संसाधन किसे कहते हैं?

अनुक्रम
संसाधन शब्द का अभिप्राय साधारणत: मानवी उपयोग की वस्तुओं से है। ये प्राकृतिक और सांस्कृतिक दोनों हो सकती हैं। मनुष्य प्रकृति के अपने अनुरूप उपयोग के लिए तकनीकों का विकास करता है। प्राकृतिक तंत्र में किसी तकनीक का जनप्रिय प्रयोग उसे एक सभ्यता में परिणित करता है, यथा जीने का तरीका या जीवन निर्वाह। इस प्रकार यह सांस्कृतिक संसाधन की स्थिति प्राप्त करता है।
  1. संसाधन राष्ट्र की अर्थव्यवस्था के आधार का निर्माण करते हैं। भूमि, जल, वन, वायु, खनिज के बिना कोई भी कृषि व उद्योग का विकास नहीं कर सकता। 
  2. ये प्राकृतिक पर्यावरण जैसे कि वायु, जल, वन और विभिन्न जैव रूपों का निर्माण करते हैं, जो कि मानवीय जीवन एवं विकास हेतु आवश्यक है।
  3. इन प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से मनुष्य ने घरों, भवनों, परिवहन एवं संचार के साधनों, उद्योगों आदि के अपने संसार का निर्माण किया है। ये मानव निर्मित संसाधन प्राकृतिक संसाधनों के साथ काफी उपयोगी भी हैं और मानव के विकास के लिए आवश्यक भी।

संसाधन की परिभाषा

  1. स्मिथ एवं फिलिप्स के अनुसार- ’’भौतिक रूप से संसाधन वातावरण की वे प्रक्रियायें हैं जो मानव के उपयोग में आती हैं।’’
  2. जेम्स फिशर के शब्दों में- ’’संसाधन वह कोई भी वस्तु हैं जो मानवीय आवश्यकतों और इच्छाओं की पूर्ति करती हैं।’’
  3.  जिम्मर मैन के अनुसार-  ‘‘संसाधन पर्यावरण की वे विशेषतायें हैं जो मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति में सक्षम मानी जाती हैं, जैसे ही उन्हे मानव की आवश्यकताओं और क्षमताओं द्वारा उपयोगिता प्रदान की जाती हैं।’’

संसाधनों का वर्गीकरण

संसाधनों को इन आधारों पर कई तरीकों से वर्गीकृत किया जा सकता है: (i) पुनर्नवीनीकरण, (ii) उत्पत्ति और (iii) उपयोग।

जैविक संसाधन 

इन संसाधनों में पर्यावरण के समस्त जीवित तत्व सम्मिलित हैं। वन, वनोत्पाद, फसलें, पछी, वन्य जीव, मछलियां व अन्य समुद्री जीव जैव संसाधनों के उदाहरण हैं। ये संसाधन नवीकरणीय है क्योंकि ये स्वयं को पुनरूत्पादित व पुनर्जीवित कर सकते हैं। कोयला और खनिज तेल भी जैविक संसाधन है, परंतु ये नवीकरणीय नहीं हैं।

