संसाधन किसे कहते हैं और कितने प्रकार के होते हैं?

संसाधन किसे कहते हैं (sansadhan kise kahate hain) संसाधन शब्द का अभिप्राय मानवी उपयोग की वस्तुओं से है। ये प्राकृतिक और सांस्कृतिक दोनों हो सकती हैं। भूमि, जल, वन, वायु, खनिज घरों, भवनों, परिवहन एवं संचार के साधन ये संसाधन काफी उपयोगी भी हैं और मानव के विकास के लिए आवश्यक भी।

संसाधन किसे कहते हैं?

संसाधन की परिभाषा

संसाधन की परिभाषा (sansadhan ki paribhasha) विभिन्न विद्वानों ने संसाधन को परिभाषित किया है -

स्मिथ एवं फिलिप्स के अनुसार- ’’भौतिक रूप से संसाधन वातावरण की वे प्रक्रियायें हैं जो मानव के उपयोग में आती हैं।
 
जेम्स फिशर के शब्दों में- ’’संसाधन वह कोई भी वस्तु हैं जो मानवीय आवश्यकतों और इच्छाओं की पूर्ति करती हैं।
 
जिम्मर मैन के अनुसार- संसाधन पर्यावरण की वे विशेषतायें हैं जो मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति में सक्षम मानी जाती हैं, जैसे ही उन्हें मानव की आवश्यकताओं और क्षमताओं द्वारा उपयोगिता प्रदान की जाती हैं।

संसाधन का वर्गीकरण

संसाधन का वर्गीकरण (sansadhan ka vargikaran) संसाधनों को विभिन्न प्रकारों में वर्गीकृत कर सकते हैं। इनमें से प्रमुख वर्गीकरण और वर्गीकरण के आधार इस प्रकार से हैं:
  1. जैविक संसाधन
  2. अजैविक संसाधन
1. जैविक संसाधन - इन संसाधनों में वन, वनोत्पाद, फसलें, पछी, वन्य जीव, मछलियां व अन्य समुद्री जीव जैव संसाधनों के उदाहरण हैं। ये संसाधन नवीकरणीय है क्योंकि ये स्वयं को पुनरूत्पादित व पुनर्जीवित कर सकते हैं। कोयला और खनिज तेल भी जैविक संसाधन है, परंतु ये नवीकरणीय नहीं हैं।
  1. वन -  भारत में पाई जाने वाली वनस्पतियों को छ: मुख्य प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है। ये हैं- उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन, उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन, कटीली झाड़ियाँ, ज्वारीय वन और पर्वतीय वन।
  2. वन्य जीव - भारत में वन्य जीवों की बहुसंख्य प्रजातियाँ पाई जाती हैं। ज्ञात विश्व में, जानवरों की पाई जाने वाली कुल 1.05 मिलियन प्रजातियों में से लगभग 75000 (7-46%) भारत में पाई जाती हैं। 
  3. पशुधन -  विश्व की लगभग 57 प्रतिशत भैंसें व लगभग 15 प्रतिशत गाय-बैल भारत में पाये जाते हैं। भारत के दो तिहाई से ज्यादा मवेशी मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, उत्तराखण्ड, झारखण्ड, महाराष्ट्र, उड़ीसा, कर्नाटक व राजस्थान राज्यों में हैं। 
  4. मात्स्यिकी - भारत में विभिन्न प्रकार की मछलियों की 1800 से भी ज्यादा प्रजातियाँ विद्यमान हैं। भारत में चार प्रकार की माित्स्यकी, जैसे- सागरीय माित्स्यकी, स्वच्छ जल या अन्त:स्थलीय माित्स्यकी,एस्चुरी माित्स्यकी एवं पेरल मित्स्यकी पायी जाती हैं। 
2. अजैविक संसाधन - इन संसाधनों में पर्यावरण के समस्त निर्जीव पदार्थ सम्मिलित है। भूमि, जल, वायु और खनिज यथा लोहा, ताँबा, सोना आदि अजैविक संसाधन हैं। ये समाप्त होने योग्य हैं व पुनर्नवीनीकरण के योग्य नहीं है, क्योंकि ये न तो नवीनीकृत हो सकते हैं और न ही पुनरूपादित।
  1. भूमि संसाधन - भारत 32,87,263 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में विस्तृत हैं। क्षेत्र एवं आकार के आधार पर रूस, कनाड़ा, चीन, संयुक्त राज्य अमरीका, ब्राजील व मिस्र के बाद यह विश्व का सातवाँ सबसे बड़ा राष्ट्र है। यह वृहद् आकार स्वत: एक बहुत बड़ा संसाधन है। लगभग 30 प्रतिशत क्षेत्र पर्वतों से ढका है; जो कि दृश्य सौन्दर्य, सदानीरा नदियों, वनों एवं वन्य जीवों का स्रोत हैं। 
  2. जल संसाधन - संसाधनों में विविधता; हिमानियों, धरातलीय नदियों एवं भूमिगत जल, वर्षा एवं महासागरों के रूप भू-आकारों में विविधता का परिणाम है। अनुमानित औसत वार्षिक वर्षा 117 से.मी. है। भारत की पुनर्भरण योग्य भू-जल क्षमता 434 अरब घन मीटर है। आज, 70 प्रतिशत से भी ज्यादा जनसंख्या, अपनी घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भूजल का उपयोग करती है। आधे से भी ज्यादा सिंचाई इस स्त्रोत से प्राप्त होती है।
  3. खनिज संसाधन - भारत खनिज संसाधनों में बहुत ही धनी है और इसमें एक औद्योगिक शक्ति बनने की क्षमता है। यहाँ लौह अयस्क के आरक्षित क्षेत्रा, कोयला, खनिज तेल, बॉक्साइट व अभ्रक के व्यापक निक्षेप पाये जाते हैं। झारखण्ड, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में खनिज निक्षेपों का वृहद् संकेन्द्रण है। देश के कुल कोयला निक्षेप का तीन चौथाई भाग यहाँ है। भारत में पाये जाने वाले अन्य महत्वपूर्ण खनिज हैं- लौह अयस्क, मैगनीज, अभ्रक, बॉक्साइट और रेडियोधर्मी खनिज।
अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मानव प्रारंभ से ही संसाधनों का उपयोग करता रहा है। यह प्रक्रिया ‘संसाधन उपयोग’ कहलाती है। इस प्रकार संसाधन मनुष्य द्वारा निर्मित किए जाते हैं। 

