मार्क्सवाद का अर्थ, विशेषताएं, सिद्धांत, पक्ष या विपक्ष में तर्क

अनुक्रम
मार्क्सवादी विचारधारा के जन्मदाता कार्ल मार्क्स 1818-1883. तथा फ्रेडरिक एन्जिल्स 1820-1895 . है। इन दोनों विचारको ने इतिहास समाजशास्त्र विज्ञान अर्थशास्त्र व राजनीति विज्ञान की समस्याओ पर संयुक्त रूप से विचार करके जिस निश्चित विचारधारा को विश्व के सम्मुख रखा उसे मार्क्सवाद का नाम दिया गया।

मार्क्सवाद का अर्थ 

मार्क्सवाद क्रांतिकारी समाजवाद का ही एक रूप है। यह आर्थिक और सामाजिक समानता में विश्वास रखता है अत: मार्क्सवाद सभी व्यक्तियो की समानता का दर्शन है। मार्क्सवाद की उत्पत्ति खुली प्रतियोगिता स्वतंत्र व्यापार आरै पूंजीवाद के विरोध के कारण हुइर्। मार्क्सवाद पूंजीवाद व्यवस्था को आमलू रूप से परिवर्तित करने और सर्वहारा वर्ग की समाजवादी व्यवस्था को स्थापित करने के लिये हिंसात्मक क्रांति को एक अनिवार्यता बातलाता है इस क्रांति के पश्चात ही आदर्श व्यवस्था की स्थापना होगी वह वर्गविहीन संघर्ष विहीन और शोषण विहीन राज्य की होगी।

मार्क्सवाद की विशेषताएं 

  1. मार्क्सवाद पूंजीवाद के विरूद्ध एक प्रतिक्रिया है। 
  2. मार्क्सवाद पूंजीवादी व्यवस्था को समाप्त करने के लिये हिंसात्मक साधनो का प्रयागे करता है। 
  3. मार्क्सवाद प्रजातांत्रीय संस्था को पूंजीपतियो की संस्था मानते है जो उनके हित के लिये और श्रमिको के शोषण के लिए बना गयी है। 
  4. मार्क्सवाद धर्म विरोधी भी है तथा धर्म को मानव जाति के लिये अफीम कहा है। जिसके नशे में लागे उंघते रहते हे। 
  5. मार्क्सवाद अन्तरार्ष्टी्रय साम्यवाद मे विश्वास करते हे। 
  6. समाज या राज्य में शाषको और शोषितों में पूंजीपतियों और श्रमिकोद्ध में वर्ग संघर्ष अनिवार्य है। 
  7. मार्क्सवाद अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत द्वारा पूंजीवाद के जन्म को स्पष्ट करता हे। 

मार्क्सवाद के सिद्धांत

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का सिद्धांत 

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद मार्क्स के विचारो का मूल आधार है मार्क्स ने द्वन्द्वात्मक प्रणाली को हीगल से ग्रहण किया है मार्क्स के द्वन्द्ववाद को समझने के लिए हीगल के विचारो को जानना आवश्यक है।  हीगल के विचारो में सम्पूर्ण संसार गतिशील है और इसमें निरंतर परिवतर्न होता रहता हे। हीगल के विचारो में इतिहास घटनाओ का क्रम मात्र नही है बल्कि विकास की तीन अवस्थाआे का विवेचन किया है - 1. वाद 2 प्रतिवाद 3 संवाद। हीगल की मान्यता कि को भी विचार अपनी मूल अवस्था में वाद होता है। कुछ समय बीतने पर उस विचार का विरोध उत्पन्न होता है इस संघर्ष के परिणमस्वरूप मौलिक विचार वाद परिवर्तित होकर प्रतिवाद का विराधेा होने से एक नये विचार की उत्पत्ति होती है जो सवाद कह लाती है।

