूत कर लेने से है। अत: निषेद्य विकास का प्रमुख अंग है। किसी भी क्षेत्र में तब तक कोई विकास नहीं हो सकता जब तक कि वह अपने अस्तित्व के पुराने रूप का निषेद्य न करे। निषेद्य ही अन्तर्विरोधों का समाधान करता है। पुरानी वस्तुओं का स्थान नई वस्तु लेती है। विकास के इस क्रम में पुराना नया हो जाता है और फिर कोई और नया उसका स्थान ले लेता है। इस प्रकार विकास का यह क्रम निरन्तर चलता रहता है। यह निषेद्य की प्रक्रिया समय की अविरल धारा के समान निर्बाधा रूप से चलती रहती है। प्रत्येक पुराना नए को जन्म देते समय उसके निषेद्य को जन्म देकर इस विकास की प्रक्रिया को गतिशील बनाता है। निषेद्य से निषेद्य की उत्पत्ति होती है। कालान्तर में निषेद्य निषेद्य को जन्म देता है और निषेद्य का अनन्त क्रम जारी रहता है। अत: विकास अनगणित क्रमबद्ध निषेद्यों की एक सत्य कहानी है। अर्थात् प्रगति द्वन्द्वात्मक विकास की आम दशा है। यह सर्पिल आकार में उच्च से उच्चतर स्थिति की तरफ निरन्तर प्रवाहमान रहती है। 
द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की आलोचना – कार्ल मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का सिद्धांत अनेक आलोचनाओं का शिकार हुआ है। इसकी आलोचना के आधार हैं:-
  1. कार्ल मार्क्स का द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद अत्यन्त रहस्यमी है। यद्यपि लेनिन तथा अन्य साम्यवादी लेखकों ने अपनी रचनाओं में इसको स्थान देने का प्रयास तो किया है, लेकिन वे इसकी विस्तृत विवेचना करने में असफल रहे। इसका प्रमुख कारण इसकी अस्पष्टता है।
  2. इस सिद्धांत की प्रमुख आलोचना यह भी है कि आत्म तत्व की घोर उपेक्षा करता है। कार्ल मार्क्स ऐन्द्रिय ज्ञान को ही प्रामाणिक मानता है। भारतीय आध्यात्मवादी विचारकों व लेखकों के मन में कार्ल मार्क्स की बात उतर नहीं सकती। 
  3. आलोचकों का कहना है कि द्वन्द्ववाद आदर्शवाद से तो कदाचित सम्भव हो सकता है, लेकिन भौतिकवाद में नहीं। विवेक या विश्वात्मा आन्तरिक आवश्यकताओं के कारण स्वयं विकसित हो सकती है, परन्तु पदार्थ जो आत्मा विहीन होता है, स्वयं विकसित नहीं हो सकता। इसलिए जड़ जगत में होने वाले सारे परिवर्तन आन्तरिक शक्ति की बजाय बाहरी शक्ति का ही परिणाम है। 
  4. कार्ल मार्क्स ने अपने द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की पुष्टि दृष्टांतों के आधार पर की है न कि प्रमाणों के आधार पर। दृष्टांतों का प्रयोग भी मनमाने ढंग से किया गया है। प्राणिशास्त्र के नियम इतिहास के नियमों से भिन्न होते हैं। लेनिन तथा एंजिल्स ने स्वयं कहा था-’’जीवशास्त्र के विचारों को हमें सामाजिक विज्ञानों के क्षेत्र में नहीं लाना चाहिए।’’ अत: यह मानना अनुचित है कि भौतिक जगत के नियम मानव जीवन के समान रूप से लागू हो सकते हैं। ऐसा कोई स्पष्ट प्रमाण कार्ल मार्क्स ने नहीं दिया, जिससे माना जा सके कि भौतिक जगत व प्राणी जगत के नियम समान हैं।
  5. कार्ल मार्क्स ने पदार्थ तत्व को मानवीय चेतना एवं अंत:करण से अधिक महत्व दिया है। उसने मनुष्य को स्वार्थी प्राणी माना है जो अपने हितों के लिए नैतिक मूल्यों एवं मर्यादाओं की उपेक्षा करता है। सत्य तो यह हे कि मनुष्य स्वार्थी होने के साथ परोपकार का गुण भी रखता है। इस तरह नैतिक मूल्यों की उपेक्षा करके कार्ल मार्क्स ने पक्षपाती व एकांगी दृष्टिकोण का ही परिचय दिया है।
  6. कार्ल मार्क्स का द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का सिद्धांत जड़ जगत् से सम्बन्धित एक भौतिकवादी वैज्ञानिक सिद्धांत है, जिसे मानव के समाजिक जगत् में पूरी तरह से लागू करना कठिन है। 
  7. कार्ल मार्क्स ने भौतिक जगत के विकास का आधार संघर्ष (Struggle) को माना है। वह भौतिक संतुष्टि को ही मानसिक संतुष्टि का आधार मानता है। किन्तु यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि कई बार मनुष्य दु:खों में भी मानसिक रूप से संतुलित रहता है। कई बार निर्धन व्यक्ति धनवानों की बजाय अधिक संतुष्ट दिखाई देता है।
  8. कार्ल मार्क्स का मानना है कि मानव-विकास की प्रक्रिया पूर्व-निश्चित है। इस विकास प्रक्रिया में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार कार्ल मार्क्स ने नियतिवाद का समर्थन किया है। उसके अनुसार संसार की प्रत्येक घटना ऐतिहासिक नियतिवाद का ही परिणाम है। कार्ल मार्क्स ने ‘मानव की स्वतन्त्र इच्छा’ की घोर उपेक्षा की है। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब मनुष्य ने अपनी स्वतन्त्र इच्छा के बल पर इतिहास की धारा को मोड़ दिया। इस विश्व में प्रत्येक घटना के पीछे नियतिवाद के साथ-साथ मानवीय चेतना का भी हाथ होता है।