जैविक संसाधनों का वितरण

  1. वन -  भूगोल विषय में जब हम ‘वितरण’ शब्द का प्रयोग करते हैं तब इसका मुख्य तात्पर्य भौगोलिक परिघटनाओं/घटनाओं के भौगोलिक या स्थानिक वितरण से होता है। अन्यथा, एक समाजशास्त्राी के लिए वितरण का अर्थ मुख्यत: समाज की विभिन्न सामाजिक श्रेणियों में वितरण से है। पृथ्वी की परिघटनाओं का भौगोलिक अध्ययन करते समय एक भूगोलवेत्ता के दृष्टिकोण से प्रथम एवं महत्वपूर्ण कार्य, इन परिघटनाओं, (इस संदर्भ में वनों का वितरण), की क्षेत्राीय विभिन्नताओं को समझना तथा इस हेतु उत्तरदाई कारणों का परीक्षण करना है। वर्तमान में भारत की 75.5 मिलियन हेक्टेयर भूमि वनाच्छादित है, जो कि कुल भौगोलिक क्षेत्राफल का लगभग 23% है। वनों के वितरण में लगभग 83% का अंतर पाया जाता है, जो कि अंडमान व निकोबार द्वीप समूह में 87% है वहीं हरियाणा में केवल 4% हमारी राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार, पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने के लिए, देश के कुल भौगोलिक क्षेत्राफल के 33%भू-भाग को वनाच्छादित होना चाहिए। दुर्भाग्यवश, यह हमारी वन नीति में निर्धारित (रेखाकित) मानदण्ड से नीचे है। भारत में पाई जाने वाली वनस्पतियों को छ: मुख्य प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है। ये हैं- उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन, उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन, कटीली झाड़ियाँ, ज्वारीय वन और पर्वतीय वन।
  2. वन्य जीव - भारत में वन्य जीवों की बहुसंख्य प्रजातियाँ पाई जाती हैं। ज्ञात विश्व में, जानवरों की पाई जाने वाली कुल 1.05 मिलियन प्रजातियों में से लगभग 75000 (7-46%) भारत में पाई जाती हैं। भारत में पंछियों की 1200 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। स्तनपायी जीवों में, हमारे पास विशालकाय हाथी है, जो कि असम, केरल व कर्नाटक के वनों में पाया जाता है। ऊँट शुष्क क्षेत्रों में व जंगली गधे गुजरात के कच्छ के रन में पाये जाते हैं। गुजरात के गीर वनों में भारतीय सिंह मिलते हैं। एक सींगवाला गेंडा असम व पश्चिमी बंगाल के दलदली क्षेत्रों में पाया जाता है। भारत में बंदरों व हिरणों की कई प्रजातियाँ हैं। यहाँ पाये जाने वाले कुछ सबसे सुन्दर जानवरों में चौसिंगा, कृष्ण मृग व चिंकारा शामिल हैं। हिरण की प्रजातियों में हाँगुल (कश्मीर मृग), स्वाम्प हिरण, चीतल, कस्तूरी मृग और पिसूरी सम्मिलित हैं। बिल्ली परिवार के अंतर्गत आने वाले जानवरों में तेंदुआ, क्लाउडेड तेंदुआ व हिम तेंदुआ है। हिमालय श्रेणियों में कई दिलचस्प जानवर जैसे कि जंगली भेड़, पहाड़ी बकरी, साकिन, छंछूंदर और तापिर पाये जाते हैं। हमारे देश में पंछियों का जीवन भी समान रूप से समृद्ध व रंगीन है। शानदार मोर भारत का राष्ट्रीय पक्षी है। वनों एवं नम भूमियों में फेजेण्ट, गीज, बतख, मैना, तोते, कबूतर, क्रेन (सारस), धनेश और सनबर्ड पाये जाते हैं। यहाँ कोयल व बुलबुल जैसे गाने वाले पंछी भी मिलते हैं।
  3. पशुधन -  विश्व की लगभग 57 प्रतिशत भैंसें व लगभग 15 प्रतिशत गाय-बैल भारत में पाये जाते हैं। भारत के दो तिहाई से ज्यादा मवेशी मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, उत्तराखण्ड, झारखण्ड, महाराष्ट्र, उड़ीसा, कर्नाटक व राजस्थान राज्यों में हैं। भारत की कुल भेड़ों का एक चौथाई से ज्यादा हिस्सा राजस्थान में है जबकि भारत की आधे से ज्यादा बकरियां, बिहार, झारखण्ड, राजस्थान, पश्चिमी बंगाल व उत्तर प्रदेश में पायी जाती हैं। कृषि कार्य में प्रयुक्त होने वाले पशु जैसे कि बैल, भैंस, गाय आदि भारत में कृषक समुदाय के मित्रा हैं। ये विभिन्न कृषि कार्यों यथा जुताई, बुवाई, गहाई और कृषि उत्पादों के परिवहन में प्रयुक्त किये जाते हैं। इसके बाद भी कृषि के मशीनीकरण के साथ विशेषकर उत्तर-पश्चिमी भारत, तटीय आंध्र प्रदेश व तमिलनाडु व कुछ अन्य क्षेत्रों में कृषि कार्यों में पशु शक्ति का महत्व कम हो रहा है। गाय व भैंस द्वारा दूध और भेड़ से ऊन, मांस व चमड़े की प्राप्ति होती है। बकरियों से दूध, माँस, बाल व चमड़ा मिलता है। अंडे व पंखों के लिए चूजे, बतखें, गीज़ व टर्की पाली जाती हैं।
  4. मात्स्यिकी - लगभग 20 लाख वर्ग किलोमीटर के विशाल महाद्वीपीय आकार, बड़ी झीलों व नदियों में मछलियों के भोजन की पर्याप्त उपलब्धता, सागरीय धाराओं और कुशल मछुआरों के कारण देश में माित्स्यकी के विकास के प्रचुर अवसर हैं। यहाँ सागरों व महासागरों में सागरीय माित्स्यकी तथा झीलों, नदियों व जलाशयों में अंत:स्थलीय माित्स्यकी की जाती है। भारत में विभिन्न प्रकार की मछलियों की 1800 से भी ज्यादा प्रजातियाँ विद्यमान हैं। भारत में चार प्रकार की माित्स्यकी, जैसे- सागरीय माित्स्यकी, स्वच्छ जल या अन्त:स्थलीय माित्स्यकी,एस्चुरी माित्स्यकी एवं पेरल मित्स्यकी पायी जाती हैं। वार्षिक मत्स्य उत्पादन में सागरीय माित्स्यकी का हिस्सा लगभग 63 प्रतिशत है। यहां की प्रमुख मछलियाँ सैरडाइन्स, मैकेरल, प्रॉन, क्लूपिओइड्स और सिल्वर बेलीज़ हैं। देश के कुल मत्स्य उत्पादन का लगभग 37 प्रतिशत भाग अंत:स्थलीय माित्स्यकी से आता है। प्रमुख मछलियाँ कतला, रोहिता, काला बासिल, मंृगल और कार्प हैं। देश की सागरीय मछलियों के कुल उत्पादन का 97 प्रतिशत से ज्यादा भाग व अंत:स्थलीय मछलियों का 77 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा केरल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक एवं गुजरात से आता है। यहाँ ध्यान देने योग्य है, कि ये सभी तटीय राज्य हैं।