हीगल का कहना है कि द्वन्द्व के माध्यम से संवाद आगे चलकर वाद का रूप ले लेता है जिनका पनु : प्रतिवाद होता है आरै द्वन्द्व के बाद संवाद का रूप धारण करता है। इस प्रकार यह क्रम चलता रहता है अन्त मे सत्य की प्राप्ति होती है।

मार्क्स ने हीगल के द्वन्द्ववाद को स्वीकार किया किन्तु हीगल के विचारो को उसने अस्वीकार किया। जहां हीगल संसार को नियामक तथा विश्व आत्माा मानता है। वहां माक्सर् भौतिक तत्व को स्वीकार करता हे। मार्क्स का मानना है कि द्वन्द्ववाद का आधार विश्व आत्मा न होकर पदार्थ ही है। यह भौतिक पदार्थ ही संसार का आधार है पदार्थ विकासमान है और उसकी गति निरंतर विकास की ओर है विकास द्वन्द्वात्मक रीति से होता है। वाद प्रतिवाद और संवाद के आधार पर ही विकास गतिमान रहता है मार्क्स के विचारो मे पूंजीवाद वाद है जहां दो वर्ग पूंजीपतियों व श्रमिक है एक धनवान और दूसरा निर्धन है इन दोनो के हितो मे विरोध है। इन विरोधी वर्गो मे संघर्ष होना आवश्यक है इस संघर्ष में श्रमिको की विजय होगी और सर्वहारा वर्ग अर्थात श्रमिक वर्ग का अधिनायक वाद स्थापित होगा यह प्रतिवाद की अवस्था है। इन दोनो अवस्थाओ मे से एक तीसरी व न स्थिति उत्पन्न होगी जो साम्यवादी समाज की है। इस स्थिति मे न वर्ग रहेंगे न वर्ग संघर्ष होगा और न राज्य आवश्यक्तानुसार समाज से प्राप्त करेगा। यह तीसरी स्थिति संवाद की स्थिति होगी।

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की आलोचना - 

  1. मार्क्स द्वारा प्रतिपादित दर्शन का आधार द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद है किन्तु इसने इतने महत्वपूर्ण सिद्धांत का कहीं भी विस्तृत रूप से वर्णन नही किया। 
  2. मार्क्स ने हीगल के आध्यात्मवाद के स्थान पर भौतिकवाद का समर्थन किया है। 
  3. मार्क्स का मानना है कि समाज की प्रगति के लिए संघर्ष व क्रांति का होना अनिवार्य है। किन्तु यह सत्य है कि शांतिकाल में ही समाज की प्रगति तीव्र गति से होती है। 

