ऋतु के प्रकार

अनुक्रम
हमारे देश में तीन प्रमुख ऋतुएं -शीत , ग्रीष्म और वर्षा है। हमारे भारत देश में परम्परागत रूप में 6 ऋतुएं मानी जाती हैं-
  1. बसंत ऋतु (चैत्र-बैशाख या मार्च-अप्रैल)
  2. ग्रीष्म ऋतु (ज्येष्ठ-आषाढ़ या म-जून)
  3. वर्षा ऋतु (श्रावण-भाद्रपद या जुला-अगस्त)
  4. शरद ऋतु (आश्विन- कार्तिक या सितम्बर-अक्टूबर)
  5. हेंमत ऋतु (अगहन-पौष या नवम्बर-दिसम्बर)
  6. शिशिर ऋतु (माघ-फाल्गुन या जनवरी-फरवरी)

ऋतु के प्रकार

भारत में जलवायु के अनुसार वर्ष को चार ऋतुओं में बांटा जाता है -
  1. शीत ऋतु- दिसम्बर से फरवरी 
  2. ग्रीष्म ऋतु- मार्च से मई दक्षिणी भारत में तथा मार्च से जून उत्तरी भारत में आगे बढ़ते 
  3. दक्षिण पश्चिम मानसून की ऋतु- जून से सितम्बर पीछे हटते दक्षिण 
  4. पश्चिम मानसून की ऋतु- अक्टूबर और नवम्बर

शीत ऋतु

उत्तरी भारत में यह ऋतु प्राय: नवम्बर के अन्तिम सप्ताह में प्रारम्भ हो जाती है। देश के अधिकतर भागों में जनवरी व फरवरी सबसे अधिक ठन्डे महीने होते हैं, क्योंकि सूर्य दक्षिणी गोलार्द्ध में मकर वृत पर लम्बवत् चमकता है। इन महीनों में उत्तर के मैदानों व पर्वतीय प्रदेशों में दैनिक औसत तापमान 21 से. से कम रहते हैं। कभी-कभी रात का तापमान हिमांक से नीचे चला जाता है, इससे पाला पड़ता है।

ग्रीष्म ऋतु

सूर्य के उत्तरायण होने पर उत्तर के मैदानों में तापमान बढ़ने लगता है। इसके परिणामस्वरूप बसंत ऋतु का आगमन होता है जो शीघ्र ही ग्रीष्म ऋतु का रूप ले लेती है। ग्रीष्म ऋतु जून के अन्त तक रहती है। इस ऋतु में तापमान उत्तर की ओर बढ़ता है तथा उत्तर के मैदानों के अधिकांश भागों में कई माह में लगभग 45 से. हो जाता है। दोपहर के बाद धूल भरी आंधियों और लू का चलना ग्रीष्म ऋतु के विशिष्ट लक्षण हैं। लू गर्म और शुष्क पवनें हैं। ये मई व जून के महीनों में उत्तरी मैदानों में चलती हैं। देश के कुछ उत्तरी पश्चिमी भागों में दिन का तापमान कभी-कभी 45 से भी अधिक हो जाता है।

ग्रीष्म ऋतु के विशिष्ट लक्षण हैं- गर्म व शुष्क मौसम, ‘लू’ (एक गर्म शुष्क पवन) का उत्तरी मैदानों में चलना, कभी-कभी बूंदाबांदी, दोपहर बाद धूल भरी आंधियां तथा केरल में आम्र वृष्टि, पं. बंगाल व असम में काल वैसाखी के रूप में हल्की वर्षा।

आगे बढ़ते दक्षिण पश्चिम मानसून की ऋतु

भारत के अधिकांश भागों में वर्षा इस ऋतु में होती है। यह दक्षिण पश्चिम मानसून जो केरल तट पर जून के पहले सप्ताह में पहुंचता है, के आगमन से प्रारम्भ होती है। ये पवनें भारत के अधिकांश भागों में मध्य जुलाई तक पहुंच जाती है। यह ऋतु सितम्बर माह तक रहती है। आर्द्रता से लदी इन गर्म पवनों से मौसमी दशाएं पूर्णत: बदल जाती है। इन पवनों के आने से अचानक वर्षा होने लगती है, जिससे तापमान काफी कम हो जाता है। तापमान में यह गिरावट 5 से 10 से. तक होती है। अचानक होने वाली इस वर्षा को ‘मानसून का टूटना या फटना’ कहते हैं। इन पवनों के आगमन में एक या दो सप्ताह की देरी हो सकती है। यह उत्तरी मैदानों तथा हिन्द महासागर पर वायु दाब की दशाओं पर निर्भर करता है।

पीछे हटते दक्षिण पश्चिम मानसून की ऋतु

दक्षिण पश्चिम मानसून पाकिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्रों व उत्तरी पश्चिमी भारत से सितम्बर के पहले सप्ताह से पीछे हटने लगते हैं, जहाँ वे सबसे अन्त में पहुँचते हैं। इन पवनों के पीछे हटने का मुख्य कारण भारत के उत्तर पश्चिमी भाग के निम्न दाब क्षेत्र का कमजोर होना है। सूर्य का विषुवत वृत्त की ओर आभासी गति तथा विस्तृत वर्षा का कारण तापमान के नीचे गिरने के साथ वायुदाब धीरे-धीरे उच्च होने लगता है। वायुमण्डलीय दाब के ढांचे में परिवर्तन के कारण दक्षिण पश्चिम मानसून पीछे हटता है। इसलिए इस अवधि को दक्षिण पश्चिम मानसून के पीछे हट जाती हैं। इसके परिणामस्वरूप इस ऋतु में स्वच्छ मौसमी दशायें पायी जाती हैं।

Comments

  1. Kya aap hindi ke संकेत m बता saket h .

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