ऐतिहासिक भौतिकवाद

कार्ल मार्क्स ने ‘द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद’ का प्रयोग ऐतिहासिक व सामाजिक विकास की व्याख्या करने के लिए किया। उसने बताया कि मानव-इतिहास में होने वाले विभिन्न परिवर्तनों और घटनाओं के पीछे आर्थिक शक्तियों का हाथ होता है। इसलिए उसने अपने ‘द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद’ के सिद्धांत के आधार पर इतिहास की व्याख्या को ऐतिहासिक भौतिकवाद या ‘इतिहास की भौतिकवादी’ व्याख्या का नाम दिया, आगे चलकर अनेक विद्वानों ने इस सिद्धांत को ‘इतिहास की आर्थिक व्याख्या’ ‘आर्थिक नियतिवाद’ आदि नामों से भी पुकारा गया। 

इस सिद्धांत के अनुसार कार्ल मार्क्स ने यह बताया है कि ‘इतिहास का निर्धारण अन्तिम रूप में आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार होता है।’’ इस प्रकार कार्ल मार्क्स के सिद्धांत का नाम इतिहास की आर्थिक व्याख्या होना चाहिए। लेकिन कार्ल मार्क्स ने ‘भौतिकवाद’ शब्द का प्रयोग हीगल के आशीर्वाद से अपने सिद्धांत को अलग व उलटा रखने के लिए इसका नाम ऐतिहासिक भौतिकवाद ही रखा।