इतिहास की आर्थिक भौतिकवादी व्याख्या - 

मार्क्स की विचारधारा में द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की भांति इतिहास की आर्थिक व्याख्या का सिद्धांत भी महत्वपूर्ण है। मार्क्स के विचार में इतिहास की सभी घटनाएं आर्थिक अवस्था में होने वाले परिवर्तनो का परिणाम मात्र है। मार्क्स का मत है कि प्रत्येक देश मे और प्रत्येक काल मे सभी राजनीतिक सामाजिक संस्थाएं कला रीति रिवाज तथा समस्त जीवन भौतिक अवस्थाओ व आर्थिक तत्वो से प्रभावित होती है। मार्क्स अपनी आर्थिक व्याख्या के आधार पर मानवीय इतिहास की छ: अवस्थाएं बतलायी है जो है।
  1. आदिम साम्यवादी अवस्था-सामाजिक विकास की इस पहली अवस्था में जीविकोपार्जन के तरीके बहुत सरल थे शिकार करना मछली मारना जंगलो से कंद मूल एकत्रित करना ही इनका मुख्य व्यवसाय था। भोजन प्राप्त करने व जंगली जानवरो से अपनी रक्षा करने के लिये ही मनुष्य समूह में झुण्ड बनाकर साथ साथ रहते थे। इस अवस्था में उत्पादन के साधन समस्त समाज की सामूहिक सम्पत्ति हुआ करते थे इस अवस्था में निजी सम्पत्ति नही थी और न ही को शोषक था और न ही को शोषित सब मनुष्य समान थे। इसलिए मार्क्स ने इस अवस्था को ‘साम्यवादी अवस्था’ कहा है।
  2. दासता की अवस्था - धीरे धीरे भौतिक परिस्थितियों में परिवर्तन हुआ। व्यक्तियों ने खेती करना पशुपालन करना और दस्तकारी करना प्रारंभ कर दिये। इससे समाज में निजी सम्पत्ति के विचारो का उदय हुआ। जिन्होने उत्पादन के साधनो; भूमिद्ध आदि पर अधिकार कर लिया। वे ‘स्वामी’ कहलाये ये दूसरे व्यक्तियों से बलपूर्वक काम करवाने लगे वे ‘दास’ कहलाये समाज ‘स्वामी’ और दास दो वर्गो में विभजित हो गया आदिम समाज की समानता और स्वतंत्रता समाप्त हो ग। इसी अवस्था से समाज के शोषक और शोषित दाे वर्गो के मध्य अपने आथिर्क हिताे के लिये सघ्ंर्ष प्रारंभ हो गया।
  3. सामंतवादी अवस्था - जब उत्पादन के साधनो में और अधिक उन्नति हुयी पत्थर के औजार और धनुष बाण से निकलकर लोहे के हल करघे का चलन शुरू हुआ कृषि दस्तकारी बागवानी कपड़ा बनाने के उद्योगो का विकास हुआ। अब दास के स्थान पर उद्योगो में काम करने वाले श्रमिक थे। सम्पूर्ण भूमि छोटे मोटे उद्योगो दस्तकारियाें और उत्पादन के अन्य साधनो पर तथा कृषि पर जिनका आधिपत्य था उन्हे ‘जागीरदार व सामन्त’ कहा जाता था। कृषि कार्य करने वाले कृषकों और दस्तकारी करने वाले श्रमिको का वर्ग सांमतो के अधीन था। इस व्यवस्था को सामंतवादी अवस्था कहा जाता है। मार्क्स के अनुसार इस अवस्था मे भी सामन्तो तथा कृषको दस्तकारो के आर्थिक हितों में परस्पर संघर्ष चलता रहा।
  4. पूंजीवादी अवस्था - अठारहवीं शताब्दी के उत्तराध्र्द में औद्योगिक क्रांति हु जिसके परिणामस्वरूप उत्पादन के साधनो पर पूंजीपतियों का नियंत्रण स्थापित हो गया अर्थात पूंजीपति उत्पादन के साधनो के स्वामी हो गये लेकिन वस्तुओ के उत्पादन का कार्य श्रमिकों द्वारा किया जाता है वस्तुओं का उत्पादन बहुत बडे पैमाने पर हो ता है अत: श्रमिक स्वतंत्र होकर कार्य करते है किन्तु श्रमिको के पास उतपादन के साधन नहीं होते अत: वे अपनी आर्थिक आवश्यकता पूर्ण करने लिये श्रम बचे ने को बाध्य होते है। निजी लाभ के लिये पूंजीपति वर्ग ने श्रमिकों को शोषण किया दसू री तरफ श्रमिकों में भी अपने हितों के रक्षा के लिये जागरूकता आ। परिणामस्वरूप दो वर्गो पूंजीपति शोषक वर्ग और सर्वहारा; श्रमिकद्ध शोषित वर्ग के बीच सघंर्ष प्रारंभ हो जाता है। मार्क्स का मत है कि संघर्ष अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच कर पूंजीवाद को समाप्त कर देगा।
  5. श्रमिक वर्ग के अधिनायकत्व की अवस्था - मार्क्स का विचार है कि पूंजीवादी अवस्था द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के माध्यम से श्रमिको व पूंजीपतियो के मध्य संघर्ष में जब पूंजीपतियो की पराजय होगी तब पूंजीवाद समाप्त होकर ऐतिहासिक विकास की पांचवी अवस्था ‘‘श्रमिक वर्ग के अधिनायकत्व की अवस्था’’ आयेगी। इस अवस्था में उत्पादन के सम्पूर्ण साधनों पर श्रमिको का अधिकार हो जायेगा जिसे ‘श्रमिक वर्ग का अधिनायक तंत्र या तानाशाही’ कहा गया है इस पांचवी अवस्था के बहुमत वर्ग (श्रमिक वर्ग अल्पमत वर्ग पूंजीपति वर्ग) के विरूध्द अपनी राज्य शक्ति का प्रयोग कर उसे पूर्णतया समाप्त कर देगा।
  6. राज्यविहीन और वर्गविहीन समाज की अवस्था - मानवीय इतिहास की अन्तिम अवस्था राज्य विहीन और वर्ग विहीन समाज की अवस्था आयेगी इस अवस्था में समाज में कवे ल एक ही वर्ग होगा जिसे श्रमिक वर्ग कहा गया है। इस समाज में न शोषक वर्ग होंगे न शोषित वर्ग होंगे। यह समाज राज्यविहीन आरै वर्ग विहीन होगा अत: वर्ग विहीन समाज में राज्य स्वत: ही समाप्त हो जायेगा तथा इस समाज में वितरण का सिद्धांत लागू होगा जिसमें समाज के प्रत्येक लागे अपनी यागेयता के अनुसार कार्य करें ओर उसे आवश्यक्तानुसार पा्रप्ति हो।
इस अवस्था साम्यवादी युग में वर्ग विहीन समाज की स्थापना से वर्ग संघर्ष प्रकृित से होगा। मनुष्य प्रकृति से संघर्ष कर मानव कल्याण हेतु नवीन खोज आविष्कार करेगें तथा साम्यवादी समाज आगे विकास करता रहेगा।