अजैविक संसाधन 

इन संसाधनों में पर्यावरण के समस्त निर्जीव पदार्थ सम्मिलित है। भूमि, जल, वायु और खनिज यथा लोहा, ताँबा, सोना आदि अजैविक संसाधन हैं। ये समाप्त होने योग्य हैं व पुनर्नवीनीकरण के योग्य नहीं है, क्योंकि ये न तो नवीनीकृत हो सकते हैं और न ही पुनरूपादित।
  1. प्राकृतिक संसाधन मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं, ये प्रकृति के मुफ्त उपहार हैं। उदाहरणार्थ - भूमि, जल, मृदा आदि। 
  2. कोई पदार्थ जो कि मनुष्य के लिए मूल्यवान व उपयोगी है, संसाधन कहलाता है। 
  3. संसाधन प्राकृतिक पर्यावरण जैसे कि वायु, जल, वन और विभिन्न जैव रूप का निर्माण करते हैं, जो कि मानव के जीवन यापन व विकास के लिए आवश्यक है। 
  4. संसाधन उत्पत्ति, पुनर्नवीकरण व उपयोग के आधार पर वर्गीकृत किए जा सकते हैं।

अजैविक संसाधनों का वितरण

  1. भूमि संसाधन - भारत 32,87,263 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रा में विस्तृत हैं। क्षेत्रा एवं आकार के आधार पर रूस, कनाड़ा, चीन, संयुक्त राज्य अमरीका, ब्राजील व मिस्र के बाद यह विश्व का सातवाँ सबसे बड़ा राष्ट्र है। यह वृहद् आकार स्वत: एक बहुत बड़ा संसाधन है। लगभग 30 प्रतिशत क्षेत्रा पर्वतों से ढका है; जो कि दृश्य सौन्दर्य, सदानीरा नदियों, वनों एवं वन्य जीवों का स्त्रोत हैं। भूमि का लगभग 43 प्रतिशत क्षेत्रा मैदान होने के कारण कृषि के लिए सर्वथा उपयुक्त है। शेष 27 प्रतिशत क्षेत्रा पठारों के अंतर्गत आता है, जो कि खनिजों एवं धातुओं का भंडार है।
  2. जल संसाधन - भारत भाग्यशाली है कि उसके पास विशाल जल संसाधन हैं। संसाधनों में विविधता; हिमानियों, धरातलीय नदियों एवं भूमिगत जल, वर्षा एवं महासागरों के रूप भू-आकारों में विविधता का परिणाम है। अनुमानित औसत वार्षिक वर्षा 117 से.मी. है। भारत में नदियाँ धरातलीय जल का प्रमुख स्रोत हैं। सिंधु, गंगा व ब्रह्मपुत्रा कुल धरातलीय जल का लगभग 60 प्रतिशत वहन करती हैं। भारत की पुनर्भरण योग्य भू-जल क्षमता 434 अरब घन मीटर है। आज, 70 प्रतिशत से भी ज्यादा जनसंख्या, अपनी घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भूजल का उपयोग करती है। आधे से भी ज्यादा सिंचाई इस स्त्रोत से प्राप्त होती है।
  3. खनिज संसाधन - भारत खनिज संसाधनों में बहुत ही धनी है और इसमें एक औद्योगिक शक्ति बनने की क्षमता है। यहाँ लौह अयस्क के आरक्षित क्षेत्रा, कोयला, खनिज तेल, बॉक्साइट व अभ्रक के व्यापक निक्षेप पाये जाते हैं। झारखण्ड, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में खनिज निक्षेपों का वृहद् संकेन्द्रण है। देश के कुल कोयला निक्षेप का तीन चौथाई भाग यहाँ है। भारत में पाये जाने वाले अन्य महत्वपूर्ण खनिज हैं- लौह अयस्क, मैगनीज, अभ्रक, बॉक्साइट और रेडियोधर्मी खनिज।