ऐतिहासिक भौतिकवाद की आलोचना - कार्ल मार्क्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद का सिद्धांत अनेक आलोचनाओं का शिकार हुआ है। इसकी आलोचना के आधार हैं:-
  1. कार्ल मार्क्स ने आर्थिक तत्वों को मानव समाज का निर्धारक मानने की भारी भूल की है। मानव इतिहास के विकास में धर्म, दर्शन, राजनीति, नैतिकता आदि का महत्वपूर्ण योगदान होता है। इसके अतिरिक्त जलवायु, न्याय की इच्छा, विवेक, लाभ तथा मानव की महतवकांक्षाएं, भावनाएं, अभिलाक्षाएं भी मानवीय क्रियाओं में प्रभावी रही है। जातीय पक्षपात, षड्यंत्र, अन्धविश्वास, लैंगिक इच्छा, लैंगिक आकर्षण, अधिकार, नाम तथा प्रसिद्धि की लिप्साओं पर कार्ल मार्क्स का सिद्धांत प्रकाश नहीं डालता। संसार में संघर्षों का कारण आर्थिक तत्व ही नहीं रहे हैं। इनके पीछे और आर्थिक तत्वों ईर्ष्या, प्रदर्शन की इच्छा, शक्ति और सत्ता का प्रेम आदि का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है।
  2. कार्ल मार्क्स का मानना है कि समाज में जिस वर्ग का उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व होता है, समाज की सत्ता पर भी उसका ही अधिकार होता है। पूंजीवादी अवस्था में तो यह ठीक है लेकिन हर अवस्था में संभव नहीं हो सकता। प्राचीन भारत में ब्राह्मणों और क्षत्रियों के पास राजनीतिक सत्ता अत्यधिक थी, फिर भी वे आर्थिक सत्ता से अभावग्रस्त थे। मध्ययुग में पोप की शक्ति का आधार आर्थिक स्वामित्व पर निर्भर नहीं था। वर्तमान युग में कर्मचारी वर्ग का महत्व आर्थिक सत्ता के कारण न होकर उनकी मानसिक शक्ति के कारण है। अत: सदैव आर्थिक सत्ता ही राजनीतिक सत्ता का आधार नहीं होती।
  3. कार्ल मार्क्स का कहना है कि आज तक का इतिहास उत्पादन शक्तियों में होने वाले संघर्ष का परिणाम है। लेकिन सत्य तो यह है कि युद्ध केवल आर्थिक कारणों से ही नहीं हुए हैं। महाभारत का युद्ध, रावण पर राम का आक्रमण, आर्थिक प्रेरणाओं से युक्त नहीं थे। इनके पीछे मनोवैज्ञानिक तत्वों-ईष्र्या, द्वेष, बदला, पाप का नाश करने व धर्म की रक्षा करने की भावना आदि बलशाली थी। सिकन्दर द्वारा भारत पर आक्रमण के पीछे उसकी विश्व विजय की महत्वाकांक्षा थी। दो महाशक्तियों में लम्बे समय तक चलने वाला शीतयुद्ध (Cold - war) विचारधाराओं का संघर्ष था, ब्रटेंड रसल ने कहा है-’’हमारे राजनीतिक जीवन की बड़ी-बड़ी घटनाओं का निर्धारण भौतिक अवस्थाओं और मानवीय भावनाओं की पारस्परिक क्रियाओं के द्वारा होता है।’’ अत: संघर्षों के पीछे आर्थिक तत्वों के साथ गैर-आर्थिक तत्वों का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है।
  4. कार्ल मार्क्स के इन सिद्धांत के अनुसार उत्पादन प्रणाली ही विचार की जन्मदाता है। जबकि सत्य तो यह है कि विचार भी उत्पादन प्रणाली को जन्म देते हैं। उदाहरणत: सोवियत प्रणाली, जो 1917 की क्रान्ति के बाद स्थापित की गई, साम्यवादी सिद्धांत की उपज है। फासिस्ट प्राणी फासिस्ट सिद्धांत जो इटली में मुसोलिनी ने पेश किया था, की उपज है। नाजीवादी प्रणाली जर्मनी में हिटलर के नाजीवाद की देन है। अत: विचार भी उत्पादन प्रणाली की जननी होते हैं।
  5. कार्ल मार्क्स ने अपनी आर्थिक व्याख्या के अन्तर्गत इतिहास का काल विभाजन-दास युग, सामन्तवादी युग, पूंजीवादी युग, सर्वहारा वर्ग का अधिनायकत्व और साम्यवादी युग में किया है। उसका यह काल विभााजन गलत है। यह आवश्यक नहीं है कि सर्वहारा वर्ग का अधिनायक पूंजीवाद के पूर्ण विकास के बाद ही आए। रूस में 1917 की क्रान्ति से पहले वहां पूंजीवाद न होकर कृषि प्रधान राज्य था। इसी तरह चीन सर्वहारा क्रान्ति से पूर्व कोई औद्योगिक दृष्टि से विकसित राष्ट्र नहीं था। अत: कार्ल मार्क्स का काल विभाजन तार्किक दृष्टि से गलत है।
  6. कार्ल मार्क्स का यह सोचना गलत है कि इतिहास का विकास क्रम राज्यविहीन समाज पर आकर रूक जाएगा। क्या साम्यवादी युग में पदार्थ का अन्तर्निहित गुण ‘गतिशीलता’ समाप्त हो जाएगा। यदि गतिशीलता का पदार्थ का स्वाभाविक गुण है तो उसमें साम्यवादी अवस्था में भी अवश्य ही परिवर्तन होगा। उत्पादन के साधन बदलेंगे, सामाजिक सम्बन्धों में परिवर्तन आएगा तथा वर्गविहीन समाज का प्रतिवाद उत्पन्न होकर साम्यवाद को भी नष्ट कर देगा। अत: कार्ल मार्क्स का ‘गतिशीलता का सिद्धांत’ साम्यवाद के ऊपर आकर रूक जाएगा, तर्कसंगत व वैज्ञानिक नहीं हो सकता।
  7. कार्ल मार्क्स ने इस सिद्धांत को गम्भीर अनुशीलन व वैज्ञानिक अध्ययन करके नहीं निकाला है। उसने हीगल को द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया के आधार पर ही इसकी कल्पना की है। उसने पूंजीवाद के नाश के उद्देश्य से इस सिद्धांत के वैज्ञानिक नियमों की ओर ध्यान नहीं दिया है। 

वर्ग संघर्ष का सिद्धांत

मार्क्स की वर्ग-संघर्ष की धारणा उसके चिन्तन की एक महत्वपूर्ण धारणा है। कार्ल मार्क्स ने इतिहास की प्रेरक शक्ति भौतिक है। उसका मानना है कि उत्पादन प्रक्रिया के मानव सम्बन्ध इतिहास का निर्माण करते हैं। उत्पादन प्रक्रिया धनी और निर्धन दो वर्गों को जन्म देती है। प्रत्येक वर्ग एक दूसरे से संघर्ष करता रहता है। यही समाज की प्रगति का आधार है। इस तरह मार्क्स का वर्ग-संघर्ष का सिद्धांत जन्म लेता है। उसकी यह धारणा इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या तथा अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत पर आधारित है। उसने ऐतिहासिक भौतिकवाद की सैद्धान्तिक प्रस्थापनाओं के आधार पर साम्यवादी घोषणापत्र में कहा है कि-’’आज तक का सामाजिक जीवन का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है।’’ सेबाइन ने भी उसकी पुष्टि करते हुए कहा है कि मार्क्स वर्ग-संघर्ष को ही सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मानता है।