इतिहास की आर्थिक व्याख्या की आलोचना - 

  1. आर्थिक तत्वों पर अत्यधिक और अनावश्यक बल - आलोचको के अनुसार मार्क्सवाद ने समाज के राजनीतिक सामाजिक और वैधानिक ढांचे में आर्थिक तत्वों को आवश्यकता से अधिक महत्व दिया है तथा मार्क्स का यह दृष्टिकोण भी त्रुटिपूर्ण है कि सभी मानवीय कार्यो का आधार यही आर्थिक तत्व है सामाजिक अवस्था एवं समस्त मानवीय क्रियायें केवल आर्थिक तत्व पर ही आधारित नहीं होती है आर्थिक तत्व के अतिरिक्त अन्य तत्वों के द्वारा भी कार्य किया जाता है इन दूसरे तत्वो में सामाजिक वातावरण मानवीय विचारो और भौगोलिक तत्वों को लिया जा सकता है। 
  2. इतिहास का काल निर्धारण त्रुटिपूर्ण - मार्क्स ने मानवीय इतिहास की जो छ: अवस्थाएं बतलायी है वह त्रुटिपूर्ण है उसने इतिहास की गलत व्याख्या की है। मानववाद मार्क्स के आदिम साम्यवाद से सहमत नहीं है। 
  3. धर्म का निम्न स्थान - मार्क्स ने इतिहास की व्याख्या में धर्म को निम्न स्थान प्रदान करते हुए उसे अफीम की संज्ञा दिए है मानव केवल अथर् की ही आवश्यकता महसूस नही करता मानव को मानसिक शांति भी चाहिए।