संसाधनों का उपयोग

अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मानव प्रारंभ से ही संसाधनों का उपयोग करता रहा है। यह प्रक्रिया ‘संसाधन उपयोग’ कहलाती है। इस प्रकार संसाधन मनुष्य द्वारा निर्मित किए जाते हैं। किंतु उसे इन निष्क्रिय उपादानों को मूल्यवान संसाधनों में परिवर्तित करने के लिए संस्कृति की सहायता की आवश्यकता होती है। संस्कृति में समस्त उपकरण एवं मशीनें, परिवहन एवं संचार के साधन साथ ही प्रभावी प्रबंधन, सामूहिक सहयोग, मनोरंजन, बौद्धिक कार्य, शिक्षा, प्रशिक्षण, उन्नत स्वास्थ्य एवं शिक्षा शामिल हैं। संस्कृति के बिना मनुष्य की कार्य एवं उत्पादन की क्षमता सीमित है। आधुनिक युग में, विज्ञान एवं तकनीक के उपयोग ने उत्पादन हेतु संसाधनों के प्रभावी उपयोग की मनुष्य की क्षमता एवं योग्यता बढ़ा दी है। उदाहरण के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका व पश्चिम यूरोपीय देशों के पास, उन्नत तकनीक द्वारा प्राकृतिक सम्पदा के प्रभावी उपयोग के लिए ‘उच्च विकसित अर्थव्यवस्था’ है। दूसरी ओर, अफ्रीका, एशिया व लैटिन अमेरिका के कई देश प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों के होते हुए भी विकास के स्तरों में काफी पीछे हैं क्योंकि ये देश आधुनिक तकनीक के मामले में भी काफी पीछे हैं।

भारत में संसाधन उपयोग की सीमा

प्राकृतिक संसाधनों ने हमारे देश के सामाजिक-आर्थिक विकास में सार्थक भूमिका अदा की है। भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा कृषीय देश है। ऐसा इसलिए क्योंकि विभिन्न फसलों को उगाने के लिए यहाँ विविध जलवायविक दशाएँ और अंतहीन मौसम पाया जाता है। भारत की विशाल खनिज सम्पदा ने इसे औद्योगिक रूप से विकसित होने में समर्थ बना दिया है। हाल के दशकों में न केवल तेजी से बढ़ती जनसंख्या को भोजन देने बल्कि विशाल भारतीय जनसंख्या के आर्थिक कल्याणों को गति प्रदान करने की इच्छा ने संसाधनों के उपयोग को चमत्कारिक रूप से बढ़ा दिया है। संसाधनों के अधारणीय उपयोग के कारण इसने पर्यावरणीय एवं परिस्थितिकीय असंतुलन को बढ़ाया है। संसाधनों का उपयोग कुल सामाजिक लाभों को अधिक करने के स्थान पर उत्पादन एवं लाभों को अधिकतम करने की प्ररेणा से किया गया। मृदा अपरदन, वन नाशन, अति चराई तथा वनों के असावधानीपूर्ण प्रबंधन के कारण मृदा जैसे मूल्यवान संसाधन का ह्रास हो रहा है। अवैज्ञानिक कृषि क्रियाएँ जैसे- उत्तर-पूर्वी भारत में झूमिंग कृषि और रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग के साथ अति सिंचाई के परिणामस्वरूप मृदा के पोषक तत्वों में कमी, जल भराव व लवणता की समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं। तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या के दबाव के कारण उपलब्ध जल संसाधनों का शोषण हो रहा है जिस कारण ये तेजी से कम हो रहे हैं। तकनीकी कमी के कारण भारतीय नदियों के कुल वार्षिक प्रवाह का लगभग 38 प्रतिशत ही उपयोग के लिए उपलब्ध है। यही स्थिति भू जल के उपयोग की है। स्वतन्त्राता के पश्चात्, माित्स्यकी उद्योग ने विशेषकर सागरीय माित्स्यकी ने पारंपरिक व निर्वाही व्यवसाय को बाजार चालित अरबों रुपये के उद्योग के रूप में बदलते देखा है। वर्तमान में भारत करीब 55 श्रेणियों में सागरीय उत्पादों का दक्षिण एशियाई व यूरोपीय देशों तथा संयुक्त राज्य अमेरिका को निर्यात करता है।
  1. मनुष्य प्रारंभिक समय से ही अपनी भौतिक व आत्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संसाधनों का उपयोग करता रहा है और यह प्रक्रिया ‘संसाधन उपयोग’ कहलाती है। 
  2. मृदा अपरदन, वन नाशन व अति चराई के कारण मूल्यवान मृदा संसाधन अवक्षय की आशंका से घिरे हैं।