वर्ग-संघर्ष सिद्धांत की आलोचनाएं - मार्क्स के वर्ग-संघर्ष सिद्धांत की अनेक आलोचनाओं का शिकार हुआ है। इसकी आलोचना के आधार हैं:-
  1. कार्ल मार्क्स द्वारा दी गई वर्ग की परिभाषा के अनुसार आधुनिक समाज में मजदूरों और पूंजीपतियों के दो स्पष्ट वर्ग निश्चित नहीं किए जा सकते। आजकल उद्योगों में काम करने वाले अनेक मजदूर कम्पनियों के शेयर खरीदकर उद्योगों में हिस्सेदार बन जाते हैं और अतिरिक्त मूल्य के रूप में लाभ ग्रहण करने वाले पूंजीपति बन जाते हैं। इसी तरह उद्योगों के प्रबन्धकों को किस श्रेणी में रखा जाए? उन्हें न तो पूंजीपति वर्ग कहा जा सकता है और न ही मजदूर। सेबाइन ने कहा है कि-’’मार्क्स के सामाजिक वर्ग की धारणा की अस्पष्टता उसकी भविष्यवाणी की कुछ गम्भीर गलतियों के लिए उत्तरदायी है।’’ अत: कहा जा सकता है कि मार्क्स के ‘वर्ग’ की परिभाषा अस्पष्ट व दोषपूर्ण है।
  2. कार्ल मार्क्स का यह कथन कि आज तक का मानव इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास है, थथार्थ स्थिति को स्पष्ट नहीं करता। इसमें सन्देह नहीं है कि इतिहस युद्धों से भरा पड़ा है। लेकिन ये सभी युद्ध वर्ग-संघर्ष की श्रेणी में नहीं रखे जा सकते। इनमें से अधिकतर युद्धों का उद्देश्य आर्थिक न होकर समान स्थिति वाले शासकों के बीच हुए हैं। प्राचीन व मध्ययुगीन के अनेक संघर्ष राजाओं के मध्य हुए हैं। 
  3. आलोचकों का कहना है कि समाज में केवल दो ही वर्ग नहीं होते। पूंजीपति व श्रमिक वर्ग के अतिरिक्त एक मध्यम वर्ग (बुद्धिजीवी) भी होता है। यह वर्ग समाज के विकास का मार्ग प्रशस्त करता है। समाज की प्रगति बुद्धिजीवी वर्ग पर ही निर्भर करती है। इसके अन्तर्गत इंजीनियर, वकील, डॉक्टर, अध्यापक व तकनीशियन आदि आते हैं। इस वर्ग की संख्या लगातार बढ़ रही है। इस वर्ग का होना मार्क्स के वर्ग-संघर्ष के सिद्धांत का खण्डन करता है। अत: मार्क्स द्वारा समाज का दो वर्गों में किया गया विभाजन गलत है। समाज में दो के स्थान पर कई वर्ग हैं।
  4. कार्ल मार्क्स का कहना है कि संघर्ष जीवन का आधार है। इसी पर जीवन का अस्तित्व निर्भर करता है। किन्तु सत्य तो यह है कि संघर्ष की बजाय प्रेम, त्याग, सहयोग, सहानुभूति, अहिंसा आदि के ऊपर सम्पूर्ण मानव समाज का अस्तित्व निर्भर करता है। आर्थिक क्षेत्र में भी संघर्ष की बजाय आपसी सहयोग व शांतिपूर्ण वातावरण में ही उत्पादन सम्भव है। 
  5. कार्ल मार्क्स का कहना गलत है कि श्रमिक वर्ग ही क्रान्ति का आधार होता है और भविष्य में भी सर्वहारा वर्ग ही क्रान्ति का बिगुल बजाएगा। सत्य तो यह है कि आज तक जितनी भी क्रान्तियां हुई हैं, उन सबका नेतृत्व बुद्धिजीवियों ने किया था, न कि श्रमिकों ने। लेनिन ने स्वयं इस बात को स्वीकार करते हुए कहा है-’’हमने कहा था कि मजदूर लोग अब तक इस योग्य नहीं है कि उनमें समाजवादी चेतना उत्पन्न हो सके। उनके अन्दर यह चेतना केवल बाहर से ही लाई जा सकती है। सभी देशों के इतिहासों से प्रमाणित होता है कि अपने अनन्य प्रयत्नों से मजदूर वर्ग केवल मजदूर सभाई चेतना विकसित कर सकता है, जिसे समाजवादी मोड़ देने के लिए संगठित ‘बौद्धिक दल’ का अस्तित्व आवश्यक है।’’ रुस और चीन की क्रान्तियों को सफल बनाने में लेनिन तथा माओ जैसे बुद्धिजीवियों की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण रही है।
  6. कार्ल मार्क्स ने कहा है कि समाज के सभी वर्गों में वर्गीयता की भावना ही सर्वाधिक प्रबल होती है। सत्य तो यह है कि राष्ट्रीयता की भावना वर्गीयता की भावना से ऊपर होती है। द्वितीय विश्वयुद्ध में धुरी राष्ट्रों (जापान, इटली व जर्मनी) की महत्वपूर्ण भूमिका वर्गीयता की अपेक्षा उग्र-राष्ट्रीयता की भावना पर आधारित थी। जर्मनी में यहुदियों पर हिटलर द्वारा किए गए अत्याचार वर्ग-संघर्ष का परिणाम न होकर हिटलर की जातीय-श्रेष्ठता की भावना का परिणाम था। युद्ध के समय एक देश के अन्दर ही पूंजीपति व मजदूर दोनों वर्ग एक जगह संगठित होकर दूसरे देश के पूंजीपतियों व मजदूरों का विरोध करने लगते हैं। इसके पीछे मुख्य कारण राष्ट्रवाद की भावना ही कार्य करती है।
  7. आलोचकों का कहना है कि सामाजिक और आर्थिक वर्ग एक न होकर अलग-अलग होते हैं। यद्यपि यह भी सम्भव है कि मार्क्स ने दोनों को एक मानकर उनका राजनीतिक दृष्टि से सही प्रयोग करने का प्रयास किया होगा। किन्तु उसका यह प्रयास अनेक त्रुटियों का जन्मदाता बन गया है।
  8. कार्ल मार्क्स ने भविष्यवाणी की थी कि एक दिन पूंजीवाद का अन्त होगा और उसके स्थान पर सर्वहारा वर्ग का अधिनायत्व स्थापित होगा। उसकी यह भविष्यवाणी गलत साबित हुई। आज अनेक पूंजीवादी देश तेजी से अपना विकास कर रहे हैं। वहां पर उनके श्रमिक वर्ग के साथ सम्बन्ध अच्छे हैं। आज अनेक पूंजीवादी देशों में मजदूरों की दशा तेजी से सुधर रही हैं वे मजदूरों को उचित वेतन देकर श्रमिक-असंतोष को कम कर रहे हैं। वहां पर निकट भविष्य में किसी संगठित श्रमिक आन्दोलन की संभावना नजर नहीं आ रही है। 
  9. कैटलिन ने मार्क्स के वर्ग-संघर्ष के सिद्धांत की आलोचना करते हुए कहा है कि यह सिद्धांत आधुनिक कष्टों, दु:खों, रोगों और फासीवाद का जनक है। उसने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि-’’मैं मार्क्स पर यह आरोप लगाता हूं कि उसने द्वन्द्वात्मक प्रतिक्रिया के द्वारा फासीवाद और संघर्ष को जन्म दिया है, जो बीसवीं शताब्दी के कई कष्टों का कारण है।’’ 

अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत

कार्ल मार्क्स का यह सिद्धांत ‘मूल्य के श्रम सिद्धांत’ पर आधारित है। सेबाइन ने लिखा है-’’अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत प्रकट रूप में मूल्य के श्रमिक सिद्धांत का ही प्रसार था जिसे रिकार्डों तथा संस्थापित अर्थशास्त्रियों ने बनाया था। अगर मूल्य का श्रमिक सिद्धांत नहीं होगा तो अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत भी नहीं होगा। अत: अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत श्रम सिद्धांत का ही वंशज है।’’ यह सिद्धांत सबसे पहले पैन्टी ने इंग्लैण्ड में प्रस्तुत किया था। इसे बाद में एडमस्थिम तथा रिकार्डों ने विकसित किया। इन दोनों अर्थशास्त्रियों ने निष्कर्ष प्रस्तुत किया कि श्रम ही मूल्य का स्रोत हैं श्रम के बिना मूल्य का कोई महत्व नहीं हो सकता। प्रो0 वेपर ने भी मार्क्स के मूल्य सिद्धांत पर रिकार्डों का प्रभाव स्वीकार करते हुए लिखा है-’’मार्क्स का अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत रिकार्डों का ही व्यापक रूप है जिसके अनुसार किसी भी वस्तु का मूल्य उसमें निहित श्रम की मात्रा के अनुपात में होता है, बशर्तें कि यह श्रम-उत्पादन की क्षमता के वर्तमान स्तर के समान हो।’’