वर्ग संघर्ष का सिद्धांत

मार्क्स का अन्य सिद्धांत वर्ग संघर्ष का सिद्धांत है माक्सर् ने कहा है अब तक के समस्त समाजो का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है। कुलीन और साधारण व्यक्ति सरदार और सवे क संघपति आरै श्रमिक निरंतर एक दूसरे के विरोध में खडे रहे है। उनमें आबाध गति से संघर्ष जारी है। मार्क्स इससे निष्कर्ष निकाला है कि आधुनिक काल में पूंजीवाद के विरूध्द श्रमिक संगठित होकर पूंजीवादी व्यवस्था को समाप्त कर देंगे तथा सर्वहारा वर्ग की तानाशाही स्थापित हो जायेगी।

वर्ग संघर्ष के सिद्धांत की आलोचना - 

  1. कार्ल मार्क्स का दृष्टिकोण गलत कि सामाजिक जीवन का आधार संघर्ष है वास्तव में सामाजिक जीवन का आधार सहयोग है। 
  2. मार्क्स ने घोषणा की है कि छोटे छोटे पूंजीपति समाप्त हो जायेंगे किन्तु ऐसा नही हुआ ये पूंजीपति विकसित हुए। 
  3. मार्क्स ने समाज में केवल दो वर्गो की बात कही है। जबकि आधुनिक युग में दो वर्गो की बात कही है। जबकि आधुनिक युग में दो वर्गो के बीच में एक महत्वपूर्ण तथा विशाल मध्यम वर्ग विद्यमान है। 

अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत - 

मार्क्स ने अपनी पुस्तक दास केपिटल में अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत की विवेचना की है। मार्क्स की मान्यता है कि पूंजीपति श्रमिको को उनका उचित पारिश्रमिक न देकर उनके श्रम का सम्पूर्ण लाभ स्वयं हड़प लेता है मार्क्स ने माना है कि किसी वस्तु का मूल्य इसलिए होता है क्योंकि इसमें मानवीय श्रम लगा है। दूसरे शब्दाे में वस्तु के मूल्य का निर्धारण उस श्रम से होता है जो उस वस्तु के उत्पादन पर लगाया जाता है जिस वस्तु पर अधिक श्रम लगता हे। उसका मूल्य अधिक और जिस वस्तु के उत्पादन पर कम श्रम लगता है उसका मूल्य कम हाते ा हे। इस प्रकार मार्क्स का विचार है कि किसी वस्तु का वास्तविक मूल्य वह होता है जो उस पर व्यय किये गये श्रम के बराबर होता है किन्तु जब वह वस्तु बाजार में बिकती है तो वह उंचा मूल्य पाती है। 

इस प्रकार वस्तु के बाजार मूल्य व वास्तविक मूल्य के अंतर को पूंजीपति स्वयं हड़प लेता है। मार्क्स की दृष्टि में जो धन पूंजीपति द्वारा अपने पास रख लिया गया वही धन अतिरिक्त मूल्य कहलाता है। स्वयं मार्क्स के शब्दो में ‘‘अतिरिक्त मूल्य इन दो मूल्यों का अंतर है जिसे श्रमिक पैदा करता है और जिसे वह वास्तव में प्राप्त करता है।’’ इस प्रकार वास्तविक मूल्य और विक्रयमूल्य का अंतर ही अतिरिक्त मूल्य है। इस सम्बन्ध में मार्क्स ने लिखा है’’ यह वह मूल्य है जिसे पूंजीपति श्रमिको के खून पसीने की कमा पर पथ कर(tolltax) के रूप में वसूल करता है।’’ 

अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत की आलोचना -

  1. मार्क्स ने उत्पादन का एकमात्र साधन श्रम को माना है जबकि यह सर्वविदित है कि श्रम के अतिरिक्त भूमि पूंजी संगठन व उद्यम भी महत्वपूर्ण साधन है। उत्पादित वस्तु द्वारा प्राप्त लाभ को इन सभी साधनो पर वितरित करना ही युक्तिसंगत दिखा देता है। 
  2. मार्क्स केवल शारिरिक श्रम को महत्व देता है मानसिक श्रम को नही। पूंजीपति अतिरिक्त मूल्य का प्रयोग न मशीने लाने व अन्य साधनो के उपयोग में करता है किन्तु वह यह भी कहता है कि न मशीनो व कच्चे माल से को अतिरिक्त मूल्य प्राप्त नहीं हाते ा यह तो श्रमिकों के श्रम से पा्र प्त होता है। मार्क्स के ये दोनो विचार परस्पर विरोधी है।