संसाधनों का संरक्षण

संसाधनो के संरक्षण से तात्पर्य उनके विवेकपूर्ण व नियोजित उपयोग के साथ ही उनके अपव्यय, दुरुपयोग व अति-उपयोग से बचाव करते हुए प्राकृतिक संसाधनों का पुन: उपयोग करना है। आज संसाधनों का कम होना चिंता का सबसे बड़ा विषय है। उत्पादन की अधिकतम सीमा तक पहुंचने के क्रम में हम उन सभी संसाधनों का प्रयोग कर रहे हैं, जो भावी पीढ़ी की संपत्ति हैं। सतत पोषणीय विकास के विचार के अनुसार संसाधन विरासत हैं, जो कि मानव समाज की एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होते हैं। नवीकरण के अयोग्य संसाधन कुछ समय बाद समाप्त हो सकते हैं, इसलिए जनसंख्या वृद्धि व संसाधनों के उपयोग के मध्य एक संतुलन बनाना आवश्यक है। वास्तव में इस प्रकार का संतुलन समय व स्थान के संदर्भ में भिन्न होता है। नि:संदेह, हमें किसी क्षेत्रा या देश में जनसंख्या व संसाधनों के मध्य स्थैतिक की जगह गतिशील संतुलन को देखना पड़ता है। इन दोनो में से किसी एक में असंतुलन हमारे आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास की निरंतरता को भंग कर सकता है। इसलिए, संसाधनों का नियोजित ढंग से उपयोग किया जाना चाहिए ताकि असंतुलन न उत्पन्न हो सके।

संसाधनों के संरक्षण की विधियाँ

  1. यह आवश्यक है कि लोगों के मध्य संसाधनों के परिरक्षण व संरक्षण के बारे में जागरूकता उत्पन्न की जाए। प्राकृतिक संसाधनों के बड़े पैमाने पर विनाश के घातक परिणामों के बारे में लोगों को जागरूक बनाना चाहिए। 
  2. वनरोपण : अपरिपक्व तथा युवा वृक्षों को काटने से रोकना तथा लोगों में वृक्षों के रोपण तथा पोषण के बारे में जागरूकता उत्पन्न करना, वनों के संरक्षण में सहायक हो सकते हैं। 
  3. पहाड़ी क्षेत्रों में सीढ़ीदार कृषि, समोच्च रेखाओं के अनुरूप जुताई, झूमिंग कृषि पर नियंत्राण, अतिचराई तथा अवनालिकाओं को रोकना, मृदा संरक्षण की कुछ महत्वपूर्ण विधियाँ हैं। 
  4. वर्षा जल को रोकने के लिए बाँधों का निर्माण, फव्वारा, ड्रिप या ट्रिकल सिंचाई तकनीकों का उपयोग, औद्योगिक या घरेलू उपयोग हेतु जल का पुनर्चक्रण अमूल्य जल संसाधन के संरक्षण में सहायता करेंगे। 
  5. खनिज अनवीकरणीय संसाधन है, इसलिए कुशल उपयोग, निकालने व शोधन की ज्यादा अच्छी तकनीकों का विकास, खनिजों का पुनर्चक्रण तथा स्थानापन्नों के उपयोग द्वारा इनका संरक्षण किया जाना चाहिए। 
  6. ऊर्जा के पारम्परिक स्त्रोतों को बचाने के लिए, ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्त्रोतों, जैसे- सौर, पवन या जल का विकास करना होगा।
  1. संसाधनों के संरक्षण से तात्पर्य उनके विवेकपूर्ण व नियोजित उपयोग के साथ ही उनके अपव्यय, दुरूपयोग तथा अति-उपयोग से बचाव करते हुए प्राकृतिक संसाधनों का पुन: उपयोग करना है। 
  2. यह आवश्यक है कि लोगों के मध्य संसाधनों के परिरक्षण तथा संरक्षण के बारे में जागरूकता उत्पन्न की जाए।
  3. अनवीकरणीय संसाधनों का संरक्षण तथा सर्वाधिक उचित उपयोग आवश्यक है।

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