कार्ल मार्क्स का कहना है कि पूंजीपतियों का धन असंख्य वस्तुओं का जमा भंडार है। इन सभी वस्तुओं की अपनी कीमत होती है। श्रम भी एक ऐसी ही वस्तु है। श्रम अन्य सभी वस्तुओं के मूल्य निर्धारित करता है। किसी वस्तु का मूल्य उसकी उपयोगिता की मात्रा का अनुमान लगाने के बाद ही निर्धारित हो जाता है। उपयोगिता की मात्रा का अनुमान किसी अन्य वस्तु से उसके विनिमय मूल्य पर ही आधारित होता है। इस तरह मूल्य सिद्धांत के बारे में जानने के लिए किसी वस्तु के उपयोग मूल्य तथा विनिमय मूल्य की अवधारणा के बारे में जानना आवश्यक हो जाता है। मार्क्स ने ‘अतिरिक्त मूल्य सिद्धांत’ का प्रतिपादन करने के लिए इन दोनों मूल्यों की विस्तृत विवेचना की है।
  1. उपयोग-मूल्य (Use - Value)
  2. विनिमय-मूल्य (Exchange Value)
कार्ल मार्क्स ने उपयोग मूल्य तथा विनिमय मूल्य में व्यापक आधार पर अन्तर किया है। उसका कहना है कि उपयोग मूल्य किसी वस्तु की मानव आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने में ही निहित है। उपयोगिता का अर्थ है मनुष्य की इच्छा पूरी करना, जो वस्तुएं मनुष्य की इच्छा पूरी करती है, वे उसके लिए उपयोगी व मूल्यवान है। उदाहरणार्थ-रेगिस्तान में पानी कम और रेत अधिक होता है। वहां रेत की बजाय पानी की उपयोगिता अधिक है, क्योंकि पानी मनुष्य की प्यास बुझाता है। अपनी उपयोगिता के कारण वहां पानी रेत से अधिक मूल्यवान होता है। ‘‘विनिमय मूल्य’’ यह अनुपात है जिसके आधार पर एक वस्तु के बदले दूसरी वस्तु को प्राप्त किया जा सकता है। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति के पास घी है और किसी दूसरे के पास तेल है। यदि एक को घी की अपेक्षा तेल की आवश्यकता है और दूसरे को तेल की बजाय घी आवश्यकता है तो दोनों आपस में वस्तु विनिमय कर सकते हैं। एक व्यक्ति एक किलो घी देकर 4 किलो तेल प्राप्त करता है तो एक किलो घी का विनिमय मूल्य 4 किलो तेल होगा।

कार्ल मार्क्स ने किसी वस्तु के उपयोग मूल्य की तुलना में विनिमय मूल्य को अधिक महत्व दिया है। यही मूल्य का मापदण्ड है। कार्ल मार्क्स ने इन दोनों मूल्यों से श्रम को अधिक महत्वपूर्ण मानते हुए कहा है कि श्रम ही वस्तुओं का विनिमय मूल्य निश्चित करता है। अर्थात् किसी वस्तु का विनिमय मूल्य उस वस्तु के ऊपर लगाए गए श्रम की मात्रा के ऊपर निर्भर करता है। इसे श्रम सिद्धांत कहा जाता है। कार्ल मार्क्स ने उदाहरण देकर स्पष्ट किया है कि जमीन में दबा हुआ कोयला उपयोगी होने के कारण उपयोग मूल्य तो रखता है लेकिन जब तक उसे जमीन से खोदकर बाहर नहीं निकाला जाता है, जब तक उससे मशीन नहीं चलाई जा सकती है। अत: इस उद्देश्य से कोयले को जमीन से बाहर निकालने के लिए जो श्रम किया जाता है, वही उसका ‘विनिमय मूल्य’ (Exchange Value) निर्धारित करता है। इससे स्पष्ट है कि जब तक किसी प्राकृतिक पदार्थ पर मानव श्रम व्यय न हो तो वह पदार्थ विनिमय मूल्य से रहित होता है। मानव श्रम लगने पर ही उसका विनिमय मूल्य पैदा होता है। इस आधार पर मार्क्स कहता है कि प्रत्येक वस्तु का वास्तविक मूल्य वह श्रम है जो उसे मानव उपयोगी बनाने के लिए उस पर व्यय किया जाता है, क्योंकि वही ‘विनिमय मूल्य’ पैदा करता है।

अतिरिक्त मूल्य (Surplus Value)– इस तरह मार्क्स श्रम को मूल्य का निर्धारक तत्व मानता है और उसके आधार पर ही अपने अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत की व्याख्या करता है। मार्क्स कहता है कि पूंजीवादी व्यवस्था में श्रमिक को विनिमय मूल्य के बराबर वेतन नहीं मिलता है, अपितु उसकी तुलना में काफी कम वेतन मिलता है। इस तरह सम्पूर्ण विनिमय के अधिकतर भाग को पूंजीपति हड़प जाता है। यह पूंजीपति द्वारा हड़पा जाने वाला मूल्य या लाभ ही अतिरिक्त मूल्य कहलाता है। मार्क्स के अनुसार-’’अतिरिक्त मूल्य उन दो मूल्यों में से यदि हम विनिमय मूल्य में से श्रमिक के वेतन को घटा दें, तो जो राशि (मूल्य) बचती है, उसे ही अतिरिक्त मूल्य (Surplus - Value) कहा जाता है।’’ उसने आगे कहा है कि, ‘‘यह धन दो मूल्यों का अन्तर है, जिसे मजदूर पैदा करता है और जिसे वह वास्तव में पाता है।’’ अर्थात् यह वह मूल्य है, जिसे प्राप्त कर पूंजीपति मजदूर को कोई मूल्य नहीं चुकाता। 