सर्वहारा वर्ग का अधिनायकवाद - 

माकर्स का कहना है कि द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के सिद्धांत के अनुसार पूंजीवादी व्यवस्था में अन्तर्निहित विरोध स्वभाव के कारण पूंजीपति वर्ग मे सघंर्ष होना अवश्यम्भावी है। इस वर्ग संघर्ष में श्रमिक वर्ग संगठित होकर पूंजीपति वर्ग पर भरपूर प्रहार करेगा और रक्तिम क्रान्ति द्वारा पूंजीवाद को समूल रूप से नष्ट करने के उद्दश्ेय से अधिनायकवाद की  विशेषताएं है - 
  1. मार्क्स के अनुसार पूंजीवादी समाज में अल्पसंख्यक पूंजीपति वर्ग बहुसख्ं यक श्रमिको पर शासन करता है जबकि श्रमिको की तानाशाही में बहुसंख्यक श्रमिक वर्ग अल्पसंख्यक पूंजीपतियो पर शासन करेगा। इस प्रकार यह पुंजीवादी शासन की तुलना में अधिक लोकतान्त्रिक होगा। 
  2. श्रमिकों के अधिनायकवादी शासन में निजी समपत्ति का उन्मूलन किया जायेगा और उत्पादन आरै वितरण के साधनो पर राज्य का एकाधिकार हो जायेगा। 
  3. श्रमिकों की तानाशाही में पूंजीपति वर्ग को बलपूर्वक दबा दिया जायेगा जिससे भविष्य में वह पुन: सिर न उठा सके। पूंजीवाद में विश्वास रखने वालो का अनत कर दिया जायेगा। 
  4. श्रमिको की तानाशाही की स्थिति में राज्य एक संक्रमणकालीन व्यवस्था है। संक्रमणकाल में राज्य तो रहेगा किन्तु जब पूंजीपति वर्ग को समलू रूप से नष्ट कर दिया जायेगा अर्थात वर्गीय व्यवस्था समाप्त कर दी जाएगी तो राज्य स्वयंमेव समाप्त हो जायेगा। 
एंजिल्स के शब्दो में ‘‘जब श्रमिक वर्ग राज्य की सम्पूर्ण शक्ति प्राप्त कर लेता है तो वह वर्ग के सभी मतभेदो व विरोधो को समाप्त कर देता है और परिणामस्वरूप राज्य के रूप में समाप्त हो जाता है।’’

वर्ग विहीन व राज्य विहीन समाज - 

मार्क्स का कहना है कि जैसे ही पूंजीवादी वर्ग का अन्त हो जायेगा और पूंजीवादी व्यवस्था के सभी अवशेष नष्ट कर दियें जायेंगे राज्य के स्थित रहने का औचित्य भी समाप्त हो जायेगा और वह मुरझा जायेगा (thestate will wither away) । जब समाज के सभी लोग एक स्तर पर आ जायेंगे तो प्रत्येक व्यक्ति समपूर्ण समाज के लिये सर्वाधिक कार्य करेगा और बदले मे अपनी सम्पूर्ण आवश्यक्ताओ की स्वतंत्रतापूर्वक पूर्ति करेगा। इस समाज में विभिन्न सामाजिक संगठनो के माध्यम से सार्वजनिक कार्यो की पूर्ति होगी। ऐसे वर्ग विहीन व राज्य विहीन समाज मे वर्ग विशेष वर्ग शोषण का पूर्ण अभाव होगा और व्यक्ति सामाजिक नियमों का सामान्य रूप से पालन करेंगे। 