संसाधन संरक्षण की विधियाँ

संसाधनो के संरक्षण से तात्पर्य उनके विवेकपूर्ण व नियोजित उपयोग के साथ ही उनके अपव्यय, दुरुपयोग व अति-उपयोग से बचाव करते हुए प्राकृतिक संसाधनों का पुन: उपयोग करना है। संसाधनों का नियोजित ढंग से उपयोग किया जाना चाहिए ताकि असंतुलन न उत्पन्न हो सके।
  1. संरक्षण के बारे में जागरूकता उत्पन्न की जाए। प्राकृतिक संसाधनों के बड़े पैमाने पर विनाश के घातक परिणामों के बारे में लोगों को जागरूक बनाना चाहिए। 
  2. वृक्षों को काटने से रोकना तथा लोगों में वृक्षों के रोपण तथा पोषण के बारे में जागरूकता उत्पन्न करना, वनों के संरक्षण में सहायक हो सकते हैं। 
  3. पहाड़ी क्षेत्रों में सीढ़ीदार कृषि, समोच्च रेखाओं के अनुरूप जुताई, झूमिंग कृषि पर नियंत्रण, अतिचराई तथा अवनालिकाओं को रोकना, मृदा संरक्षण की कुछ महत्वपूर्ण विधियाँ हैं। 
  4. वर्षा जल को रोकने के लिए बाँधों का निर्माण, सिंचाई तकनीकों का उपयोग, औद्योगिक या घरेलू उपयोग हेतु जल का पुनर्चक्रण अमूल्य जल संसाधन के संरक्षण में सहायता करेंगे। 
  5. खनिज अनवीकरणीय संसाधन है, इसलिए कुशल उपयोग, निकालने व शोधन की ज्यादा अच्छी तकनीकों का विकास, खनिजों का पुनर्चक्रण तथा स्थानापन्नों के उपयोग द्वारा इनका संरक्षण किया जाना चाहिए। 
  6. ऊर्जा के पारम्परिक स्त्रोतों को बचाने के लिए, ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्त्रोतों, जैसे- सौर, पवन या जल का विकास करना होगा।

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