मैकसी ने भी कहा है कि-’’यह वह मूल्य है, जिसे पूंजीपति श्रमिकों के खून-पसीने की कमाई पर ‘पथ कर’ (Toll Tax) के रूप में वसूलता है।’’ मार्क्स के ‘अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत’ को इस उदाहरण द्वारा समझाया जा सकता है। मान लीजिए एक श्रमिक 8 घण्टे काम करके एक दरी बनाता है जिसका विनिमय मूल्य 400 रु0 है। इसमें से श्रमिक को मात्र 100 रु0 ही मजदूरी के तौर पर मिलते हैं। इसका अर्थ यह है कि श्रमिक को केवल 2 घण्टे के श्रम के बराबर मजदूरी मिली। शेष 6 घण्टे का श्रम (300 रुपए) पूंजीपति ने स्वयं हड़प लिया। कार्ल मार्क्स के इस सिद्धांत के अनुसार यह 300 रुपए अतिरिक्त मूल्य है, जिस पर श्रमिक का ही अधिकार होना चाहिए। किन्तु व्यवहार में पूजीपति इस मूल्य को अपनी जेब में रख लेता है। उसे केवल पेटभर मजदूरी ही देकर उसका भरपूर शोषण करता है ताकि वह काम करने योग्य शरीर का स्वामी बन कर रह सके। इसे ‘मजदूरी का लौह नियम’ कहा जाता है। 

इसी के आधार पर पूंजीपति श्रमिक का वेतन निश्चित करके अतिरिक्त मूल्य पर अपना अधिकार बनाए रखता है। पूंजीपति की हार्दिक इच्छा यही होती है कि अतिरिक्त मूल्य में वृद्धि हो जाए। इस इच्छा का परिणाम, श्रमिकों के शोषण के रूप में निकलता है। कार्ल मार्क्स का कहना है कि श्रमिकों के शोषण को रोकने का एकमात्र उपाय ‘अतिरिक्त मूल्य’ श्रमिकों की जेब में जाना है। क्योंकि किसी वस्तु के उत्पादन में श्रम ही सब कुछ होता है।