मार्क्स द्वारा प्रतिपादित समाजवाद की यह सर्वोच्च स्थिति है। मानव कल्याण का यह सर्वोच्च शिखर है। इस स्वतंत्र समाज में प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता तथा योग्यतानुसार कार्य करेगा और आवश्यक्तानुसार मजदूरी प्राप्त करेगा। इस समाज मे प्रत्यके व्यक्ति की आवश्यक्ता की पूर्ति होगी तथा वह अपनी योग्यतानुसार समाज को सहयोग देगा। यह वह समाज है जिसमें न वगर् होगा न राज्य रहेगा। 

वर्गविहीन व राज्यविहीन समाज की आलोचना - 

मार्क्सवाद की यह मान्यता एक कोरी कल्पना प्रतीत होती है कि सर्वहारा वर्ग के अधिनायकवाद की स्थापना के परिणामस्वरूप जब पूंजीवाद पूर्णत: विनष्ट हो जाएगा तो राज्य भी स्वयं ही समाप्त हो जाएगा। इस प्रकार एक वर्ग विहीन समाज स्थापित हो जाएगा परन्तु अनुभव यह बतलाता है कि साम्यवादी देशों में भी राज्य समाप्त होने के स्थान पर पूर्व की अपेक्षा और अधिक सुदृढ सशक्त एवं स्थायी होते जा रहै है। उनके स्वयं समाप्त होने की सम्भावना भी नही है। रूस और चीन अपनी सीमा का विवाद नहीं सुलझा सके है। इन राज्यो के उच्च अधिकारी साम्यवादी दल के उच्च नेता सैनिक व प्रशासनिक अधिकारी बहुत व्यापक अधिकारों का उपभोग करते है। सुरक्षा तथा पुलिस अधिकारी अपनी मनमानी के लिये बदनाम हे। इस सदंर्भ में स्टालिन ने कहा था’’ समाजवादी राज्य एक नये पक्रार का राज्य है’ और इसलिए इसकी समाप्ति का प्रशन नहीं उठता।’’ 

मार्क्सवाद की आलोचना या विपक्ष में तर्क 

  1. मार्क्सवाद का उददेश्य अस्पष्ट - मार्क्सवाद की आलोचना का आधार उसके उददेश्य की अस्पष्टता है। मार्क्सवाद एक ऐसे समाज की कल्पना करता है जो वर्ग विहीन और राज्य विहीन हो इसका व्यावहारिक हल मार्क्सवाद मे आस्था रखने वाले देशो के पास भी नही है। आज भी चीन में श्रमिक वर्ग की तानाशाही विद्यमान है किन्तु वहां अन्य वगर् भी है। 
  2. हिंसा द्वारा सामाजिक परिवर्तन- मार्क्सवादीयों का दृष्टिकोण है कि सामाजिक परिवर्तन के लिए हिंसा आवश्यक है कितुं हिसां की किसी भी स्थिति में सवर्मान्य एवं वाछंनीय नही हो सकती। 
  3. मजदूरो की तानाशाही खतरनाक- विश्व में विद्यमान तानाशाही शासको के समान श्रमिको की तानाशाही भी शासन का विकृत रूप है। 
  4. लोकतंत्र विरोधी धारणा- यद्यपि मार्क्सवाद समाजवादी लोकतंत्र के प्रति आस्था व्यक्त करते हे। किन्तु वास्तव में यह तानाशाही व्यवस्था का ही दूसरा रूप है। इस व्यवस्था में कोई दसूरा राजनीतिक दल नही होता। 
  5. अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत त्रुटिपूर्ण- मार्क्स ने अपने अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत में केवल श्रम को ही वस्तु के मूल्य निर्धारण का आधार माना है जो स्वयं मे त्रुटिपूर्ण है। मूल्य निर्धारण के लिये मांग पूतिर् समय स्थान आदि ऐसे कारण है जो वस्तु के मूल्य निर्धारण को प्रभावित करते है। 
मार्क्सवाद की उपर्युक्त आलोचना के निष्कर्ष स्वरूप- प्रो. केर्यूण्ट का कथन उल्लेखनीय है कि सायवाद अथवा मार्क्सवाद विश्व की सबसे बडी विध्वंसक शक्ति है। विश्व में स्थायी शांति की व्यवस्था की तब तक आशा नही की जा सकती जब तक कि साम्यवादी विचारधारा में विश्व कल्याण तथा लोकतंत्र के लिए आवश्यक संशोधन न कर लिये जायें’’