अतिरिक्त मूल्य सिद्धांत के निहितार्थ -
  1. श्रम ही किसी वस्तु का मूल्य निर्धारक है। विनिमय मूल्य श्रम पर ही आधारित होता है।
  2. समस्त विनिमय मूल्य पर केवल श्रमिका का अधिकार होता है, किन्तु व्यवहार में उसे वेतन के रूप में थोड़ा सा ही भाग मिलता है।
  3. व्यवहार में विनिमय मूल्य पर पूंजीपति का ही अधिकार होता है।
  4. अतिरिक्त मूल्य विनिमय मूल्य का वह भाग है जो श्रमिक को नहीं दिया जाता है तथा जिसे स्वयं पूंजीपति अपने पास रख लेता है। यह पूंजीपति द्वारा श्रमिक के धन की चोरी है और इस चोरी के कारण ही पूंजीपति को बड़ा फायदा होता है और उसके पास पूजी का संचय बढ़ता है।
  5. पूंजीवाद श्रमिकों के घोर शोषण पर खड़ा है, जो एक अन्यायपूर्ण अवस्था है इसलिए इसके विरुद्ध क्रान्ति की जानी चाहिए।
‘अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत’ की आलोचनाएं -कार्ल मार्क्स के इस सिद्धांत की आलोचना के प्रमुख आधार हैं-
  1. कार्ल मार्क्स के अनुसार श्रम ही किसी वस्तु का मूल्य निर्धारित करता है। अर्थात् श्रम ही एकमात्र मूल्य-निर्धारक तत्व है। इसलिए मार्क्स ने उत्पादन के अन्य साधनों, भूमि, पूंजी, मशीनों आदि की घोर उपेक्षा की है। उत्पादन में इन साधनों की भूमिका बहुत अधिक महत्वपूर्ण होती है। इनके अभाव में उत्पादन की कल्पना करना असम्भव है। मार्क्स ने श्रम को अधिक महत्व देकर अन्य साधनों के साथ भेदभाव करता है। इसलिए मार्क्स का अन्य साधनों के प्रति भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण साफ झलकता है।
  2. कार्ल मार्क्स ने अपने इस सिद्धांत में शारीरिक श्रम को अधिक महत्व दिया है। आलोचकों का कहना है कि उत्पादन की वृद्धि में तकनीकी ज्ञान, प्रबन्ध कुशलता तथा व्यावसायिक कुशलता आदि का भी बहुत बड़ा योगदान होता है। मानसिक श्रम ही किसी वस्तु के निर्माण व उसके तैयार होने पर बेचने के लिए उपयुक्त बाजार की तलाश करता है। मानसिक शक्ति ही किसी उद्योग के फायदे व धनी के बारे में विचार कर सकती है। लेकिन मार्क्स ने मानसिक श्रम को महत्व देकर बड़ी भूल की है।
  3. कार्ल मार्क्स ने वस्तुओं के उत्पादन में पूंजीपति द्वारा किए गए व्यय का कोई ब्यौरा इस सिद्धांत में नहीं दिया है। पूंजीपति को अतिरिक्त मूल्य की राशि श्रमिकों के उत्तम जीवन, बेकारी व बोनस, मशीनों की घिसावट आदि के सुधार पर व्यय करना पड़ता है। अत: कार्ल मार्क्स का यह कहना गलत है कि पूंजीपति अतिरिक्त मूल्य के अधिकतर हिस्से को हड़प जाता है।
  4. प्रो . केरयु हण्ट का विचार है कि-’’कार्ल मार्क्स का अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत किसी भी रूप में ‘मूल्य का सिद्धांत नहीं है।’ यह वास्तव में ‘‘शोषण का सिद्धांत’’ है, जिसके द्वारा यह दिखाने की चेष्टा की गई है कि साधन सम्पन्न वर्ग सदैव ही साधनहीन वर्ग के श्रम पर जीवित रहता है।’’ मैकस बियर ने भी कहा है-’’इस विचार को अस्वीकार करना असम्भव है कि कार्ल मार्क्स का सिद्धांत आर्थिक सत्य के स्थान पर राजनीतिक और सामाजिक नारेबाजी है।’’
  5. अलेकजैण्डर ग्रे (Alexander Grey) ने कहा है कि क्या कोई भी हमें यह बता सकता है कि मूल्य से मार्क्स का वास्तव में क्या अभिप्राय था? इसके अलावा कार्ल मार्क्स ने जिन पूंजीपतियों व मजदूरों का उल्लेख किया है, वे न जाने किस लोक से सम्बन्ध रखते हैं। मार्क्स ने मूल्य, दाम आदि शब्दों का प्रयोग बड़े मनमाने व अनिश्चित ढंग से किया है। मार्क्स के विचारों की अस्पष्टता इस बात से सिद्ध हो जाती है-’’मजदूरी दुगने या तिगुने कर दीजिए मुनाफा स्वयंमेव ही दुगुना हो जाएगा।’’ बिना कुशलता व तकनीकी ज्ञान के मुनाफे में वृद्धि होना असम्भव है। लेकिन मार्क्स इतनी बड़ी अस्पष्ट व असंगत बात सरलता से कह दी। इस तरह मार्क्स ने आर्थिक शब्दों व आर्थिक प्रक्रिया की मनमानी व्याख्या करके इस सिद्धांत को भ्रांतिपूर्ण बना दिया है।
  6. सेबाइन ने कहा है कि-’’मार्क्स के मूल्य-सिद्धांत का प्रयोजन विशुद्ध रूप से आर्थिक न होकर नैतिक था, क्योंकि मार्क्स के मूल्य का सिद्धांत कीमतों का सिद्धांत नहीं, बल्कि सामाजिक हित एवं ‘मानव मूल्य’ का सिद्धांत था।’’ बीयर ने भी इसकी पुष्टि करते हुए कहा है कि यह सिद्धांत सामाजिक या राजनीतिक नारे से अधिक महत्व नहीं रखता है। यह सिद्धांत मजदूरों के शोषण का इतना अधिक वर्णन करता है कि यह आर्थिक हित की बजाय सामाजिक हित की बात करता प्रतीत होता है।
  7. कार्ल मार्क्स का अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत कई गलत धारणाओं पर आधारित है। उदाहरण के रूप में-’’मार्क्स ने कहा है कि ‘अतिरिक्त मूल्य’ पर श्रमिक का अधिकार होना चाहिए। यदि मार्क्स की इस बात को मान लिया जाए तो पूंजीपति उत्पादन क्यों करेंगे? कोई भी व्यक्ति लाभ कमाने के उद्देश्य से ही उत्पादन करता है। यदि सारा लाभ उसकी जेब में जाने की बजाय किसी वर्ग विशेष के पास जाएगा तो उसके दिमाग में कमी नहीं है कि वह उत्पादन जारी रखेगा। इस तरह गलत धारणाओं पर आधारित होने के कारण भी यह सिद्धांत आलोचना का शिकार हुआ है।
  8. कार्ल मार्क्स ने यह सिद्धांत अन्य अर्थशास्त्रियों रिकार्डों तथा एडम स्मिथ के श्रम सिद्धांत पर आधारित किया है। इसलिए यह सिद्धांत मार्क्स का मौलिक सिद्धांत न होने के कारण अनेक भ्रांतियों का जनक बन गया और आलोचना का शिकार हुआ।

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