मार्क्सवाद का महत्व या प्रभाव या पक्ष में तर्क 

मार्क्सवाद की विभिन्न आलोचनाओ के बावजूद इसके महत्व को नकारा नही जा सकता। आज मार्क्सवाद ने पूरे विश्व के स्वरूप को ही परिवर्तित कर दिया है ये पीडितो दलितो शोषित एवं श्रमिक का पक्ष लेकर उपेक्षित मानव कलयाण के लिये मार्क्सवाद ने समाजवाद को एक ठोस एवं वैज्ञानिक आधार प्रदान किया है। उनकी प्रमुख देन  है - 
  1. वैज्ञानिक दर्शन- माक्सर्वाद को वैज्ञानिक समाजवाद भी कहा जाता है माक्सर् के पूर्ण समाजवादी सिद्धांतो मे वैज्ञानिक आधार देने का कभी भी प्रयास नही किया। इस कार्य को प्रारंभ करने का श्रेय मार्क्स को जाता है। 
  2. सैध्दांतिकता की अपेक्षा व्यावहारिकता पर बल - मार्क्सवाद की लोकप्रियता का प्रमुख कारण उसका व्यावहारिक होना है। इसकी अनेक मान्यताओ को रूस और चीन में प्रयोग में लाया गया जिनमें पूर्ण सफलता भी मिली। 
  3. श्रमिक वर्ग की स्थिति को सबलता प्रदान करना - मार्क्सवाद की सबसे बडी देन है तो वह श्रमिक वर्ग में वर्गीय चेतना और एकता को जन्म देना है। उनकी स्थिति में सुधार करना है। मार्क्स ने नारा दिया ‘‘विश्व के मज़दूर एक हो जाओ तुम्हारे पास खोने के लिये केवल जंजीरे है और विजय प्राप्त करने के लिये समस्त विश्व पड़ा हे। ‘‘ मार्क्स के इन नारो ने श्रमिक वर्ग में चेतना उत्पन्न करने में अद्वितीय सफलता प्राप्त की। 
  4. पूंजीवादी व्यवस्था के दोषो पर प्रकाश डालना - मार्क्सवाद के अनुसार समाज में सदा शोषक शोषित के बीच संघर्ष चलते रहता है। शोषक या पूंजीवादी वर्ग सदा अपने लाभ कमाने की चिन्ता में रहता है। इसके लिये वह श्रमिको तथा उपभोक्ताओ का तरह तरह से शोषण करता रहता है। परिणाम स्वरूप पूंजीपति और अधिक पूंजीपति हो जाते है और गरीब और अधिक गरीब। समाज में भूखमरी और बेकारी बढती है। तो दसू री ओर पूंजीपतियों व्यवस्था के इन दोषो को दूर किये बिना आदर्श समाज की स्थापना नही की जा सकती। 
संक्षेप में मार्क्सवादी विचारधारा ने दलित आरै उपेक्षित मानवता पक्ष लेकर अपने को एक अत्यधिक लोकप्रिय और आकर्षक रूप में प्रस्तुत किया है और विश्व राजनीति में अपने को एक प्रबल चुनौती के रूप में खडा कर दिया हैं। 
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